कुछ कहानिय��ँ ऐसी होती हैं,
जिन्हें देखकर शायद भगवान भी हैरान हो जाते होंगे। शायद सोचते होंगे कि मैंने कैसा इंसान बनाया है, जो न रुक रहा है, न थक रहा है, और हर मुश्किल को हराकर आगे बढ़ता जा रहा है।
ऐसी ही कहानी है शर्मीला धनकर ��ी...
शर्मीला सिर्फ 2 साल की थीं, जब उन्हें पोलियो हो गया। इस वजह से उनका दायाँ पैर हमेशा के लिए प्रभावित हो गया।
पोलियो ने उनका जीवन पहले ही बहुत मुश्किल बना दिया था। लेकिन किस्मत यहीं नहीं रुकी। उनका परिवार भी बेहद गरीब था।
घर में इतनी गरीबी थी कि खाने के लिए पैसे नहीं, पढ़ाई के लिए पैसे नहीं, पहनने के लिए ढंग के कपड़े नहीं, रहने के लिए अच्छा घर नहीं और न ही कोई सुविधा।
उनकी माँ भी अंधी थीं। ऐस�� में शर्मीला का पूरा बचपन बहुत गरीबी और तंगी में बीता।
वह पढ़ाई में अच्छी थीं, लेकिन घर की हालत ऐसी नहीं थी कि आगे पढ़ सकें। इसलिए कम उम्र में ही उनकी शादी कर दी गई।
उन्हें लगा कि शायद अब जिंदगी बदल जाएगी।
जिंदगी बदली जरूर, लेकिन और ज्यादा दुख लेकर...
उनके पति बहुत अत्याचारी निकले। रोज मारपीट, बेइज्जती और ताने उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गए।
उन्होंने सालों तक यह सब सहा। फिर दो बेटियों के जन्म के बाद हालात और भी खराब हो गए। एक दिन उनके पति ने उन्हें दोनों बेटियों के साथ घर से निकाल दिया। उस समय उनकी छोटी बेटी को पैदा हुए सिर्फ 37 दिन हुए थे।
हर कोई जानता है कि बच्चे के जन्म के बाद एक महिला को संभलने और ठीक होने में कई महीने लगते हैं। लेकिन शर्मीला को सिर्फ 37 दिन बाद ही अपनी दोनों बेटियों के साथ सड़क पर आना पड़ा।
अब न सिर पर छत थी, न कोई सहारा।
लेकिन शर्मीला हार मानने वालों में से नहीं थीं। उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी और अपने माता-पिता के पास लौट आईं।
दिव्यांग होने की वजह से उनके पास काम के मौके भी बहुत कम थे। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी और जैसे-तैसे जिंदगी चलाती रहीं।
कुछ समय बाद उनकी दूसरी शादी हुई और यहीं से उनक�� जिंदगी ने नया मोड़ लिया।
उनके दूसरे पति और उनकी माँ ने हर कदम पर उनका साथ दिया। दोनों ने मिलकर उन्हें पैरा स्पोर्ट्स में करियर बनाने के लिए पूरी मदद की।
उनके पति ने अपनी सारी जमा-पूंजी उनकी ट्रेनिंग पर लगा दी। वहीं उनकी माँ ने भी अपना छोटा-सा प्लॉट बेच दिया, ताकि बेटी अच्छी ट्रेनिंग ले सके।
यानी जिस कमी को लोग उनकी कमजोरी समझते थे, शर्मीला ने उसी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया।
आज 40 साल की ���र्मीला ने महिलाओं की F57 शॉट पुट स्पर्धा में कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वह भारत की पहली पैरा एथलीट बनीं, जिसने कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता।
उन्होंने पोलियो, गरीबी और घरेलू हिंसा जैसी बड़ी-बड़ी मुश्किलों को हराकर यह मुकाम हासिल किया।
आज उनकी 15 और 12 साल की दोनों बेटियाँ भी खेलों में अपना भविष्य बना रही हैं। बड़ी बेटी जेवलिन थ्रो की खिलाड़ी है, जब��ि छोटी बेटी लॉन्ग जंप करती है।
दोनों का सपना है कि आने वाले कॉमनवेल्थ गेम्स में वे अपनी माँ के साथ भारत के लिए खेलें।
ज़रा सोचिए, वह पल कितना गर्व का होगा, जब माँ और उनकी दोनों बेटियाँ एक साथ भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी।
जिस शर्मीला को सिर्फ 10 साल पहले बेइज्जत करके अपनी बेटियों के साथ सड़क पर छोड़ दिया गया था, आज उसी शर्मीला ने पूरे भारत का सिर गर्व से ऊँचा कर दिया है।
और बहुत जल्द वह दिन भी आएगा, जब शर्मीला और उनकी दोनों बेटियाँ मिलकर दुनिया के सामने तिरंगे की शान और भी ऊँची करेंगी।
🚨आवाज़ उठाओ – अब बदलाव जरूरी है!🚨
नौकरी करने वाले का महीना 30 से 31 दिन का होता है,
दूध वाले का महीना भी 30 से 31 दिन का होता है…!
लेकिन मोबाइल रिचार्ज कराने वाले का महीना 28 दिन का क्यों?
हर बार 349 -399 रुपये का रिचार्ज,
और साल में 12 नहीं बल्कि 13 बार Sim Recharge कराना क्या ये सही है?
क्या आम जनता से ऐसे ही ज्यादा पैसा लिया जाएगा?
अगर आप भी चाहते हैं कि
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तो अब चुप मत रहो…
अपनी आवाज उठाओ और इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा से ज्यादा Repost करें
एकजुट होंगे तभी बदलाव आएगा! #RaghavChadha
सुख, शांति एवं समृद्धि की असीम मंगलकामनाओं के साथ आप सभी को शक्ति की आराधना के पावन पर्व #चैत्र_नवरात्रि और #नववर्ष की हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं ….. 🙏🚩
🍁🙏 #जय_मां_भवानी 🙏🚩
मोबाइल रीचार्ज खत्म होने के बाद इनकमिंग ��ॉल बंद हो जाना और महीने के नाम पर 28 दिन का रीचार्ज प्लान रखने के मुद्दे पर सांसद राघव चड्डा ने पार्लियामेंट में रखी अपनी बात! @raghav_chadha
द्वंद्व कहां तक पाला जाए
युद्ध कहां तक टाला जाए
तू भी है राणा का वंशज
फेंक जहां तक भाला जाए कहना तो नहीं चाहता हूं पर जाति प्रमाण पत्र वालों को जब जाति प्रमाण पत्र बनवाने में शर्म नहीं। आती तो आस्था सिंह के खुदको ठाकुर करने पर तो गर्व होना ही चाहिए
#ISupport_ASTHA_SINGH
ठाकुर हूँ, B@KCh@di मत करना।
एक तरफ़ बैंक में कस्टमर गाली-गलौज कर रहा है, महिला कर्मचारी को बेइज्ज़त करने की कोशिश कर रहा है और दूसरी तरफ़ वही महिला जब अपनी इज्ज़त बचाने के लिए बोलती है 'मैं ठाकुर हूँ, मेरे साथ ज़्यादा मत करो' तो पूरी सोशल मीडिया पर हंगामा मचा दिया गया!
क्या ये इंसाफ़ है? क्या ये न्याय है?
आप पहले पूरा वीडियो देख लीजिए कस्टमर पहले से ही गाली दे रहा था, बदतमीज़ी कर रहा था!
लेकिन वायरल क्लिप में सिर्फ़ आस्था सिंह की वो एक लाइन दिखा दी गई।
अब सवाल ये है क्या कर्मचारी की इज्ज़त की रक्षा करना गलत है? क्या ठाकुर होना अपराध हो गया? या फिर ये सब जातिवादी एंगल देकर मसला भड़काने की साज़िश है?
ऐसे लोगों से सवाल कौन करेगा? बैंक ने कर्मचारी को क्यों नहीं बचाया? और जो लोग सिर्फ़ क्लिप देखकर फैसला सुना रहे हैं, वो पूरा सच क्यों नहीं देखते.?