बेघर होते हुए सोचता हूँ
कि हर एक का घर होना चाहिए,
जैसे मछली का घर पानी,
चिड़िया का पेड़,
और एक दिल का घर कोई दूसरा दिल।
सोचता हूँ, आग को कहाँ घर दूँ
तभी एक स्त्री मेरी कल्पना में बुदबुदाती है
"आग की सही सही जगह चूल्हा..."
मैंने अपने को हटा लिया है हर होड़ से
मैं तुम्हारा विरोधी प्रतिद्वन्द्वी या हिस्सेदार नहीं,
मुझे कुछ देकर या न देकर भी
तुम कम से कम एक आदमी से तो निश्चिन्त रह सकते हो
~ विष्णु खरे