Raghav Chadha ने जो मुद्दा उठाया, वह सीधा मध्यम वर्ग की जिंदगी से ��ुड़ा है।
आज स्थिति यह है कि भारत के इतिहास में पहली बार पर्सनल इनकम टैक्स कलेक्शन कॉरपोरेट टैक्स से ज्यादा हो गया है।
मतलब देश का बड़ा टैक्स बोझ अब मिडिल क्लास उठा रहा है।
• सैल��ी से सीधे TDS
• हर खरीद पर GST
• ईंधन , बीमा , सेवाओं पर टैक्स
• महंगाई अलग
कॉरपोरेट टैक्स दरें कम हुई , प्रोत्साहन मिले यह विकास के नाम पर समझाया गया।
लेकिन जब व्यक्तिगत कर संग्रह कंपनियों से ज्यादा हो जाए , तो संतुलन पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
राघव का सुझाव भी स्पष्ट था कि 👇
अगर सरकार सीधे टैक्स कम नहीं कर सकती, तो कम से कम मध्यम वर्ग की जमा राशि पर ज्यादा ब्याज दे।
• फिक्स्ड डिपॉजिट पर बेहतर रिट���्न
• सेविंग अकाउंट पर सम्मानजनक ब्याज
• वरिष्ठ नागरिकों और वेतनभोगी वर्ग के लिए विशेष दरें।
मिडिल क्लास निवेशक नहीं, पहले बचतकर्ता होता है।
वह जोखिम नहीं, सुरक्षा चाहता है।
अगर टैक्स से राहत नहीं मिल रही, तो बचत पर बेहतर रिटर्न देकर राहत दी जा सकती है।
मध्यम वर्ग न सब्सिडी मांगता है ,
न मुफ्त योजनाएँ।
वह सिर्फ न्यायसंगत व्यवस्था चाहता है।
संसद में असली बहस यही होनी चाहिए कि
राजस्व संतुलन कैसे बने और मेहनत करने वाले वर्ग को वास्तविक राहत कैसे मिले।
टैक्स पर टैक्स… और चुप्पी सिस्टम की! 😡
गाड़ी खरीदो ➝ GST दो
हर साल ➝ Road Tax दो
पेट्रोल-डीज़ल भरो ➝ Fuel Tax दो
फिर भी हाईवे पर कदम रखते ही —
“टोल दीजिए साहब!” 🚧💰
सवाल सिर्फ एक है 👇
��ब सड़कें जनता के टैक्स से बनती हैं,
तो जनता से टोल क्यों?
550 सांसदों में से
राघव चड्ढा ने संसद में वो सवाल पूछा
जो हर आम आदमी रोज़ टोल बूथ पर खड़ा होकर सोचता है! 👏
क्या सरकार को एक ही चीज़ के लिए
तीन-तीन बार टैक्स वसूलने का हक़ है?
या टोल सिस्टम सिर्फ
आम आदमी की जेब काटने की
एक “लीगल मशीन” बन चुका है? 🤔
अब चुप रहने का वक्त नहीं है!
टोल सिस्टम पर दोबारा सोच ज़रूरी है!
👉 आप बताइए —
ये लूट है या सिस��टम?
Raghav Chadha ने राज्यसभा में वन नेशन , वन मेडिकल ट्रीटमेंट की आवश्यकता पर जोर दिया और भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर सवाल उठाए।
उन्होंने मुद्दा उठाया कि 👇
देश में इलाज की गुणवत्ता और लागत राज्य दर राज्य, शहर दर शहर अलग क्यों है?
एक ही बीमारी का इलाज कहीं सुलभ और किफायती है, तो कहीं अत्यधिक महंगा और संसाधनों की कमी से जूझता हुआ।
मुख्य चिंताएं 👇
• सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर और स्टाफ की कमी।
• ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरी
• दवाओं और जांच की ऊंची कीमतें।
• निजी अस्पतालों में अनियंत्रित बिलिंग।
वन नेशन , वन मेडिकल ट्रीटमेंट का अर्थ यह है कि हर नागरिक को समान गुणवत्ता का इलाज मिले , इलाज की न्यूनतम मानक दरें तय हों ,
दवाओं और प्रक्रियाओं की कीमतों में पारदर्शिता हो और स्वास्थ्य सेवा को अधिकार के रूप में देखा जाए , न कि विशेष सुविधा के रूप में।
स्वास्थ्य व्यवस्था सिर्फ अस्पतालों की संख्या से नहीं , बल्कि समान पहुंच , पारदर्शिता और जवाबदेही से मजबूत होती है।
Raghav Chadha ने राज्यसभा में “वन नेशन , वन मेडिकल ट्रीटमेंट” की आवश्यकता पर जोर देते हुए भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि देश में एक ही बीमारी का इलाज अलग-अलग राज्यों और अस्पतालों में अलग गुणवत्ता और अलग कीमत पर मिलना असमानता को दर्शाता है। कहीं सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी है , तो कहीं निजी अस्पतालों में इलाज की लागत आम आदमी की पहुंच से बाहर है।
उन्होंने मांग की कि पूरे देश में इलाज के न्यूनतम मानक तय हों , दवाओं और चिकित्सा प्रक्रियाओं की कीमतों में पारदर्शिता हो और हर नागरिक को समान गुणवत्ता की स्वास्थ्य सेवाएं मिलें।
भारत में विकास का एक अजीब ही मॉडल चलता है...!!🙆🏼♂️
पहले नई सड़क बनती है, फिर उसी सड़क को तोड़कर नाला खोद दिया जाता है।
नाला पूरा होते ही दोबारा सड़क बिछती है और कुछ ही समय बाद पाइपलाइन, केबल या किसी नई योजना के नाम पर फिर खुदाई शुरू हो जाती है। यह सिलसिला संयोग नहीं, बल्कि एक ऐसा चक्र है जो कभी खत्म ही नहीं होता।
यह अव्यवस्था नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर र��ा गया खेल है जहाँ योजनाओं से ज़्यादा बिलों की चिंता होती है।
जनता टैक्स देती है, धूल झेलती है, गड्ढों से गुजरती है, और बदले में उसे सिर्फ़ चल रहा है का जवाब मिलता है। सड़कें कम और फाइलें ज़्यादा बनती हैं।
आज की दुनिया पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करती है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि भारत में भ्रष्टाचार सिर्फ़ एक समस्या नहीं, बल्कि वरदान बन चुका है।
चेहरे बदलते रहते हैं, वादे नए होते हैं, मग��� तरीका वही पुराना रहता है।
और हर बार इस खेल की कीमत वही चुकाता है....आम आदमी, जिसकी मेहनत की कमाई विकास के नाम पर बार-बार खोद दी जाती है।
भारत में मिलावट अब चोरी नहीं , उद्योग बन चुकी है। गुजरात की Satya Dairy पकड़ी गई 300 लीटर असली दूध से 1,800 लीटर नकली दूध तैयार।
रेसिपी सुनिए 👉 पानी + मिल्क पाउडर + कास्टिक सोडा + पामोलीन/सोयाबीन ऑयल + डिटर्जेंट + यूरिया खाद। ऊपर से चमकदार पाउच , नीचे गाँवों में सप्लाई।
₹71.29 लाख का ज़हर ज़ब्त हुआ, पाँच लोग गिरफ्तारऔर सवाल ये कि जो नहीं पकड़े गए, वो क्या खिला रहे हैं?
ज़ब्त माल 👉 450 किलो व्हे पाउडर, 625 किलो SMP, 300 किलो प्रीमियम SMP, 1,962 लीटर नकली दूध, 1,180 लीटर नकली छाछ।
यानि दूध नहीं , धीमा ज़हर।
अब सवाल हरामखोर संस्थाओं 👇
FSSAI कहाँ है? फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट क्या कर रहा है?
क्या बच्चों की ज़िंदगी इतनी सस्ती है कि माफिया खुलेआम ज़हर बेचें और सरकार सोती रहे?
यह सिर्फ मिलावट नहीं, पीढ़ियों के साथ किया जा रहा अपराध हैऔर इसकी ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए।
टैक्स देने वालों की कमर टूट चुकी है
सोने की चिड़िया अब कर्ज की रानी बन गई है
केवल सूर्य-चंद्रमा ही चुनावी ���ादे के बाहर हैं
जन्म लेने वाले बच्चे पर भी 1.5 लाख कर्ज है
मुफ्तखोरी पर नियंत्रण नितांत आवश्यक है
जब एक माँ अपने बच्चे को भरोसे के साथ ग्लास में दूध देती है , उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं होता कि उसी दूध में यूरिया और डिटर्जेंट मिलाया जा चुका है। जो दूध बच्चे की सेहत, हड्डियों और दिमाग के विकास के लिए होता हैb, वही दूध धीरे-धीरे जहर बन चुका है।
रिसर्च बताती है कि 71% दूध मिलावटी है , यूरिया , डिटर्जेंट और केमिकल्स से भरा हुआ। ।
फ्रीबीज पर सुनवाई को तैयार सुप्रीम कोर्ट!
CJI सूर्यकांत बोले- यह बेहद ही गंभीर मुद्दा।
याचिकाकर्ता ने फ्रीबीज पर तंज कसते हुए कहा ���ि राजनीतिक दल इतनी चीजें मुफ्त देने का वादा कर चुके हैं कि अब सिर्फ सूरज और चांद दिए जाने का वादा करना ही बचा रह गया है।
राजनीतिक दलों द्वारा सियासी फायदे के लिए मतदाताओं को फ्रीबीज (मुफ्त उपहारों) पर रोक लगाने से संबंधित याचिका पर उच्चतम न्यायालय ��ुनवाई के लिए तैयार हो गया है।
CJI सूर्यकांत ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि फ्रीबीज का मुद्दा बहुत ही महत्वपूर्ण है।
जिस 8 महीने की बेटी के साथ 8 साल पहले बलात्कार हुआ, उसे आजतक न्याय नहीं मिला। एक बेटी के साथ ग़लत होता है, वो सालों इंसाफ़ के लिए कोर्ट के चक्कर काटती है, बार-बार अपना दर्द दोहराती है, और हाथ जोड़कर इंसाफ़ माँगती है।
मैंने अपने महिला आयोग के 9 साल के कार्यकाल में 8 महीने की मासूम बच्ची से लेकर 90 साल की बुजुर्ग दादी तक के य��न शोषण के दिल दहला देने वाले मामले देखे और उन पर दिन-रात काम किया। हर केस एक चीख था, एक टूटा हुआ जीवन था और मैंने देखा कि अपराधी तो खुलेआम घूमते हैं, लेकिन पीड़िता को समाज की नज़रों से छिपना पड़ता है।
आज संसद में देश की आबादी की सुरक्षा का मुद्दा रखा
FSSAI , डेयरी विभाग और राज्य प्रशासन पर सीधे नुकीला सवाल 👇
देश-भर में बिक रहे दूध का उत्पादन बनाम बिक्री ऑडिट कहाँ है?
केमिकल , पाउडर और सिंथेटिक दूध की नियमित लैब जांच क्यों नहीं?
छोटे बच्चों के लिए बिकने वाले दूध पर ज़ीरो-टॉलरेंस नीति क्यों नहीं?
मिलावट पकड़ने का एक्शन केवल मीडिया के बाद ही क्यों?
@fssaiindia जवाब देकर टीम खुरपेंच का मुंह बंद कर दो।
आप भी जहर खा रहे है...!!
राज्यसभा सांसद और आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा ने संसद में खाने में मिलावट का मुद्दा उठाया....
उन्होंने कहा है कि देश में यह एक बड़ा स्वास्थ्य
संकट बन चुका है
उन्होंने बताया कि...
*दूध में यूरिया
*सब्जियों में ऑक्सीटोसिन
*पनीर में कास्टिक सोडा
*मसाले में ईट का चूरा
*और आइसक्रीम में डिटर्जेंट तक मिलाया जा रहा है...
क्या राघव चड्ढा बिल्कुल सही कह रहे हैं कि लोग धीरे-धीरे जहर खा रहे हैं...?
दूध में यूरिया
सब्जियों में ऑक्सीटोसिन
पनीर में कास्टिक सोडा
मसालों में ईंट का पाउडर
शहद में पीला रंग
पोल्ट्री में स्टेरॉयड
आइसक्रीम में डिटर्जेंट
हम सब ज़हर खा रहे हैं!
@raghav_chadha भीड़ में अलग लाइन ले रहे हैं।आम आदमी की जिंदगी की बात कर रहे हैं। बुलंद रहिए।
राज्य सभा की सांसद स्वाती मालीवाल ने बताया कि वर्ष 2024 में एक बड़ी फार्मा कंपनी 30 डॉक्टरों को ₹2 करोड़ खर्च कर Paris घुमाने ले गई।
सवाल सीधा है ये इलाज है या खुला सौदा?
फार्मा कंपनियाँ डॉक्टरों-अस्पतालों को ट्रिप, गिफ्ट, कमीशन जैसे लालच देती हैं और बदले में अपनी दवाएँ-इंजेक्शन मरीज़ों को लिखवाती हैं।
क्या यह ओपन ���िंडिकेट नहीं है?
ड्रग रेगुलेटर , मेडिकल काउंसिल , स्वास्थ्य मंत्रालय कहाँ हैं?
मरीज की जरूरत पर दवा लिखी जा रही है या कमीशन पर?
ऐसे सौदों की जां, खुलासा और सज़ा कब होगी?
जब इलाज व्यापार बन जाए ,
तो नुकसान मरीज का और मुनाफ़ा माफ़िया का होता है।