Once Mohammed bin Salman said the Middle East is the new Europe. I told a friend the West wouldn’t digest that easily.
Now tensions around Iran are shaking investor confidence across Dubai, Abu Dhabi, Riyadh & Qatar. Fear spreads fast, markets react faster. When stability is questioned, the whole region feels it.
#IranWar
ये IPS आनंद मिश्रा हैं। अब बक्सर सीट से बीजेपी के विधायक हैं। बहुत जरूरी मुद्दा सदन में उठाया।
कहा- पड़ोसी जलन करता है इसलिए केस करवा दिया। इससे उसको करेक्टर सर्टिफिकेट नहीं मिलता, वह किसी भी चीज की तैयारी करे, उसे नौकरी नहीं मिलेगी। लेकिन हम चाहते हैं कि सिर्फ FIR से ऐसा न हो। केस ट्रायल पर जाए, फिर जो फैसला आए, अगर वह दोषी है तो हम उसे डिस्मिस कर सकते हैं।
पुलिस सुधार को लेकर कई और बातें आनंद मिश्रा ने कही है।
विष्णु जी,
पिछले कुछ समय से कुछ लोग यह भ्रम फैलाने में लगे हैं कि पूज्य सरसंघचालक जी ने आपके द्वारा चलाए जा रहे प्राचीन मंदिरों के पुनरुद्धार के अभियान को कमज़ोर करने का प्रयास किया। लेकिन आपने स्वयं जाकर उन्हें सुना, संवाद किया और वास्तविकता को समझा। इसलिए मेरा आग्रह है कि आपको अपने विचार व्यक्त करने चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अफवाहों और आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर मत बनाने के बजाय तथ्य, संवाद और परस्पर सम्मान को प्राथमिकता दें। जो लोग संघ को न समझते हैं, न उसकी कार्यपद्धति से परिचित हैं और न ही उसके विचारों की गहराई को जानने का प्रयास करते हैं, वे अक्सर दूर बैठकर निष्कर्ष निकाल लेते हैं।
संघ की परंपरा संवाद और समन्वय की है। मतभेद हो सकते हैं, लेकिन संवाद और सम्मान ही समाधान का मार्ग है।
मैं उस समय वही मौजूद था। आप जिस एक वाक्य को आधार बना रहे है वो बिल्कुल ग़लत है। आपकी बाते सत्य से परे हैं।
आपने यह कहा था कि “एक अकेला व्यक्ति शासन-प्रशासन से नही लड़ सकता, इसलिए जब किसी भी हिंदू समाज के व्यक्ति को तकलीफ़ आती है तो संघ के लोगो का उसका समर्थन करना चाहिए, क्योंकि आप लोगो के पास संगठन है, और सिस्टम में पकड़ भी है, अकेला व्यक्ति सिस्टम से नही लड़ सकता।”
इसके उत्तर में सरसंघचालक जी ने कहा था कि “संघ ने ठेका ले रखा है क्या?” उन्होंने यह भी कहा था कि संघ के स्वयंसेवक अग्रेसर बन सकते है, लेकिन उनके पीछे हिंदू समाज को एक-जुट होकर खड़ा होना पड़ेगा।
इस वाक्य के मर्म को समझने की जरूरत है। संघ समाज का संगठन है, ना कि समाज के अंदर कोई संगठन। संघ से जुड़ने वाला व्यक्ति इसी समाज से आता है और समाज के लिए ही कार्य करता है। संघ का स्वयंसेवक घर-घर जाकर आह्वान करता है कि संघ से जुड़िए, शाखा में आइए, अपने आस-पास के लोगो को भी जोड़िये, संघ में आकर संघ के कार्य को समझिए, अगर अच्छा लगे तो ठीक, नहीं तो आप स्वतंत्र है, यहाँ कोई कांट्रैक्ट थोड़े है।
हिंदू समाज को संगठित करने के लिए ही संघ का कार्य है। ताकि विकट परिस्थितियों में समाज एक जुट होकर लड़ सके, ना कि शासन और प्रशासन से मदद की आस में बैठा रहे। आज समाज संगठित नही है, सशक्त नही है, जात-पात में विभक्त है, इसलिए समस्याएं है, जिसका फायदा राजनीतिक दल उठाते है। आज हिंदू के घर में लाठी भी नहीं मिलती, अपने बचाव के लिए हथियार रखना तो दूर। संघ में एक रहने की शिक्षा मिलती है, लाठी भी घर में है तो उसका इस्तेमाल कैसे करना है, उसकी ट्रेनिंग होती है। समाज के हर व्यक्ति से प्रेम भाव हो, दबे, कुचले या कमजोर की मदद हो, ऊंच-नीच का भेदभाव ख़त्म हो, ये सिखाया जाता है। आज लाखो सेवा कार्य संघ के स्वयंसेवक चला रहे हैं।
सरसंघचालक जी ने अनेकों बार सपष्ट किया है कि संघ का काम राजनीति से नहीं हो सकता, क्योंकि आज की राजनीति समाज को तोड़ती है। राजनीतिक दल वोट के लिए नीतियां बनाते है। जबकि संघ जैसा संगठन जात-पात और ऊंच-नीच के भाव से ग्रस्त समाज को एक करने के लिए कार्य कर रहा है।
दूसरा प्रश्न बंगाल को लेकर था, जिसपर उन्होंने कहा था कि “संघ के स्वयंसेवक अपने सामर्थ्य अनुसार जितना कर सकते हैं, उतना कर रहे हैं। फिर भी कोई अन्य विषय है तो बंगाल के स्थानीय कार्यकर्ताओं से आप बात कर सकते है, और मैं भी व्यक्तिगत रूप से बात करके वहाँ की जानकारी लूंगा।”
आपको जब संघ के कार्य की समझ नही है, तो आप जो चाहे आरोप लगायें, और जो चाहे बोले, क्योंकि आपकी पोस्ट को शेयर करने वाले भी अधिकतर लोग वही हैं जो संघ को जानते नही। गाली देना बहुत आसान है, देश में बहुत लोग कर रहे हैं। फ़र्क़ इतना ही है कि आपके जैसे लोगो कि गाली थोड़े ज़्यादा लोग सुनते हैं। यही आपके घमंड का कारण भी है। रावण भी कहता था कि “मैंने अपनी कठिन तपस्या से शक्तियाँ पायी, इसलिए उनपर घमंड का अधिकार भी है, और उसी घमंड के मद में चूर होकर ग़लत कार्य कर बैठा।”
इसलिए आपने जो फॉलोवर जोड़े है, उनके ऊपर घमंड का पूर्ण अधिकार है। लेकिन बेहतर यह है कि गाली-गलौच की बजाय समाज जागरण में उसका इस्तेमाल करें। आधी-अधूरी बात बोलकर अपने आप को सही साबित करने की कोशिश ना करें।
संघ का कार्य अविरल रूप से चल रहा है। धीरे-धीरे संघ संगठन इतना बड़ा हो गया है कि उसका प्रभाव देश की नीतियों पर पड़ने लगा है। क्योंकि अब संघ के स्वयंसेवक राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री आदि बनने लगे है, और उनकी विचारधारा देश की नीतियों पर प्रभाव डालती है। लेकिन वो भी अपनी-अपनी जगहों पर स्वतंत्र है। सत्ता को चलाने के लिए अपनी बुद्धि से निर्णय लेते है। लेकिन संघ से सलाह करते हैं, विचार-विमर्श करते हैं, तो संघ सलाह भी देता है।
आज संघ संगठन का प्रभाव है। लेकिन ऐसा प्रभाव कई लोगो को पचता नहीं। यही कारण है कि संघ की शुरुवात से ही अनेकों बाधाएँ आई, यहाँ तक की संघ पर प्रतिबंध भी लगे। लेकिन जिसका अपना कोई स्वार्थ नही, जिसने अपने लिए कभी कुछ मांगा नही, उसको किस बात का डर। अनेकों यातनाएँ झेलते हुए, विरोधों और अत्याचारों के बावजूद संघ आगे बढ़ता गया। अब ऐसी सज्जन शक्ति कुछ लोगो के लिए समस्या बन गई है। इसलिए उन्होंने संघ के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार शुरू किए, जिसके अनेकों स्वरूप आज देखने को मिल रहे हैं, और ये कम नही होंगे, बल्कि और बढ़ेंगे।
इसलिए हमको दुष्प्रचार से बचना है, और संघ को सत्ता की सीढ़ी समझने वालो से सावधान भी रहना है। क्योंकि आज जब संघ के स्वयंसेवकों का प्रभाव है, तो कुछ लोग संघ में केवल इसलिए आते है कि कुछ हासिल हो जाए। लेकिन ऐसे लोग लंबे नहीं टिकते। जब उनके स्वार्थों की पूर्ति नही होती तो ऐसे लोग दुष्प्रचार भी करते हैं।
इसलिए स्वार्थ पूर्ति के लिए नही, निःस्वार्थ भाव से सेवा करने हेतु संघ से जुड़िए, संघ के सहयोगी पथिक बनकर काम कीजिए, क्योंकि यह संघ का नही, हमारा, आपका सबका काम है, और इसी में राष्ट्र का सुख निहित है।
संघ से आशा-अपेक्षा रखने वाले संघ से दूर रहें, क्योंकि यहाँ कुछ मिलने वाला नही है, जो है वो भी जा सकता है। अपने को जलाकर समाज के लिए रोशनी कर सकते हैं तो संघ में आपका स्वागत है।
धन्यवाद।
एक बार एक व्यक्ति के घर RSS के लोग गए और उसको कहा कि “अरे भाई आप भी RSS की शाखा में आया करो।” वो बोला ठीक है। सो अगले दिन से वो भी शाखा जाने लग गया। वहाँ खेल खेलता, बीच-बीच में भारत माता की जय बोलता, देशभक्ति का गीत गाता और अंत में एक सुभाषित सुनके घर चला आता।
फिर एक दिन शहर में बाढ़ आ गई। उसने देखा कि उसकी शाखा में आने वाले सब स्वयंसेवक अपने-अपने घर से भोजन ला रहे थे। उन्होंने कहा कि भाई आप भी घर से थोड़ा भोजन बनवा लीजिए, ताकि बाढ़ प्रभावित लोगो को खिला सके। उसने भी बिना प्रश्न पूछे भोजन बनवा लिया, और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में अन्य स्वयंसेवकों के साथ जरूरतमंदों को बांट दिया। स्वयंसेवकों ने वहाँ ना तो किसी की जाति पूछी और ना धर्म।
ऐसे ही किसी दिन पास के पहाड़ी क्षेत्र में भूसंखलन से हादसा हो गया। पास के सभी स्वयंसेवकों को मौके पर पहुँचने की सूचना मिली, तो वह भी पहुँच गया। उसने देखा कि दुर्घटना में घायल लोगो के लिए कुछ डॉक्टर निःस्वार्थ भाव से उपचार कर रहे हैं, और बिना पैसा लिए फ्री में दवाइयाँ भी दे रहें हैं। दूसरी तरफ़ उसके कुछ साथी पीड़ित परिवारों के लिए भोजन की व्यवस्था कर रहे थे। उसने भी अपने घर से पीड़ित लोगो के लिए भोजन और अन्य राहत सामग्री मँगवा ली। बाद में जानकारी ली तो पता चला कि ये डॉक्टर भी उसके जैसे ही स्वयंसेवक हैं।
थोड़ा समय बीता तो एक दिन उसके पास वहाँ के संघ प्रचारक का फ़ोन आया। प्रचारक जी ने आग्रह किया कि सेवा भारती के कुछ कार्यकर्ता ग़रीब बच्चों को पढ़ाने के लिए एक छात्रावास शुरू कर रहे हैं, तो क्या वह एक बच्चे की फीस का भार वहन कर सकता हैं? तो उसने कहा कि ये तो बड़ी अच्छी बात है, मैं जरूर करूँगा। कुछ और स्वयंसेवकों ने भी उन बच्चो की स्कूल फीस, उनके आवास की व्यवस्था, व भोजन इत्यादि का भार अपने कंधों पर ले लिया, और छात्रावास सुचारू रूप से चलने लगा।
एक दिन शाखा में एक वरिष्ठ कार्यकर्ता का प्रवास हुआ, तो उसने जिज्ञासा-वश पूछ लिया कि भाईसाहब आप हमेशा कहते रहते हो कि हो हम देश के लिए कार्य कर रहे हैं, मैं इतने दिन से शाखा में आ रहा हूँ, तो मैंने देश के लिए क्या किया? तब उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि इस भाव को जागृत करना कि “मैंने देश के लिए क्या किया?”, इतना ही संघ शाखा का काम था। और तुम इतने दिन से देश का ही तो कार्य कर रहे हो। ये समाज जिसकी तुमने सेवा की, ये अपना ही तो है। इसी समाज से देश बना है, और ये समाज सशक्त होगा तो देश सशक्त होगा।
उसको जवाब मिल गया।
उसको समझ आ गया कि संघ का कार्य संपूर्ण समाज के लिए है, और उसके जैसे सैकड़ो स्वयंसेवक बिना किसी स्वार्थ के निरंतर समाज-सेवा में लगे हैं। शाखा तो माध्यम है जहाँ उसने सीखा कि संगठन में शक्ति है, कोई छोटा या बड़ा नहीं, सब समान हैं। सम्पूर्ण समाज अपना है, और उसकी सेवा अपने सामर्थ्य अनुसार करना हमारा दायित्व। शाखा में ना तो किसी ने उसकी जाति पूछी, और ना ही जाति देखकर स्वयंसेवकों ने कोई काम किया। अब धीरे-धीरे उसने अन्य लोगो को भी संघ से जोड़ना शुरू किया। उसके जैसे कई लोग संघ से जुड़े, जिनमें से कुछ नेता बन गए, कुछ अधिकारी, कोई डॉक्टर तो कोई वैज्ञानिक, और कुछ घर-परिवार छोड़कर इसी कार्य में लग गए, जिनको संघ ने प्रचारक की संज्ञा दी।
लेकिन समाज के कुछ लोगो ने, जिनको संघ कार्य की जानकारी नही है, उन्होंने यह मान लिया कि ये सब काम तो संघ के लोगो की ड्यूटी है।
ऐसे लोगो के पास एक ही काम रह गया - किसी भी जगह दंगा-फ़साद हो जाए, सांप्रदायिक हिंसा हो जाए, कोई प्राकृतिक आपदा आ जाए तो तुरंत सवाल करो कि “RSS वाले कहाँ है?” लेकिन ये प्रश्न करते वक्त वो भूल जाते है कि RSS उनके जैसे लोगो से ही बना है।
RSS में सदस्यता नही दी जाती, और ना ही कोई पंजीकरण होता है। आप जब मर्जी आइए, जब मर्जी जाइये। काम अच्छा लगे तो संघ के सहयोगी बनकर काम कीजिए, ना पसंद आए तो अपने सामर्थ्य अनुसार समाज में जाके काम कीजिए। इसलिए ना तो संघ ने ठेका लिया है और ना संघ को किसी ने ठेका दिया है। संघ में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है। संघ ने किसी पर कुछ थोपा नही है। हाँ, एक व्यवस्था है, उस व्यवस्था को चलाने के लिए अलग-अलग दायित्व पर कार्यकर्ता मौजूद है। समय-समय पर कार्य की समीक्षा होती है और संगठनात्मक परिवर्तन भी होते है।
संघ को लेकर अक्सर धारणाएँ बन जाती हैं, लेकिन इस थ्रेड में आप देखेंगे कि किस तरह स्वयंसेवक चुपचाप काम करते हैं, और कैसे सेवा, अनुशासन और समाज के प्रति जिम्मेदारी के भाव से जुड़कर बदलाव लाने की कोशिश करते हैं।
पढ़ें और खुद समझें।
अगर आप जानना चाहते हैं कि RSS की शाखा, और संगठन की भावना जमीनी स्तर पर कैसे सेवा का मूर्त रूप लेती है, तो यह जरूर पढ़ें। इसमें सरल उदाहरणों के जरिए बताया गया है कि समाज के लिए निःस्वार्थ भाव से काम करने का दृष्टिकोण क्या होता है।
किसी ने कोई मत नहीं बदला। राजनीतिक दलों का काम है बातों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना। 2015 के बिहार चुनाव में वही हुआ था।
सरसंघचालक जी ने आरक्षण सही तरीके से लागू रखने और राजनीतिक दबाव से मुक्त, निष्पक्ष समिति द्वारा उसकी समीक्षा की बात कही थी, ताकि यह पता चल सके कि नीति का लाभ वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक पहुँच रहा है या नहीं।
आपकी जो भाषाशैली है, इसको बिहारी में “थेथरई” बोलते है। इसी प्रकार की भाषा कन्हैया कुमार की भी है, जिसे सुनकर कुछ लोगो को आनंद तो मिलता है, क्योंकि यह बड़ी मसालेदार होती है, लेकिन इसका सत्य से कोई वास्ता नही होता।
किसी भी संस्था को समझने का सही तरीका यह है कि उसके मूल विचार, कार्यपद्धति, सेवा कार्य और दीर्घकालीन योगदान को देखा जाना चाहिए। समस्या ये है कि ना तो आपको मूल विचार का ज्ञान है, और ना कार्यपद्धति की समझ। सेवा कार्य और योगदान की जानकारी भी जितना सोशल मीडिया और इंटरनेट से मिली उतनी ही है। इसलिए संघ इतनी साधारण व्यवस्था नही है, जो थेथरई करने से समझ आए।
बहुत प्रचलित कहावत है — “जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि।” अर्थात् इंसान दुनिया को वैसे ही समझता है जैसा उसका नजरिया या अनुभव होता है। जिसने जैसा देखा/समझा, उसने वैसा ही जाना।
मज़ाक़ या तिरस्कार से न तो समझ बढ़ती है और न ही समाधान निकलता है। किसी भी बड़े संगठन की तरह संघ को भी समय-समय पर आत्ममंथन करना पड़ता है। समाज बदलता है, अपेक्षाएँ बदलती है, इसलिए संवाद दोतरफा होना चाहिए। जो लोग असहमत हैं, वे भी तथ्य और तर्क के साथ चर्चा करें, यही लोकतांत्रिक परंपरा है। अगर किसी को आपत्ति है, तो वह प्रश्न पूछे और तर्क दे।
लेकिन थेथरई करने, मज़ाक़, या पूर्वाग्रह से न तो सत्य सामने आता है, न समाज मजबूत होता है। क्वांटम फिजिक्स, रॉकेट साइंस, क्वाड्रटिक Equation में आप घुस गए, जैसे किसी सरल विषय को जटिल शब्दों में उलझाकर गंभीर दिखाना ही उद्देश्य हो।
इस ढाई मिनट के वीडियो में 10 आयाम तो आपने स्वयं ही गिना दिए, कि संघ ये करता है, वो करता है, लेकिन मूल में पहुँच नही पाए। चलिए जितना समझा उतना स्वीकार तो किया। अक्सर ऐसा ही होता है कि विरोध करते-करते भी व्यक्ति अनजाने में स्वीकार कर लेता है कि कोई कार्य हो रहा है, बस उसे देखने का चश्मा अलग होता है।
अगर वास्तव में समझना हो, तो किसी शाखा में जाकर बैठिए, स्वयंसेवकों से बात कीजिए, सेवा कार्य देखिए, फिर आलोचना कीजिए, तो आपकी बात अधिक वजनदार लगेगी। क्योंकि विचारों का मुकाबला विचारों से होता है, न कि थेथरई से।
समाज को जोड़ने का काम कठिन है, इसमें समय, धैर्य और निरंतरता लगती है। जो लोग केवल दूर से देखकर टिप्पणी करते हैं, उन्हें पूरा परिप्रेक्ष्य दिख ही नहीं पाता।
इसलिए बेहतर यही है कि हम असहमति रखें, लेकिन ईमानदारी के साथ रखें; प्रश्न करें, लेकिन समझने की नीयत से करें; और आलोचना करें, लेकिन तथ्यों के आधार पर करें।
अंततः, किसी भी संगठन का मूल्यांकन उसके दीर्घकालीन प्रभाव से होता है, न कि कुछ मिनट के वीडियो या चुटीली टिप्पणियों से।
सामाजिक उत्थान में ऐसी भाषा का खुले रूप में प्रयोग घातक है । एक सभ्य समाज में ऐसी भाषा की भर्त्सना होती है - यहाँ ये इससे पैसा अर्जित कर रहे है । एक स्वस्थ समाज और राष्ट्र सदैव गुस्से व तनाव की स्थिति में नहीं रह सकता । ऐसे लोग हर वक्त समरसता बिगाड़ रहे हैं
आज गोमती नदी के पुनरुद्धार हेतु लखनऊ के ताज होटल में राज्य परिवर्तन आयोग द्वारा आयोजित राज्यस्तरीय कार्यशाला “Revitalizing the Lifeline: Clean Gomti 2026” में प्रतिभाग किया। इस अवसर पर गोमती नदी के पुनरुद्धार के लिए नीति, तकनीक, वित्तीय संसाधन एवं जनसहभागिता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक एवं गहन विचार-विमर्श किया गया।
इस अवसर पर विशेषज्ञों, प्रशासनिक अधिकारियों एवं विभिन्न हितधारकों द्वारा नदी संरक्षण से जुड़े नवाचारों, सतत विकास रणनीतियों तथा प्रभावी क्रियान्वयन के उपायों पर अपने विचार साझा किए गए, जिससे गोमती नदी के दीर्घकालिक संरक्षण एवं पुनर्जीवन की दिशा में ठोस कार्ययोजना तैयार की जा सके।
माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी के कुशल नेतृत्व में गोमती नदी का पुनरुद्धार का ये पहल प्रेरणादायक होगी
We worship Ganga at night & pollute it in the morning.
Instead of collecting garbage after Ganga Aarti, they are literally flushing it in Ganga itself.
Ganga is never going to get cleaned if this continues....
Video by SaneemaWala