सवाल अब भी बाकी था --
अब कंठ अवरुद्ध
और शब्द नदारद थे।
सो अपलक सवालिया नजरों से
देखती रही नरम हरी दूब को ..
वो भी तो कुछ नहीं बोली थी
पर वहाँ बैठकर,
अब वह इतनी शांत हो गई थी
कि अपनी आवाज़ सुन सके
और इतना काफी था
समझ गई थी कि
कुछ सवालों के जवाब नहीं होते
वह एक सवाल लेकर
नदी के पास आई
बताओ मुझे
समझाओ मुझे
कि कहां जाते हैं इस दुनिया से जाने वाले?
हाथ थाम नदी का, कही अपने जी की
पर नदी ठिठकी, रुकी निमिष भर और
बिना कुछ कहे बढ़ गई आगे..
पर सवाल शेष था
सो दूर चमकते चाँद को
देखती रही डबडबाती आंखों से
पर जवाब उसने भी नहीं दिया था।
जो बाजार में किसी वस्तु का भाव गिर जाए तो उस वस्तु का महत्व नहीं रह जाता इसी तरह अगर जिंदगी में भाव न रहे तो ये जिंदगी भी किसी काम की नही रह जाती ..
-गुरुदेव प्रेमानंद जी
तो क्यों न भाव से जिएं ? हरदम स्व स्व की रट किसलिये? वो गीत है न कि अपने लिए जिये तो क्या जिए तू जी ए दिल
प्रेम
तमाम व्याधियों की
चमत्कारी औषधि है
प्रेम
विषाद को परे कर देने वाली
जादुई झप्पी है
पर ...
प्रेम शब्द
जब-जब
नजरों के सामने लहराया
तब-तब
किसी और के आमद की
राह देखी हमने,
मन देहरी पर
किसी और के कदमों की दस्तक की
बाट जोहते रहे हम
लेकिन मैं चुप नही रहता
सो मृत भी नही हूं
मैं जिंदा हूँ
और लड़ता हूँ
उन उन्मत्त लोगों से
जो मेरे देश पर हुकूमत करते हैं
क्योंकि मैं जिंदा हूँ
इसलिए लड़ता हूँ
और अगर मैं लड़ता हूँ
तो मैं सवेरा होने में योगदान करता हूँ
-Otto René Castillo
अंग्रेजी से - नीता पोरवाल
कभी कभी मन न कुछ सोचना चाहता है न कुछ करना.. सिर्फ पत्ते पर झूलती बूँद सा ढुलकना चाहता है ..
बेफिक्र बेख़याल ..किसी से न कोई शिकवा न शिकायत .. कुछ न मिल पाने के मलाल, जो मिला उसकी खुशी से इतर ...मूक हो विलोकता एक दर्शक सा ...
हां, सरल तो है ये जीवन,यही है जीवन,यहीं है जीवन
बुझा मन, उड़ा रंग
प्रीति कहां, कौन संग
निरख निरख नैन थके
मन की पीर कैसे घटे
मावस की रात सी
बिसरी कोई बात सी
जब थी तब थी,सखी
अब तो उजियार भई
दिन बीता, बात गई
उठ बावरी, भोर भई
-नीता
छोटी-छोटी चीज़ें ही तो मायने रखती हैं...
मसलन गर्म मोज़े
मद्धम रोशनी वाला कमरा
खिड़की से झांकता नीला आसमान
दोनों हाथों से थामे चाय भरा एक मग
आँखों में टिमटिमाते कुछ जुगनू
और खुद से मुलाकात
-नीता