आगरा के डाकघर का वीडियो जहां पर आप देख सकते हो सरकारी कर्मचारी अपने मिलने वालो का काम पहले करते हैं
यदि व्यक्ति इसका विरोध करें तो लड़ने को तैयार हो जाते हैं सुरक्षाकर्मी को बुला लेते हैं
@IndiaPostOffice@OfficeOfDMAgra
150 करोड़ मैसी पर खर्च करने वाला देश अपने खिलाड़ियों को मूलभूत सुविधा नहीं दे सकता ।
रंजीत बजाज कहते है कि अगर 15000 हजार बच्चों पर खर्च करे तो 10 मैसी पैदा हो सकते है !
लियोनल मेसी यूनाइटेड नेशंस के चाइल्ड ऑर्गेनाइजेशन UNICEF के ब्रांड एम्बेसडर हैं. UNICEF के एक प्रोग्राम के तहत वो GOAT इंडिया टूर पर आए थे ।
150 करोड़ खर्च करने पर 5-10 गुणा पैसा UNO से हजारों करोड़ फंडिंग होगी और फिर नेताओं की जेब में करोड़ों रुपए जाएंगे ।
इसलिए 150 करोड़ ज्यादा नहीं है 😎
शिक्षक अपनी नौकरी छोड़ रहे हैं : एक कड़वी सच्चाई
“शिक्षक जा रहा है” — यह लेख एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक कृष्ण कुमार द्वारा लिखा गया है, जो द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ था। इस लेख का सारांश इस प्रकार है —
आज देशभर के स्कूलों में एक शांत लेकिन गहराई तक परेशान करने वाला बदलाव हो रहा है —
👉वह है शिक्षकों के मन में बढ़ती थकान, बेबसी और मोहभंग।
👉शिक्षक अपनी नौकरियां छोड़ रहे हैं — कुछ चुपचाप, और कुछ भीतर ही भीतर टूटकर।
👉वहीं, नई पीढ़ी अब शिक्षक बनना ही नहीं चाहती।
ऐसा क्यों हो रहा है?
🔹 1. शिक्षकों के चारों ओर फैला नौकरशाही का जाल :
📍 पढ़ाने के बजाय शिक्षक अब रिपोर्ट भरने, फॉर्म भरने और डाटा अपलोड करने में उलझे रहते हैं।
📍 “फोटो भेजो”, “प्रमाण दो”, “रिपोर्ट अपलोड करो” — यही उनका रोज़मर्रा का काम बन गया है।
📍 अब कक्षा में उनकी उपस्थिति घट रही है, जबकि स्क्रीन के सामने बिताया समय बढ़ रहा है।
🔹 2. तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता :
📍 हर विषय में डिजिटल टूल, ऐप्स और स्मार्ट बोर्ड थोपे जा रहे हैं।
📍 विषय, बच्चे की उम्र या संदर्भ को बिना समझे आदेश दिए जाते हैं — “तकनीक का उपयोग करो।”
📍 शिक्षण से मानवीय स्पर्श गायब हो गया है; शिक्षा अब मशीन-केंद्रित बन गई है।
🔹 3. शिक्षक बन गए हैं ‘इवेंट मैनेजर’ :
📍 हर दिन कोई न कोई दिवस मनाना होता है — योग दिवस, मातृभाषा दिवस, पर्यावरण दिवस आदि।
📍 अब शैक्षणिक गुणवत्ता नहीं, बल्कि कार्यक्रमों की संख्या और दिखावा सफलता का पैमाना बन गया है।
📍 प्रधानाचार्य और शिक्षक दोनों इस प्रदर्शन संस्कृति के जाल में फंसे हुए हैं।
🔹 4. ग्रामीण शिक्षकों की दयनीय स्थिति :
📍 दो-तीन शिक्षक सैकड़ों छात्रों को पढ़ाने के लिए मजबूर हैं।
📍 पढ़ाने के साथ-साथ उन्हें मिड-डे मील, छात्रवृत्ति, यूनिफॉर्म, साइकिल, सरकारी रिपोर्ट्स सब संभालनी पड़ती हैं।
📍 अब वास्तविक शिक्षा से अधिक महत्व “डाटा भेजने” को दिया जा रहा है
*🔹 5. मानसिक तनाव और आत्म-सम्मान की हानि :
📍 लगातार ऊपर से निगरानी ने शिक्षकों का आत्मविश्वास तोड़ दिया है।
📍 हर काम का सबूत मांगा जाता है — विश्वास समाप्त हो गया है।
📍 छात्रों के तनाव और व्यवहारिक समस्याओं से जूझते-जूझते शिक्षक भावनात्मक रूप से थक चुके हैं।
📍 माता-पिता की अवास्तविक अपेक्षाएं और हर चीज़ का प्रमाण देने का दबाव।
🔹 6. शिक्षा का असली उद्देश्य खो गया है :
📍 शिक्षकों पर सिलेबस पूरा करने का भारी दबाव है।
📍 विषयों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, चाहे उसकी जरूरत हो या नहीं।
📍 अब स्कूल “मानव निर्माण की जगह” नहीं रह गए हैं।
📍 आज की शिक्षा प्रणाली प्रदर्शन दिखाने की परियोजना बनकर रह गई है।
📍 शिक्षक-छात्र का भावनात्मक रिश्ता, जो शिक्षा का केंद्र था, अब डाटा और डेडलाइन के नीचे दब गया है
📍 अब छात्र शिक्षक को सेवा प्रदाता समझने लगे हैं — सम्मान खो गया है।
🔹 अब विचार करने का समय है...
👉शिक्षा का असली केंद्र फिर से बच्चे और शिक्षक होने चाहिए, ना कि डाटा और रिपोर्ट।
👉यदि शिक्षकों को स्वतंत्रता, सम्मान और विश्वास नहीं दिया गया,तो कल की शिक्षा निर्जीव हो जाएगी।
📚 हमें एक बार फिर शिक्षकों पर विश्वास करना होगा — क्योंकि अगर शिक्षक चला गया,तो स्कूल तो खड़ा रहेगा,पर शिक्षा नहीं बचेगी।।
Jio के खराब नेटवर्क के बारे मे जब से ट्विट किया है
कम्पनी वाले कॉल पर कॉल कर रहे है, और अंत मे आज पल्ला झाड लिया की नेटवर्क उपलब्ध नहीं करा सकते।
रिट्वीट करो और कमेंट्स मे अनुभव शेयर करो
#देश_का_लुटेरा_अम्बानी@reliancejio@JioCare
भारत के करोड़ों ग्रामीण उपभोक्ता आज भी एयरटेल, जियो और वोडाफोन जैसी कंपनियों पर निर्भर हैं — > पर क्या मिला?
ना स्थिर नेटवर्क, ना ठीक कॉल क्वालिटी, ना 5G की वास्तविक स्पीड।
कंपनियाँ महंगे प्लान बेच रही हैं, लेकिन सेवाएँ तीसरे दर्जे की दे रही हैं।
TRAI और संचार मंत्रालय आँख मूँदकर बैठे हैं —> क्या उनका काम सिर्फ दरें बढ़ाना और कंपनियों को फायदा पहुँचाना है?
गाँवों में कॉल ड्रॉप, डेटा कटना और नेटवर्क गायब होना आम बात है।
तो सवाल उठता है —> जब जनता पैसे पूरे देती है तो सेवाएँ आधी क्यों मिलती हैं?
अब समय है कि लोग चुप रहना छोड़ें, अपने एरिया का नाम और समस्या टैग करें।
ट्वीट करें, शिकायत करें, जवाब माँगें —>> क्योंकि ये डिजिटल इंडिया नहीं, डिजिटल ठगी बन चुका है।
रिलायंस जियो ने शुरुआत में देशभर में लोगों को फ्री वॉयस कॉल और अनलिमिटेड 4G इंटरनेट देकर लुभाया। उस समय इसे “डिजिटल क्रांति” कहा गया, लेकिन असल में यह एक योजनाबद्ध जाल था।
जब हर हाथ में Jio सिम पहुँच गई और बाकी टेलीकॉम कंपनियाँ टिक नहीं सकीं, तब धीरे-धीरे असली खेल शुरू हुआ।
पहले ₹149 का प्लान ₹249 हुआ, फिर ₹349, अब ₹899 तक पहुँच गया। हर साल दाम बढ़ रहे हैं, पर नेटवर्क और स्पीड वहीं के वहीं हैं।
TRAI और सरकार दोनों चुप हैं — क्या ये मिलीभगत नहीं?
लोगों को ऐसी डिजिटल लत लगा दी गई है कि अब बिना इंटरनेट कोई काम नहीं चलता।
अब उपभोक्ता के पास विकल्प नहीं, मजबूरी है।
डेटा पैक जबरन बेचे जा रहे हैं, वॉयस-ओनली रिचार्ज खत्म कर दिए गए।
गरीब और मध्यम वर्ग रोज़ाना लुट रहा है, और ये कॉर्पोरेट कंपनियाँ अरबों का मुनाफ़ा कमा रही हैं।
यह “डिजिटल इंडिया” नहीं, “कॉर्पोरेट इंडिया” है — जहाँ जनता ग्राहक नहीं, शिकार बन चुकी है।
मध्य प्रदेश के जबलपुर रेलवे स्टेशन पर एक यात्री ट्रेन से उतरा और उसने वेंडर से समोसे लिए, तभी उसकी UPI फेल हो गई तो
उसने समोसे लेने को मना किया, वेंडर ने उसे पकड़ लिया तब तक उसकी ट्रेन छूटने लगी, फिर
यात्री ने अपनी घड़ी वेंडर को दी तब ट्रेन में बैठा।
यह उस देश की हालत है , जहां क्रिकेट प्लेयर को भगवान और किसान को देशद्रोही बोला जाता है !
जहां पर 80 करोड़ लोगों फ्री राशन और GHI 2024 के अनुसार 127 देशों में से 105 रैंक है ।
🚨 विपक्ष का काम है सवाल उठाना।
Subramanian Swamy बोले - अमित शाह इस्तीफ़ा दें।
GenZ उतरी नहीं, BJP ने बदनाम करना शुरू कर दिया।
Sonam Wangchuk हो या अरविंद केजरीवाल - जो जनता के लिए बोले, BJP उसे कुचलती है! 😡
@nyvaanofficial to the point 🎯
#Justiceforschoolschildren
उत्तर प्रदेश में सरकारी संस्थानों पर अनुमानित रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में 60-70% लोग सरकारी स्कूलों और अस्पतालों पर पूरी तरह से निर्भर हैं। सरकारी संस्थान, विशेषकर अस्पताल और स्कूल, कम आय वर्ग के लिए सस्ती और सुलभ सेवाएँ प्रदान करने के लिए आवश्यक हैं, जो लोग निजीकरण पर ज़ोर डालने की बात करते हैं और कहते हैं कि कौन सरकारी संस्थानों का लाभ लेता है, उन्हें यह समझना चाहिए कि एक बड़ा वर्ग धराशाही हो जाएगा अगर संस्थान समाप्त अथवा कम किए गए। ये संस्थान शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित करते हैं, जो सामाजिक-आर्थिक विकास या यूं कहें जीवन Survival के लिए महत्वपूर्ण हैं।
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विपिन बिहारी
उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के बैनर तले, दिनांक 6 जुलाई दिन रविवार को अपराह्न 1 बजे "विद्यालय मर्जर" से चिंतित अभिभावक, आमजनमानस, शिक्षक एवं युवाओं के द्वारा महाट्विटर अभियान प्रस्तावित है।
@DrDCSHARMAUPPSS@UPPSS1921
पहले तो ब्लड प्रेशर कंट्रोल करिए और भाषा ठीक करिए
दूसरा अगर यही सच है तो 1 करोड़ 67 लाख बच्चे किसके हैं जो परिषदीय सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं।
5 किलो अनाज, एक टाइम का mdm खिलाने को मलाई कहना और भद्दी गलियां देना बेहद शर्मनाक है।
*अब पता चला बेसिक में संख्या क्यो नहीं बढ़ रही है,,*
Listen appeal of Deoria D.M Divya Mittal👆🏻
बेसिक स्कूलों में 1200/-
प्राइवेट स्कूलों में 5000/-
Gazzab