🙏 गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ 🙏
🗓️ गुरु पूर्णिमा: 29 जुलाई 2026, बुधवार
🗓️ पूर्णिमा तिथि: 28 जुलाई सायं 06:18 बजे से 29 जुलाई रात्रि 08:05 बजे तक
गुरु पूर्णिमा सनातन धर्म का एक अत्यंत पावन पर्व है। प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को यह उत्सव ज्ञान, साधना, कृतज्ञता और गुरु-शिष्य परंपरा के सम्मान के रूप में मनाया जाता है। इस दिन जगद्गुरु महर्षि वेदव्यास की जयंती होने के कारण इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
गुरु वह हैं, जो शिष्य को अज्ञानरूपी अंधकार से निकालकर ज्ञान, विवेक और आत्मबोध के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु केवल शास्त्रों का ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि जीवन को धर्म, सत्य और ईश्वर की दिशा में अग्रसर करने का मार्ग भी दिखाते हैं।
इस दिन प्रातः स्नान कर भगवान श्रीहरि विष्णु, भगवान वेदव्यास तथा अपने गुरुदेव का श्रद्धापूर्वक पूजन करें। दीप, धूप, पुष्प, अक्षत, फल एवं नैवेद्य अर्पित करें। यदि गुरु सान्निध्य में हों तो उनके चरणों में प्रणाम कर आशीर्वाद प्राप्त करें, और यदि दूर हों तो मन, वचन एवं कर्म से उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें।
📖 शास्त्रीय संदर्भ
🔹 मुण्डकोपनिषद् (१.२.१२)
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्
समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥
अर्थ: ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए शिष्य को ऐसे गुरु की शरण में जाना चाहिए जो शास्त्रों के ज्ञाता तथा ब्रह्मनिष्ठ हों।
🔹 श्रीमद्भागवत महापुराण (११.१७.२७)
आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्।
न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः॥
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं— आचार्य को मेरा ही स्वरूप समझना चाहिए। उनमें कभी साधारण मनुष्य की बुद्धि नहीं करनी चाहिए, क्योंकि गुरु समस्त देवताओं का स्वरूप हैं।
🔹 भगवद्गीता (४.३४)
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
अर्थ: विनम्रतापूर्वक प्रणाम, सेवा और उचित प्रश्नों के द्वारा तत्त्वदर्शी गुरु से ज्ञान प्राप्त करो।
🌺 गुरु पूर्णिमा का संदेश
गुरु के प्रति श्रद्धा, सेवा, समर्पण और कृतज्ञता ही साधना की वास्तविक नींव है। गुरु का कृपाप्रसाद ही जीवन को धर्म, ज्ञान, शांति और आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाता है।
तस्मै श्रीगुरवे नमः। 🙏
#GuruPurnima #गुरु_पूर्णिमा #व्यास_पूर्णिमा #गुरुतत्त्व
🙏 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏
🗓️ आषाढ़ पूर्णिमा: 29 जुलाई 2026, बुधवार
🗓️ पूर्णिमा तिथि: 28 जुलाई सायं 06:18 बजे से 29 जुलाई रात्रि 08:05 बजे तक
आषाढ़ पूर्णिमा सनातन धर्म की अत्यंत पवित्र तिथि है। इस दिन प्रातः स्नान, दान, जप, तप तथा भगवान श्रीहरि विष्णु की उपासना का विशेष महत्त्व बताया गया है। इसी पावन तिथि पर गुरु पूर्णिमा एवं व्यास पूर्णिमा भी मनाई जाती है, अतः यह दिन ज्ञान, श्रद्धा, भक्ति एवं कृतज्ञता का महापर्व माना जाता है।
अनेक परम्पराओं में इस दिन गोपद्म व्रत का भी पालन किया जाता है। इस व्रत में भगवान विष्णु का पूजन कर धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष तथा समस्त मंगल की प्रार्थना की जाती है। शास्त्रों में श्रीहरि की उपासना को समस्त पापों का नाश करने वाली एवं कल्याण प्रदान करने वाली बताया गया है।
इस दिन भगवान श्रीहरि के गरुड़ारूढ़ चतुर्भुज स्वरूप का ध्यान करना चाहिए, जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हैं। उनके साथ विराजमान महालक्ष्मी का भी श्रद्धापूर्वक स्मरण एवं पूजन करना अत्यंत शुभ माना गया है।
📖 शास्त्रीय संदर्भ
🔹 श्रीमद्भागवत महापुराण (१.२.२८)
वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः।
वासुदेवपरा योगा वासुदेवपराः क्रियाः॥
अर्थ: समस्त वेद, यज्ञ, योग और धर्मकर्मों का परम लक्ष्य भगवान वासुदेव ही हैं।
🔹 भगवद्गीता (९.२२)
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
अर्थ: जो भक्त अनन्य भाव से मेरा चिंतन एवं उपासना करते हैं, उनके योगक्षेम का भार मैं स्वयं वहन करता हूँ।
🔹 पद्मपुराण में पूर्णिमा के दिन स्नान, दान, जप तथा भगवान विष्णु की आराधना को विशेष पुण्यदायक बताया गया है। इसी प्रकार स्कन्दपुराण में भी पूर्णिमा तिथि पर भगवान विष्णु के पूजन एवं दान का विशेष माहात्म्य वर्णित है।
🌺 आषाढ़ पूर्णिमा का संदेश
यह पावन तिथि हमें भगवान श्रीहरि की शरण, गुरु के प्रति कृतज्ञता, धर्ममय जीवन तथा दान, सेवा और साधना के महत्त्व का स्मरण कराती है। श्रद्धापूर्वक किया गया जप, पूजन और सत्कर्म जीवन में शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
श्रीमन्नारायणाय नमः।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। 🙏
अमीर बनो।
अगर अमीर नहीं बन सकते, तो Attractive बनो।
अगर Attractive नहीं बन सकते, तो Intelligent बनो।
अगर Intelligent नहीं बन सकते, तो Confident बनो।
और यदि Confident भी नहीं बन सकते, तो कम-से-कम Disciplined बनो।
क्योंकि…
अमीर परिवार में जन्म लेना हमारे हाथ में नहीं है।
जन्म से आकर्षक दिखना भी हमारे हाथ में नहीं है।
हर व्यक्ति का IQ भी समान नहीं होता।
लेकिन…
समय पर उठना,
अपने वचन का पालन करना,
प्रतिदिन ईमानदारी से मेहनत करना,
और बिना बहाने बनाए निरंतर आगे बढ़ते रहना—
यह पूरी तरह हमारे हाथ में है।
Discipline वह शक्ति है जो हर इंसान को समान रूप से मिली है।
यही वह गुण है जो साधारण व्यक्ति को भी असाधारण बना सकता है।
यदि कोई व्यक्ति इस अंतिम शक्ति का भी उपयोग नहीं करता, तो फिर जीवन बदलने का अवसर धीरे-धीरे उसके हाथ से निकल जाता है।
अब निर्णय आपका है—
Discipline चुनना है…
या फिर Excuses के साथ पूरी ज़िंदगी समझौता करना है।
मंत्रजप का हमारे अंतर्मन पर होने वाला गहन प्रभाव
मंत्रजप केवल माला फेरने का नाम नहीं है, बल्कि यह अंतर्मन को जागृत करने वाली एक अत्यंत शक्तिशाली साधना है। नियमित मंत्रजप से साधक के जीवन में अनेक सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।
१. नियमित मंत्रजप करने से मन की चंचलता धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। मन एकाग्र और स्थिर होता है, जिससे किसी भी कार्य में ध्यान लगाने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। मंत्रोच्चारण से उत्पन्न दिव्य स्पंदन मन में संचित राग, द्वेष, लोभ, अहंकार तथा अन्य मानसिक विकारों को क्षीण करते हैं और अंतःकरण को शुद्ध एवं निर्मल बनाते हैं।
२. जो साधक पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा और निरंतरता के साथ किसी विशिष्ट मंत्र का जप करते हैं, उनकी वाणी में अद्भुत तेज, मधुरता और प्रभाव उत्पन्न होता है। उनके शब्दों में सकारात्मक शक्ति और सत्य का बल समाहित हो जाता है, जिससे उनकी वाणी लोगों के हृदय को सहज ही स्पर्श करती है।
३. मंत्रजप के माध्यम से साधक बाहरी संसार के शोर-शराबे से हटकर अपने शांत अंतरंग की यात्रा करता है। यही साधना उसे आत्मचिंतन, आत्मज्ञान और अंततः परम शांति की अनुभूति तक पहुँचाती है।
प्रतिदिन कुछ समय मंत्रजप के लिए अवश्य निकालें। श्रद्धा, नियमितता और समर्पण के साथ किया गया मंत्रजप जीवन में नई ऊर्जा, मानसिक संतुलन, आध्यात्मिक उन्नति और दिव्य आनंद का अनुभव कराता है।
॥ हरिः ॐ ॥
You cannot tell your mind to calm down. It will not listen. But breathe out slowly for twice as long as you breathe in, do it for two minutes, and watch the anger drop a level on its own. The breath reaches the mind through a back door. Meditation makes it even more effective
जबतक तुम भोगवासनाओं को नहीं छोड़ दोगे, तबतक तुम्हें शान्ति नहीं मिलेगी। यह तुम्हारी बड़ी मूर्खता है, जो बार-बार दुःख का अनुभव करते हुए भी तुम कामनाओं के गुलाम बने हुए हो। छोड़ो इनको। इनसे साफ कह दो कि ‘मैं मूर्खतावश तुम्हारे हाथ का खिलौना बना दुःख-पर-दुःख उठा रहा था। अब मैं तुम्हें जान गया हूँ। तुम आसक्ति से पैदा होती हो। अब मैं विषयासक्ति को ही पास नहीं फटकने दूँगा। मेरी सारी आसक्ति मैं अनासक्ति में लगा दूँगा।’
अच्छे काम करने के बाद भी क्यों बुरा होता है? | @news18india@gurudev ने बताया कि किस प्रकार हमारा कर्म,अहंकार और अपेक्षा से जुड़ा है
जो लोग अच्छा करते हैं, यदि उनके साथ कुछ बुरा होता है, तो जान लें कि जाने-अनजाने में उन्होंने अतीत में निश्चित रूप से कोई गलती की होगी. नीम का बीज बोने से आम नहीं मिलता. जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे. लोग अपनी अच्छाई के कारण दुख नहीं भोगते. किसी भी कर्म को करने से पहले आपको अपनी बुद्धि और जागरूकता का उपयोग करना होगा.
गुरुदेव की यह अमृत वाणी आप इस लेख में पढ़ सकते हैं.
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जिनके श्रीचरण-कमलों की पावन रज श्री राधा-श्याम के दिव्य प्रेमरस से परिपूर्ण है, वही समस्त संसार-जनित भव-रोगों का नाश करने वाली अमृतमयी संजीवनी के समान परम औषधि है।
ऐसे करुणामय, कृपासिंधु ‘#गुरुदेव’ वैद्य के श्रीचरणों में अपना तन, मन, धन और सर्वस्व समर्पित करते हुए कोटि-कोटि, सहस्रों-सहस्र प्रणाम। 🙏
~ स्वामी ब्रह्मचैतन्य
🗓️ योगिनी एकादशी: 11 जुलाई 2026, शनिवार
🗓️ पारण: 12 जुलाई 2026, रविवार , सूर्योदय के पश्चात्
आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित अत्यंत पुण्यदायिनी तिथि है। शास्त्रों में इसे पापों का क्षय करने वाली, मन को निर्मल बनाने वाली तथा भक्ति, संयम और सदाचार को पुष्ट करने वाली एकादशी कहा गया है।
प्रातःकाल स्नान कर भगवान श्रीविष्णु का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। श्रीहरि को तुलसी दल, पीले पुष्प, चंदन, अक्षत, फल एवं नैवेद्य अर्पित करें। श्रद्धापूर्वक “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें तथा योगिनी एकादशी व्रत कथा, विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता अथवा श्रीमद्भागवत का पाठ-श्रवण करें।
इस दिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, जल, वस्त्र, छाता, जूते अथवा अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान करना विशेष पुण्यदायी माना गया है। यह व्रत केवल उपवास का नहीं, बल्कि इन्द्रियनिग्रह, करुणा, सेवा और भगवान के स्मरण का भी पर्व है।
शास्त्र प्रमाण
एकादश्यां निराहारो यो भुङ्क्ते द्वादशीदिने।
विष्णुलोकमवाप्नोति सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
— पद्मपुराण, उत्तरखण्ड (एकादशी माहात्म्य)
भावार्थ: जो श्रद्धापूर्वक एकादशी का व्रत रखकर द्वादशी को विधिपूर्वक पारण करता है, वह भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त कर पापों से मुक्त होता है।
योगिनी नाम सा प्रोक्ता सर्वपापप्रणाशिनी।
भुक्तिमुक्तिप्रदा नॄणां विष्णुभक्तिविवर्धिनी॥
— ब्रह्मवैवर्त पुराण, एकादशी माहात्म्य
भावार्थ: योगिनी एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली, भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली तथा भगवान विष्णु की भक्ति को बढ़ाने वाली कही गई है।
मंत्र:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। 🙏🌼
~ Swami Brahmachaitanya
🗓️ संत कबीरदास जयंती: 29 जून 2026, सोमवार
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥ 🙏
संत कबीरदास जी का प्राकट्य ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन माना जाता है, इसलिए प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा को उनकी जयंती श्रद्धापूर्वक मनाई जाती है।
संत कबीरदास जी ने सरल लोकभाषा में भक्ति, सत्य, सदाचार और मानवता का ऐसा संदेश दिया, जो आज भी समाज के लिए समान रूप से प्रासंगिक है। उन्होंने बाहरी आडंबर, अहंकार, जातिगत भेदभाव और दिखावे का विरोध करते हुए निर्मल मन, ईश्वर-भक्ति तथा सच्चे आचरण को जीवन का आधार बताया।
उनकी वाणी का संदेश सनातन शास्त्रों की इस शिक्षा से भी मेल खाता है—
“निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥”
— श्रीमद्भगवद्गीता १५.५
अर्थात् जो मनुष्य अहंकार और मोह से मुक्त होकर आत्मचिंतन में स्थित रहता है, वही परम पद को प्राप्त करता है।
इसी प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण समदृष्टि का उपदेश देते हैं—
“विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥”
— श्रीमद्भगवद्गीता ५.१८
अर्थात् ज्ञानी पुरुष विद्वान ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता तथा अन्य सभी प्राणियों में समान आत्मभाव का दर्शन करता है।
कबीर जयंती के अवसर पर उनके दोहों का अध्ययन करें, संतवाणी का श्रवण करें तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी जरूरतमंद की सहायता का संकल्प लें। अपने व्यवहार से किसी के जीवन में सम्मान, आशा और सहजता लाना ही संत कबीर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
संत कबीर की वाणी हमें विनम्रता, विवेक, सत्यनिष्ठा और ईश्वर-भक्ति के साथ मानवतापूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
🙏 संत कबीरदास जी को कोटि-कोटि नमन।
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🗓️ गायत्री जयंती : 25 जून 2026, गुरुवार
🔹 एकादशी तिथि : 24 जून सायं 06:12 बजे से 25 जून रात्रि 08:09 बजे तक
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के पावन अवसर पर मनाई जाने वाली गायत्री जयंती वेदमाता, ब्रह्मविद्या एवं दिव्य प्रज्ञा की अधिष्ठात्री शक्ति माँ गायत्री की आराधना का महोत्सव है। सनातन परम्परा में गायत्री को समस्त वेदों की जननी तथा सद्बुद्धि प्रदान करने वाली परम कल्याणमयी शक्ति माना गया है।
📖 ऋग्वेद (3.62.10) में वर्णित परम पावन गायत्री मंत्र—
ॐ भूर्भुवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
यह मंत्र मानव की बुद्धि को धर्म, ज्ञान एवं सत्य के मार्ग पर प्रेरित करने की प्रार्थना है।
📖 भगवद्गीता (10.35) में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं—
“छन्दसामहम् गायत्री”
अर्थात् समस्त छन्दों में मैं गायत्री हूँ।
📖 देवीभागवत महापुराण (12.6.76) में कहा गया है—
“गायत्री वेदजननी गायत्री पापनाशिनी।
गायत्र्याः परं नास्ति देवि चेह च पावनी॥”
अर्थात् गायत्री वेदों की जननी, पापों का नाश करने वाली तथा समस्त पावन शक्तियों में श्रेष्ठ है।
📖 अथर्ववेद (19.71) में गायत्री को आयु, प्राण, यश, तेज, कीर्ति एवं आध्यात्मिक सामर्थ्य प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में स्तुत किया गया है।
🌿 इस दिन प्रातःकाल स्नान करके उदित होते सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करें तथा शांत एवं पवित्र स्थान पर बैठकर श्रद्धानुसार 24, 54 अथवा 108 बार गायत्री मंत्र का जप करें। दीप, पुष्प एवं सात्त्विक नैवेद्य अर्पित कर वेदमाता का पूजन करें।
🤲 अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, पुस्तकें, शिक्षण सामग्री अथवा ज्ञान-विस्तार से संबंधित वस्तुओं का दान करना विशेष पुण्यदायक माना गया है।
गायत्री जयंती हमें विचारों की पवित्रता, ज्ञान के प्रति श्रद्धा, विवेकपूर्ण जीवन और आत्मोन्नति का दिव्य संदेश प्रदान करती है।
🕉️ वेदमाता गायत्री देवी की कृपा से समस्त प्राणियों का कल्याण हो।
ॐ भूर्भुवः स्वः ॥ 🙏
#GayatriJayanti #गायत्री_जयंती #वेदमाता_गायत्री #GayatriMantra #सनातन_संस्कृति
🗓️ निर्जला एकादशी : 25 जून 2026, गुरुवार
🗓️ पारण : 26 जून 2026, शुक्रवार, प्रातः 05:25 बजे से 08:13 बजे तक
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी को समस्त एकादशियों में अत्यंत श्रेष्ठ एवं पुण्यदायिनी माना गया है। यह व्रत भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना, इन्द्रिय-संयम तथा अखण्ड भक्ति का महापर्व है। धर्मशास्त्रों में इसे “भीमसेनी एकादशी” अथवा “पाण्डव एकादशी” भी कहा गया है।
📖 ब्रह्मवैवर्त पुराण तथा पद्म पुराण में वर्णित है कि महर्षि व्यासजी के उपदेशानुसार भीमसेन ने वर्षभर की समस्त एकादशियों का फल प्राप्त करने हेतु इस एक निर्जला एकादशी का व्रत किया था।
📖 पद्मपुराण, उत्तरखण्ड में कहा गया है—
“एकादश्यां निराहारो यो भवेत् केशवप्रियः।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥”
अर्थात् जो भक्त एकादशी के दिन भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए उपवास करता है, वह पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
📖 स्कन्दपुराण में निर्जला एकादशी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है—
“निर्जला नाम सा प्रोक्ता सर्वपापप्रणाशिनी।
एकैव सर्वएकादश्यः फलदा परिकीर्तिता॥”
अर्थात् निर्जला एकादशी समस्त पापों का नाश करने वाली है और अकेली ही सभी एकादशियों के समान फल प्रदान करने वाली कही गई है।
🌿 इस दिन प्रातः स्नान कर भगवान श्रीविष्णु के समक्ष व्रत एवं पूजा का संकल्प लें। श्रीहरि को पीले पुष्प, चंदन, फल तथा तुलसीदल अर्पित करें। श्रद्धापूर्वक—
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
मंत्र का जप करें तथा विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता अथवा एकादशी माहात्म्य का पाठ करें।
💧 ग्रीष्म ऋतु में जलदान, शीतल पेयजल की व्यवस्था, छत्रदान, फलदान एवं अन्नदान को विशेष पुण्यदायक बताया गया है। गरुड़ पुराण में दान, सेवा और परोपकार को भगवान विष्णु की प्रसन्नता का श्रेष्ठ साधन कहा गया है।
🙏 निर्जला एकादशी हमें आत्मसंयम, भक्ति, सेवा और ईश्वर-स्मरण का संदेश देती है। भगवान श्रीहरि की कृपा से सभी साधकों के जीवन में धर्म, शांति और मंगल का प्रकाश बढ़े।
🕉️ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ 🙏
#NirjalaEkadashi #निर्जला_एकादशी #एकादशी #श्रीहरि #विष्णुभक्ति #सनातनधर्म
जितनी जल्दी यह समझ में आ जाए कि यहाँ कुछ भी हमारा नहीं है, उतना ही कल्याण है। यह संसार एक पड़ाव है, मंज़िल नहीं। रात भर विश्राम कर सकते हैं, पर सुबह फिर यात्रा पर निकलना है।
जीवन उन्हीं का है जिनके भीतर खोज की आग जीवित है, जो भगवान् की निरंतर तलाश में लगे हैं और जिन्होंने यह स्मरण कभी नहीं खोया कि हम कहीं से आए हैं और हमें कहीं जाना है।
भवान्यष्टकम् ॥
इस स्तोत्र में भक्त अपनी सभी कमियों को स्वीकार करते हुए माँ को अपना एकमात्र सहारा बताता है इसके नियमित पाठ से अहंकार दूर होता है और मन को गहरी शांति मिलती है यदि आप किसी भी प्रकार के विवाद, दुख, यात्रा, आग, जल, पर्वत या शत्रुओं के भय में हैं, तो इस स्तोत्र का पाठ अत्यधिक सुरक्षात्मक माना जाता है
न तातो न माता न बन्धुर्न दाता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥1॥
भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः
पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः।
कुसंसार-पाश-प्रबद्धः सदाऽहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥2॥
न जानामि दानं न च ध्यान-योगं
न जानामि तंत्र न च स्तोत्र-मन्त्रम्।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥3॥
न जानामि पुण्यं न जानानि तीर्थं
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्।
न जानामि भक्ति व्रतं वाऽपि मात-
र्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥4॥
कुकर्मी कुसंगी कुबुद्धि कुदासः
कुलाचारहीनः कदाचारलीनः।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबंधः सदाऽह
गतिस्त्व गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥5॥
प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं
दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्।
न जानामि चाऽन्यत् सदाऽहं शरण्ये
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥6॥
विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे
जले चाऽनले पर्वते शत्रुमध्ये।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥7॥
अनाथो दरिद्रो जरा-रोगयुक्तो
महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाऽहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥8॥
॥ इति श्रीमच्छशंकराचार्यकृतं भवान्यष्टकं संपूर्णम् ॥
जो व्यक्ति स्वयं आनंद से परिपूर्ण हो जाता है, वह दूसरों को दुख देने में सक्षम ही नहीं रहता। अनीति का अर्थ क्या है? दूसरों को पीड़ा पहुँचाना। और नीति क्या है? दूसरों को पीड़ा न दे पाना।
जो मनुष्य स्वयं भीतर से दुखी है, वह अनजाने ही दूसरों को भी दुख देगा….क्योंकि जो हमारे भीतर है, वही बाहर प्रकट होता है। हम वही बाँट सकते हैं, जो हमारे पास है; जो हमारे पास नहीं है, उसे देने का कोई उपाय नहीं।
यदि मैं स्वयं दुख से भरा हूँ, तो मैं आपको आनंद कैसे दे सकता हूँ? वह मेरे भीतर है ही नहीं। चाहे मैं कितनी ही इच्छा करूँ कि आपको प्रेम और सुख दूँ, पर यदि मेरा अंतःकरण दुखी है, तो मेरे माध्यम से दुख ही प्रकट होगा।
इसके विपरीत, यदि मैं भीतर से आनंदित हूँ, तो चाहकर भी आपको दुख नहीं दे पाऊँगा। क्योंकि अंततः वही प्रवाहित होता है, जो हमारे भीतर भरा होता है…और जब भीतर आनंद है, तो बाहर भी वही बहेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ के 45वें स्थापना दिवस पर करेंगे संबोधन
भारत के माननीय प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी जी ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ की स्थापना के 45 वर्ष पूर्ण होने और इसके संस्थापक, गुरुदेव रवि शंकर के 70वें जन्मदिवस के उपलक्ष्य पर आयोजित समारोह को संबोधित करेंगे 10th मई 2026 को, आर्ट ऑफ लिविंग के अंतरराष्ट्रीय केंद्र, बेंगलुरु में। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्य वक्तव्य देंगे तथा नव-निर्मित ‘ध्यान मंदिर’ एक विशेष ध्यान कक्ष का उद्घाटन करेंगे।
@ArtofLivingIC@narendramodi
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