बेदिली! क्या यूँ ही दिन गुजर जायेंगे,सिर्फ़ ज़िन्दा रहे हम तो मर जायेंगे I कितने दिलकश हो तुम कितना दिलजूँ हूँ मैं,क्या सितम है कि हम लोग मर जाएंगे I-जॉन एलिया
पप्पू चरसी यानी राहुल गांधी कांग्रेसी कुत्तों के बीच में शेर की खाल ओढ़ कर हुए कहता है कि मैं राहुल गांधी हूं राहुल सावरकर नहीं हूं मैं माफी नहीं मांगूंगा
लेकिन कल चुपचाप इस पप्पू चरसी ने दूम हिलाते हुए पिछवाड़ा रगड़ते हुए शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय चौहान से माफी मांग लिया
और यह राहुल गांधी की अब तक की आठवीं माफी है
झाबुआ की रैली में राहुल गांधी ने कहा था कि पनामा पेपर में शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय चौहान का नाम है
कार्तिकेय चौहान सीधे कोर्ट में गए मानहानि का केस किया पहले तो राहुल गांधी ने पैसे देकर मामला खत्म करने की कोशिश की
लेकिन कार्तिकेय चौहान अड़ गए बोले मुझे पैसा नहीं चाहिए या तो तुम सबूत दो कि मेरा नाम पनामा पेपर में है या लिखित में मुझसे माफी मांगो
और अंत में कल राहुल गांधी ने कोर्ट में लिखित में यह कहा कि वह कार्तिकेय चौहान से माफी मांगते हैं उन्होंने झाबुआ में जो कुछ कहा वह गलतफहमी में कहा इस पर उन्हें अफसोस है और वह चाहते हैं कि कार्तिकेय चौहान मेरी माफी को स्वीकार करके मामला खत्म कर दें और कार्तिकेय चौहान ने राहुल गांधी की लिखित माफी नामा स्वीकार कर ली
तो कांग्रेसी कुत्तों तुम्हारा मालिक भी तुम ही लोगों के बीच का ही अल्सेशियन नस्ल का है
यह कभी कोई शेर की खाल ओढ़ कर तुम लोगों के सामने दहाड़ने लगता है और तुम लोग इसको शेर समझ लेते हो
इसे सेव कर सुरक्षित कर लें, ऐसी पोस्ट कम ही आती है...
स्कंद पुराण में एक सुंदर श्लोक है -
अश्वत्थमेकम् पिचुमन्दमेकम्
न्यग्रोधमेकम् दश चिञ्चिणीकान्।
कपित्थबिल्वाऽऽमलकत्रयञ्च
पञ्चाऽऽम्रमुप्त्वा नरकन्न पश्येत्।।
अश्वत्थः = पीपल (100% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
पिचुमन्दः = नीम (80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
न्यग्रोधः = वटवृक्ष (80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
चिञ्चिणी = इमली (80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
कपित्थः = कविट (80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
बिल्वः = बेल (85% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
आमलकः = आवला (74% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
आम्रः = आम (70% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
(उप्ति = पौधा लगाना)
अर्थात् - जो कोई इन वृक्षों के पौधो का रोपण करेगा, उनकी देखभाल करेगा उसे नरक के दर्शन नही करने पड़ेंगे। इस सीख का अनुसरण न करने के कारण हमें आज इस परिस्थिति के स्वरूप में नरक के दर्शन हो रहे हैं। अभी भी कुछ बिगड़ा नही है, हम अभी भी अपनी गलती सुधार सकते हैं औऱ गुलमोहर निलगिरी जैसे वृक्ष अपने देश के पर्यावरण के लिए घातक हैं।
पश्चिमी देशों का अंधानुकरण कर हमने अपना बड़ा नुकसान कर लिया है। पीपल, बरगद और नीम जैसे वृक्ष रोपना बंद होने से सूखे की समस्या बढ़ रही है।
ये सारे वृक्ष वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाते है। साथ ही, धरती के तापनाम को भी कम करते हैं।
हमने इन वृक्षों के पूजने की परंपरा को अन्धविश्वास मानकर फटाफट संस्कृति के चक्कर में इन वृक्षो से दूरी बनाकर यूकेलिप्टस (नीलगिरी) के वृक्ष सड़क के दोनों ओर लगाने की शुरूआत की। यूकेलिप्टस झट से बढ़ते है लेकिन ये वृक्ष दलदली जमीन को सुखाने के लिए लगाए जाते हैं। इन वृक्षों से धरती का जलस्तर घट जाता है। विगत ४० वर्षों में नीलगिरी के वृक्षों को बहुतायात में लगा कर पर्यावरण की हानि की गई है।
शास्त्रों में पीपल को वृक्षों का राजा कहा गया है...
मूले ब्रह्मा त्वचा विष्णु शाखा शंकरमेवच।
पत्रे पत्रे सर्वदेवायाम् वृक्ष राज्ञो नमोस्तुते।।
भावार्थ -जिस वृक्ष की जड़ में ब्रह्मा जी तने पर श्री हरि विष्णु जी एवं शाखाओं पर देव आदि देव महादेव भगवान शंकर जी का निवास है और उस वृक्ष के पत्ते, पत्ते पर सभी देवताओं का वास है ऐसे वृक्षों के राजा पीपल को नमस्कार है आगामी वर्षों में प्रत्येक ५०० मीटर के अंतर पर यदि एक एक पीपल, बड़ , नीम आदि का वृक्षारोपण किया जाएगा, तभी अपना भारत देश प्रदूषणमुक्त होगा। घरों में तुलसी के पौधे लगाना होंगे। हम अपने भविष्य में भरपूर मात्रा में नैसर्गिक ऑक्सीजन मिले इसके लिए आज से ही अभियान आरंभ करने की आवश्यकता है। आइए हम पीपल , बड़ , बेल , नीम , आंवला एवं आम आदि वृक्षों को लगाकर आने वाली पीढ़ी को निरोगी एवं सुजलां सुफलां पर्यावरण देने का प्रयत्न करें...
जय श्रीराम, जय सनातन धर्म, जय गोविंदा ✨🙏🕉️💖
गुलमोहर (Delonix regia) अपने घने, फैले हुए छायादार छत्र और आकर्षक लाल-नारंगी फूलों के लिए प्रसिद्ध है.। 🌳🌺
यह गर्म जलवायु में अच्छी तरह बढ़ता है और सड़क किनारे, पार्कों तथा बगीचों में सजावटी वृक्ष के रूप में लगाया जाता है.।
ज़्यादातर अभिनेता चाहते हैं कि उन्हें फ़िल्मों में ज़्यादा से ज़्यादा स्क्रीन टाइम मिले।
लेकिन मैक मोहन (शांभा) को मिला कम।
जब शोले की एडिटिंग हुई, तो शांबा के उनके ज्यादातर सीन काट दिए गए। वह इतने निराश हुए कि फ़िल्म के प्रीमियम में नहीं गए और जश्न से भी दूर रहे।
उन्हें लगा कि उनके हाथ से एक बड़ा मौका छीन लिया गया। लेकिन असल में उसी वक्त इतिहास लिखा जा रहा था। सिर्फ़ कुछ ही सीन और एक यादगार जवाब-
"पूरे पतास हज़ार !" - ने मैक मोहन को हमेशा के लिए अमर कर दिया...!!
मुंबई में क्रिकेटर बनने का सपना लेकर आए इस इंसान ने आगे चलकर भारतीय सिनेमा के सब यादगार किरदारों में से एक बना दिया।200 से ज़्यादा फ़िल्में ! बॉलीवुड में कई दशक। फिर भी जिस किरदार के बारे में उन्हें लगा था कि उसे छोटी कर दिया गया, वही किरदार उन्हें हमेशा के लिए लोगों के दिलों में बसा गया।
कभी कभी किस्मत आपको उतना ही देती जितना आप चाहते हैं, लेकिन बदले में वह आपको उससे कहीं ज़्यादा ही दे देती है, जितना आपने कभी सोचा भी नहीं होता।
मैक मोहन एक बेहतरीन अभिनेता होने के साथ-साथ एक बेहतरीन डांसर भी थे ।
फिल्म- आओ प्यार करें (1964)
साथ में जाय मुखर्जी, संजीव कुमार बैठे हुए हैं ☝🏽
🌺🌺💞
@vipulkocher There is a difference between adulterated food & poisonous food.Adulteration means to add something cheaper into expensive ingredients not necessarily harmful for health on consumption.
Even to mix groundnut in almond is adulteration.
सुप्रीम कोर्ट का यह क्लिप धारा 370 पर सुनवाई के दौरान का है
आर्टिकल 370 पर सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने इतिहास का वो पन्ना पलट दिया कि सभी जज चुपचाप सुनते रह गए,
उन्होंने नेहरू का नाम तो नहीं लिया लेकिन नेहरू के नीचता और नेहरू की गद्दारी की पूरी कहानी सुप्रीम कोर्ट के खंडपीठ के सामने बयां कर दी वह भी तथ्यों के साथ
फिर भी कांग्रेसी चमचे कहेंगे नेहरू तो आधुनिक भारत के निर्माता थे
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी अपनी दलील में कहते हैं, 'हम सच्चाई के बारे में बात नहीं करना चाहते हैं। सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर कौन था, औचिनलेक। भारत के तीनों जनरल ब्रिटिश थे। पाकिस्तान के तीनों जनरल ब्रिटिश थे। यह युद्ध (कश्मीर पर पाकिस्तान की तरफ से हमला) क्या था? चर्चिल ने ही तय किया था कि भारत का विभाजन होगा। यह जियो-पॉलिटिक्स का खेल था सब। यह युद्ध एक ब्रिटिश युद्ध था। उन्होंने दोनों तरफ से इसकी तैयारी की थी। हमलावर कहां से आए थे? उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) से। दो कार्यकालों के बाद मिस्टर कनिंघम, जो उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत के गवर्नर रह चुके थे, उन्हें जुलाई में वापस बुलाया गया। चुनाव से ठीक पहले।'
द्विवेदी ने उस वक्त की परिस्थियों को बताते हुए आगे कहा, 'हमलावरों को प्रशिक्षित किया गया, सेना के हथियारों के साथ ट्रकों पर भेजा गया। पाकिस्तान की सेना भारत से अभी-अभी अलग हुई थी। और सबसे बड़ा, सबसे स्पष्ट उदाहरण है, कौन लड़ रहा था? आज पीओके क्या है? पीओके का दो-तिहाई हिस्सा गिलगित-बााल्टिस्तान है। और वहां किसने युद्ध लड़ा? हमलावरों ने नहीं। यह मेजर ब्राउन था। वहां का एजेंट कौन था? उन्हें कनिंघम ने ठीक उसी जुलाई में दोबारा पोस्ट किया था। उन्होंने महाराजा (हरि सिंह) के सभी फोर्सेज को मार डाला। अंसार अहमद वहां तैनात थे और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। और उन्होंने चार दिनों में पाकिस्तान का झंडा लहराया और उन्होंने इसे कनिंघम को सौंप दिया। उन्होंने पाकिस्तान की सेना आलम के पास भेजी और उन्होंने गिलगित-बल्तिस्तान पर कब्जा कर लिया। पाकिस्तान के साथ युद्ध कहाँ है? यह ब्रिटिश है। लेकिन अगर हम इन सब से आंखें मूंद लेते हैं।'
वो कहते हैं, 'भला ये हमलावरों का युद्ध है? हमलावर अपने आप श्रीनगर तक नहीं आ सकते थे। युद्ध लगभग कारादु और कारगिल से लेकर लेह के करीब तक पहुंच गया था। तो यह एक अलग तरह का युद्ध था, लेकिन कोई नहीं कह सकता था क्योंकि माउंटबेटन वहां गवर्नर जनरल के रूप में थे। पता नहीं हमारे नेताओं ने ऐसा क्यों किया? जिन्ना ने तो साफ कहा, मैं किसी भी ब्रिटिश गवर्नर-जनरल को स्वीकार नहीं करूंगा। लेकिन हमारे यहां कहा गया, नहीं, हमें गवर्नर जनरल स्वीकार हैं। तो यह युद्ध क्या है? यही नहीं, जब युद्ध शुरू हुआ, तो उन्होंने (नेहरू सरकार ने) एक डिफेंस कमिटी का गठन किया और माउंटबेटन को इसका अध्यक्ष बनाया दिया। तो यह एक गजब की स्थिति है, लेकिन माउंटबेटन डिफेंस कमिटी के अध्यक्ष हैं।'
वरिष्ठ वकील आगे कहते हैं, 'ऑचिनलेक सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर हैं। सभी जनरल ब्रिटिश हैं और एक ब्रिटिशर विद्रोह कर रहा है और जब वह इंग्लैंड लौटता है तो उसे ब्रिटिश साम्राज्य का पदक दिया जाता है। तो यह युद्ध की स्थिति नहीं है। इसलिए जब आप संविधान और 370 को पढ़ते हैं, तो कृपया इन बातों को ध्यान में रखें कि हमारे नेता किन परिस्थितियों में आगे बढ़ रहे थे। हमारी हमलावरों को पीछे धकेलने और अपनी जमीन वापस पाने की चाहत ही नहीं थी। उन्होंने एक समय पर जानबूझकर युद्ध को रोक दिया और संयुक्त राष्ट्र चले गए क्योंकि अगर हम मीरपुर तक और पीछे चले गए होते तो वह गिलगित-बल्तिस्तान से कनेक्शन टूट जाता।'
राकेश द्विवेदी ने अपनी बहस जारी रखते हुए कहा, 'ये सभी सच्चे तथ्य हैं। कोई भी इसे नकार नहीं सकता। और संयुक्त राष्ट्र क्या था? वही शक्ति जो जियो पॉलिटिक्स की वजह से भारत का विभाजन करना चाहती थी, अमेरिका और ब्रिटेन, उन्हें मध्यस्थ बनाया गया था। सौभाग्य से, पाकिस्तान ने पीओके खाली करने से इनकार कर दिया। इसलिए वह प्रस्ताव खत्म हो गया है। संयुक्त राष्ट्र के बारे में बात करने की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन उस समय 370 के निर्माण में स्थिति की गंभीरता को देखें।'
@AadeshRawal कौन सी दुकान,कौन सी सब्जी मंडी से प्याज खरीदते हो?
अरे हां! कही इसमें 30 रुपये प्रति डिलिवरी ब्लिंकिट के पैसे तो नहीं जोड़ रहे??
चीनी!!कितनी चीनी एक महीने में खा पाते हो?
राजनीति का इतना शौक है तो @pradip103 की तरह @INCIndia प्रवक्ता बन जाओ।
@PandeyJaideep@meevkt इस्तीफा देने से पहले दिव्या मित्तल कुछ बड़े राजनीतिक दल के नेतृत्व से मिली थी।
आप उन्हें 2027 मे सपा समर्थित कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में भी देख सकते हैं।