राजस्थानी भाषा अपनी पहचान को लेकर लड़ाई लड़ रही है। अकादमियों का हाल यह है कि अवार्ड बीकानेर से बाहर नहीं जाता। एक किताब नहीं उनको अवार्ड देना मंजूर!दलित–आदिवासी साहित्यकारों को एक अवार्ड नहीं। क्या हमारी अकादमियां समावेशी है?
@DailyNavajyoti अखबार में मेरी रिपोर्ट–
Just FYI: The Suhrawardy of the #SuhrawardyRoad was not named after Muslim league leader & ex-Pak PM, Huseyn Suhrawardy (aka Butcher of Bengal), but Sir Hassan Suhrawardy- the first VC of CU, succeeded by Shyama Prasad Mookerjee. His house Kashana is still there in Park Circus which is now the Bangladesh High Commission Library and Information Center.
Wish the administration had done a bit of research before making such changes to push political and communal propaganda.
There is only one problem in changing the name of the Subawardy Avenue. It’s not named after Huseyn Shaheed Suhrawardy but his uncle Hassan Suhrawardy, VC of the Calcutta University. And it was named before 1930s, long before the 1946 riot.
https://t.co/bGPAOfFpc1
प्रख्यात पत्रकार तवलीन सिंह का यह ट्वीट भाषायी चिंता नहीं, राजनीतिक पाखंड की एक बहुत महीन मिसाल है।
राहुल गांधी कोटा में छात्रों से परीक्षा-व्यवस्था की तबाही, पेपर लीक, कोचिंग के आर्थिक शोषण, बेरोज़गारी, पारिवारिक दबाव और विद्यार्थियों की मानसिक यातना पर बात कर रहे थे।
उन्होंने उस व्यवस्था को चुनौती दी, जिसमें करोड़ों बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस और कुछ गिनी-चुनी परीक्षाओं की सुरंग में धकेलकर बाकी प्रतिभाओं को लगभग विफल घोषित कर दिया जाता है।
लेकिन तवलीन सिंह को इस पूरी बातचीत में समस्या यह दिखाई दी कि राहुल अंगरेज़ी में क्यों बोले!
यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी जलते हुए घर के सामने खड़े होकर पूछा जाए कि आग बुझाने वाला आदमी बाल्टी पर हिन्दी में क्यों नहीं लिखकर लाया।
पहली बात, भारत के विद्यार्थी इतने असहाय नहीं हैं कि अंगरेज़ी का एक सामान्य संवाद समझ ही न सकें। कोटा में देश के लगभग हर प्रदेश से आए विद्यार्थी पढ़ते हैं। वहाँ हिन्दी, अंगरेज़ी और अनेक भारतीय भाषाओं का सहज मिश्रण है। अंगरेज़ी में कही गई बात अपने आप जनता-विरोधी नहीं हो जाती और हिन्दी में कही गई हर बात अपने आप जनपक्षधर नहीं बन जाती।
दूसरी बात, तवलीन सिंह स्वयं मुख्यतः अंगरेज़ी में लिखती हैं, अंगरेज़ी मीडिया के मंचों पर बोलती हैं और भारतीय राजनीति पर अपनी राय अंगरेज़ी में व्यक्त करती हैं। तब भाषा लोकतांत्रिक संप्रेषण का माध्यम होती है; लेकिन राहुल गांधी अंगरेज़ी बोल दें तो अचानक हिन्दी की आत्मा संकट में पड़ जाती है। यही चयनात्मक भाषायी राष्ट्रवाद है।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात—यदि राहुल केवल हिन्दी बोलते तो यही लोग शायद पूछते कि दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत के विद्यार्थियों से संवाद किस भाषा में होगा। वे अंगरेज़ी बोलते हैं तो पूछा जाता है कि हिन्दी क्यों नहीं। अर्थात आपत्ति भाषा से नहीं, वक्ता से है। निष्कर्ष पहले तय है, तर्क बाद में खोजा जाता है।
किसी पत्रकार का काम यह पूछना होना चाहिए था कि राहुल गांधी ने परीक्षा-व्यवस्था को “एक्सटॉर्शन मशीन” क्यों कहा; क्या कोचिंग उद्योग वास्तव में परिवारों को कर्ज़ में धकेल रहा है; पेपर लीक की जवाबदेही किसकी है; और विद्यार्थियों की आत्महत्याओं को रोकने के लिए क्या संरचनात्मक बदलाव चाहिए।
परन्तु जब सत्ता से कठिन सवाल पूछने की इच्छा क्षीण हो जाए, तब विपक्षी नेता के वाक्य की भाषा ही सबसे बड़ा राष्ट्रीय प्रश्न बना दी जाती है। तवलीन सिंह का ट्वीट दरअसल यह नहीं पूछ रहा कि राहुल ने अंगरेज़ी क्यों बोली। वह शिक्षा-संकट पर उठी असुविधाजनक बहस से बचने के लिए पूछ रहा है—हम असली मुद्दे को भाषा की बहस में कैसे डुबो दें?
@RahulGandhi@tavleen_singh
आपसे तो यह उम्मीद कतई नहीं थी... माफ कीजिए,इतिहास हमेशा लड़ने वाले ही बनाते हैं,सरेंडर करने वाले नहीं... मुझे बेहद अफसोस है कि आपके तेवर और भाषणों से मैंने आपको जज कर लिया था और फिर आपके बारे में लगातार खूब लिखा भी... अब आपकी क्या मजबूरी रही यह आपका पर्सनल मामला है... लेकिन मेरी कोई मजबूरी नहीं है.. अलविदा और यह आपसे जुड़ी मेरी आखिरी पोस्ट होगी...
सौरभ द्विवेदी को छोड़िए, आपको दीपक कैसे लगे ?
न्यूज एक्सप्रेस हिन्दी के संपादक-प्रस्तोता सौरभ द्विवेदी एक गंभीर मसले पर ख़बर पढ़ रहे होते हैं, इसी बीच फ्रेम में दीपक आ जाते हैं. सौरभ द्विवेदी के ठीक आगे कोई सामान रखकर वापस मुड़ते हैं कि वो उन्हें बुला लेते हैं- इधर आओ गुरु तुम इधर आओ. क्या नाम है भईया तुम्हारा ? दीपक.
दीपक ! इधर आओ, सबको हैलो बोलो. दीपक हमारे साथी हैं. दीपकजी और दीपकजी की जिम्मेदारी रहती है कि जो हमारी टीम में दीपक तेंदुलिया और बाक़ी साथी हैं, चाय की सप्लाय होती रहे. दीपक बाबू, आगे से शूट हो रहा होगा न….
द्विवेदी अभी अपना वाक्य पूरा भी नहीं कर पाते कि तो ध्यान रखना कि दीपक सिर हिलाने लग जाते हैं. वो द्विवेदी के बुलाते ही समझ जाते हैं उन्हें किस ग़लती के कारण बुलाया है. उनकी पूरी भाव-भंगिमा में एक डर है, एक आशंका लेकिन द्विवेदी के ये कहते ही कि सबको हैलो बोलो, उनके भीतर वो शिशु मन चहक उठता है जो लोगों के आगे चाय की प्याली रखते हुए जाने कब गुम हो गया होगा !
वीडियो के इस हिस्से को लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तरह-तरह की बातें हो रही है और उन सारी बातों के केन्द्र में सौरभ द्विवेदी हैं. उनका बनावटी होना, घमंड होना, ग़ैरज़रूरी चीज़ को शामिल करना..आदि-आदि.
यह ठीक बात है कि द्विवेदी चाहते तो वीडियो से इस हिस्से को एडिट करवा लेते जिससे कि दर्शकों को पता ही नहीं चलता कि किस बात को लेकर कट है ! वैसे भी न्यूज चैनलों का एक पूरा दौर रहा है जिसमें न्यूजरूम को जीवंत दिखाने का ऐसा चलन कि ख़बर पढ़ते एंकर के पीछे कोई दराज़ खोल रहा होता, कोई पेनड्राइव इन्सर्ट करते तो कोई पीठ खुजलाते नज़र आ जाते. इतना ही नहीं, बजट और बाक़ी के ख़ास मौक़े पर डेस्क-दर-डेस्क जाकर एंकर ख़ुद ही सबके काम में घुस जाया करते और पूछते- आपका क्या ख़याल है !
गूगल ऑफिस जैसा कूल दिखने का हऊवा न्यूज़ चैनलों पर कम तारी नहीं हुआ है जो कि अभी भी अलग-अलग तरीक़े से बना हुआ है. लेकिन
एक बार जब ख़बर पढ़ते सौरभ द्विवेदी के बीच फ्रेम में दीपक आ गए और द्विवेदी ने बुलाकर हमसे परिचय कराया तो अब सिर्फ़ सौरभ द्विवेदी कंटेंट नहीं हैं बल्कि दीपक भी बराबर के हैं और बल्कि द्विवेदी से कहीं ज़्यादा. बस ये है कि आपको सौरभ द्विवेदी से थोड़े समय के लिए शिफ़्ट होकर दीपक पर फोकस करना होगा. मैंने जब ऐसा किया तो पहला वाक्य दिमाग़ में आया-
कितने क्यूट हैं, कितने समझदार और अचानक से दुनिया की नज़र में आने की बात को लेकर कितने सशंकित और घबराये हुए भी. हैलो बोलने के दौरान भीतर की कितनी उलझी इच्छाएं चेहरे पर साफ़ झलकने लग जा रही हैं ! उस पूरे समय के लिए स्क्रीन की तासीर कितनी अलग हो गयी ! हम सौरभ द्विवेदी को तो आए दिन देखते रहते हैं, ये तो दीपक को देखने का समय है.
आप चाहें तो दीपक की पूरी बॉडी लैंग्वेज से न्यूज़रूम के बीच काम कर रहे ऐसे बाक़ी दीपक के मन और उसकी मौज़ूदगी को समझ सकते हैं, महसूस कर सकते हैं ! कितनों का मन होता होगा कि मेरी भी एक रील कट जाय, मुझे भी कोई एक बार नोटिस लेकर कहे कि तुममें बहुत संभावना है दीपक.
आजतक की इन्टर्नशिप के दौरान, दूसरे-तीसरे दिन बाद से ही आपस की बातचीत में साथ के लोग हमें बताने लगे थे कि यहां कौन, कैसे आया ? समीप राजगुरु से लेकर ऐसे दर्जनभर से ज़्यादा लोग जिनका सीधे-सीधे मीडिया का कोई अनुभव ही नहीं रहा और न इस काम के लिए आए लेकिन देखते-देखते वो न्यूज़रूम में न्यूज़ और शो का हिस्सा हो गए.
सौरभ द्विवेदी के भीतर एक आदिम गार्ज़ियन है. ये उसकी पूरी मौज़दूगी, भाषा और अंदाज़ में झलकता है. वो बहुतों के भईया, चाचा-ताऊ कहलाना पसंद करते हैं. सर तो हैं ही. ऐसे में,
मैं अब इस वीडियो क्लिप से गुज़रने के बाद दीपक के सिरे से सौरभ द्विवेदी को देख रहा हूं और उम्मीद करता हूं कि वो दीपक की इस सहज उपस्थिति को आकार देंगे. दीपक ऐसे दौर में एक संपादक की फ्रेम में आया है जिसमें संपादक के थोड़े से सहयोग से, उससे बहुत दूर, बहुत बड़ी दुनिया का हिस्सा हो सकता है.
आपमें से जिस किसी ने भी डिजिटल मीडिया के ठीक पहले के दौर में इन्टर्नशिप की है वो बेहतर जानते हैं कि संपादक-न्यूज़ एंकर इन्टर्न को क्या समझा करते और कैसे पेश आते ? ऐसे में आज सौरभ द्विवेदी ने अपने भीतर के गुस्से, खीज और असहजता को दबाकर दीपक को बाहों में घेरकर समझाया, हम दर्शकों को हैलो बोलने कहा है तो हमारे दिमाग़ में ये सवाल ज़रूर रहेगा-
हैलो ! अब कुछ आगे भी तो बोलो दीपक ! हैलो मतलब शुरुआत, अब आगे…कोई विज्ञापन, किसी फ़िल्म में..
मैं कामना करता हूं कि दस-पन्द्रह दिन में दीपक के भीतर इतनी सहजता और साहस पैदा हो कि टकराने पर सौरभ द्विवेदी से कह सकें- सर ! आप सिर्फ़ हैलो करवाकर छोड़ दिए, कुछ और भी तो..
BABA, I was a disciple of Asaram Bapu. After he went to jail, I felt betrayed & my faith felt shattered.
Virat-Anushka’s baba: Don’t focus on the fact that he is in jail. Lord Krishna was also born in a prison. There is no reason to lose faith. Asaram Bapu is our Ram, whether he is in prison or outside. Think of him as God. There should be no doubt.
Today marks the centenary of the birth of Norma Jeane Mortenson, the woman the world knew as Marilyn Monroe.
While the bourgeois press continues to gape at the ghost of a manufactured icon, the Communist Party of Britain reclaims the intellectual and the comrade.
Her politics were born of the assembly line. From the foster homes of Los Angeles to the Radioplane munitions factory, Monroe’s class consciousness was forged in the heat of proletarian survival. She was a woman of fierce intelligence, possessing an IQ that dwarfed the men who sought to manage her, yet she was reduced to a commodity to be bought, sold, and traded by the parasitic studio system.
The FBI files, which tracked her until her final breath, confirm what the establishment feared - a sex symbol who had read Marx and admired the Chinese Revolution. She was a militant anti-racist who used her platform to shatter the colour bar for Ella Fitzgerald, and she stood firm against the cowardice of the McCarthyite witch hunts when she married the blacklisted playwright Arthur Miller.
We must recognise that Monroe’s struggle was the intersection of class exploitation and patriarchal violence. She was a worker whose labour was her own body, super-exploited by a system that demanded she be beautiful and silent. Her life was a constant act of rebellion against the male gaze of capital. On her 100th birthday, we do not celebrate a "bombshell". We honour a clear-minded socialist who understood that the liberation of her class was inseparable from the liberation of her sex.
Happy Centenary, Comrade Marilyn. The struggle continues.
#MarilynMonroe
शशिकांत सेंथिल ने आज बड़ा सुंदर लिखा है, जिसे हर आईएएस और हर राजनेता को पढ़ना चाहिए।
मेरे सिविल सेवक जीवन के वर्षों की एक स्मृति है, जिसे मैं आज तक अपने भीतर लिए चलता हूँ। वह स्मृति कभी मुझसे दूर नहीं हुई।
उन दिनों मेरा तबादला मंगलौर के कलेक्टर के रूप में हुआ था। वह शहर उस समय सांप्रदायिक हिंसा की छाया और एक ख़तरनाक़ रेत माफि़या के दबाव में था। मेरे रवाना होने से पहले संदेश आया कि मुख्यमंत्री मुझसे व्यक्तिगत रूप से मिलना चाहते हैं। यह असामान्य था। सामान्यतः कलेक्टरों को इस तरह नहीं बुलाया जाता। मैं उनके कक्ष में गया तो भीतर एक बेचैनी थी।
उन्होंने मेरी ओर देखा : वही परिचित, पढ़ना कठिन चेहरा। स्थिर। शांत। बिना किसी जल्दबाज़ी के।
उन्होंने कहा, “बन्नी…”!
यानी, आइए।
फिर बोले, “निम्मगे ओंधे केलसा… अल्ली एन्नुम कम्युनल आग बारदु।”
यानी, “वहाँ तुम्हारा केवल एक काम है। कोई सांप्रदायिक घटना नहीं होनी चाहिए।”
बस इतना ही। न कोई भूमिका, न राजनीति, न प्रदर्शन।
एक मुख्यमंत्री एक युवा IAS अधिकारी से अकेले में यह कहते हुए कि शासन में सबसे ज़रूरी क्या है। उस एक वाक्य में शासन का पूरा दर्शन बसता था। एक ऐसा दर्शन जो छवि-निर्माण में नहीं, साधारण लोगों को असाधारण नफ़रत से बचाने में विश्वास रखता था।
पंद्रह दिन बाद मंगलौर भड़क उठा। दो सांप्रदायिक हत्याएँ, दो समुदाय और तनाव के किनारे खड़ा एक शहर। उन्होंने मुझे फिर फोन किया। उतनी ही साफ़ भाषा में।
“डीसी… जो ज़रूरी हो, करो। किसी को भी हिरासत में लो, हमारी पार्टी के लोगों को भी। चिंता मत करो। लेकिन इसे एक दिन के भीतर रोक दो।”
एक युवा कलेक्टर के लिए वे शब्द सब कुछ थे। वे अनुमति थे। वे संरक्षण थे। वे राजनीतिक इच्छाशक्ति का सबसे ईमानदार रूप थे।
मैंने इसका उलटा भी देखा है। एक दूसरे शासन में, लगभग वैसी ही स्थिति में, ऊपर से निर्देश बिल्कुल उलटा था, कठोर कुछ मत करो। चीज़ों को सड़ने दो। वह चुप्पी ही सब कुछ कह देती थी कि कौन किसके लिए शासन करता है।
सिद्धारमैया जी ऐसे नेता कभी नहीं थे।
वे सरकारी वित्त को अपनी उंगलियों पर रखते थे और सामाजिक न्याय को अपनी रीढ़ में। वे उन स्थानों पर जाने से परहेज़ करते थे, जहाँ सामंती गंध आती थी। वे साफ़ बोलते थे, तीखे ढंग से शासन करते थे और कमरे में मौजूद आख़िरी व्यक्ति के पक्ष में खड़े होते थे।
अगर कोई एक राजनीतिक व्यक्तित्व है, जिसकी मैंने मंच से और निकट से, सचमुच प्रशंसा की है तो वे सिद्धारमैया जी हैं। उनकी विरासत केवल उन योजनाओं में नहीं है, जिन्हें उन्होंने शुरू किया, या उन बजटों में नहीं है, जिन्हें उन्होंने पढ़ा। उनकी असली विरासत उस मुख्यमंत्री में है, जिसे उन्होंने तब चुना, जब कोई देख नहीं रहा था। उस शांत फोन कॉल में। उस तरह में, जिसमें उन्होंने एक घबराए हुए युवा अधिकारी से कहा कि जाओ और शांति बनाए रखो।
और अब, जब वे उसी शांत गरिमा के साथ पीछे हट रहे हैं, जिसके साथ उन्होंने हमेशा नेतृत्व किया, मैं अपने भीतर एक गहरी भावुकता महसूस करता हूँ। उन्होंने इस परिवर्तन को उस व्यक्ति की शालीनता से संभाला है, जो हमेशा जानता था कि सिद्धांत पदों से अधिक लंबे समय तक जीवित रहते हैं।
सिद्धारमैया जी, आप शतायु पार हों, आपको स्वास्थ्य उत्तम रहे और और कृपया हमारा मार्गदर्शन करते रहिए।
कांग्रेस को और इस देश को अब भी उस नैतिक स्पष्टता की ज़रूरत है, जिसे आप इतनी सहजता से अपने भीतर धारण करते हैं।
@s_kanth
Beautiful article by @manojkjhadu
Nehru dreamed of building a modern India.
Guru Dutt gave that India a soul through cinema.
One shaped the nation’s future, the other captured its emotions.
Together, they represent an era where India believed in both progress and art.
https://t.co/JDqnl3lIXM
This is a Maa Kali Mandir inside Kolkata Metro since years.
Many people must have seen it and many people may not even know that a Mandir existed .
Nobody bothered much leave aside any Muslim objecting, but Namaz on the road for 10 minutes once a week and everybody’s rights are reminded. Why should the world trust India ?
For The Times of India, I wrote about my hometown, Sikar, a small town in Rajasthan now at the centre of the NEET paper leak controversy. What does its brutal economy of aspiration reveal about Indian society, coaching culture, and our education system? Read here:
जिसने 3 कृषि कानून के पक्ष मे वोट दिया था उसकी यात्रा मे राहुल गाँधी, भूपेंद्र हुडा जाएंगे, अब ये दोनों 750 किसानों की शहादत के ऊपर ट्रैक्टर चलाने जाएंगे 🙏
और निशाने पर सिर्फ दुष्यंत चौटाला, क्यों?
अयोध्या में बाबा मानस दास रहते हैं। कमाल के सुरीले कलाकार हैं। पक्के राग के साथ साथ फिल्मी गाने, भजन, ग़ज़ल सब गाते हैं। कुछ साल पहले #Raaggiri ने उनका पहला इंटरव्यू किया था। इसमें कई किस्से-कहानी और दिलचस्प सवाल थे। बाबा जी की गायकी सुनिए
@YRDeshmukh@hvgoenka@KapilSharmaK9
Gauri Lankesh was murdered under your watch @narendramodi.
You’ll one day cry without glycerin for all the crimes committed against women under your watch!