When you wanted to gift ₹500 to your sister on Raksha Bandhan, but she gets an equal share of your inheritance because of the Hindu Code Bill introduced by Babasheb Ambedkar. 😂
इनसे मिलिए ये चमार सर है जो सभी जाति धर्म के लोगो को निशुल्क शिक्षा देते है ।
जिस चमार शब्द को लोग गाली समझते है उस चमार शब्द को ये अलग पहचान देने का प्रयास कर रहे है जो काबिले तारीफ है ।
सौरभ द्विवेदी जी जाति को नहीं मानते और जाति को खत्म करने की वकालत करते हैं लेकिन The Lallantop के थ्रू ब्राह्मण पत्रकारों की फ़ौज खड़ी कर दी ,आने वाले 30 सालों तक पत्रकारिता में ब्राह्मण समाज का वर्चस्व क़ायम रहेगा
अभिनव पांडे,रोहित,कुलदीप सब इन्ही के बनाये हुए हैं
अजीत भारती जाति नहीं मानता लेकिन बिहार की जो राइट विंगर टीम है उसमे अपनी जाति को ही आगे बढ़ाया है चाहे हो आदित्य राज सिंह,अनुपम सिंह,अजीत तिवारी,Random sena,या कोई भी अन्य बड़ा हैंडलर हो,बिहार की 90% राइट विंगर ग्रुप का लीडर भूमिहार है जो अजीत भारती द्वारा प्रमोट किए जाते हैं
जो कहे कि मैं जात को नहीं मानता तो समझ लो वो सबसे बड़ा जातिवादी है
* आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation): आरक्षण का लाभ समाज के विभिन्न वर्गों को उनकी वास्तविक जनसंख्या के अनुपात में मिलना चाहिए।
* वैज्ञानिक डेटा की आवश्यकता: 1931 के बाद व्यापक जाति जनगणना न होने के कारण वर्तमान नीतियां पुराने अनुमानों पर आधारित हैं; सटीक डेटा के लिए राष्ट्रव्यापी जाति जनगणना जरूरी है।
* चुनौतियाँ: प्रशासनिक जटिलता और सामाजिक ध्रुवीकरण की आशंका, जिससे निपटने के लिए पारदर्शी और समावेशी नीति की आवश्यकता है।
जातीय आतंकवाद का वीभत्स और घिनौना नमूना है यह व्यक्ति जो खुलेआम, बिना किसी डर के, दलित नेता और युवा प्रेरणास्रोत सांसद चंद्रशेखर आजाद 'रावण' को जान से मारने की धमकी दे रहा है। यह धमकी केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं है, बल्कि यह उस संपूर्ण लोकतांत्रिक और सामाजिक समरसता के विचार पर हमला है जिसकी नींव पर भारत खड़ा है। सांसद चंद्रशेखर आजाद केवल दलितों, शोषितों और वंचितों के ही नहीं, बल्कि एक प्रगतिशील और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना चाहने वाले संपूर्ण समाज के नेता हैं। उनका प्रभाव केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर युवा उन्हें एक साहसी और मुखर आवाज़ के रूप में देखते हैं।
नेट पेपर लीक आंदोलन और NEET-UG परीक्षा में हुई धांधली के विरोध प्रदर्शनों में भी तो वह छात्रों के दुख और आक्रोश में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे। उन्होंने न केवल इस गंभीर शिक्षा घोटाले को उजागर किया, बल्कि सड़कों पर उतरकर पीड़ित विद्यार्थियों के लिए न्याय की मांग की। यह दिखाता है कि उनकी चिंता केवल जातिगत मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह शिक्षा, रोजगार, और सामाजिक न्याय जैसे व्यापक राष्ट्रीय सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध हैं। ऐसी धमकियां देने वाले तत्वों पर कठोर कानूनी कार्रवाई होना अत्यंत आवश्यक है ताकि समाज में डर और वैमनस्य फैलाने की उनकी मंशा विफल हो सके।
@PrinceV93789344@Aamitabh2 * यह पत्रकार अपनी जाति की वजह से पत्रकार बन बैठा है, नहीं तो इसमें कोई भी मेरिट नहीं है।
* मेरिट के आधार पर इसकी योग्यता झाड़ू लगाने के लिए भी प्रतीत नहीं होती है।
* जब अंग्रेजों का शासन था, तो अंग्रेज यह दावा करते थे कि भारतीय उनके मुकाबले हीन हैं और भारतीयों में मेरिट नहीं होता है, उच्च पदों और उच्च स्किल स्कूलों में उनके ही बच्चे पढ़ते थे, भारतीय बच्चों को उसमें एडमिशन नहीं मिलता था।
* ठीक उसी तरह, आज यह ब्राह्मण लोग भी दलित, आदिवासी, पिछड़ों के बच्चों को उच्च शिक्षा में नहीं जाने देना चाहते हैं।
अगर भारत में आरक्षण खत्म कर दिया जाए, तो सभी सरकारी नौकरियों और सांसद-विधायक ब्राह्मण जाति के लोग ही होंगे। इस बात का सबूत है यह फोटो, जिसमें स्कूल के सभी प्राचार्य ब्राह्मण ही हैं।
आदिवासी बच्चों के पास आज भी स्कूल तक पहुंचने के लिए पक्के रास्ते नहीं हैं। ये बच्चे कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करते हुए शिक्षा हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ जंतर-मंतर पर इन्हीं भील बच्चों और आदिवासी समाज के संवैधानिक आरक्षण को खत्म करने की मांग को लेकर आंदोलन हो रहे हैं।
शैक्षणिक संस्थानों में उच्च जाति के छात्रों द्वारा निम्न जाति के सहपाठियों, विशेषकर आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों के प्रति भेदभाव और उपेक्षा आम है। यह जातिवाद छात्रों तक सीमित नहीं; कर्मचारी, अध्यापक और प्रोफेसर भी जातिवादी होते हैं। प्रशासनिक विभागों के उच्च जाति कर्मचारी सफाई कर्मचारियों तथा प्रयोगशाला सहायकों जैसे निम्न पदों के कर्मचारियों के साथ अस्पृश्यता और अपमानजनक व्यवहार करते हैं। अध्यापक-प्रोफेसर मूल्यांकन, शोध निर्देशन और कक्षा चर्चा में आरक्षित छात्रों के प्रति पूर्वाग्रह रखते हैं, जिससे उनकी शैक्षणिक प्रगति बाधित होती है और मानसिक तनाव होता है। यह संस्थागत व व्यक्तिगत जातिवाद शैक्षणिक वातावरण को दूषित कर समावेशी शिक्षा के लक्ष्यों को कमजोर करता है।
If you legitimize his consistently abusive and psychologically damaging language, perhaps suggesting it's merely a 'stress reaction' or 'rough communication style,' do you honestly think he can coherently argue and definitively keep his exact, potentially threatening, words and statements intact and unchallenged before a highly experienced judicial judge, particularly when those words are presented as evidence of malicious intent or harassment in official court transcripts? Do you believe the court will accept his defense that the severe verbal aggression and constant degradation were simply justifiable acts of free expression or standard interpersonal discourse, ignoring the demonstrable harm and pattern of coercive control inherent in the language used?