प्रिय दिल्लीवासियों,
बची रहे जो ‘अरावली’
तो दिल्ली रहे हरीभरी!
अरावली को बचाना कोई विकल्प नहीं है बल्कि ये तो संकल्प होना चाहिए। मत भूलिए कि अरावली बचेगी तो ही एनसीआर बचेगा।
अरावली को बचाना अपरिहार्य है क्योंकि यह दिल्ली और एनसीआर के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच है या कहें क़ुदरती ढाल है। अरावली ही दिल्ली के ओझल हो चुके तारों को फिर से दिखा सकती है, पर्यावरण को बचा सकती है।
अरावली पर्वतमाला ही दिल्ली के वायु प्रदूषण को कम करती है और बारिश-पानी में अहम भूमिका निभाती है।
अरावली से ही एनसीआर की जैव विविधता बची हुई है। जो वेटलैंड गायब होते चले जा रहे हैं, उन्हें यही बचा सकती है। गुम हो रहे परिंदों को वापस बुला सकती है।
अरावली से ही एनसीआर का तापमान नियंत्रित होता है।
इसके अलावा अरावली से एक भावात्मक लगाव भी है जो दिल्ली की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक धरोहर का हिस्सा है।
अरावली को बचाना, दिल्ली के भविष्य को बचाना है, नहीं तो एक-एक साँस लेने के लिए संघर्ष कर रहे दिल्लीवासी स्मॉग जैसे जानलेवा हालात से कभी बाहर नहीं आ पाएंगे। आज एनसीआर के बुज़ुर्ग, बीमार और बच्चों पर प्रदूषण का सबसे ख़राब और ख़तरनाक असर पड़ रहा है। यहाँ के विश्व प्रसिद्ध हॉस्पिटल और मेडिकल सर्विस सेक्टर तक बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जो लोग बीमारी ठीक करने दिल्ली आते थे, वो अब और बीमार होने नहीं आ रहे हैं।
- यही हाल रहा तो उत्तर भारत के सबसे बड़े बाज़ार और आर्थिक केंद्र के रूप में भी दिल्ली अपनी अहमियत खो देगी।
- विदेशी तो छोड़िए, देश के पर्यटक भी यहाँ नहीं आएंगे।
- न ही दिल्ली में कोई बड़ा इवेंट आयोजित होगा।
- न ही कोई राजनीतिक, शैक्षिक, अकादमिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक सम्मेलन आयोजित होगा।
- न ही ओलंपिक, कॉमनवेल्थ या एशियाड जैसी कोई बड़ी खेल प्रतियोगिता आयोजित होगी।
- यहाँ का होटल, रेस्टोरेंट, टैक्सी-कैब, गाइड, हैंडीक्राफ़्ट बिज़नेस, हर काम-कारोबार व अन्य सभी आर्थिक-सामाजिक गतिविधियाँ ठप्प हो जाने के कगार पर पहुँच जाएंगी।
- जब प्रदूषण की वजह से हवाई जहाज़ नहीं चलेंगे, ट्रेनें घंटों लेट होंगी, सड़क परिवहन असुरक्षित हो जाएगा, तो दिल्ली कौन आएगा।
- यहाँ तक कि इसका असर ये भी पड़ेगा कि लोग अपने बेटी-बेटे की शादी तय करने से पहले दिल्ली के हवा-पानी के बारे में सोचने लगेंगे।
- इसीलिए हर नागरिक के साथ हर स्कूल-कोचिंग, हर व्यापारी, हर कारोबारी, हर दुकानदार, हर रेहड़ी-पटरीवाले, हर घर-परिवार तक को ‘अरावली बचाओ’ अभियान का हिस्सा बनना चाहिए।
- हर चैनल, हर अख़बार को ये अभियान चलाना चाहिए। जो लोग सरकार की चाटुकारिता कर रहे हैं, वो भी समझ लें कि उनका स्वयं का जीवन भी ख़तरे में है।
अरावली को बचाना मतलब ख़ुद को बचाना है।
अगर अरावली का विनाश नहीं रोका गया तो भाजपा की अवैध खनन को वैध बनाने की साज़िश और ज़मीन की बेइंतहा भूख देश की राजधानी को दुनिया की ‘प्रदूषण राजधानी’ बना देगी और लोग दिल्ली छोड़ने को बाध्य हो जाएंगे।
इसीलिए आइए हम सब मिलकर अरावली बचाएं और भाजपा की गंदी राजनीति को जनता और जनमत की ताक़त से हराएं!
आपका
अखिलेश
बच्चे मन के सच्चे....... बीजेपी हटाओ..... साफ है देश की आवाज है,
आज की सत्ता ने क्या दिन दिखा दिया है --
सबकी जिम्मेदारी अपनी आने वाली सांसों की और स्वच्छ जल, आपदा से सुरक्षित रहने की
आवाज दो.....
बीजेपी हटाओ..... पर्वत बचाओ..... जंगल बचाओ
एक पेड़ माँ के नाम लगाने वाले अरावली को काटने की इजाज़त देने वाले सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर चुप क्यों हैं।
अरावली बचेगी तो जल, जंगल और जीवन बचेगा।
चुप्पी नहीं, प्रतिरोध ज़रूरी है।
#SaveAravalli#अरावली_बचाओ
अरावली सिर्फ़ पहाड़ नहीं, हमारा भविष्य है।
अरावली उत्तर भारत की जीवन रेखा है—जो रेगिस्तान को रोकती है, पानी बचाती है और पर्यावरण संतुलन बनाए रखती है। आज काग़ज़ी परिभाषाओं के ज़रिये अरावली को छोटा किया जा रहा है, जिससे खनन और मुनाफ़े का रास्ता खुलेगा।
अगर अरावली कमजोर हुई तो भूजल सूखेगा, तापमान बढ़ेगा और रेगिस्तान शहरों की ओर बढ़ेगा। यह नुकसान आज का नहीं, आने वाली पीढ़ियों का है।
यह विकास नहीं, भविष्य के साथ समझौता है।
अब भी समय है—अरावली को बचाइए।
#SaveAravalli
हवाई जहाज से अरावली कुछ यूँ नजर आती है। जो ढाल बनकर खड़ी है।
हैदराबाद जाते समय अरावली को अपने कैमरे में कैद किया था और आज उसे बचाने के लिए चिंता हो रही है ।
#अरावली_बचाओ
सरकार की देखरेख में नदियाँ दूषित, जंगल खत्म और पहाड़ नष्ट किए जा रहे हैं.
देश की प्राकृतिक संपदाओं और पर्यावरण को लेकर सरकार की मंशा ठीक नहीं है.
अपने पर्यावरण को बचाने के लिए आपको ख़ुद आगे आना होगा.
#SaveAravalli
सोशल मीडिया संघर्ष से काम चल जाएगा क्या?
अरावली के मुद्दे पर हर कोई जागा हुआ दिख रहा है। सोशल मीडिया पर खूब हल्ला है। कोई अपनी प्रोफाइल पिक्चर चेंज कर रहा है तो कोई वीडियो बनाकर अपलोड कर रहा है और जिन्हें लिखना आता है वे लिख भी रहे हैं। हर कोई ट्रेंड में भाग ले रहा है। यह जागरूकता के लिए अच्छा है और इसका स्वागत होना चाहिए।
लेकिन बड़ा सवाल यह भी है कि सिर्फ सोशल मीडिया की जागरूकता और यहां से उठने वाला विरोध हुक्मरानों की नींद उड़ा पाएगा क्या?
शायद नहीं। बहुत मुश्किल काम है आजकल हुक्मरानों को जगा पाना। बल्कि यहां तो जरूरत उन्हें सोचने और सही फैसला लेने के लिए मजबूर करने की है।
फिर सवाल यह उठता है कि इसके लिए धरातल पर संघर्ष कहां दिख रहा है? धरातल पर संघर्ष करने के लिए कौन तैयार है? अपना कंफर्ट जोन कौन छोड़ना चाह रहा है? इस सर्दी में जमीन पर उतरने के लिए कौन तैयार हो रहा है?
शायद कोई नहीं।
कोई भी नहीं।
अरावली का मुद्दा फिलहाल वोट बटोरने वाला नहीं है। अन्यथा हो सकता है कोई ना कोई अभी तक जमीन पर उतर भी गया होता। लेकिन अफसोस। जब क्रेडिट और वाह वाही ट्वीट करने और ट्विटर पर प्रोफाइल पिक्चर बदलने से ही मिल जाए तो कोई जमीन पर आखिर क्यों उतरेगा?
लेकिन याद रखिए। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, अरावली को बचाने के लिए किसी न किसी को तो आगे आना ही होगा।
मेरी अपेक्षा युवा नेताओं से है।
बुजुर्गों के लिए ये मेथी के लड्डू खाने के दिन हैं।
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अरावली सिर्फ़ पहाड़ नहीं, राजस्थान की सांस है। हज़ारों सालों से ये पर्वतमाला हमारी ज़मीन, पानी और जीवन की रक्षा करती आ रही है। इसे बचाना मतलब आने वाली पीढ़ियों को बचाना। #SaveAravalli
अरावली को हड़पने का नया फ़ॉर्मूला 🚨
कल तक पहाड़ थे।
आज “100 मीटर से छोटे टीले” बताकर
काग़ज़ों से ही ग़ायब कर दिए गए।
नाम बदले। परिभाषा बदली।
क़ानून की आड़ में खनन आसान।
यह पर्यावरण नीति नहीं है।
यह मोदी सरकार की
मित्र अडानी के लिए बनाई गई कॉरपोरेट सुविधा है! 🔥
#SaveAravalli #FridayFitness