क्या इन बेटियों की आवाज़ सुनने वाला कोई है, या पूरी सरकार बहरी हो चुकी है?
बहरी तो शायद नहीं होगी, क्योंकि जंतर-मंतर पर दी गई गालियाँ अगर सत्ता के कानों तक पहुँच सकती हैं, तो इन बेटियों की पुकार भी ज़रूर पहुँच रही होगी।
फिर सवाल उठता है - आख़िर उनकी शिकायतों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? दोषियों पर जवाबदेही तय क्यों नहीं की जा रही? या फिर सत्ता की यह चुप्पी ही किसी संरक्षण का संकेत है?
"मैं स्कूलों में राजनीतिक पार्टियों के आने और वहाँ कार्यक्रम करने पर रोक लगा रहा हूँ। स्कूल पढ़ाई के लिए हैं, राजनीति के लिए नहीं।"
थलापति विजय, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री
सुकरात की तरह हम भी इसी सदन में जहर खाकर मर जाएंगे,
लेकिन महिला आरक्षण बिल के नाम पर
90 फीसदी गरीबों का गला नहीं कटने देंगे,
अफ़सोस आज शरद य��दव जैसा पिछड़ों का कोई नेता सदन में नहीं है,
सरकारी स्कूल क्यों लगातार बंद हो रहे है?
क्यों इन स्कूलों के बंद होने से किसी को फर्क नही पड़ रहा, कैसे नेताओं की इतनी हिम्मत है कि वो ये कर रहे है? 🤔
सुनिए नीतू मैडम और विजेंद्र चौहान की इस विषय पर महत्वपूर्ण बात। 👇🏻👇🏻
मैंने ज़मीन के भीतर से निकली हुई बुद्ध की जितनी प्रतिमाएँ देखी हैं, उतनी शायद ही किसी और देवी-देवता की मिली हों। इतिहास खुद गवाही देत��� है कि यह विरासत कितनी व्यापक और गहरी है।
सत्ता का गुड़गान करने वाले बॉलीवुड के अभिनेताओं के इस गाने “मोदी है तो मुमकिन है” से अच्छा है तो ये अपूर्वा झा का गाना “All IZZ Hell”है।
जो भ्रष्टाचार, महंगाई, प्रदूषण में डूबे भारत को दिखा रहा है।
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"दलितों को जाटव और OBC को यादवों के खिलाफ भड़का दो, एकता टूट जाएगी।"
~पूर्व जज CB Pandey
10% अकेले डकारने वाले पांडे बता रहे है कि देश को कैसे तोड़ना है।
'फूट डालो राज करो' अंग्रेजों की नहीं बल्कि तनातनी परंपरा रही है! जाति बनाकर समाज को तोड़ने वाले आज भी उसी कुकर्म में लिप्त है।
बिहार चुनाव की हार के विश्लेषण में मैंने एक interesting narrative देखा है जिसमें "experts" राजद और विपक्ष की arrogance/ उद्दंडता की बात कर रहे हैं। सच बताइए, दिक्कत उद्दंडता से है या इस बात से कि उद्दंडता "पिछड़ी" जाति के लोग ��र रहे हैं? जिन सड़कों से, गाड़ियों से, चौराहों से एक हजारों साल पुराने system का फायदा उठाने वालों ने उन्हें वंचित रखा, उन जगहों पर वो अपना claim रखने की कोशिश कर रहे हैं तो बुरा लग रहा है? उनकी हिम्मत हज़म नहीं हो रही?
और ये बात तो कर ही नहीं रही कि वहां हजारों बीघे कौड़ियों के भाव पूंजीपति को बेच दिया, चुनाव से ठीक पहले करोड़ों रुपए बांट दिए, हवाओं में नफ़रत की अफ़ीम घोल दी, लोकतंत्र में नागरिक का मौलिक अधिकार, उसका वोट तक चुरा लिया, लेकिन विपक्ष को उद्दंडता नहीं करनी चाहिए थी, है न? प्रियंका और कंचना को थोड़ा मधुर वाणी में बोलना चाहिए था, हैं न? फासीवादी है तो क्या हुआ, भाषा की मर्यादा तो रखता है सत्ता पक्ष! विपक्ष को भी प्यार से बोलना चाहिए था।
ये है इस देश का political discourse.
“सुरक्षा कारणों से चुनाव प्रचार करने नहीं जा रहा हूँ क्यूंकि बिहार में जंगलराज है”
आज़म ख़ान साहब ने बीजेपीबी की B, C टीम से बिहार के मुसलमानों को सावधान किया