Hotel complimentary breakfast is the place where a man eats not out of hunger but out of a sense of recovering the room rent.
At home two toasts suffice in the morning, but the moment he picks up a plate in the hotel the inner chartered accountant wakes up.
First he will put fruit because he has to look healthy, then next to it aloo paratha, idli, poha, sausages and a tiny croissant whose identity he doesn’t know but which is free so it must be respected.
As soon as the plate runs out of space he picks up a second plate and tells himself this is only for the omelette. The live-counter guy asks veg or cheese, onion, tomato, chilli, mushroom… now we are not ordering an omelette, we are giving information as detailed as choosing a life partner.
Then he puts bread in the toaster. It disappears from the bottom but never comes out. You bend over and peer inside as if a child has fallen into a borewell. Just then someone else’s burnt toast emerges from behind and he looks at you suspiciously as if you did something to his bread.
The coffee machine has six buttons. Press espresso and two spoons of sorrow drop into the cup. Press cappuccino and the machine first groans, then releases steam, then gives so much foam that the coffee ends up living somewhere underneath like a tenant.
You return to the table and your wife asks “Who will eat so much?” You say “I just took a little,” while looking at the table it seems the United Nations has sent famine-relief supplies. In between the waiter comes to clear plates and you, while saving the half-eaten idli, say “It’s still going on.” Is this a meal or an old EMI that must not be closed?
In the end the stomach has already surrendered but the eyes fall on the sweets.
We wrap one muffin in a napkin and keep it for later. Then back in the room we cannot lie straight on the bed for two hours and proudly declare “No need for lunch today.”
That is the real saving of hotel breakfast: money is saved for one meal and the digestive system does two days of overtime!
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Note : A post of a retired doctor received on WhatsApp
आवारापन 2 मूवी विशुद्ध सिनेमाई मनोरंजन है।
पहली बात ये कि जब फिल्म का निर्देशक सिंगल लाइन की स्टोरी पकड़ के एक इंच भी अपने मूल प्लॉट से इधर उधर न भटके तो साधारण अभिनेताओं की साधारण स्टोरी पर बनी आवारापन 2 जैसी साधारण फिल्म भी कमाल कर जाती है ।
आवारापन 2 मूवी की खास बात ही यही है कि सिंगल लाइन स्टोरी पर चलने के बावजूद आप फिल्म से इसीलिये बंधे रहते हैं कि फिल्म एक भी सीन आपको गैर जरूरी नहीं लगता।
और ये चीज ये भी बताती है कि इस मूवी की एडिटिंग गजब की है।
इतनी गजब कि फिल्म का सबसे बड़ा ट्विस्ट ठीक इंटरवल पर आता है।
फिल्म की सबसे टॉप की बात ये है कि इसका विलेन वाकई विलेन है और विलेन का किरदार इतना अच्छा लिखा गया है कि आपको प्रभावित भी करता है।
कसौटी जिंदगी की कोमुनिका के बैकग्राउंड साउंड ट्रैक की तरह जोरावर का बैक ग्राउंड साउंड ट्रैक भी काम कर गया है और ऐसी पुरानी और आजमाई हुई चीजों को ज्यादातर वर्तमान निर्देशक नहीं अपनाते, पर इस फिल्म में ये बैकग्राउंड म्यूजिक कमाल कर गया मौके पर।
गीत संगीत खराब नहीं हैं और गाने फिल्म की वाइब्स के साथ पूरी तरह से मैच करते हैं।
आइटम सांग जैसी चीज एक भी नहीं है।
इमरान हाशमी की फिल्म होने के बावजूद एक भी अश्लील टाइप का सीन या संवाद नहीं है। एक भी नहीं।
ये वो प्लस प्वाइंट है जो इस फिल्म की ऑडियंस बढ़ा देता है।
vfx का अनावश्यक प्रयोग नहीं है।
सिनेमेटोग्राफी परफेक्ट है। सीन साफ दिखते हैं।
और साउंड डबिंग इतनी अच्छी है कि हर संवाद साफ सुन सकते हैं जो एनिमल जैसी हिट फिल्म की भी कमी थी।
बेसिकली ये एक एक्शन मूवी है और एक्शन सीन भी परफेक्ट हैं।
खासतौर पर शुरुआत का कार चेजिंग सीन और अंत से पहले का बौद्ध भिक्षुओं वाला सीन बेहतरीन है।
फिल्म की कई खासियतों में से एक है कि हर किरदार बस उतना ही संवाद बोलता है जितना जरूरी है।
अनावश्यक के लंबे डायलॉग और रोना धोना नहीं है।
नफीसा नवाज के रोल में मात्र चार सीन और आठ संवादों में शबाना आजमी ऐसी छा गई हैं कि आपको लगने लगता है कि इनका रोल और बड़ा होना चाहिए था।
अब शायद आवारापन 3 बनेगी ही बनेगी और नफीसा नवाज उसमें लंबे रोल में होंगी,ये पक्का है।
दिशा पाटनी बस ग्लैमरस दिखी हैं, वही उनका काम भी था।
विलेन के रोल में वामिका गब्बी का भाई पूरन गब्बी है और इमरान हाशमी के साथ वोही फिल्म की जान है।
सपने vs एवरीवन का मामा भी फिल्म में है और अच्छा रोल किया है।
इमरान हाशमी के कैरियर की ये बेस्ट परफॉमेंस है।
शिवम पंडित के रोल में इमरान हाशमी धमाका कर गये हैं और ये रोल सिर्फ वही कर सकते था।
अपनी बेटी जैसी लड़की को बचाने के लिये चाइल्ड ट्रैफिकिंग गैंग से लड़ने उतरे शिवम पंडित के रोल में इमरान हाशमी अपनी प्ले बॉय वाली छवि से बिल्कुल अलग मूड में दिखे हैं।
इस कहानी पर फिल्में हॉलीवुड में थोक के भाव बनी हैं पर इमरान हाशमी और पूरन गब्बी की जुगलबंदी इसे हिंदी दर्शकों के लिए उन हॉलीवुड फिल्मों से ज्यादा मनोरंजक बना देती है।
मुझे फिल्म बहुत पसंद आई।
मेरी तरफ से चार स्टार।
बाकी आपको जैसी भी लगे, वो आपकी चॉइस।
@old_cricketer में भी पहले नहीं पहनता था अब रोज पहन रहा हु तो आदत में आ गया ओर धूल,धूप,बारिश सब से भी सुरक्षा रहती है दूसरा अब बिना हेलमेट गाड़ी चलाना जमता नहीं
जयपुर में UGC को लेकर हुए प्रदर्शन में घायल देवराज सिंह की अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई! खुद को जब गाली पड़ी तो रात को 12 बजे 4 रील डाल दि यहाँ लोग मर रहे हैं और आवाज़ तक ना निकलेगी। समय की बात है, तू भी इंतज़ार कर, हम भी कर रहे हैं
@narendramodi#UGCRegulation2026
महिपाल सिंह मकराना बोले ; हम चाहते हुए CM हाउस के अंदर घुसने की हमारी औकात थी, लेकिन हमने ऐसा नहीं किया"
स्वर्ण समाज को ओबीसी से टाइड जा रहा है, SC -ST को हमसे 80 साल लगले अलग कर दिया गया। आज वे हिंदू ना होकर बौद्ध हो गए हैं, क्रिश्चियन हो गए है, मुस्लिम हो गए हैं। उसने हिंदू देवी - देवताओं को गालियां निकलवाई जा रही है। अब हमें मूल ओबीसी का जो समाज है, जो हमारे जीवन से मृत्यु तक साथ रहने वाली कौम है। अब उनको हमसे दूर करने के लिए ये ये लोग UGC लेकर आए हैं।
हम लोग यहां गांधीवादी तरीके से आए है, आपको हमारी 24 दिन की 800 किलोमीटर की पैदल यात्रा आखिर क्यों रास नहीं आई ? क्या आपको उसी तरह के आंदोलन पसंद है जिसमें आपकी बहन -बेटियों को गाली निकाली जाए ? आपकी मातृ शक्ति को गाली दी जाए ? गंदे - गंदे स्लोगन लिखे पोस्टर लाए जाएं ? पुलिस के मुठभेड़ की जाए ? ऐसे लोग जो हाथापाई करे ? वो ही पसंद है ?
मकराना ने कहा कि हम हाथ में गीता और संविधान लेकर चल रहे थे। इनको संविधान से चलना है या लाठी - भाटे से चलना है ? मकराना का आरोप है कि "हमारे शांतिपूर्ण प्रदर्शन को बदनाम करने के लिए इन्होंने हर एक वो हथकंडा अपनाया।"
मकराना ने कहा कि लेकिन, हमने इनको वापस प्रतिउत्तर नहीं दिया....हालांकि, हम उनको प्रतिउत्तर देने के लिए इनसे 20 गुना ज्यादा थे। अगर, हम चाहते हुए CM हाउस के अंदर घुसने की हमारी औकात थी। लेकिन, हम संविधान से चलने वाले लोग है, इसलिए रुक गए।
The protests that are coming soon to a street near you in Modi 3.0 in the coming months:
1) NEET related protests
2) IMA doctors protests
3) Farmer protests
4) Muslim led protests (for Palestine but soon against Adani and Modi using fake news)
5) Khalistani related protests mostly outside India
More are planned for later for the next years.
जिस देश में आंदोलन होना चाहिए UGC पर, जिस देश में आंदोलन होने चाहिए सुरसा के मुँह माफिक़ बढ़ते आरक्षण पर, जिस देश की सड़के पट जाने चाहिए ST /SC जैसे काले कानूनों के खिलाफ , जिस देश में आवाज़ बुलंद होने चाहिए हर विभाग में, सरकारी योजनाओं में व्याप्त कदाचार के खिलाफ, नेताओं के दल बदल पर, खरीद फरोख्त पर, तुष्टिकरण पर, एक देश एक संविधान बोलकर हर जगह व्याप्त विषम अवसर पर,, लेकिन दुर्भाग्य देखिये इस देश का,, कि सरकार द्वारा जिन्हें पेट में आने से लेकर चिता पर लेट धुआँ हो जाने तक सरकारी खजाने से पैसे दिए जाते हैं वो हीं सरकार के खिलाफ विपक्ष के हाथों कठपुतली बन सड़क पर गुंडई कर रहें हैं, और कमाल ऐ कि सरकार उन्हें दामाद की तरह बुलाकर उनसे, उनकी माँग फोटू खींचाकर ले रही है।
सौरभ दास जो कि जर्मन शेफर्ड का रखैल है उससे नड्डा बात कर रहें हैं। ऐ औकात है। वहीं जब UGC के लिए प्रदर्शन हेतू जगह की मांग लीगली रूप से मांगी गयी तब सरकार ने मना कर दिया।
वैसे भी जिस बच्चे को माँ बाप बचपन में ज्यादा लाड़ प्यार करते हैं, बुढ़ापे में सबसे ज्यादा बांस भी वहीं बच्चा करता है।
जब इतना देने के बाद, सरकारी खजाने लुटाने के बाद भी नारे लगते हैं कि - मर जा मोदी, मर जा शाह.. भाजपा हाय हाय.. कोई बोल रहा, संसद में घुस कर मोदी को पीटूँगा, कोई बोल रहा, संसद उखाड़ देंगे, कोई बोल रही, अनपढ़ गवार मोदी, मतलब तमाम तरह की गालियां बकी जा रही है, फिर भी सवर्ण समाज से इकट्ठे किए गए टैक्स को इन तिलचट्टो पर बेतहाशा लुटाने का क्या हीं फायदा।
बंद होने चाहिए सब.. जब बदले में अदद एक वोट और सम्मान नहीं तो फिर काहे का दरियादिली...
जिस प्रोटेस्ट को चंद्रशेखर रावण लीड कर रहा हो, उसकी विश्वसनीयता मेरी नज़र में एक परसेंट भी नहीं है।
जो बच्चे कल इन लोगों के बहकावे में आकर तोड़फोड़ किये और लाठी खाए, उनके लिये दुःख ही व्यक्त कर सकता हूँ।
दिल्ली को एक दिन की अराजकता में झोंकने के लिए प्रधान को गोद में छिपा लेने वाला प्रधान ही जिम्मेदार है।
🚨Indian Express का बड़ा खुलासा🚨
मध्य प्रदेश में मोहन यादव के CM बनने के बाद उनके परिवार और उनकी कंपनियों ने उज्जैन में कई सारे प्लॉट खरीदे।
• 168 एकड़ की संयुक्त ज़मीन वाले ये 137 प्लॉट ऐसी जगहों पर हैं👇🏼
• जहां कई सारे सरकारी प्रोजेक्ट्स (road infra) की घोषणा हुई है 🧵
यह रिपोर्ट सीधे-सीधे मुख्यमंत्री पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रही है। हालाँकि, मुख्यमंत्री @DrMohanYadav51 जी और उनका परिवार यह कह सकता है कि, हम तो ज़मीन के धंधे में बहुत पहले से हैं। किसी ने मुझे बताया कि, मुख्यमंत्री बनने से पहले ही मोहन यादव उज्जैन के रियल एस्टेट किंग जैसे कहे जाते थे और अब तो मुख्यमंत्री ही हैं।
इस देश की यही समस्या है। एक मुख्यमंत्री का परिवार दिन रात राज्य की उन्नति और उसे बीमारू से हाईटेक बनाने में लगा हुआ है। उज्जैन को पूरी तरह रिफर्बिश किया जा रहा है ।
ऐसे में उनका परिवार अगर चंद एकड़ जमीन खरीद लेता है ऑर्गेनिक खेतीबाड़ी के लिए तो मीडिया के पेट मे मरोड़ मार गई।
तेरे बाप का नौकर नहीं है। पहले जॉइंट ब्रीफ़ और प्रेस वार्ता का अंतर पता कर ले। और प्रेस फ्रीडम इंडेक्स की अहमहियत अधोजटाओं के मूड़े बाल जितनी नहीं है। भारत में प्रेस फ्री है और हर दिन मोदी की सरकार गिराते हैं, गरियाते हैं, पैसे भी कमाते हैं, सरकार कुछ नहीं कहती। चैनल, सोशल मीडिया, यूट्यूब सब स्वतंत्र है। मैं जेल में नहीं हूँ, यह उसका सबसे बड़ा सबूत है कि आलोचना की जगह है।