फिर भी एक विश्वास भीतर अब भी जीवित है—
कौन जानता है, किस्मत ने मेरे लिए कौन-सा अध्याय अभी अधूरा छोड़ रखा हो।
समय ही अंतिम निर्णायक है;
आज की उलझन, शायद कल की सबसे बड़ी सीख बन जाए।
#business_men
इन दिनों मन एक अजीब कशमकश से गुजर रहा है।
���भी लगता है कि कम उम्र में व्यापार का मार्ग चुनकर कहीं जल्दबाज��ी तो नहीं कर दी।
कभी मन कहता है कि शायद एक बार सरकारी परीक्षा की तैयारी भी कर लेनी चाहिए थी।
निर्णय मेरा था, पर आज प्रश्न भी मुझसे ही जवाब मांग रहे हैं।
"आज मैं कील हूँ, इसलिए हर चोट सह रहा हूँ। जिस दिन हथौड़ा बनूँगा, उस दिन वार भी उतना ही प्रचंड होगा; क्योंकि मेरे घावों पर कभी किसी ने मरहम नहीं लगाया।"
थाना सैदनगली क्षेत्र में नवनिर्मित भवन का लिंटर गिरने की दुखद घटना पर जिलाधिकारी डॉ. नितिन गौड़ एवं पुलिस अधीक्षक श्री लखन सिंह यादव तत्काल घटनास्थल पर पहुंचे तथा राहत एवं बचाव कार्यों का जायजा लिया। पुलिस, एसडीआरएफ एवं एम्बुलेंस टीम द्वारा युद्धस्तर पर राहत एवं बचाव कार्य संचालित किया गया।
मेरी सादगी से मुझे मत आँकिए।
नम्रता मेरा संस्कार है, कमजोरी नहीं।
और जो मन में दुर्भावना रखते हैं, उनके लिए मेरा व्यवहार भी परिस्थितियों के अनुसार बदल जाता है।
सादगी मेरा स्वभाव है, पर स्वाभिमान मेरा धर्म।
अस्पताल आकर समझ में आता है कि
ज़िंदगी से बड़ी कोई दौलत नहीं होती,
और अपने लोगों से बड़ा कोई सह���रा नहीं होता।
आख़िर में इंसान यही समझता है कि धन, पद और शोहरत सब यहीं रह जाते हैं—
साथ चलती हैं तो बस अपनों की मोहब्बत, उनकी दुआएँ और जीने की उम्मीद।
अस्पताल की इन दीवारों ने मुझे इतना तो सिखा दिया...
यहाँ हर मुस्कान के पीछे एक दर्द छिपा होता है,
और हर आँसू के पीछे किसी अपने को खो देने का डर।
कुछ लोग दवाइयों से ठीक हो जाते हैं,
और कुछ लोग सिर्फ़ अपनों की दुआओँ से।
इसलिए उम्मीद रखिए, मगर उसे अपनी खुशी का एकमात्र सहारा मत बनाइए।"
"कल की चिंता में आज को मत खोइए। क्योंकि जिसने बीते हुए हादसे देखे हैं, वह जानता है कि ज़िंदगी किसी तय रास्ते पर नहीं चलती।"
"भविष्य की इमारत हम कल्पनाओं से बनाते हैं, लेकिन ज़िंदगी अक्सर उसे अपनी मर्ज़ी से बदल देती है��� बीते हादसे यही सिखाते हैं कि अगले पल का कोई भरोसा नहीं। इसलिए जो आज हमारे पास है, वही सबसे बड़ा सच है।"
"ज़िंदगी ने इतना तो सिखा ही दिया कि भविष्य की हर योजना पूरी हो, यह ज़रूरी नहीं।
बल्कि पहले से अधिक मज़बूत बनाकर आगे बढ़ने की तैयारी करता है। इसलिए संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है; मेरी यात्रा भी नहीं। एक दिन यही ठहराव मेरी सबसे बड़ी ताकत बनकर मेरी पहचान लिखेगा।"
"जब-जब मैं���े समाज के बीच अपनी पहचान और अपनी योग्यता सिद्ध करने का प्रयास किया, तभी जीवन ने कोई ऐसी करवट ली कि मेरा पूरा सफ़र बिखर-सा गया। जिस मुकाम तक पहुँचने में वर्षों लगे, परिस्थितियाँ एक ही पल में मुझे उससे बहुत पीछे ले गईं।
कभी भाग्य ने परीक्षा ली, कभी समय ने धैर्य की सीमा को परखा, और कभी अपनों की अपेक्षाओं ने मन को थका दिया। तब लगता है कि जीवन हमारी योजनाओं से नहीं, अपने ही नियमों से चलता है।
फिर भी मैंने सीखा है कि पीछे छूट जाना, हार जाना नहीं होता। कभी-कभी जीवन हमें रोकता नहीं,
ऐसा लगता है मानो जीवन हर बार मेरी मंज़िल नहीं, बल्कि मेरे धैर्य और संघर्ष की परीक्षा लेना चाहता हो। फिर भी विश्वास है कि एक दिन यही संघर्ष मेरी पहचान बनेगा।"
"जब-जब समाज में स्वयं को साबित करने के लिए कदम बढ़ाया, तभी जीवन ने ऐसी परिस्थितियाँ सामने ला खड़ी कीं कि हर बार मुझे फिर से शून्य से शुरुआत करनी पड़ी। कभी समय ने साथ नहीं दिया, तो कभी हालात ने राह रोक ली।
"जिन दोस्तों को अभी नौकरी नहीं मिली, उन्हें लगता है कि एक नौकरी मिल जाए तो जीवन की सारी परेशानियाँ समाप्त हो जाएँगी।
लेकिन जो नौकरी पा चुके हैं, वे बताते हैं कि संघर्ष वहाँ भी कम नहीं, बस उसका स्वरूप बदल जाता है।
जो सफलता की दहलीज़ तक नहीं पहुँच पाए,
वे अपनी काबिलियत साबित करने की जद्दोजहद में हैं;
और जिन्हें सफलता मिल गई, वे जिम्मेदारियों और अपेक्षाओं के जाल में उलझे हुए हैं।
��ीवन का सत्य यही है कि यहाँ किसी का संघर्ष समाप्त नहीं होता, केवल उसके रूप बदलते रहते हैं।
"जीवन के लिए हमने न जाने कितनी योजनाएँ बनाई थीं, कितने सपने सजाए थे। परंतु जीवन अपनी ही शर्तों पर चलता है। वह राहें अक्सर वैसी नहीं होतीं जैसी हम चुनते हैं; जीवन किसी न किसी बहाने हमें अंततः वहीं पहुँचा देता है, जहाँ उसे हमें ले जाना होता है।"
— क्या मैं वह सब कर पाऊँगा, जिसके लिए आज इतना संघर्ष कर रहा हूँ, इतनी चिंताएँ पाल रहा हूँ?
किन्तु यही वह क्षण होता है जब धैर्य, साहस और आत्मविश्वास की वास्तविक परीक्षा होती है।"
"जब जीवन की राहें सुगम प्रतीत होने लगती हैं, जब सब कुछ मनोनुकूल चल रहा होता है, तभी अचानक कोई ऐसी घटना घट जाती है जो भीतर तक झकझोर देती है। मन टूट जाता है, उत्साह बिखर जाता है और कुछ करने की इच्छा भी शेष नहीं रह जाती।
फिर अचानक मन के द्वार पर एक प्रश्न आकर खड़ा हो जाता है