Poonam Pandey situation is a pretty good insight into the fact that a lot of news media is essentially just retweeting not reporting. She’s alive, journalism though….
being 24 is crazy because ek friend job kar raha hai, ek shaadi kar raha hai, ek vipassana kar raha hai, ek casual relationships kar raha hai, ek masters kar raha hai, aur ek drugs kar raha hai
Pale Blue Dot is a photo of Earth that was taken by the Voyager 1 space probe in 1990 from a distance of about 6 billion kilometers (3.7 billion miles) as it was leaving our solar system. This is what Carl Sagan said about the photo:
"Look again at that dot. That's here. That's home. That's us. On it, everyone you love, everyone you know, everyone you ever heard of, every human being who ever was, lived out their lives. The aggregate of our joy and suffering, thousands of confident religions, ideologies, and economic doctrines, every hunter and forager, every hero and coward, every creator and destroyer of civilization, every king and peasant, every young couple in love, every mother and father, hopeful child, inventor, and explorer, every teacher of morals, every corrupt politician, every 'superstar,' every 'supreme leader,' every saint and sinner in the history of our species lived there — on a mote of dust suspended in a sunbeam.
The Earth is the only world known so far to harbor life. There is nowhere else, at least in the near future, to which our species could migrate. Visit, yes. Settle, not yet. Like it or not, for the moment the Earth is where we make our stand. It has been said that astronomy is a humbling and character-building experience. There is perhaps no better demonstration of the folly of human conceits than this distant image of our tiny world. To me, it underscores our responsibility to deal more kindly with one another, and to preserve and cherish the pale blue dot, the only home we've ever known.”
I don’t think in the history of parliament such abusive words have been used by an MP against fellow MP : Ramesh Bidhuri has brought down parliament’s image to a new low. Yeh kaise ‘sanskar’ bhai? What’s the use of a new building when this is the level of discourse of our MPs? And why is one of our more sober politicians and former minister Dr Harsh Vardhan laughing? Awful. Shameful.
PM मोदी से बोतल नहीं खुल रही.
उनकी ज़ुबान फिसल रही है.
वो गड़बड़ कर दे रहे हैं.
वो बूढ़े हो रहे हैं.
ट्रोल का समझ में आता है. उसकी कमाई इससे ही होती है. लेकिन विचारकों और पत्रकारों को तो दिमाग़ लगाना चाहिए.
विरोध करने या सवाल उठाने के लिए बढ़िया पैमाना चुनिए. मूर्खता तो देखते ही रहते हैं. थोड़ा दिमाग़ लगाइए. थोड़ी रीढ़ की हड्डी दिखाइए.
एक अमेरिकी अख़बार में छपे तथ्यहीन दुष्प्रचार को इस दौर के मैकार्थीवाद की संज्ञा दी जा रही है. इसके हवाले से कुख्यात जोसफ़ मैकार्थी और उसके भयावह अभियान पर एक टिप्पणी-
भारत समेत दुनियाभर में धुर-दक्षिणपंथ के बढ़ते वर्चस्व के विश्लेषण में अक्सर 1930-40 के दशक की यूरोपीय राजनीतिक स्थिति की चर्चा होती है, जब हिटलर, मुसोलिनी और फ़्रैंको जैसे लोगों ने तबाही मचा दी थी. इसमें कोई दो राय नहीं है कि उस दौर के फ़ासीवाद और नाज़ीवाद से मौजूदा धुर-दक्षिणपंथ बहुत अधिक प्रभावित और प्रेरित है, लेकिन उसकी कार्यशैली में बड़ा अंतर है. सबसे बड़ा अंतर तो यही है कि इस राजनीति की फ़ासीवादी प्रवृत्ति लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर और उसके आवरण में काम करती है.
अमेरिका में 1950 के दशक के शुरुआती वर्षों में विस्कॉन्सिन से सीनेटर जोसेफ़ मैकार्थी के आतंक के शिकार हज़ारों लोग हुए थे. सैकड़ों जेल भेजे गये और कई हज़ारों की रोजी-रोटी पर आफ़त आयी. लोगों को प्रताड़ित करने के लिए राष्ट्रवाद-विरोध, अमेरिका-विरोध, सेक्सुअल प्रिफ़रेंस, कम्युनिस्ट सोच, षड्यंत्र रचने आदि जैसे कई आधार बनाये गये. सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ-साथ सिनेमा, थियेटर, संगीत, कला, पत्रकारिता, विज्ञान, खेल आदि से जुड़े लोगों को निशाने पर लिया गया.
मैकार्थी के इस दक्षिणपंथी हमले के शिकार कई लोग आज दुनियाभर में बड़े आदरणीय हैं. कुछ नाम तो बीसवीं सदी के महानतम व्यक्तित्व हैं- अल्बर्ट आइंस्टीन, चार्ली चैप्लिन, बर्तोल्त ब्रेष्ट, हॉवर्ड फ़ास्ट, एलेन गिंसबर्ग, पॉल स्वीजी, ऑरसन वेल्स.
नव-दक्षिणपंथी नेताओं में दंभ और झूठ कूट-कूट कर भरा है, जो मैकार्थी की भी ख़ासियत थी. सच को तोड़-मरोड़ कर पेश करना इनके व्यक्तित्व और राजनीति का मुख्य लक्षण है. मैकार्थी को भद्र और सभ्य आचरण से परहेज़ था और उसे इस बात की कोई परवाह नहीं होती थी कि उसके द्वारा किसी व्यक्ति पर लगाये गये झूठे और ग़लत आरोपों का असर कितना ख़तरनाक और नुक़सानदेह हो सकता है. सीनेट की सुनवाई में उसका रवैया ऐसा होता था कि आरोपितों और गवाहों की ज़िंदगी तबाह हो जाये और वे समाज में रहने लायक़ न रहें.
मीडिया के इस्तेमाल में भी मैकार्थी शातिर खिलाड़ी था. वह प्रेस में उल्टी-सीधी और रसदार ख़बरें प्लांट कराता था. प्रेस के एक बड़े हिस्से ने भी उसका ख़ूब साथ दिया था. वह जान-बूझकर दिन में देर से बयान जारी करता था, ताकि मीडिया को उसकी जांच करने का मौका न मिले. चूंकि इन ख़बरों को चाव से पढ़ा भी जाता था और मैकार्थी के क़हर का डर भी था, तो मीडिया भी उससे कड़े सवाल पूछने में हिचकिचाता था. इसमें कॉरपोरेट समूहों की भूमिका बेहद संदिग्ध रही थी.
मैकार्थी या धुर दक्षिणपंथ के अन्य चेहरे सिर्फ़ दंभी या हिंसक भर ही नहीं हैं, जिनका काम सिर्फ वैचारिक या नस्लीय आधार पर लोगों को प्रताड़ित करना रहा है. यह तो उनकी राजनीति का एक पक्ष है. दूसरा पक्ष अधिक ख़तरनाक है. ऐसे लोग न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण करते हैं, बल्कि नागरिकों की बेहतरी के लिए बनी कल्याणकारी योजनाओं और नीतियों को भी तार-तार करते जाते हैं. मुनाफ़ाखोरी और कॉरपोरेट हितों की पक्षधरता के कारण ही इन्हें धनकुबेरों का पूरा साथ मिलता है.
लेकिन यह कहते हुए यह भी याद रखा जाना चाहिए कि इन धुर-दक्षिणपंथी ताक़तों के उभार की प्रक्रिया लंबे समय से चलती रही है, जो अब अपने चरम पर पहुंचती दिखायी दे रही है. इस हालत के लिए लोकतांत्रिक शक्तियों को भी अपनी जवाबदेही तय करनी चाहिए क्योंकि उग्र-दक्षिणपंथ के व्यापक एजेंडे को कभी ठीक से चुनौती नहीं मिली, बल्कि यह भी हुआ कि अन्य सियासी जमातें उसके कुछ इरादों में सहभागी भी बनीं.
बहरहाल, अब जानते हैं कि मैकार्थी था कौन और क्या थी उसकी राजनीति. जोसेफ़ रेमंड मैकार्थी 1947 से 1957 के बीच रिपब्लिकन पार्टी का सीनेटर रहा था. यही दौर था, जब अमेरिका और सोवियत संघ में शीत युद्ध ज़ोरों पर था. फ़रवरी, 1950 में उसने एक सभा में यह कहकर तहलका मचा दिया कि 205 सोवियत समर्थक और जासूस देश की संघीय सरकार में बतौर अधिकारी घुसपैठ कर चुके हैं. तब के माहौल में इस बयान को ख़ूब चर्चा मिली, परंतु इस मामले में विदेशी मामलों की सीनेट कमिटी के सामने सुनवाई में वह एक भी कार्डधारी कम्युनिस्ट अधिकारी का नाम बताने में असफल रहा.
फिर भी उसे ख़ूब लोकप्रियता मिली क्योंकि अमेरिका में दुनिया के विभिन्न इलाकों- खासकर पूर्वी यूरोप और चीन- में बढ़ते कम्युनिस्ट प्रभाव तथा भयावह कोरियाई युद्ध के कारण डर का माहौल था. भयभीत जनमानस का दोहन करने में मैकार्थी ख़ासा कामयाब रहा. उसने ख़ुद को देशभक्त और अमेरिकी मूल्यों का प्रतिनिधि बताते हुए देशव्यापी कम्युनिस्ट-विरोधी ‘धर्मयुद्ध’ छेड़ दिया. उसकी नज़र में नागरिक अधिकारों का कोई मतलब नहीं था.
उसकी लोकप्रियता ने उसे दुबारा 1952 में सीनेट पहुंचाया, जहां उसे सरकारी कार्यवाही कमिटी और इस कमिटी के तहत जांच उपसमिति की अध्यक्षता मिल गयी. फिर क्या था! अगले दो साल तक उसने हज़ारों लोगों को नोटिस भेजा, कमिटी के सामने बुलाया, जेल भेजवाया और प्रताड़ना दी. सरकारी अधिकारियों, प्रोफ़ेसरों, विद्वानों, पत्रकारों, कलाकारों, सैन्य अधिकारियों… किसी को भी नहीं बख़्शा गया.
इन जांचों में एक भी मामले में कोई नतीज़ा नहीं निकला, मैकार्थी एक आदमी को भी दोषी साबित न कर सका. उसकी शह पर और सोवियत भय के कारण अन्य एजेंसियों ने भी बड़ी संख्या में लोगों को परेशान किया. मैकार्थी ने राष्ट्रपति आइज़ननहावर और ट्रूमेन को भी नहीं छोड़ा. मैकार्थी से परेशान होकर कई लोग अमेरिका छोड़ गये, जिनमें एक नाम अपने समय का दुनिया का सबसे लोकप्रिय शख़्स चार्ली चैप्लिन का भी था. वे 1972 में ही अमेरिका वापस गये ऑस्कर का लाइफ़टाइम एचीवमेंट अवार्ड लेने.
पर इस फ़ित्ने का भी ख़ात्मा एक दिन होना ही था. अप्रैल-जून, 1954 में सैन्य और प्रशासनिक अधिकारियों के ख़िलाफ़ सुनवाई के दौरान सेना के वकील ने मैकार्थी को ख़ूब खरी-खोटी सुनायी. इस 36 दिन चली सुनवाई को पूरे देश ने टेलीविज़न पर देखा. वकील जोसेफ़ नाई वेल्श ने सीनेटर को कहा कि आपने क्या भद्रता को पूरी तरह छोड़ दिया है. जून में ही एक लोकप्रिय डेमोक्रेटिक सीनेटर लेस्टर हंट ने अपने बेटे के एक साधारण अपराध पर रिपब्लिकन पार्टी द्वारा मीडिया में दुष्प्रचार करने के ब्लैकमेल के दबाव में आत्महत्या कर ली. आत्महत्या से एक दिन पहले ही मैकार्थी ने बिना नाम लिये हंट पर अनाप-शनाप बयानबाज़ी की थी.
इन प्रकरणों ने मैकार्थी के खिलाफ माहौल बना दिया. उसी साल नवंबर में हुए मध्यावधि चुनाव में सीनेट का नियंत्रण डेमोक्रेटिक पार्टी के हाथ में चला गया और मैकार्थी को कमिटी से हटना पड़ा. दो दिसंबर, 1954 को सीनेट ने 22 के मुक़ाबले 67 मतों से मैकार्थी को सीनेट की परंपरा के विरुद्ध आचरण करने के लिए निंदा प्रस्ताव पारित कर दिया. इन घटनाओं के बाद मैकार्थी अकेला पड़ गया और 1957 में दूसरा कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उसकी मौत हो गयी.
इस संदर्भ में दो बातें और अहम हैं तथा हमारे आज के लिए प्रासंगिक हैं. साल 1950 में सिर्फ नौ फ़ीसदी अमेरिकी परिवारों के पास टेलीविज़न था, लेकिन 1959 में यह आंकड़ा 85.9 फीसदी तक पहुंच गया. उस समय के मनोरंजक कार्यक्रमों का पूरा ज़ोर लोगों की रुचि के अनुरूप सामग्री देने पर था और तत्कालीन मुद्दे उनमें से ग़ायब थे. ज़ाहिर है कि टेलीविज़न के प्रसार ने मैकार्थी और उस तरह की सोच और हरकत, जिसे मैकार्थीवाद कहा जाता है, को बढ़ावा देने में इस माध्यम का बड़ा हाथ था.
उल्लेखनीय है कि फ़रवरी, 1950 के मैकार्थी के उस कुख्यात भाषण के एक महीने बाद ‘द वाशिंग्टन पोस्ट’ के एक कार्टूनिस्ट हर्बर्ट ब्लॉक ने ‘मैकार्थीज़्म’ शब्द को गढ़ा था. यह भी ध्यान रहे कि मैकार्थी को कैथोलिकों के बड़े हिस्से और कैनेडी परिवार का भी साथ मिला था. अपने उदारवाद के लिए जाने जानेवाले अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ़ कैनेडी ने सीनेट सदस्य के रूप में कभी भी मैकार्थी के विरोध में नहीं बोला और 1952 के सीनेट चुनाव में मैकार्थी ने कैनेडी के ख़िलाफ़ खड़े रिपब्लिकन उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करने से मना कर दिया था. डेमोक्रेट सीनेटर के रूप में कैनेडी ने मैकार्थी के ख़िलाफ़ लाये गये निंदा प्रस्ताव में वोट नहीं डाला था क्योंकि वे अस्पताल में थे. बाद में भी कभी उन्होंने यह ज़ाहिर नहीं किया कि यदि वे सदन में होते, तो क्या करते.
सैनिक अधिकारियों के वकील वेल्श से पहले ही मैकार्थी के ख़िलाफ़ दो पत्रकार मोर्चा लिये हुए थे- एडवर्ड मुर्रो और लेरॉय गोर. मुर्रो लोकप्रिय टीवी सीरिज ‘सी इट नाउ’ के एंकर थे. उन्होंने मार्च, 1954 में दो एपिसोड मैकार्थी पर चलाये और कहा कि सीनेटर जांच के दायरे को लांघ कर प्रताड़ित करने की प्रक्रिया में लगे हुए हैं. मुर्रो ने मैकार्थी के गैर-ज़िम्मेदाराना भाषणों के कई अंश दिखाकर सीनेटर के ख़िलाफ़ माहौल बनाने में बड़ा योगदान दिया. अप्रैल के पहले हफ़्ते में मैकार्थी खुद इस कार्यक्रम में शामिल हुआ और उसने मुर्रो को भी देशद्रोही करार दिया. इससे उसकी लोकप्रियता और गिरी.
मुर्रो और उनके प्रोड्यूसर ने अख़बारों में मैकार्थी पर बने एपिसोड के विज्ञापनों के ख़र्च अपनी जेब से दिये थे क्योंकि सीबीएस चैनल ने इसके लिए पैसे देने से मना कर दिया था. इन विज्ञापनों में सीबीएस का लोगो इस्तेमाल करने की मनाही भी थी. कहा जाता है कि इस एपिसोड के बाद चैनल में फोन कॉल का तांता लग गया था और सड़कों पर ट्रक ड्राइवर भी मुर्रो को बधाई देने लगे थे. यह भी दुर्भाग्य है कि टीवी की आर्थिकी ने अगले साल इस कार्यक्रम का प्रसारण रोकने पर विवश कर दिया क्योंकि पैसेवाले क्विज़ शो लोगों को भाने लगे थे.
लेरॉय गोर विस्कॉन्सिन के एक क़स्बे सॉक सिटी में ‘सॉक-प्रियरी स्टार’ अख़बार के संपादक थे. उन्होंने 18 मार्च, 1954 को पहले पन्ने पर एक धारदार संपादकीय लिखा तथा एक फ़ॉर्म छापा, जिसे भरकर पाठक सीनेटर मैकार्थी को पद से हटाने की मांग कर सकते थे. इसका बहुत स्वागत हुआ, पर लंबे समय तक फ़ॉर्म को छुपाकर रखना पड़ा था क्योंकि मैकार्थी के समर्थक अधिकारियों पर झूठे मुक़दमे डालकर परेशान करने लगे थे. इस अभियान ने भी मैकार्थी के पतन में अहम योगदान दिया.
हेरोइन जैसे ख़तरनाक नशे के आदी और भयंकर शराबी रहे मैकार्थी के बारे में उसकी रिपब्लिकन पार्टी के दो सीनेटर दोस्तों के बयान दिलचस्प हैं. सीनेटर राल्फ फ्लैंडर्स ने नौ मार्च, 1954 को सदन में मैकार्थी को ‘भ्रम और विभेद फैलाने वाला’ बताते हुए उसकी तुलना हिटलर से की थी. सीनेटर विलियम जेनर ने कहा था कि मैकार्थी का व्यवहार उस बच्चे की तरह था, जो किसी आयोजन में आये और शर्बत के बर्तन में पेशाब कर दे.
@Darshil_Dana Instagram is rubbish in terms of community. There is too much privacy policies that you don't have to option rather than watching others stories and get Envy and reels.
@ayarn_modi ખોટ્ટો ટાઈમ બગાડવાનો જ નહીં. ગેલેક્સી ૩માં જ મજા આવી છે બાકી બધું તો એટલું એવરેજ છે કે માર્વેલના નામના લીધે ઠીકઠીક ચાલી ગયું બાકી તો ક્યાંય આવીને ફેંકાઈ જાય.
રાધનપુર જતી ગુજરાત એસટી બસના 40 વર્ષના ડ્રાઈવર ભારમલભાઈ આહીરને વારાહી ગામે ચા-નાસ્તો કર્યા બાદ છાતીમાં દુખાવો ઉપડયો. એટેકની અવસ્થામાં મુસાફરો માટે પંદરેક કિમી બસ ચલાવીને ડેપોમાં પાર્ક કરી, એ ત્યાં જ ઢળી પડ્યા! એમની ફરજનિષ્ઠાને સલામ સાથે અફસોસ કે આવા દિલદાર કર્મચારી જીવિત નથી!