काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रांगण में आयोजित होने वाले रामायणी सम्मान हेतु कार्यक्रम संचालन का दायित्व एक बड़ी जिम्मेदारी को सार्थकता से निभाने जैसा है । बाबा विश्वनाथ की कृपा और आप सबका आशीर्वाद प्राप्त हो यही प्रार्थना है ।
#RamayanResearchCouncil#kashihinduvishwavidalaya
15 अगस्त सिर्फ़ कैलेंडर की एक तारीख़ नहीं बल्कि
ये उन वीरों की कहानी है जिन्होंने अपने आज को मिटाकर हमारे कल को आजाद बनाया था ये वो दिन है, जब तिरंगा सिर्फ़ आसमान में नहीं बल्कि हर हिंदुस्तानी के सीने में लहराया था.सवतंत्रता दिवस की अनंत शुभकामनाएँ ।
#SwatantrataDiwas
गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे ।
स्वर्गापवर्गास्पदहेतु भूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ।।
सभी देशवासियों को 79वें स्वतंत्रता दिवस की अनंत शुभकामनाएँ।।
"दक्षिणामूर्ति स्त्रोत - ध्यानम्"
ॐ नमः प्रणवार्थाय शुद्धज्ञानैकमूर्तये।निर्मलाय प्रशान्ताय दक्षिणामूर्तये नमः ।। ५।।
भारतीय अद्वैत वेदान्त की दृष्टि में गुरु वह नहीं जो केवल शब्द देता है, वरन् वह है जो शब्दातीत तत्त्व में प्रतिष्ठित होता है। शब्द वहाँ पहुँचते हैं, जहाँ ब्रह्म नहीं होता; पर जहाँ ब्रह्म है, वहाँ मौन है।
इस श्लोक में आदि शंकराचार्य ने दक्षिणामूर्ति को प्रणव (ॐ) का अर्थ, शुद्धज्ञान की एकमात्र मूर्ति, निर्मल चैतन्य, और प्रशान्त तुरीय ब्रह्म के रूप में वंदित किया है। यह कोई वैयाकरणीय स्तुति नहीं, अपितु उपनिषदों में संचित ज्ञान की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है।
“ॐ नमः प्रणवार्थाय” — दक्षिणामूर्ति: प्रणव का तात्त्विक अर्थ
माण्डूक्योपनिषद् उद्घोष करता है — “ॐ इत्येतदक्षरं इदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वम् ॐकार एव।”
अर्थात् यह सम्पूर्ण विश्व- भूत, भविष्य, वर्तमान यह सब ‘ॐ’ में ही स्थित है।
भगवद्पाद आद्य शंकराचार्य माण्डूक्य भाष्य में लिखते हैं - “प्रणवः सूचकः ब्रह्मणः, न तु वर्णमात्रम्” ॐ कोई ध्वनि मात्र नहीं है, अपितु निर्गुण ब्रह्म का सघन सूचक है। दक्षिणामूर्ति प्रणव के अर्थ हैं — वे न केवल ‘ॐ’ का उच्चारण हैं, अपितु उसके तत्त्व हैं। प्रणव के अ, उ, म् तीनों वर्ण जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाओं का संकेत करते हैं, और चतुर्थ-तुरीय- जो अविभाज्य, शब्दातीत, शान्त और अद्वैत है, वही दक्षिणामूर्ति का वास्तविक स्वरूप है।
शुद्धज्ञानैकमूर्तये” — केवल ज्ञानस्वरूप मूर्ति
तैत्तिरीयोपनिषद् (2.1.1) कहता है -
“सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म”
यहाँ ‘ज्ञान’ कोई ज्ञेय वस्तु नहीं, अपितु ब्रह्म का स्वरूप है।
भगवद्पाद शंकराचार्य इस पर भाष्य करते हैं -
“न तु इदं ज्ञानं गुणः, किं तु स्वरूपम्” - ज्ञान कोई ब्रह्म का अतिरिक्त गुण नहीं, उसकी स्वाभाविक सत्ता है। दक्षिणामूर्ति ज्ञान देने वाले नहीं, वे स्वयं ज्ञानस्वरूप ब्रह्म हैं। उनकी “एकमूर्ति” दर्शाती है कि वे सर्वविकल्परहित, केवल ज्ञानरूप हैं - जो “द्वैतस्य अभावात् केवलं ज्ञानम् इति”
“निर्मलाय”- अविद्या, राग, द्वेषादि से रहित ब्रह्म ।
श्वेताश्वतर उपनिषद् कहती है —
“एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः”
वह रुद्र (शिव / ब्रह्म) अकेला ही है, उसके अतिरिक्त कोई नहीं।
निर्मलता का तात्पर्य है - मलरहित स्थिति।
“मल’ (अविद्या) है: अहंकार, ममता, राग, द्वेष, और देहबुद्धि। दक्षिणामूर्ति उस निर्मल चैतन्य का मूर्त रूप हैं, जो “अविद्या कल्पितोपाधि रहितः आत्मा” है।
शंकराचार्य आत्मबोध ग्रन्थ में कहते हैं —
“निर्मलं परमं शान्तं ज्ञानस्वरूपं निःस्पृहं”
यह वर्णन दक्षिणामूर्ति के इसी शुद्ध, निर्विकारी स्वरूप को उद्घाटित करता है।
“प्रशान्ताय” — तुरीय ब्रह्म की निःशब्द शान्ति
माण्डूक्योपनिषद् में तुरीय की परिभाषा है - “नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं… न प्रज्ञानघनं, शान्तं शिवं अद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते।”
यह चतुर्थ अवस्था दक्षिणामूर्ति का प्रत्यक्ष स्वरूप है। वे न जाग्रत हैं, न स्वप्न, न सुषुप्त — वे हैं तुरीय, जो प्रशान्तम् है- कर्मरहित, चिन्तारहित, विकल्परहित चैतन्य।
शंकराचार्य, गीता भाष्य में कहते हैं — “प्रशान्तरूपं आत्मानं विविक्तदेशसेवी भव” ब्रह्म वह है, जो शान्त है - आन्तरिक, सदा साक्षीभाव में स्थित। दक्षिणामूर्ति की यह प्रशान्ति उपासना की सिद्धि नहीं, आत्मा की सहज स्थिति है।
दक्षिणामूर्ति - उपनिषदों में प्रतिपादित ब्रह्म का मूर्तिमान स्वरूप है। उपनिषदों में जिन विशेषणों से ब्रह्म का वर्णन किया गया है, वे सब दक्षिणामूर्ति के इस एक श्लोक में समाहित हो जाते हैं।
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भगवद्पाद आद्य शंकराचार्य जी द्वारा रचित आत्मषट्कम् (जिसे निर्वाणषट्कम् भी कहा जाता है) एक प्रसिद्ध कल्याणकारी स्तोत्र है, जिसमें अद्वैत वेदान्त के सिद्धान्तों का सार छः श्लोकों में प्रस्तुत किया गया है। प्रत्येक श्लोक “चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्” इस महान उद्घोषणा पर पूर्ण होता है।
भारतीय दर्शनों में अद्वैत वेदान्त वह सर्वोच्च शिखर है, जहाँ साधक ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ की अनुभूति में स्थिर हो जाता है। इस भावबोध की साक्षात् काव्यमयी उद्घोषणा है — “आत्मषट्कम्”, जिसे भगवद्पाद आदि शंकराचार्य ने निर्वाणषट्कम् के रूप में छः श्लोकों में रचकर ब्रह्मविद्या का अमृतपान करवाया है। यह स्तोत्र केवल शाब्दिक रचना नहीं, अपितु आत्मज्ञान का मंत्रमय व्याकरण है ; एक ऐसी तपःस्नात वाणी जो ‘शिवोऽहम्’ के दिव्य सत्य तक साधक का पथ आलोकित करती है।
प्रथम श्लोक आत्मा के विवेचन की आधारभूमि बनाता है — “मनो बुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहम्।” यहाँ भगवद्पाद आद्य शंकराचार्य आत्मा से उपाधियों का निषेध करते हैं। मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त-ये सभी अन्तःकरण के विकारी उपकरण हैं, आत्मा नहीं। देह के माध्यम से जो इन्द्रिय-ज्ञान होता है, वह भी आत्मा का प्रतिबिम्ब मात्र है — न श्रोत्र, न जिह्वा, न नेत्र, न पञ्चभूत। इन सबका सम्यक् निरसन करते हुए श्लोक अंत में आत्मा की सकारात्मक अभिव्यक्ति करता है “चिदानन्दरूपः शिवोऽहम्।” यह शुद्ध ब्रह्मनिष्ठ की उद्घोषणा है - जहाँ आत्मा केवल ज्ञानमात्र नहीं, अपितु स्वयं आनंदस्वरूप है।
द्वितीय श्लोक में आत्मा की पृथक्कता पंचकोशों से स्पष्ट की जाती है। अन्नमय से आनंदमय तक — शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और सुख — सभी को आत्मा नहीं माना गया है। आत्मा न वायु है, न प्राण, न कर्मेन्द्रियाँ; न वह कुछ करती है, न भोगती है।
यहाँ वेदान्त का वह स्वर्णसूत्र उजागर होता है - “कर्तृत्व और भोक्तृत्व आत्मा के धर्म नहीं, देह और बुद्धि की कल्पना हैं।” आत्मा तो उपाधियों के पीछे प्रज्वलित चेतना-ज्योति है, जो न कभी बदलती है, न विकारी होती है।
तृतीय श्लोक आत्मा को राग-द्वेष, लोभ-मोह, मद-मात्सर्य जैसे मानसिक विकारों से परे स्थापित करता है। न उसमें धर्म का आग्रह है, न मोक्ष की इच्छा — क्योंकि वह पहले से ही पूर्ण है।
अद्वैत का उद्घोष है — “मोक्ष कोई प्राप्तव्य वस्तु नहीं, प्रत्युत स्वरूपसिद्धि है।” आत्मा में कामना का प्रवेश ही नहीं होता, वह असङ्ग है, निरपेक्ष है, केवल चिदानन्दस्वरूप है।
चतुर्थ श्लोक कर्मफल, यज्ञ, मन्त्र, तीर्थ — इन सभी लौकिक या वैदिक विधियों से आत्मा की असंबद्धता को प्रतिपादित करता है। आत्मा न पुण्य है, न पाप; न भोग्य है, न भोगता; न अनुभव है, न अनुभवी। यह वह विवेक है जो ‘कर्म’ और ‘कर्मफल’ के चक्र से साधक को मुक्त करता है। वेद, यज्ञ, तप -सब साधन हैं; आत्मा स्वयं सिद्ध है। वह साध्य नहीं, प्रत्युत साधना की मूल सत्ता है।
पञ्चम श्लोक जन्म-मरण, जाति-भेद, सम्बन्ध, कर्तव्यों — सबका निषेध करता है। आत्मा अजन्मा है, अतः न माता है, न पिता, न जाति, न कुल, न कोई बन्धन। यहाँ भगवद्पाद शंकराचार्य वेदान्त के उस गूढ़ रहस्य को उद्घाटित करते हैं — “आत्मा अनादि है, नित्य है, स्वयंसिद्ध है।” यहाँ आत्मा को किसी भी लौकिक सम्बन्ध की परिधि से पूर्णतया मुक्त दिखाया गया है। यह पूर्ण असङ्गत्व की स्थापना है — जहाँ ‘मैं’ किसी भी ‘दूसरे’ से नहीं जुड़ा, क्योंकि ‘द्वितीय’ कुछ है ही नहीं।
षष्ठ श्लोक अद्वैत का पूर्ण निरूपण है — “अहं निर्विकल्पो निराकाररूपः।” आत्मा विकाररहित, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वेन्द्रियस्वरूप होते हुए भी निर्लिप्त है। वह न मुक्त है, न बन्धित — क्योंकि वह कभी बन्धन में रहा ही नहीं। यह वह स्थिति है जहाँ आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं रहता — आत्मा ही ब्रह्म है। न ज्ञानकर्ता बचता है, न ज्ञेय- केवल “शिवोऽहम्” की दिव्य अनुभूति शेष रहती है। यही न चासङ्गतः नैव मुक्तिर्न मेयः - इस मंत्र की मर्मगति है।
आत्मषट्कम् अद्वैत वेदान्त का वह अमृत स्रोत है, जो साधक को उपाधियों से परे ले जाकर आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित करता है। यह केवल नकार नहीं, प्रत्युत गहन सकारात्मक बोध है - “शिवोऽहम्” मैं ही वह हूँ, जो निर्विकल्प है, निराकार है, चिदानन्दरूप है। यह स्तोत्र हमें स्मरण कराता है कि हम जो अनुभव करते हैं, सोचते हैं, देखते हैं — वह सब आत्मा नहीं। आत्मा वह है, जो सबके पीछे, भीतर, और परे स्थिर है - अज, अभेद्य, अद्वितीय।
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Heartiest congratulations to Hon’ble Prime Minister Shri Narendra Modi ji and the entire nation of India on the conferment of ‘The Officer of the Order of the Star of Ghana,’ Ghana’s highest state honour! This is yet another proud moment for our beloved country! This prestigious recognition not only honours PM Modi’s visionary global leadership but also celebrates India’s rising stature on the world stage under his guidance. By dedicating this award to the youth, shared cultural heritage, and the historic bond between India and Ghana, you inspire us all. May this milestone further strengthen the friendship between our nations, paving the way for a brighter future of collaboration and growth. Congratulations to India for shining bright.
Jai Hind !
@PMOIndia@rashtrapatibhvn
"वन्दे वाञ्छितकामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखरम्।
सिंहारूढाचतुर्भुजां स्कन्दमातामहेश्वरीम्॥"
गुप्त नवरात्रि की साधना, बाह्य आडम्बर से परे, एकान्त मौन में आराध्य के प्रति पूर्ण समर्पण का निमित्त बनती है। पंचम दिवस की अधिष्ठात्री "माँ स्कंदमाता" साधक को लौकिक भय, मानसिक विकार और चित्त की चंचलता से ऊपर उठाकर आत्मानुभूति की ओर ले जाने वाली दिव्य मातृशक्ति हैं। वे करुणा की साकार प्रतिमा हैं, जिनकी कृपा से साधक आत्मिक स्थिरता और अंतर्बोध की ओर अग्रसर होता है।
शास्त्रों में वर्णित स्कंदमाता सिंह पर आरूढ़, चतुर्भुजा, एक भुजा में बाल स्कन्द (कार्तिकेय) को अंक में धारण किए हुए, करुणा, वात्सल्य और आध्यात्मिक तेज की प्रतीक हैं। यह स्वरूप केवल मातृत्व का चित्रण नहीं करता, अपितु गूढ़ रूप से दर्शाता है कि आत्मा को मोक्ष के पथ पर ले जाने वाली शक्ति, ‘माता’ ही है — जो ज्ञान के रूप में स्वयं अपने अंश को गोद में लिए हुए है।
भगवद्पाद आद्य शंकराचार्य रचित सौन्दर्यलहरी में देवी की उपासना केवल सौन्दर्य या शक्ति के रूप में ही नहीं, वरन् ब्रह्मस्वरूपा चैतन्यशक्ति के रूप में की गई है।
चतुःषष्ट्या तन्त्रैः सकलमतिसन्धाय भुवनं स्थितस्तत्तत्सिद्धिप्रसवपरतन्त्रैः पशुपतिः।
पुनस्त्वन्निर्बन्धादखिलपुरुषार्थैकघटना स्वतन्त्रं ते तन्त्रं क्षितितलमवातीतरदिदम्।।31
यहाँ ‘तन्त्र’ का आशय है - उन शक्तियों से, जिनसे सकल पुरुषार्थों की प्राप्ति सम्भव होती है। स्कंदमाता उन्हीं तन्त्रों की अधिष्ठात्री हैं - जो साधक को लौकिक सुख के साथ आत्मबोध की ओर ले जाती हैं। उनकी कृपा से चित्त निर्मल होता है, और साधक को अपने ही हृदय में स्थित ब्रह्म की झलक मिलने लगती है।
अद्वैत वेदान्त का मूल उद्देश्य है - “चित्तवृत्तिनिरोधेन आत्मदर्शन।” भगवद्पाद आद्य शंकराचार्य के अनुसार जब चित्त की सारी वृत्तियाँ शान्त होती हैं, तभी आत्मा के स्वरूप का साक्षात्कार सम्भव होता है।
माँ स्कंदमाता की उपासना से साधक के भीतर करुणा, विवेक और स्थिरता उत्पन्न होती है। उनका सिंह पर आरूढ़ होना इन्द्रियों के संयम का प्रतीक है, और उनका चन्द्रशेखर रूप चित्त की शीतलता और विवेकशीलता का संकेत देता है। वे साधक को यह क्षमता प्रदान करती हैं कि वह चित्त के विकारों से ऊपर उठकर आत्मानुभूति कर सके — यही अद्वैत है।
गुप्त नवरात्रि की साधना एक अंतर्मुख तपस्या है। यह साधक को बाह्य कर्मकांड से हटाकर स्वयं के भीतर स्थित शक्ति और ब्रह्म की अनुभूति की ओर उन्मुख करती है। माँ स्कंदमाता की उपासना इस साधना का केन्द्र बिन्दु बनती है, जहाँ साधक मन और इन्द्रियों का संयम करता है, चित्त को विकारों से मुक्त करता है, और परम तत्व के साक्षात्कार की योग्यता प्राप्त करता है।
यह वही मार्ग है, जिसे भगवद्पाद आद्य शंकराचार्य ने "मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहं न च श्रोत्र जिव्हे न च घ्राण नेत्रे .." कहकर निर्देशित किया - जहाँ आत्मा इन्द्रियों, चित्त और मन से परे स्थित परिपूर्ण सत्ता है।
स्कंदमाता की उपासना साधक के जीवन में करुणा, विवेक, संयम और आत्मबोध की ज्योति प्रज्वलित करती है। वे केवल एक माता नहीं, अपितु अद्वैत तत्त्व की अनुग्रह शील सत्ता हैं — जो अपने अंक में शिवज्ञान को धारण कर साधक को उसकी आत्मसत्ता तक पहुँचने में सहायक होती हैं।
“नमामि स्कंदजननीं शिववामभागनिलयां
शिवज्ञानप्रकाशिनीं चित्तसुधां सम्प्लावयन्तीम्॥”
गुप्त नवरात्रि के इस विशेष अवसर पर "माँ स्कंदमाता" की उपासना; एक साधक की आत्मिक उन्नति और परब्रह् की प्राप्ति का दुर्लभ अवसर बन जाती है। यह साधना तब पूर्ण होती है जब साधक अन्ततः अनुभव करता है : “अहं ब्रह्मास्मि” !
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चन्द्रहासोज्जवलकरशैलवरवाहनाम्।
कात्यायनी शुभं दद्यात् देवी दानवघातिनी॥
देवी कात्यायनी आदिशक्ति की षष्ठी स्वरूपा, जो न केवल ऋषि कात्यायन की तपस्या से प्रकट हुईं, अपितु कालातीत करुणा की साक्षात् मूर्ति बनकर सृष्टि में अवतरित हुईं। वे कोई साधारण अवतरण नहीं, वरन् परब्रह्मस्वरूपिणी-परम करुणामयी; परम सत्ता साधकों के ध्यान की अधिष्ठात्री और आज्ञाचक्र की स्वामिनी हैं, जो चित्त की एकाग्रता और आत्मसाक्षात्कार का द्वार खोलती हैं।
“पराम्बा” यह शब्द स्वयं में संपूर्णता का संनाद है; वह जो परात्पर, अप्रमेय और सृष्टि-स्थिति-संहार की लीलाधारिणी है। भगवद्पाद शंकराचार्य अपनी सौंदर्यलहरी में कहते हैं:
त्वदन्यः पाणिभ्यामभयवरदो दैवतगणः
त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया।
भयात्त्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकं
शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ॥
यह स्तुति माँ के चरणों की अरुणिमा और त्रैलोक्य-चेतन्य को प्रज्वलित करने वाली उनकी महिमा का गान करती है।
देवी कात्यायनी आत्मबोध की अधिष्ठात्री हैं, जो साधक को आज्ञाचक्र के पथ पर ले जाकर बुद्धि को आत्म-समर्पण हेतु परिष्कृत करती हैं।
अद्वैत वेदांत के दृष्टिकोण से यह वही अवस्था है, जहाँ “चित्तस्य शुद्धिः”, “ज्ञाननिष्ठा” और “कर्तृत्व-अकर्तृत्व भ्रांति का लय” होता है। उनकी उपासना साधक को स्वयं की सुप्त ब्रह्मबुद्धि के जागरण की ओर ले जाती है।
माँ कात्यायनी का स्मरण केवल देवत्व का आवाहन नहीं, अपितु आत्मा का स्वयं से संनाद है। उनके कृपापात्र साधक के लिए कोई लक्ष्य असाध्य नहीं, क्योंकि उन पर उस चेतना का सान्निध्य होता है, जो स्वयं कर्ता, भोक्ता और साक्षी है।
उनकी उपासना आत्मबोध का दिव्य साधन है, जहाँ अज्ञान का लय होता है और सत्य का प्राकट्य। माँ पराम्बा कात्यायनी; त्रैलोक्य का मंगल करें, साधकों को आत्मसाक्षात्कार का पथ प्रशस्त करें।
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सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः ।
सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥
- मुण्डकोपनिषद् २.१.८
मुण्डकोपनिषद् के इस गूढ़ मंत्र में ऋषि ने अद्वितीय उपमाओं के माध्यम से विराट सृष्टि और उसके अंतरंग रहस्यों को अभिव्यक्त किया है कि “सप्त प्राण उत्पन्न होते हैं, तदनुसार सात अर्चियाँ, सात समिधाएँ, सात होम, सात लोक (जिनमें प्राण गुप्त रूप से निवास करते हैं, हृदय रूपी गुफा में।)”
अग्नि रूपी इन्द्रियाँ, होम रूपी कर्म कल्पना कीजिए एक यज्ञस्थली, जहाँ सात शोभायमान अग्नि-शिखाएँ नृत्य कर रही हों — ये सात अग्नि-शिखाएँ हमारी इन्द्रियाँ हैं, जो बाह्य जगत के दृश्य, शब्द, स्पर्श, रस, गंध, रूप के हवन में निरन्तर व्यस्त रहती हैं। समिधाएँ वे कर्मसामग्री हैं, जिन्हें हमारी चेष्टाएँ हर क्षण यज्ञ में अर्पित कर रही हैं। इस यज्ञ में जो होम किए जा रहे हैं, वे स्वयं हमारे अनुभव और कर्मफलों के रूप में प्रकट होते हैं।
उपनिषद् इस विराट सृष्टि के भीतर गुप्त गहराइयों की ओर संकेत करता है — गुफा, जो ह्रदय रूपी है, जहाँ प्राणरूप आत्मा निवास करती है। यहीं सारा संसार, सारी इन्द्रियाँ, समिधाएँ और यज्ञ एक बिन्दु पर सिमटते हैं। गुफा के भीतर स्थित प्राण केवल साधारण साँसें नहीं, बल्कि चेतना के सात स्तर हैं, जिनके माध्यम से हम जीवन में जागरण, स्वप्न, सुषुप्ति के लोक पार करते हुए उसी शाश्वत सत्य में विसर्जित होते हैं।
भगवान शंकराचार्य इस मंत्र के भाष्य में अद्वैत वेदान्त के गूढ़ सिद्धान्त को उजागर करते हुए कहते हैं कि ये इन्द्रियों के प्राण, लोक, कर्म – सभी अंततः एक ही परम ब्रह्म से उत्पन्न होते हैं, उसी में स्थित रहते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं। इस दृष्टि से देखें, तो इन्द्रियों के प्रत्येक अनुभव में केवल ब्रह्म का खेल है।
अद्वैत वेदान्त के प्रकाश में, प्रत्येक इन्द्रिय, प्रत्येक अनुभव, प्रत्येक लोक – ब्रह्म के विस्तार हैं। साधक को चाहिए कि इस एकत्व को समझे, ताकि इन्द्रियों के मोह से परे जाकर वह उसी परम तत्व में प्रतिष्ठित हो सके।
इस मंत्र में उपनिषद् हमें सिखाती है कि इन्द्रियों के सात रंग, सात कर्म-अर्चनाएँ, सात लोक — सभी आत्मा के गूढ़ गुफा में निवास करते हैं, जहाँ अद्वैत का सूर्य प्रज्वलित है। उस सूर्य की रौशनी में इन्द्रियों के यज्ञ, कर्म के होम, प्राणों के लोक, सब एक अखण्ड चेतना में मिलकर शान्त हो जाते हैं।
इस गहन मंत्र के माध्यम से उपनिषद् साधक को अपने भीतर झाँकने, इन्द्रियों के यज्ञ से परे एक अद्वय चैतन्य के अनुभव में प्रतिष्ठित होने के लिए आमंत्रित करता है - जहाँ जीवन का प्रत्येक क्षण परम ब्रह्म के विराट यज्ञ में होमित होता है, और साधक स्वयं उस चिरंतन अग्निशिखा के रूप में प्रकट हो जाता है।
From the Muṇḍaka Upaniṣad’s sacred verse, a vision unfolds:
“Seven prāṇas arise; seven flames, seven fuels, seven oblations; seven worlds, hidden in the heart’s cave.”
Seven radiant flames—our senses—burn brightly, fed by the fuel of actions, thoughts, and perceptions. Each experience, an oblation in the inner yajña, transforms into the rhythm of existence.
Deep within the heart’s sacred cave, these prāṇas dwell, uniting the worlds of waking, dreaming, and beyond. Here, life’s currents converge, resting in the silent core of being.
Advaita’s Eternal Truth.
Śaṅkarācārya whispers: all arises from Brahman, shines briefly, and merges back into the One. The senses, the worlds, the sacrifices—are but waves on the ocean of Consciousness.
Awakening to Oneness.
In this revelation, the seeker finds liberation. The seven prāṇas, the flames, the worlds—all are Brahman’s light. Life becomes a sacred offering, flowing back to its infinite source.
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"नीलांचल निवासाय नित्याय परमात्मने।
बलभद्र सुभद्राभ्याम् जगन्नाथाय ते नमः॥"
भगवान श्री जगन्नाथ – जो नीलाचल के नित्य निवासी, परमात्मा, परमसत्य और सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान करुणासिन्धु हैं – आज अपनी रथयात्रा में विश्व के प्रत्येक प्राणी के हृदय में विराजते हैं। अद्वैत वेदान्त के अनुसार, सृष्टि, जीव और ईश्वर एक ही अद्वितीय चेतना के अभिव्यक्त रूप हैं। यही भावना रथयात्रा के पर्व में गहराई से निहित है।
यह रथ केवल काष्ठ-पट्टियों से निर्मित एक वाहन नहीं, बल्कि इस देह रूपी रथ में चेतना रूपी सारथी के रूप में स्वयं ब्रह्म परमात्मा प्रतिष्ठित हैं। बलभद्र और सुभद्रा इस सृष्टि के भीतर स्थित ज्ञान-बल और करुणा के प्रतीक हैं, जिनकी उपस्थिति में स्वयं जगन्नाथ रूपी परम-सत्य हृदय के रथ पर आरोहित होते हैं।
महाप्रभु जगन्नाथ केवल बाह्य रूप से देव ही नहीं, बल्कि अद्वैत ब्रह्म के सगुण रूप हैं। रथयात्रा हमारे भीतर इस सत्य को उद्घाटित करने की यात्रा है कि “अहम् ब्रह्मास्मि” – मैं वही ब्रह्म हूँ, जो सर्वत्र एकरस व्याप्त है। जब मन, बुद्धि, अहंकार से युक्त शरीर रूपी रथ में चेतना रूपी सारथी परमात्मा को स्थापित किया जाता है, तभी ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्म के पुष्प उस रथ में स्वतः प्रकट होते हैं।
रथयात्रा पर्व केवल बाहरी उत्सव ही नहीं, बल्कि अंतर्यात्रा है – उस अद्वैत परात्पर ब्रह्म के साक्षात्कार की, जो हमारे भीतर स्थित है। इस पर्व पर हम प्रार्थना करते हैं कि नीलाचल में निवास करने वाले महाप्रभु श्री जगन्नाथ हमारे अंतःकरण में इस अद्वैत तत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित हों, जिससे हम संसार में रहते हुए भी ब्रह्ममय दृष्टि से देखें और जीवन को परिपूर्णता से जीएँ।
अद्वैत वेदान्त के प्रकाश में इस पावन पर्व की शुभकामना है कि महाप्रभु भगवान श्री जगन्नाथ जी अपनी करुणामय दृष्टि से हमारे हृदय में ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्मनिष्ठा की अखण्ड ज्योति प्रज्वलित करें।
"रथयात्रा पर्व" की हार्दिक शुभकामनाएँ !
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#जगन्नाथ_रथयात्रा #जगन्नाथपुरी
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25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया।
लेकिन क्या आप ये जानते हैं देश में आपातकाल की स्थिति कैसे पैदा हुई ?
इसका लाल बहादुर शास्त्री की मौत से क्या कनेक्शन है?
सुनिए पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर जी को!
तदेतत् सत्यं यथा सुदीप्तात् पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः।
तथा अक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति॥”
- मुण्डकोपनिषद् २.१.१
मुण्डकोपनिषद् के इस मंत्र में गुरु शिष्य को अद्वैत वेदान्त के गूढ़ सिद्धान्त की शिक्षा उपमामूलक रूप में प्रदान करते हैं। जिस तरह प्रज्वलित अग्नि से अनगिनत चिन्गारियाँ उत्पन्न होती हैं, उसी तरह एकमात्र अविनाशी अक्षरब्रह्म से इस संसार के विविध रूप उत्पन्न होते हैं, और अन्त में उसी में लय हो जाते हैं।
अग्नि से उत्पन्न चिन्गारियाँ कुछ क्षणों के लिए स्वतंत्र प्रतीत होती हैं, परन्तु वे अंततः अग्नि में ही मिलती हैं। ठीक वैसे ही, यह प्रपञ्च — जिसमें जीव, जगत और ईश्वर के विविध रूप दिखाई पड़ते हैं — एकमात्र ब्रह्म से उत्पन्न होते हैं। यद्यपि इस सृष्टि में नानात्व प्रतीत होता है, किन्तु सारा अस्तित्व उस एक अद्वितीय कारण में स्थित है।
भगवान शङ्कराचार्य के भाष्य के अनुसार अक्षरम् अविनाशी ब्रह्म इस सम्पूर्ण सृष्टि का उपादान कारण है — वही उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का आधार है। चिन्गारियों के अग्नि में पुनः मिल जाने से यही भाव अभिव्यक्त होता है कि समस्त प्राणी, प्रपञ्च और जगत् उसी में लय होते हैं।
इस उपमा के माध्यम से अद्वैत वेदान्त की मुख्य शिक्षा स्पष्ट होती है —
एकं सत् विप्राः बहुधा वदन्ति — एकमात्र सत् है, ऋषि उसे विभिन्न रूपों में व्यक्त करते हैं। जगत में जो विविधता प्रतीत होती है, वह माया जनित उपाधियों के कारण है। इस विविधता के पार एक अद्वितीय चैतन्य है, जिसको जानना ही मुक्ति है।
साधक को चाहिए कि इस उपदेश के आलोक में जगत के प्रत्येक अनुभव में एकमात्र सत् के दर्शन करें। इस सत्य के बोध से द्वैत का भ्रम दूर होता है और अद्वैत अनुभव में मन स्थिर हो जाता है। इस उपदेश में गुरु शिष्य को निर्देशित करते हैं कि उपाधियों से परे अपने ही आत्मस्वरूप को पहचानना जीवन का चरम लक्ष्य है।
अग्नि से उत्पन्न चिन्गारियों की उपमा इस मंत्र में अद्वैत वेदान्त के गूढ़ रहस्य को उद्घाटित करती है — एकमात्र अविनाशी ब्रह्म से ही सृष्टि, पालन और लय होता है। उपनिषद् हमें बताती है कि जगत की विविधता में एकता के दर्शन से ही मोक्ष सम्भव है। इस उपदेश के अनुसार साधक को उपाधियों से परे चैतन्य के अद्वैत रूप में स्थित होना चाहिए।
Muṇḍaka Upaniṣad 2.1.1
“Just as countless sparks arise from a blazing fire and merge back into it, so too all beings come forth from the imperishable Brahman and return to It.”
This beautiful verse reveals a key teaching of Advaita Vedānta. Brahman is the one eternal source of the entire universe — all names and forms appear like sparks from this fire. Though we see diversity, everything is rooted in Brahman and ultimately returns to that one Reality.
Śaṅkarācārya explains that Brahman is the true essence of all beings. The sparks may seem separate, but they never exist apart from the fire. In the same way, all creatures and worlds arise in Brahman and disappear into It.
This insight reminds the seeker to look beyond surface differences. Realizing the one Brahman in all is the path to liberation.
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"तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये
शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः ।
सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति
यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ।।"
- मुण्डकोपनिषद् १.२.११
यह मंत्र मुण्डकोपनिषद् की दिव्य ध्वनि है, जिसमें मानव जीवन की चरम साधना का आलोक प्रस्फुटित होता है। यह केवल एक वैदिक पद्य नहीं, अपितु एक दार्शनिक आह्वान है— उस आत्मा के लिए, जो संसार की क्षणभंगुरता से थककर, सत्य की निष्कलुष धाराओं की ओर उन्मुख हुई है।
यहाँ वर्णन उन तपस्वियों का है, जिन्होंने तप और श्रद्धा को जीवन का आधार बना लिया। वे अरण्यवास में रहते हैं— न केवल भौगोलिक अरण्य में, बल्कि संसार की कोलाहलपूर्ण वृत्तियों से दूर, अंतर्मन के एकान्त में। यह विरक्ति उनका पलायन नहीं, अपितु गहन साक्षात्कार की पूर्वपीठिका है।
“तपः” का तात्पर्य है— देह, इन्द्रिय और मन की कठोर साधना। यह तप अग्नि के समान है, जो राग-द्वेष, अहंकार और मोह को भस्म करता है। “श्रद्धा” वह अंतःप्रदीप है, जो गुरु वचनों और शास्त्रों में अटूट विश्वास के रूप में जलता है। यह श्रद्धा ही है, जो साधक को कर्म से परमार्थ तक ले जाती है, शब्द से परब्रह्म तक।
वे “शान्ताः” हैं— क्योंकि उन्होंने अपनी कामनाओं का विसर्जन कर दिया है। “विद्वांसः” हैं— क्योंकि उन्हें आत्मा और अनात्मा का भेद स्पष्ट है। और वे “भैक्ष्यचर्यां चरन्तः” हैं— क्योंकि उन्होंने भोग की आकांक्षा का परित्याग कर केवल निर्वाहमात्र की व्यवस्था की है। उनका जीवन उपभोग के लिए नहीं, उपासना के लिए है।
ऐसे साधक मृत्यु के समय “सूर्यद्वार” से प्रस्थान करते हैं। यह कोई भौतिक द्वार नहीं, वरन् वह सूक्ष्म मार्ग है, जिसे शास्त्रों में देवयान कहा गया है— वह दिव्य पथ जो आत्मा को ब्रह्मलोक की ओर ले जाता है।
“विरजाः प्रयान्ति” — वे क्लेश और पाप से रहित होते हैं; उनकी यात्रा रजोगुण और तमोगुण से अतीत है।
जहाँ वे जाते हैं, वहाँ “अमृतः स पुरुषः” स्थित है— अर्थात् वह सगुण ब्रह्म, जो समयातीत है, जो अव्यय है। यह कोई लौकिक पुरुष नहीं, अपितु हिरण्यगर्भ रूप ब्रह्म है, जिसे उपासना के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। किन्तु उपनिषद् यहीं नहीं रुकता। यह मार्ग अन्तिम नहीं है, अपितु वह पूर्ववर्ती साधना है, जो जीव को परमगति की ओर अग्रसर करती है।
भगवद्पाद शंकराचार्य इस मंत्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि—
“न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः” — केवल त्याग और ज्ञान से ही परम अमृत की प्राप्ति होती है।
यह मंत्र एक ध्यानसूत्र है, एक दिग्दर्शन है — उस साधना के पथिक के लिए जो आत्मबोध की चोटी पर आरोहण करना चाहता है। यह हमें बताता है कि—
•श्रद्धा के बिना ज्ञान निष्फल है,
•तप के बिना श्रद्धा अस्थिर है,
•शान्ति के बिना साधना अधूरी है,
•और ज्ञान के बिना मोक्ष असम्भव है।
“तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये…” — यह केवल एक मंत्र नहीं, जीवन की महायात्रा का उद्घोष है। यह उस सत्पथ की घोषणा है, जो न कर्मफल में रुकता है, न स्वर्ग की आकांक्षा में, बल्कि अंततः आत्मा को निर्गुण ब्रह्म के परम आलोक में विलीन कर देता है।
ऐसी साधना ही मानव जीवन का सर्वोच्च प्रयोजन है— और यही है “अमृतत्व की ओर यात्रा”।
Muṇḍakopaniṣad 1.2.11
The Muṇḍakopaniṣad presents a luminous vision of the seeker’s highest journey. It speaks of those who, with tapas (austerity) and śraddhā (faith), renounce worldly life and dwell in solitude—not just in the forest, but in the inner stillness of detachment.
These sages are peaceful (śāntāḥ), wise (vidvāṃsaḥ), and live simply by alms, free from possessions and desires. Their life is a silent offering, devoted to the pursuit of Truth.
At death, they transcend the cycle of rebirth, ascending the solar path (sūryadvāra)—a divine way leading to brahmaloka, the realm of the cosmic Puruṣa, who is immortal and imperishable.
Yet, as Śaṅkarācārya explains, this is not the final goal. The ultimate liberation lies beyond even brahmaloka—in the realization of the formless, infinite Brahman, where all distinctions cease.
This verse is a call to inner renunciation, deep faith, and unwavering wisdom. It reminds us that through purity, peace, and knowledge, we too may walk the sunlit path to the deathless Self.
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अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितं मन्यमानाः । जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥
मुण्डकोपनिषद् १.२.८
मुण्डकोपनिषद् का यह मंत्र मानवीय अज्ञान की गहराइयों को उद्घाटित करता है और अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से जीवन के सत्यबोध की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यह मंत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए चेतावनी है जो बाह्याचार और अज्ञान में डूबे होने के बावजूद स्वयं को ज्ञानी मानते हैं।
“जो साधक अविद्या (अज्ञान) में स्थित हैं, वे स्वयं को धीर और पण्डित मानते हैं। वे मूर्ख होकर विभिन्न मार्गों में इधर-उधर भागते हैं, जैसे अंधे की अगुवाई भी एक अंधा ही कर रहा हो।”
भगवदपादाचार्य कहते हैं
“अविद्यायामन्तरे” — वे लोग जो शास्त्र के यथार्थ तात्पर्य, आत्मबोध से अनभिज्ञ रहकर केवल कर्मकाण्ड और लौकिक ज्ञान में ही लगे रहते हैं।
“स्वयं धीराः” — वे स्वयं को विवेकी मानते हैं, जबकि उनका विवेक वास्तव में अविद्या से आच्छन्न है।
“पण्डितं मन्यमानाः” — अहंकारवश वे स्वयं को ज्ञानी मानते हैं, परंतु ब्रह्मविद्या से वे पूर्णतः वंचित रहते हैं।
“जङ्घन्यमानाः परियन्ति” — वे जीवन भर भटकते रहते हैं, कभी कर्मकाण्ड में, कभी दर्शन में, पर आत्मबोध से दूर ही रहते हैं।
“अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः” — जैसे अंधे को दूसरा अंधा रास्ता दिखा रहा हो, वैसे ही ये मूर्ख लोग भी दूसरे अज्ञानियों का अनुगमन करते हैं और मोक्ष से वंचित रहते हैं।
वेदान्त का मूल उद्देश्य आत्मा और ब्रह्म के अद्वैत स्वरूप का बोध कराना है। इस पथ में केवल बाह्याचार, यज्ञ, दान, तप, शास्त्रज्ञान आदि पर्याप्त नहीं हैं जब तक वे आत्मबोध की ओर न ले जाएँ। यह मंत्र उस दुर्गति की ओर संकेत करता है जो केवल कर्मकाण्ड के बाह्य स्वरूप में उलझे रहने से होती है।
जैसे कोई व्यक्ति अंधकार में अपने आप को प्रकाशमान समझे, वैसे ही इन ‘धीर’ जनों की दशा है। उनका पांडित्य अहंकार से भरा होता है, न कि ज्ञान से। शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान (ब्रह्मविचार) के बिना, केवल कर्मों के सहारे मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं।
यह मंत्र हमारे भीतर झाँकने का आह्वान करता है—क्या हमारा ज्ञान आत्मज्ञान की दिशा में है, या केवल बाह्य प्रदर्शन मात्र? क्या हम भी किसी भ्रमित मार्गदर्शक के पीछे चल रहे हैं?
सत्य यह है कि—
“कर्मणा न मुच्यते जन्तुः, ज्ञानात् एव तु मुच्यते।”
(विवेकचूडामणि)
बिना आत्मसाक्षात्कार के कोई मुक्त नहीं हो सकता। शंकर का अद्वैत वेदान्त इसी बात को पुष्ट करता है कि केवल ब्रह्मज्ञान ही जीवन के बंधनों से मुक्ति दिला सकता है।
मुण्डकोपनिषद् का यह मंत्र केवल अज्ञानियों की आलोचना नहीं करता, बल्कि एक गहन चेतावनी भी है — आत्मबोध के मार्ग पर चलो, वरना भटकाव और पुनर्जन्म ही गति है। शंकराचार्य का भाष्य इस सत्य को और भी गहराई देता है: केवल बाह्य बुद्धिमत्ता नहीं, बल्कि ब्रह्म का बोध ही सच्चा पांडित्य है।
Muṇḍakopaniṣad 1.2.8
“Living in ignorance, considering themselves wise, the deluded wander about, afflicted, like the blind led by the blind.”
This profound Upanishadic verse exposes a timeless truth: the danger of mistaking ignorance for wisdom. It critiques those who are entangled in mere intellectualism or ritualism, yet pride themselves on being learned.
According to Ādi Śaṅkarācārya’s commentary, such individuals are caught in avidyā—spiritual ignorance—and still believe they are dhīra (wise) and paṇḍita (learned). Their knowledge is outward and ego-driven, lacking the essence of brahma-jñāna, the knowledge of the Self.
Like blind men led by other blind men, they follow superficial teachings and miss the path of true liberation. They wander in confusion, chasing karmic results, never realizing the Self within.
Śaṅkarācārya declares:
“karmaṇā na mucyate jantuḥ, jñānāt eva tu mucyate”
“A being is not freed by action but only through knowledge.”
True freedom does not arise from action alone, nor from scriptural scholarship. It comes from the direct experience of non-duality—the realization that the Self and Brahman are one.
This mantra is both a mirror and a warning: unless guided by true viveka (discrimination) and rooted in inner inquiry, we may remain in spiritual darkness while thinking ourselves enlightened.
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