हम डटे रहे, हम खड़े रहे
लखनऊ में भारी बारिश के बीच जब सड़कों पर ट्रैफिक का दबाव बढ़ा, मरीन ड्राइव पर तैनात पुलिसकर्मी मैदान में डटे रहे—कहीं ट्रैफिक संभाला, तो कहीं बारिश में फँसे वाहनों और राहगीरों की मदद की।
न मौसम की परवाह।
न मुश्किल की शिकायत।
बस ड्यूटी का जज़्बा और मदद के लिए बढ़ते हाथ।
कुछ तस्वीरें सिर्फ़ बारिश नहीं दिखातीं…
वे ख़ाकी का हौसला भी दिखाती हैं। ⭐
📍 मरीन ड्राइव, लखनऊ
मौसम चाहे जैसा हो… ख़ाकी डटी रहेगी।
#UPPolice #UPPCares #KhakiKaSitara #DutyNeverStops
गाज़ियाबाद में कांवड़ यात्रा के कारण स्कूल 12 दिन तक बंद रहेंगे।
आस्था का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन बच्चों की पढ़ाई का लगातार नुकसान भी एक गंभीर मुद्दा है।
#Ghaziabad#KanwarYatra#Education
#BJP के प्रदेश अध्यक्ष का आज मेरठ जाने के दौरान गाजियाबाद के यूपी गेट और डासना के पास स्वागत किया जाएगा। इसको लेकर बीजेपी के पदाधिकारियों ने NH 9 और DME के बीच 1 किलोमीटर का पर्दा लगा दिया, होर्डिंग भी लगाई गई है। स्वागत तो ठीक है लेकिन ट्रैफिक कोहरे में ट्रैफिक के मर्जर के बीच ये ऑब्सट्रक्शन का काम करेगा। सवाल ये है कि @NHAI_Official से ऐसा करने के लिए कोई परमिशन ली गई थी अथवा नहीं? क्या @Gzbtrafficpol से कोई NOC की गई या नहीं? आम लोगों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ की इजाजत किसने दी?
@MORTHIndia@BJP4UP
दिल्ली में झुग्गी के बदले मकान देने के करोड़ो के विज्ञापन देने वाली @BJP4India ने दिल्ली से सटे गाजियाबाद में 40 साल पुरानी झुग्गियों को तोड़कर गरीबों को कड़कड़ाती ठंड में किया बेघर। सिर्फ @ArvindKejriwal ही है जो बचाता है गरीबों के आशियाने।
आप अपनी गाड़ी पर पुलिस लिखवा दो फिर आप कानून, संविधान सभी से ऊपर हो जाते है ये फोटो गाजियाबाद पुलिस लाईन के बाहर की है अब देखते है @Uppolice और @ghaziabadpolice क्या खानापूर्ति करती है।
आज़ादी की सुबह की पहली चाय….. 17 महीने बाद!
वह आज़ादी जो संविधान ने हम सब भारतीयों को जीने के अधिकार की गारंटी के रूप में दी है।
वह आज़ादी जो ईश्वर ने हमें सबके साथ खुली हवा में साँस लेने के लिए दी है।
स्कूल के टीचर और सरकारी दफ़्तर के बाबू में क्या अंतर है?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुसार टीचर राष्ट्र के भविष्य का निर्माता है, लेकिन शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार के कुछ बड़े बाबूओं की नज़र में टीचर और दफ़्तरी बाबू में कोई अंतर नहीं है…
तभी तो इन्होंने एक नया फ़रमान जारी करते हुए उन सभी टीचर्स को, जो दस साल से ज़्यादा उसी स्कूल में हैं, को चेतावनी दी है कि वो ख़ुद किसी और स्कूल में स्थानांतरण के लिए अप्लाई करें नहीं तो प्रशासन अपनी मर्ज़ी से उन्हें किसी भी स्कूल में पोस्ट कर देगा !
हो सकता है इस प्रकार का रैंडम ट्रांसफ़र सरकारी बाबूओं के केस में ज़रूरी हो पर टीचिंग प्रोफेशन में ये बिलकुल ग़ैर ज़रूरी है।
ऐसा इसलिए क्योंकि टीचर्स का अपने स्कूल के बच्चों, उनके पैरेंट्स और समुदाय के साथ एक आर्गेनिक रिश्ता होता है। ये रिश्ता कई सालों के भरोसे के आधार पर बनता है।
इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का पैरा 5.3 कहता है, “शिक्षक और समुदाय के बीच संबंध बने और वह समुदाय से जुड़ा रहे जिससे विद्यार्थीयों को रोल मॉडल और शैक्षिक वातावरण मिल सके, इसे सुनिश्चित करने के लिये अत्यधिक स्थानांतरण की हानिकारक प्रैक्टिस पर रोक लगाई जाएगी।"
पर अफ़सोस की बात है कि शिक्षा निदेशालय के वर्तमान आकाओं ने न सिर्फ़ राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भावनाओं का अपमान किया है बल्कि मनीष सिसोदिया जी द्वारा टीचर्स और सरकार के बीच भरोसे और सम्मान का जो रिश्ता स्थापित किया था, उसे तोड़ने का काम भी किया है।
इस रिश्ते की बदौलत ही दिल्ली सरकार के टीचर्स ने राष्ट्रीय राजधानी के लगभग 18 लाख बच्चों को विश्वस्तरीय शिक्षा देने का काम किया है।
देश के अन्य सरकारी स्कूलों से अलग दिल्ली सरकार के टीचर्स, स्कूल को सरकारी स्कूल नहीं बल्कि अपना और अपने स्टूडेंट्स का स्कूल मानने लगे थे।
अब ये नये आका लोग एक झटके में उस रिश्ते को फिर से अविश्वास की खाई में धकेलना चाह रहे है।
ये सरकारी फ़रमान फिर से स्कूलों को सिर्फ़ और सिर्फ़ शिक्षा निदेशालय का ब्रांच ऑफिस बनाने की प्रक्रिया है।
शिक्षा निदेशालय की एक ट्रांसफ़र पालिसी है जिसके तहत आवश्यकतानुसार टीचर्स ख़ुद ट्रांसफ़र के लिए ऑनलाइन आवेदन करते हैं। इसके अलावा, प्रिंसिपल की संस्तुति, स्कूलों की ज़रूरत या प्रशासनिक कारणों से भी टीचर्स का ट्रांसफ़र होता है।
इन सब के अलावा अब ये नया फ़रमान लगभग 6000 टीचर्स यानी दिल्ली सरकार के स्कूलों में पोस्टेड 10% टीचर्स को विशेष रूप से प्रभावित करेगा।
ये सारी क़वायद कुछ तथाकथित “मठाधीश टीचर्स”, जो कई सालों से एक ही स्कूल में जमे है और क्लास में पढ़ाने नहीं जाते, उन्हें “डिसिप्लिन” करने के नाम पर लिया जा रहा है।
पर मेरी बात नोट कर लीजिए- वो तथाकथित “मठाधीश टीचर्स” अपने जुगाड़ की बदौलत कहीं नहीं हिलेंगे, बल्कि इस फ़रमान की ग़ाज़ सिर्फ़ “सिंसियर टीचर्स” पर ही गिरेगी।
और तो और, इतना बड़ा डिसिशन लेने से पहले इन आकाओं ने चुनी हुई सरकार या शिक्षा मंत्री से विचार विमर्श करना भी ज़रूरी नहीं समझा।
इनके अनुसार से “सर्विस मैटर” है लिहाज़ा ये मुद्दा चुनी हुए सरकार के दायरे से बाहर है।
ग़ज़ब स्थिति है ये !!
बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की ज़िम्मेदारी चुनी हुए सरकार की है, पर उन्हें शिक्षा देने वाले टीचर्स किस स्कूल में पढ़ायेंगे ये चुनी हुई सरकार नहीं तय करेगी, ये तय करेंगे बाबू लोग!!
अब देखना ये है टीचर्स की “ऑटोनोमी” की दुहाई देने वाले और भारत को “विश्वगुरु” बनाने का सपना देखने वाले लोग, दिल्ली सरकार के इन गुरुओं के साथ हो रही इस प्रशासनिक मनमानी पर क्या बोलते और करते हैं…
@msisodia@Dir_Education@AtishiAAP