वो जो दूसरों के खेतों में काम करता है,वो जो दूसरों के बड़े- बड़े आशियाने बनाता है,वो जो होटलों में आपकी जूठन उठाता है ,वो जो छोटी मोटी फैक्टरियों में श्रम कर उनके मालिकों को धनवान बनाता है,वो जो आपकी सड़क-नालियाँ साफ करता है,वो जो आपके घरों-ऑफिसों-खेतों की चौकीदारी करता है.......
ये पहली बार नहीं हो रहा है.
2011 में जब साढ़े तीन दशक बाद वाम मोर्चा सरकार गिरी थी तब रातों-रात सीपीएम के कई काडर तृणमूल में शिफ्ट कर गए थे. दीदी तब लेफ्ट के खिलाफ अल्ट्रा-लेफ्ट राजनीति कर रही थीं. मुस्लिम वोट खिसका और सीपीएम का किला ढह गया. रातों-रातों सभी क्लब TMC के हो गए. चुनाव के बाद की हिंसा नई सत्ता के प्रति वफादारी दिखाने का उपक्रम बन गया.
काडर के दम पर चलने वाली सीपीएम के पास 2014 आते-आते जमीन पर काडर ही नहीं बचा. बंगाल की तासीर है कि वो पुरानी चीजों को बहुत सहेज कर रखता है. ट्राम, उपनिवेशिक शिष्टाचार और वामपंथ. इतने साल बाद भी अधेड़ उम्र के कुछ लोग लाल झंडा लिए दिख जाएंगे. लेफ्ट और बिमान बोस अजायबघर में रखा हुआ ग्रामोफोन है, जिसे कलकत्ता ने सहेज लिया है.
बाकी बंगाल में सत्ता बदलती है, लेकिन दादा स्थाई हैं. कल से वो भगवा गमछा पहनने लगेंगे. वही टैक्सी स्टैंड चलाएंगे. वो ही सब्जी मंडी से हफ्ता वसूलेंगे. अब वो जय बंगला की जगह जय श्रीराम कहेंगे.
1977 में लोगों ने सीपीएम से उम्मीद की कि वो आपातकाल के दौर की हिंसा को खत्म करेंगे. लेकिन सीपीएम ने इसे और संस्थागत किया. 2011 में ममता से उम्मीद थी, लेकिन ममता राजनीतिक हिंसा की इस संस्कृति को और मजबूत ही किया.
अब बीजेपी भी इसी परिणति का शिकार होती दिख रही है. सत्ता बदलती है, लेकिन दादा स्थायी है.
तो बंगाल में आखिर क्या बदलेगा?
-बंगाल के भीतर यह बदलेगा कि जहां-जहां पार्टी के दादा मुस्लिम थे, वहां हिन्दू दादा उभरेंगे.
-दूसरा अगले चुनाव में इस बात की बहुत संभावना है कि मुस्लिम वोट फिर से वाम मोर्चा की तरफ शिफ्ट हो जाए.
-तीसरा बड़ा बदलाव है कि बीजेपी की तथाकथित काऊ बेल्ट पर निर्भरता कम होगी. बंगाल में लोकसभा की 42 लोकसभा सीट हैं. फिलहाल 12 सीटें हैं बीजेपी की. यूपी में 2024 में गिनती 33 पर सिमट गई थी और बहुमत नहीं मिल पाया था. अब बीजेपी के पास एक बड़ा राज्य है जहां वो सभी सीटें जीत सकती है.
-चौथा बड़ा बदलाव है कि इस चुनाव के बाद बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा दम तोड़ देगा. बांग्लादेश की सीमा से सटे सभी राज्यों में बीजेपी की सरकार है. लिहाजा सब चंगा सी हो जाएगा.
दादा के गले में पड़ा तिरंगा पटका, भगवा हो जाएगा. इसके अलावा बंगाल में जमीन पर कुछ बदलेगा, इसमें संदेह है।
कब मिलेगा पूरा वेतन: जनप्रतिनिधियों को मानदेय वृद्धि का उपहार, नवनियुक्त कर्मचारी को अपने मूलवेतन का इंतजार
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छात्रसंघ बहाल होना ही चाहिए। वरना लीडर नहीं सिर्फ डीलर की तैयार होंगे। फलाने मंत्री जी से आशीर्वाद लेने वाले।
राजस्थान ही नहीं, देश के बाकी राज्यों में भी छात्र संघ बहाल होने चाहिए।
छात्रसंघ को बंद करना राजनीति की नर्सरी पर ताला लगाने जैसा है।
जितनी मुश्किल परिस्थितियों में यह चुनाव लड़ा गया, एक आदमी था जो पूरी ताक़त से खड़ा रहा। एक आदमी जिसके पीछे ट्रॉल आर्मी लगी थी। लाखों-करोड़ों खर्च किए गए जिसको बदनाम करने के लिए। पूरा सिस्टम लगा दिया गया। जिस
एक आदमी जिसके पीछे ट्रॉल आर्मी लगी थी। लाखों-करोड़ों खर्च किए गए जिसको बदनाम करने के लिए। पूरा सिस्टम लगा दिया गया।
जिस आदमी को कहा गया कि राजनीति के योग्य नहीं।
उसने साबित किया कि नैतिकता की राजनीति सफल होती है। ये सीटें सिर्फ़ एक पार्टी से नहीं पूरे सिस्टम से लड़कर जीती गई हैं।
ये जीत आइडिया ऑफ इंडिया की है। यह जीत संविधान की है। यह जीत राहुल गांधी स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स की है।
उत्तर के नेता जब दक्षिण जाते हैं तो वहाँ की जनता उनकी हर लाइन दो बार सुनती है। इस तरह दक्षिण में उत्तर के नेताओं की हिन्दी सुनने का धीरज विकसित हो गया लेकिन उत्तर के नेता दक्षिणों नेताओं को क्यों नहीं बुलाते हैं, धीरे-धीरे ही तो यहाँ की जनता में सुनने का धीरज विकसित होगा। अनुवादक की भूमिका पर एक छोटी सी टिप्पणी
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देश के आम चुनाव सिर्फ और सिर्फ निम्नलिखित मुद्दों पर ही होना चाहिए:
1. नौकरी
2. मंहगाई
3. सामाजिक सुरक्षा और पुरानी पेंशन स्कीम
4. स्कीम वर्कर्स की मानदेय में वृद्धि
5. भूमिहीनों को ज़मीन और आश्रय
6. सामाजिक सौहार्द
इसके अलावा अगर कोई और कुछ बकने की कोशिश करे तो सावधान रहें
मैंने एक ₹240 की वेटिंग टिकट बुक किया और वो कंफर्म नहीं हुआ तो खुद रेलवे द्वारा कैंसिल किया जाता है और वापस मात्र ₹180 होते हैं। मतलब बिना सर्विस लिए मुझे सर्विस चार्ज चुकाना पड़ा रेलवे को, यही पता करने को जब मैंने RTI किया तो पता चलता है रेलवे इस तरह से प्रतिवर्ष 1/3
@Saurabh_LT क्यों कि हल निकल चुका है ......रिटायर्ड जज के आयोग ने जाँच की है......सिर्फ सोशल मीडिया की अफवाहों को घोटाले का नाम देना कतई सही नहीं है .......मेहनती छात्रों का पहले ही 8 महीने का कीमती समय खराब हो चुका है......