जल्दी ही समय मेरी उम्र का अगला पन्ना पलट देगा।बीते समय का कोई हिस्सा अब नहीं ढोया जायेगा।जो मुझ पर बीती और मैंने उसे जैसे जिया,हां मुझे अपने आप से शिकायत है।लेकिन धन्यवाद करती हूं मैं अपने इष्ट का,जो बताते हैं कि,मुझे अपने आप से शिकायत नहीं,सिर्फ मोहब्बत होनी चाहिए।~स्मृतांशी🦋
कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं इस भीड़ भरी दुनिया का हिस्सा होकर भी उससे थोड़ा अलग हूं। ऐसा नहीं है कि मुझे लोगों से नफरत है, या मैं किसी से बैर रखता हूं। बस मेरा स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि मुझे अनावश्यक मेलजोल कभी आकर्षित नहीं कर पाया। लोगों की भीड़, बिना वजह की बातचीत, औपचारिक मुस्कुराहटें और घंटों चलने वाली बेवजह की चर्चाएं अक्सर मुझे थका देती हैं। शायद इसलिए मैं उन लोगों में से हूं जो अपने भीतर की दुनिया में ज्यादा सहज महसूस करते हैं।
मुझे बिना किसी विशेष कारण के बाहर निकलना पसंद नहीं है। जब तक कोई आवश्यक काम न हो, मेरा मन घर से बाहर जाने को तैयार ही नहीं होता। बहुत से लोग इसे अजीब समझते हैं। उन्हें लगता है कि हर समय बाहर घूमना, लोगों से मिलना और सामाजिक गतिविधियों में शामिल रहना ही जीवन का प्रमाण है। लेकिन मेरे लिए जीवन का अर्थ कुछ और है। मेरे लिए शांति का अर्थ है अपने भीतर उतर पाना, अपने विचारों के साथ बैठ पाना, अपने मन की आवाज़ सुन पाना।
कई बार ऐसा होता है कि रास्ते में कोई परिचित मिल जाता है। वह उत्साह से बातें करना चाहता है, लेकिन मैं अक्सर केवल मुस्कुरा देता हूं, दो-चार आवश्यक बातें करता हूं और फिर चुप हो जाता हूं। मेरे पास शब्दों की कमी नहीं है, लेकिन मैं हर किसी के सामने अपने शब्दों को खर्च करना नहीं चाहता। मैं उन लोगों में से हूं जो बोलने से ज्यादा सुनना पसंद करते हैं, और सुनने से ज्यादा महसूस करना।
लोग अक्सर समझते हैं कि जो व्यक्ति कम बोलता है, वह घमंडी होगा, रूखा होगा या लोगों में रुचि नहीं रखता होगा। लेकिन मेरी चुप्पी में कोई अहंकार नहीं है, मेरी चुप्पी सिर्फ मेरा स्वभाव है। मैं शब्दों को शोर बनने से पहले रोक लेना जानता हूं। मुझे लगता है कि हर बात का जवाब देना आवश्यक नहीं होता, हर चर्चा में शामिल होना जरूरी नहीं होता और हर व्यक्ति को अपनी कहानी सुनाना भी अनिवार्य नहीं होता।
और फिर है मेरा कमरा...
दुनिया के लिए वह केवल चार दीवारों का एक साधारण कमरा होगा, लेकिन मेरे लिए वो एक पूरा संसार है। वो जगह जहां मैं किसी भूमिका में नहीं होता। वहां मुझे अच्छा दिखने की जरूरत नहीं होती, किसी को प्रभावित करने की जरूरत नहीं होती, किसी उम्मीद पर खरा उतरने की चिंता नहीं होती। वहां मैं सिर्फ मैं होता हूं।
मेरे कमरे की खामोशी मुझे कभी डराती नहीं, बल्कि सांत्वना देती है। वहां की दीवारें मेरी चुप्पियों को समझती हैं। वहां रखी किताबें, मोबाइल, इंटरनेट और खिड़की या बालकनी से आती हुई हवा मेरे ऐसे साथी हैं जो मुझसे कुछ मांगते नहीं, लेकिन बहुत कुछ दे जाते हैं। कभी-कभी घंटों मैं बिना कुछ बोले बैठा रहता हूं और मुझे लगता है जैसे यही सबसे सुंदर बातचीत है जो मैं इस दुनिया से कर सकता हूं।
जब बाहर की दुनिया शोर से भर जाती है, लोग एक-दूसरे को समझने से ज्यादा साबित करने में लगे रहते हैं, जब हर तरफ प्रतिस्पर्धा, दिखावा और बनावटीपन दिखाई देता है, तब मेरा कमरा मुझे अपनी शरण में ले लेता है। वहां पहुंचकर ऐसा लगता है जैसे किसी लंबी यात्रा के बाद कोई यात्री आखिरकार अपने घर लौट आया हो।
मुझे एकांत पसंद है, क्योंकि एकांत इंसान को अपने भीतर से मिलवाता है, और मैंने अपने जीवन में जितना मैंने अपने एकांत से सीखा है, उतना शायद किसी भी भीड़ से नहीं सीख पाया।
मेरे लिए सुख का अर्थ हमेशा बड़ी महफिलें नहीं रहीं। कभी-कभी एक शांत शाम, एक अच्छी किताब, मोबाइल पर कुछ पढ़ना, अपने विचारों को कागज पर उतारना, बालकनी में बैठकर आसमान को देखना और बिना किसी व्यवधान के अपने साथ समय बिताना ही सबसे बड़ा उत्सव लगता है।
शायद मैं दुनिया के हिसाब से बहुत सामाजिक व्यक्ति नहीं हूं। शायद मैं उन लोगों जैसा नहीं हूं जिन्हें हर समय लोगों के बीच रहना अच्छा लगता है। लेकिन मुझे इससे कोई शिकायत नहीं। मैंने अपने स्वभाव को स्वीकार कर लिया है। मैंने समझ लिया है कि हर व्यक्ति का सुकून अलग होता है। किसी को भीड़ में शांति मिलती है, किसी को तालियों में, किसी को यात्राओं में, और मुझे...मुझे अपने छोटे से कमरे में।
वहीं मैं सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करता हूं। वहीं मैं सबसे ज्यादा सच्चा महसूस करता हूं। वहीं मैं अपने टूटे हुए हिस्सों को जोड़ता हूं, अपने सपनों को आकार देता हूं, अपनी कहानियां लिखता हूं, अपने दुखों को समझता हूं और अपनी खुशियों को संजोता हूं।
अगर कोई मुझसे पूछे कि दुनिया में मेरी सबसे प्रिय जगह कौन-सी है, तो शायद मैं किसी शहर, किसी पहाड़ या किसी समुद्र का नाम न लूं। मैं बस अपने कमरे की ओर इशारा कर दूं। क्योंकि वही एक जगह है जहां मुझे किसी और जैसा बनने की जरूरत नहीं पड़ती। वहां मैं अपने अस्तित्व के साथ पूरी ईमानदारी से रह सकता हूं। 🤗
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ❣️
@Saphhire_Fire उन पगडंडियों के पास
जो अब भी मेरे
पदचिह्नों को पहचानती हैं,
उन हवाओं के बीच
जिन्होंने मेरे मौन को
शब्दों से अधिक समझा है।
शहर ने
बहुत शोर दिया है मुझे,
अब कुछ देर
बर्फ़ की चुप्पियों में बैठना है
जहाँ
खुद से मिलने के लिए
किसी परिचय की जरूरत नहीं होती।
तुम्हारी लाल चूड़ियों की इस सुंदर परिधि में केवल रंग नहीं बसता, बल्कि.. प्रतीक्षा, विश्वास और समर्पण के अनगिनत भाव सिमटे हैं। जब ये तुम्हारी कलाई को सजाती हैं तो वो स्नेहिल स्पर्श मानो धीमे से कहता है कि कुछ बंधन, कुछ भाव.. यूं ही नहीं बनते। वे हृदय की गहराइयों में रचे जाते हैं।
जैसे-जैसे रात गहरी होती जाती है, मेरे भीतर कुछ और भी गहरा होने लगता है। बाहर की दुनिया धीरे-धीरे शांत हो जाती है,खिड़कियों के पीछे जलती रौशनियाँ एक-एक करके बुझने लगती हैं,और फिर ऐसा लगता है मानों पूरा संसार किसी अदृश्य चादर के नीचे सो गया हो। लेकिन उसी समय मेरे भीतर एक और संसार जाग उठता है...तुम्हारा संसार।
दिन भर मैं बहुत कुछ ओढ़े रहता हूँ, जिम्मेदारियाँ, लोगों की बातें, समय की रफ्तार, अधूरे काम,चिंताएँ और उन सबके बीच खुद को संभालने की लगातार कोशिश। मैं मुस्कुराता हूँ, अपने हिस्से की भूमिकाएँ निभाता हूँ, जैसे सब ठीक हो। लेकिन जैसे ही रात उतरती है, उन सारे आवरणों की पकड़ ढीली पड़ने लगती है और तब, तुम्हारी यादें मेरे पास चली आती हैं।
न जाने क्यों, तुम्हारी यादों में एक माँ जैसी ममता है, एक नदी जैसी शीतलता है, और एक मंदिर जैसी पवित्र शांति। वे बस धीरे से मेरे पास बैठ जाती हैं, जैसे कोई अपना बिना कुछ कहे केवल साथ देने आया हो।
मैं सिहरने लगता हूँ, क्योंकि मुझे पता है कि अब मैं मजबूत बने रहने का अभिनय नहीं कर पाऊँगा। अब मैं वैसा ही हो जाऊँगा जैसा सचमुच हूँ थका हुआ, बिखरा हुआ, तुम्हें याद करने वाला और उस क्षण, दुनिया का हर बोझ हल्का लगने लगता है।
दिन भर जो पीड़ाएँ मेरे सीने में चुपचाप जमा होती रहती हैं, वे तुम्हारी स्मृतियों के सामने टिक नहीं पातीं। तुम्हारी यादें उन्हें एक-एक करके अपने भीतर समेटने लगती हैं। जैसे कोई प्रेम से मेरे माथे पर हाथ फेरते हुए कह रहा हो "अब और नहीं, अब थोड़ा आराम कर लो।"
मैं जानता हूँ कि तुम यहाँ नहीं हो।
मुझे पता है मेरे और तुम्हारे बीच न जाने कितनी दूरियाँ हैं, कितनी खामोशियाँ हैं, लेकिन प्रेम हमेशा उपस्थित रहने का नाम नहीं होता। कभी-कभी प्रेम केवल स्मृति बनकर भी उतना ही जीवित रहता है जितना किसी धड़कन में जीवन,और तुम्हारी स्मृतियाँ तो जैसे मेरी रूह का हिस्सा बन चुकी हैं।
जब रात के किसी कोने में नींद मुझसे दूर खड़ी रहती है, तब मैं तुम्हें याद करता हूँ। तुम्हारी हँसी, तुम्हारी आँखों की चमक, तुम्हारी बातों की मिठास, तुम्हारी चुप्पियां..सब कुछ।
फिर ऐसा लगता है जैसे तुम यहीं कहीं हो..मेरे कमरे की हवा में,मेरी किताबों के बीच,मेरे तकिये की सिलवटों में और सबसे अधिक, मेरे दिल की उन जगहों पर जहाँ आज भी किसी और का अधिकार नहीं हो पाया।
कई बार मैं आँखें बंद कर लेता हूँ और सोचता करता हूँ कि तुम मेरे सामने बैठी हो और मैं दिन भर की सारी थकान तुम्हें सुनाता हूँ। वे बातें भी जो किसी और से नहीं कह पाता,वे डर भी जो दुनिया के सामने स्वीकार नहीं कर पाता,वे आँसू भी जिन्हें दिन के उजाले में बहने की अनुमति नहीं देता,और तुम बस सुनती रहती हो,कुछ कहे बिना। क्योंकि प्रेम में हमेशा शब्दों की आवश्यकता नहीं होती। कई बार किसी का केवल होना ही पर्याप्त होता है।
तुम्हारी यादों का होना मेरे लिए वैसा ही है।
फिर मैं धीरे-धीरे स्वयं को छोड़ देता हूँ। सारी मजबूतियाँ,सारी दीवारें,सब कुछ और तुम्हारी स्मृतियों के उस कोमल स्पर्श में निढाल होकर बहने लगता हूँ जैसे कोई पत्ता नदी के हवाले हो जाए,जैसे कोई थका हुआ पंछी अपने घोंसले में लौट आए,जैसे कोई यात्री वर्षों भटकने के बाद घर पहुँच जाए।
उस क्षण मुझे किसी मंज़िल की आवश्यकता नहीं होती,किसी उपलब्धि की आवश्यकता नहीं होती,किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। बस तुम्हारी यादें चाहिए होती हैं। वे यादें जो मुझे ये विश्वास दिलाती हैं कि प्रेम कभी समाप्त नहीं होता..वह केवल अपना रूप बदलता है। कभी साथ बन जाता है,कभी इंतज़ार,कभी प्रार्थना, कभी पीड़ा और कभी रात की उस गहरी निस्तब्धता में उतर आने वाली शांति, जहाँ केवल दो धड़कनें रह जाती हैं एक मेरी, और दूसरी तुम्हारी स्मृति की।
आज भी रात उतर रही है। खिड़की के बाहर अँधेरा और गहरा हो रहा है,घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ रही हैं,संसार नींद की ओर जा रहा है और मैं फिर उसी परिचित प्रतीक्षा में हूँ।
मुझे पता है,थोड़ी देर में तुम आओगी। शरीर से नहीं,शब्दों से नहीं,किसी आवाज़ से भी नहीं,तुम आओगी अपनी यादों के रूप में,मेरे माथे पर अदृश्य स्पर्श रखकर मेरे दिन भर की सारी थकान को अपने आँचल में समेटकर सोख लोगी और मैं फिर उसी तरह, पूरी निष्ठा से,पूरी मोहब्बत से,पूरी रूह के साथ स्वयं को तुम्हारे हवाले कर दूँगा।
क्योंकि इस विशाल संसार में अगर कोई जगह है जहाँ मेरी सारी बेचैनियाँ आकर शांत हो जाती हैं, तो वह तुम्हारी यादों की गोद है।
और सच कहूँ,रात मुझे इसलिए प्रिय है क्योंकि वह तुम्हें मेरे और करीब ले आती है।
इतना करीब कि कभी-कभी मुझे लगता है मैं सो नहीं रहा हूँ,मैं तुम्हारी यादों की बाँहों में सिर रखकर बस थोड़ी देर के लिए दुनिया से दूर हो गया हूँ। ❤️
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ❣️
गुप्तगामिनी – वह जो रात्रि की रेखा पर चलती है
वह चलती नहीं वह सरकती है, जैसे चंद्रमा की रेखा सरकती हो शांत जल पर।
उसकी गति में कोई शब्द नहीं, कोई संकोच नहीं
वह स्त्री है,
पर कोई साधारण नारी नहीं,
वह गुप्तगामिनी है
जो अपने देह को वस्त्र नहीं, मंत्र की भाँति पहनती है।
उसकी देह कोई उद्घोष नहीं करती,
वह मौन की मृदुलता से सजी है।
वह लज्जा की रेखा पर नहीं,
गर्व की गहराई पर खड़ी है
एक ऐसी स्त्री, जो प्रेम को छिपाकर नहीं रखती,
बल्कि उसे सहेजकर अपने भीतर जलाती है
जैसे कोई अखंड दीप।
उसके बालों में रात उलझी रहती है
वे केशगुच्छ नहीं, तिमिर की तांत्रिक रस्सियाँ हैं।
हर लट जैसे कोई रात्रिचर मंत्र,
हर जूड़ा जैसे किसी प्रेम-पूजा की गांठ।
वह जब चलती है, तो धरती पर कोई पदचिन्ह नहीं पड़ते
क्योंकि वह केवल धरती पर नहीं,
प्रेमी की स्मृति में चलती है।
उसके अधर
कोई निमंत्रण नहीं देते,
किंतु उन्हें देख लेना ही किसी समाधि का प्रथम सोपान है।
वह बोलती नहीं, पर उसके मौन में
असंख्य आलिंगनों की आकांक्षा होती है।
वह किसी अट्टहास की स्त्री नहीं
वह उस मौन हँसी की नायिका है,
जो रात्रि के तीसरे प्रहर में
किसी प्रिय की नींद में उतर जाती है,
जैसे कोई अनाम सुगंध।
उसकी आँखें
वे कोई दृष्टि नहीं देतीं,
बल्कि स्पर्श का संकेत देती हैं।
हर कटाक्ष किसी गुप्त ऋतु की पुकार,
हर पलकपात कोई प्रणव है।
वह वासना नहीं
वह विरह के बाद का विशुद्ध स्पर्श है।
वह रति में नहीं, रति से पहले की प्रतीक्षा में सुंदर है।
वह मिलन की क्षणिक आह नहीं,
बल्कि मिलन की पूर्णाहुति है।
उसकी नाभि में कोई आभूषण नहीं,
फिर भी वह नाभि कोई ज्योतिरलिंग है
जहाँ एक ब्रह्मांड स्त्री होकर घूमता है।
उसकी कटि वह वह घाट है,
जहाँ कोई प्रेयसी होकर नहाता नहीं,
बल्कि देह को त्यागता है।
वह स्वप्न नहीं,
स्वप्नों की वह रेखा है जो जागते समय भी आँखों में जलती है।
उसकी जंघाएँ
कोई श्रृंगार नहीं, चेतना की सीढ़ियाँ हैं,
जिनसे चढ़कर कोई प्रिय
उसके भीतर के देवालय में प्रवेश करता है।
वह कोई रूपवती नहीं,
क्योंकि उसका रूप कोई रंग नहीं
एक अर्थ है।
वह नायिका नहीं,
क्योंकि नायिका होना केवल अभिनय है
वह तो अधिनायिका है,
जो स्वयं अपनी कथा रचती है, निभाती है, और विसर्जित कर देती है।
वह जल में उतरती है,
तो जल में गंध आ जाती है।
वह चंदन नहीं लगाती,
फिर भी देह से कोई अग्नि का सुवास उठता है।
वह मंदिर नहीं जाती
क्योंकि वह स्वयं एक चलायमान देवालय है।
उसकी चाल में चित्त चंचल नहीं होता,
बल्कि स्थिर हो जाता है
जैसे किसी योगी को सहसा साक्षात्कार हो जाए।
वह गुप्त है
क्योंकि उसका प्रेम सस्ता नहीं,
उसकी देह उपलब्ध नहीं,
और उसकी आत्मा अशांत नहीं।
वह वह स्त्री है,
जिसे पाना संभव नहीं,
और जिसमें विलीन होना अपरिहार्य।
गुप्तगामिनी कोई नाम नहीं,
कोई उपाधि नहीं
वह एक स्त्री के भीतर की वह शाश्वत रात्रि है,
जो हर युग में, हर देह में, हर प्रणय में
अस्तित्व का सबसे सुंदर रहस्य बनकर उतरती है|
अजेष्ठ
मुझे दहेज़ चाहिए
तुम लाना तीन चार ब्रीफ़केस
जिसमें भरे हो
तुम्हारे बचपन के खिलौने
बचपन के कपड़े
बचपने की यादें
मुझे तुम्हें जानना है
बहुत प्रारंभ से..
तुम लाना श्रृंगार के डिब्बे में बंद कर
अपनी स्वर्ण जैसी आभा
अपनी चांदी जैसी मुस्कुराहट
अपनी हीरे जैसी दृढ़ता..
तुम लाना अपने साथ
छोटे बड़े कई डिब्बे
जिसमें बंद हो
तुम्हारी नादानियाँ
तुम्हारी खामियां
तुम्हारा चुलबुलापन
तुम्हारा बेबाकपन
तुम्हारा अल्हड़पन..
तुम लाना एक बहुत बड़ा बक्सा
जिसमें भरी हो तुम्हारी खुशियां
साथ ही उसके समकक्ष वो पुराना बक्सा
जिसमें तुमने छुपा रखा है
अपना दुःख
अपने ख़्वाब
अपना डर
अपने सारे राज़
अब से सब के सब मेरे होगे..
मत भूलना लाना
वो सारे बंद लिफ़ाफे
जिसमें बंद है स्मृतियां
जिसे दिया है
तुम्हारे मां और बाबू जी ने
भाई-बहनों ने
सखा-सहेलियों ने
कुछ रिश्तेदारों ने..
न लाना टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन
लेकिन लाना तुम किस्से, कहानियां
और कहावतें अपने शहर की
कार,मोटरकार हम ख़ुद खरीदेंगे
तुम लाना अपने तितली वाले पंख
जिसे लगा
उड़ जाएंगे अपने सपनों के आसमान में..
मुझे दहेज़ में चाहिए,
तुम्हारा पूरा प्यार,
पूरा खालीपन,
तुम्हारे आत्मा के वसीयत का पूरा हिस्सा,
सिर्फ़ इस जन्म का साथ तो चाहिए ही है..
- सौरभ रामाधुन
जिंदगी कोई उत्सव नहीं रह गई है, एक लगातार चलने वाली थकान बन गई है। सुबह आँख खुलती नहीं कि जिम्मेदारियाँ सामने खड़ी मिलती हैं, ऑफिस का दबाव, बॉस की उम्मीदें, काम का अंतहीन बोझ। दिन भर मशीन की तरह खटने के बाद जब इंसान घर लौटता है, तो वहां भी सुकून नहीं, बल्कि एक और किस्म का तनाव इंतजार करता है, परिवार की अपेक्षाएँ, समाज की नसीहतें, और खुद के अधूरे सपनों की चुभन।
ऐसे में कोई पूछे कि तुम खुश हो? तो जवाब देने का मन ही नहीं करता। क्योंकि सच मायने में अंदर से आदमी धीरे-धीरे टूट रहा होता है। ये कोई अचानक गिरने वाली दीवार नहीं है, बल्कि रोज़-रोज़ चटकती दरारों का एक सिलसिला है, जिसे हम मुस्कान की पलस्तर से ढकते रहते हैं।
और इस सबके बीच समाज बड़ी सहजता से एक और बोझ थमा देता है शादी कर लो, उम्र निकल रही है, वंश चलाओ। जैसे जीवन कोई चेकलिस्ट हो, जिसमें टिक लगाना है पढ़ाई, नौकरी, शादी, बच्चा। किसी को ये जानने की फुर्सत नहीं कि जिस आदमी से ये सब करवाया जा रहा है, उसकी अपनी हालत क्या है। वह खुद अपनी जिंदगी को संभाल नहीं पा रहा, अपने मानसिक संतुलन के लिए जूझ रहा है, और उससे उम्मीद की जा रही है कि वह एक और जिंदगी की जिम्मेदारी उठा ले।
यहाँ सवाल सिर्फ शादी का नहीं है, सवाल ईमानदारी का है। क्या हम सच में तैयार हैं किसी और को इस दुनिया में लाने के लिए? या हम सिर्फ इसलिए बच्चे पैदा करना चाहते हैं क्योंकि समाज हमें अधूरा मानता है? क्योंकि हमें लगता है कि बिना परिवार के हम कमतर हैं? या इसलिए कि हमारे अंदर की खाली जगह को हम किसी और की जिंदगी से भरना चाहते हैं?
सच तो ये है कि आज बहुत से लोग शादी नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रदर्शन कर रहे हैं। तस्वीरें खिंचवाने, रिश्तेदारों को खुश करने, और अपनी उम्र के हिसाब से सही कदम उठाने का दबाव। लेकिन उस शादी के भीतर क्या है तनाव, झगड़े, अधूरी समझ, और अक्सर दो ऐसे लोग जो खुद से ही ठीक नहीं हैं।
और फिर उसी अधूरेपन में एक बच्चा आ जाता है। एक नई जिंदगी, जो इस उम्मीद के साथ लाई जाती है कि वह सब कुछ ठीक कर देगी। लेकिन हकीकत तो यही है कि वह बच्चा भी उसी दबाव, उसी असुरक्षा, और उसी मानसिक थकान के माहौल में बड़ा होता है। हम उसे वो सुकून नहीं दे पाते, जिसकी उसे जरूरत है, क्योंकि हमारे पास खुद के लिए ही सुकून नहीं बचा होता।
अगर बात सिर्फ शारीरिक जरूरत की है, तो उसे शादी के नाम पर पवित्रता का चोला पहनाने की क्या जरूरत है? शादी कोई व्यवस्था नहीं है, जिसे सिर्फ अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए इस्तेमाल किया जाए। ये एक जिम्मेदारी है, एक साझेदारी है, जिसमें दो लोग एक-दूसरे के साथ खड़े होते हैं, ना कि एक-दूसरे पर बोझ बनते हैं।
कड़वा सच यही है कि हममें से बहुत से लोग शादी इसलिए नहीं कर रहे क्योंकि वे तैयार हैं, बल्कि इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे डरते हैं अकेलेपन से, समाज की उँगलियों से, “लोग क्या कहेंगे” से, और इसी डर में हम अपनी और किसी और की जिंदगी को एक ऐसे रास्ते पर डाल देते हैं, जहाँ खुशी की संभावना कम और समझौते ज्यादा होते हैं।
जिंदगी पहले ही इतनी उलझी हुई है कि उसे और जटिल बनाने से पहले एक बार ठहरकर सोचना जरूरी है। अगर आप खुद के साथ शांति में नहीं हैं, तो किसी और के साथ शांति की उम्मीद करना भ्रम है। अगर आप खुद की जिंदगी को लेकर स्पष्ट नहीं हैं, तो किसी और की जिंदगी की दिशा तय करना अन्याय है।
हर किसी को शादी करनी ही चाहिए ये कोई सार्वभौमिक सत्य नहीं है, और हर किसी को बच्चा पैदा करना ही चाहिए ये तो बिल्कुल भी नहीं। जिंदगी कोई परंपरा निभाने का मंच नहीं है, ये एक जिम्मेदारी है, जिसे समझदारी से जीना पड़ता है।
कभी-कभी सबसे बड़ा साहस यही होता है कि आप समाज के तय रास्ते पर चलने से मना कर दें। खुद को समझें, अपनी सीमाओं को स्वीकार करें, और ईमानदारी से तय करें कि आप क्या चाहते हैं, ना कि वह जो आपसे चाहा जा रहा है।
क्योंकि अंत में, जिंदगी आपकी है और अगर वह पहले से ही बिखरी हुई है, तो उसे संभालना ज्यादा जरूरी है, बजाय इसके कि आप किसी और को उसी बिखराव में खींच लाएँ। 🔥
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
कभी-कभी ऐसा लगता है ना कि जैसे हम इस भीड़ भरी दुनिया में होते हुए भी कहीं दर्ज ही नहीं हैं। लोग आते हैं, गुजर जाते हैं, बातें करते हैं, पर कोई ठहरकर हमें देखता नहीं…सच में देखता नहीं। हमारी खामोशियों को शोर समझ लिया जाता है, और हमारी गहराई को बस एक साधारण-सी बात।
और फिर धीरे-धीरे मन के भीतर एक खालीपन घर कर जाता है। एक ऐसा खालीपन, जो दिखता नहीं पर हर पल महसूस होता है। जैसे कोई अंदर ही अंदर पुकार रहा हो "क्या मैं सच में मायने रखता हूँ?"
लेकिन सच मायने में ये जो तुम्हें लग रहा है ना कि तुम समझे नहीं जा रहे, ये तुम्हारी कमी नहीं है। ये सिर्फ उन नज़रों की सीमा है, जो अभी तक तुम्हारी गहराई तक पहुँच ही नहीं पाईं।
तुम कोई साधारण कहानी नहीं हो, तुम वो किताब हो जिसे हर कोई पढ़ ही नहीं सकता। तुम्हारे हर एहसास में एक पूरी दुनिया बसती है, तुम्हारी हर खामोशी में एक अनकहा संगीत है, और ये दुनिया…ये दुनिया अक्सर जल्दी में होती है, उसे गहराई से ज़्यादा सतह पसंद होती है। इसलिए वो तुम्हें देख तो लेती है, पर समझ नहीं पाती।
पर यकीन मानो कहीं न कहीं, किसी मोड़ पर, एक ऐसी नज़र तुम्हारा इंतज़ार कर रही है जो तुम्हें बस देखेगी नहीं…महसूस करेगी।
वो तुम्हारी अधूरी बातों को पूरा करेगी, तुम्हारी चुप्पियों को समझेगी, और तुम्हारे उस हिस्से को पहचान लेगी जिसे तुम खुद भी कभी-कभी भूल जाते हो, और जिस दिन वो नज़र तुमसे टकराएगी ना, उस दिन तुम्हें एहसास होगा कि तुम कभी भी व्यर्थ नहीं थे। तुम बस गलत जगहों पर तलाशे जा रहे थे।
तुम्हारी मौजूदगी का अर्थ तब खुलकर सामने आएगा, जैसे बरसों से बंद कोई खिड़की अचानक खुल जाए और धूप अंदर चली आए।
उस एक पल में तुम्हें अपने होने का वजन महसूस होगा, अपनी कीमत का एहसास होगा, और तुम खुद से कहोगे "मैं हमेशा से इतना ही खूबसूरत था, बस किसी ने मुझे सही तरह से देखा ही नहीं था।"
तो अभी जो भी अंधेरा है, जो भी खालीपन है, उसे अपने होने की सच्चाई मत मान लेना।
ये बस एक इंतज़ार है उस नज़र का, जो तुम्हें पूरी तरह से देखेगी और फिर कभी तुम्हें खुद पर शक करने नहीं देगी।
याद रखो तुम व्यर्थ नहीं हो…तुम बस अभी तक सही दिल तक पहुँचे नहीं हो। ❤️
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️