एक पत्ता आपकी लीवर, किडनी और हार्ट को 70 साल तक बीमार नहीं होने देगा...
पपीता एक ऐसा फल है, जिसे लगभग सभी लोग खाना पसंद करते हैं. आपने यह जरूर पढ़ा होगा कि पपीता खाने के क्या-क्या फायदे हैं? लेकिन आज हम आपको पपीता के पत्तों का रस पीने के फायदे बताने वाले हैं. पपीते के पत्तों में कई तरह के बीमारियों का इलाज संभव है. पपीता का पत्ता आपकी लीवर, किडनी और हार्ट को 70 साल तक बीमार नहीं होने देगा. तो चलिए जानते हैं इसके बारे में। आपने पपीते का सेवन कभी ना कभी तो जरुर ही किया होगा| पपीता को आप सब्जी और फल दोनों बोल सकते है| पपीता जब कच्चा होता है तो इसे लोग सब्जी बनाकर खाते है| वहीँ जब पपीता पाक जाता है तब इसे फल के रूप में खाया जाता है| आपको शायद पता ना हो तो मैं आपको बता दू की पके पपीता में सभी फलो से ज्यादा गुण पाए जाते है| इसलिए अगर आप नियमित रूप से पपीते का सेवन करते है तो आपका शरीर कई बीमारियों से दूर ही रहता है|
◾ पपीता बालों और त्वचा के लिए भी अच्छा होता है. पपीते का उपयोग उपयोग सलाद के रूप में भी किया जाता है। तो आइए पपीता के क्या-क्या फायदे हैं और इसका उपयोग किस-किस तरह से किया जा सकता है। पपीता केवल फल नहीं है यह एक दवाई भी है क्योंकि यह पेट से दिल तक स्वस्थ्य लाभ पहुंचता है। पपीता एक ऐसा फल है, जो कच्चा और पका हुआ दोनों ही रूप में खाया जाता है। सबसे अच्छी बात यह है पपीते में कई तरह के विटामिन मिलते हैं, नियमित रूप से खाने से शरीर में कभी विटामिन्स की कमी नहीं होती। बीमार व्यक्ति के लिए भी यह बहुत फायदेमंद होता है। यह आसानी से अवशोषित होकर शारीर को काफी फायदा पहुचता है। पपीते में पपेन नामक पदार्थ पाया जाता है जो मांसाहार गलाने के काम आता है। भोजन पचाने में भी यह अत्यंत सहायक होता है।
◾ पपीता आसानी से हजम होने वाला फल है। पपीता भूख व शक्ति को बढ़ाता है। यह प्लीहा (तिल्ली), यकृत (लीवर), पांडु (पीलिया) आदि रोग को समाप्त करता है। पेट के रोगों को दूर करने के लिए पपीते का सेवन करना लाभकारी होता है। पपीते के सेवन से पाचनतंत्र ठीक होता है। पपीते का रस अरूचि, अनिद्रा (नींद का न आना), सिर दर्द, कब्ज व आंवदस्त आदि रोगों को ठीक करता है। पपीते का रस सेवन करने से अम्लपित्त (खट्टी डकारें) बंद हो जाती है। पपीता पेट रोग, हृदय रोग , आंतों की कमजोरी आदि को दूर करता है। पके या कच्चे पपीते की सब्जी बनाकर खाना पेट के लिए लाभकारी होता है। पपीते के पत्तों के उपयोग से उच्च रक्तचाप में लाभ होता है और हृदय की धड़कन नियमित होती है।
◾पपीते के पत्ते के फ़ायदे ◾
1. डेंगू :- डेंगू के उपचार के लिए पपीते के पत्तों का रस रामबाण की तरह कार्य करता है. पपीते के पत्तों का रस ब्लड में प्लेटलेट्स और आरबीसी को बढ़ाता है। जिससे ब्लड सर्कुलेशन में तेजी से सुधार होता है।
2. कैंसर :- कैंसर की रोकथाम में पपीते का पत्ता लाभदायक होता है। पपीते के पत्तों में एंटी ट्यूमर गुण पाए जाते हैं. जो ट्यूमर को बढ़ने से रोकने में सहायक होते हैं. पपीते के पत्तों का रस सर्वाइकल कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर और फेफड़ों के कैंसर को होने से रोकते हैं।
3. कब्ज :- पपीते के पत्तों का रस कब्ज दूर करने में भी लाभकारी साबित होता है। क्योंकि यह एक लैक्सेटिव के रूप में भी जाना जाता है. लैक्सेटिव कब्ज की समस्या को दूर करता है।
4. लीवर, किडनी और हार्ट :- पपीते के पत्तों का रस शरीर की इम्युनिटी सिस्टम को मजबूत करते हैं। पपीते के पत्तों में एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं. जो ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने और लीवर, किडनी और हार्ट को सही रखने में सहायक होते हैं। साथ ही यह हमारे हार्ट को भी स्वस्थ बनाए रखता है।
◾पके पपीते खाने के फायदे ◾
🔹माता-बहनो के लिए : पीरियड के दौरान महिलाओं को पपीते का सेवन जरुर करना चाहिए| पपीते में पाए जाने वाला गुण मासिक चक्र को बनाए रखता है साथ ही उस दौरान होने वाले पेट दर्द को कम करने में मदद करता है|
🔹 आँखों की रौशनी :- पके पपीते में विटामिन ए और सी भरपूर मात्रा में मौजदू होती है| जिसका सेवन रोजाना 10 दिनों तक करने से आँखों की रौशनी बढती है साथ ही बढती उम्र के साथ होने वाली बीमारियों से भी बचाए रखता है|
🔹मोटापा :- अगर आपका वजन काफी ज्यादा है और आप अपने वजन को घटाना चाहते है| तो अपने डाईट में पके पपीते को जरुर शामिल करे| सिर्फ 10 दिनो तक लगातार पके पपीते खाने से आपको अपने शरीर में फर्क दिखना शुरू हो जाएगा|
🔹 दिल की बीमारी- : पपीते में एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन ए, सी और इ पाया जाता है। इस ऑक्सीडेंट से शारीर में कोलेस्ट्रॉल नहीं जम पाता, जिससे वजह से दिल की बीमारी नहीं होती। इसके अलावा इसमें फाइबर होते हैं जो कोलेस्ट्रॉल को खून में कंट्रोल कर
गायत्री मंत्र विज्ञान
|| ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥
वेद कहते हैं गायत्री मंत्र का जप करने से जपकर्ता शुद्ध हो जाता है। गायत्री मंत्र सुनने से श्रोता शुद्ध हो जाता है।
गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मंडल के बासठवें (62) सूत मैं मौजूद दसवा श्लोक है ये हजारो वर्ष पुराना वैदिक मंत्र है जिसकी रचना त्रेतायुग मैं ऋषि विश्वामित्र ने की थी।
गायत्री=गायन्ताम् त्रायते इति गायत्री (वह जो अपने गायक की रक्षा करती है)। इसे यहां पारंपरिक रूप से गायन के रूप में संदर्भित किया जाता है क्योंकि इसमें लय होती है। प्रभावी रूप से, गायत्री एक ऐसी चीज है जो उन लोगों की रक्षा करती है जो इसमें बह जाना चाहते हैं।
यदि कोई गायत्री मंत्र का जाप करता है तो भगवान कृष्ण वहां उपस्थित होते हैं क्योंकि यह सभी मंत्रों का राजा है और भगवान स्वयं इस मंत्र में निवास करते हैं।
"श्री कृष्ण कहते हैं: सामवेद के मंत्रों में मैं बृहत्-साम हूं, और सभी मंत्रों में मैं गायत्री मंत्र हूं।''
(गीता अध्याय 10.35)
गायत्री मंत्र हिंदू धर्म के सभी चार वेदों में पाया जाता है। भगवान का आह्वान किया गया है इस मंत्र में सावित्र है, इसलिए इस मंत्र को सावित्री मंत्र भी कहा जाता है
यह भी माना जाता है कि गायत्री मंत्र में 24 अक्षर मानव शरीर में 24 विशिष्ट नोडल केंद्रों से संबंधित हैं, जो सही जप करने पर संबंधित स्थानों पर ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। गायत्री मंत्र व्यक्ति को सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करने की अनुमति देता है, जो मानव जाति के लिए उपलब्ध दिव्य ऊर्जा का सबसे शक्तिशाली और सार्वभौमिक रूप है।
यह पहला मंत्र भी है जो किसी व्यक्ति को उसके उपनयन संस्कार के दौरान उसके पिता द्वारा आत्मसात किया जाता है और व्यक्ति के आध्यात्मिक उत्थान के लिए मंच तैयार करता है। यह भी महत्वपूर्ण है कि जब तक कोई व्यक्ति गायत्री मंत्र के जाप सहित अपना संध्यावंदन नहीं करता है, तब तक उसे अपनी दैनिक पूजा और गृहस्थ आश्रम से संबंधित अन्य सभी अनुष्ठान नहीं करने चाहिए।
यह जानना भी बहुत दिलचस्प है कि गायत्री मंत्र 3 पंक्तियों से बना है, जिनमें से प्रत्येक 3 वेदों (ऋग, यजुर और साम (अथर्वण वेद को यहां वेदों का अभिन्न अंग नहीं माना जाता है)) को दर्शाता है। यहां प्रत्येक पंक्ति को संबंधित वेद का सार माना जाता है और देवी गायत्री को वेदमाता, महान दिव्य ज्ञान का स्रोत माना जाता है।
गायत्री मंत्र ओम (प्रणव/मूल मंत्र) का एक और संक्षिप्त रूप है। जब आप गायत्री मंत्र का उच्चारण करते हैं, तो प्रणव मंत्र के दुष्प्रभाव (शुद्धिकरण) से अधिकतर बचा जाता है, ताकि लाभ लंबे समय तक अनुभव किया जा सके।
गायत्री के तीन भाग माने जा सकते हैं -
(i) आराधना (ii) ध्यान (iii) प्रार्थना।
सबसे पहले ईश्वर की स्तुति की जाती है, फिर उसका ध्यान किया जाता है और अंत में ईश्वर से बुद्धि को जागृत और मजबूत करने की अपील की जाती है।
गायत्री को सभी छंदों की माता माना जाता है (गायत्री छंदसम मते)। यह सभी मंत्रों में सबसे सार्वभौमिक भी है जहां मनुष्य सर्वोच्च भगवान से "हमारे विचारों को रोशन करने" (धियोयोनहा प्रचोदयात्) के लिए ज्ञान मांगता है।
गायत्री मंत्र", दुनिया का सबसे शक्तिशाली भजन है।
डॉ. हॉवर्ड स्टिंगरिल , एक अमेरिकी वैज्ञानिक, ने दुनिया भर से मंत्र, भजन और आह्वान एकत्र किए और अपनी फिजियोलॉजी प्रयोगशाला में उनकी ताकत का परीक्षण किया।
हिंदू के गायत्री मंत्र ने 110,000 ध्वनि तरंगें/सेकंड उत्पन्न कीं...
यह सर्वोच्च था और विश्व का सबसे शक्तिशाली भजन पाया गया।
एक विशेष आवृत्ति की ध्वनि या ध्वनि तरंगों के संयोजन के माध्यम से, यह मंत्र विशिष्ट आध्यात्मिक क्षमताओं को विकसित करने में सक्षम होने का दावा किया जाता है।
हैम्बर्ग विश्वविद्यालय ने सृजन के मानसिक और भौतिक स्तर पर गायत्री मंत्र की प्रभावकारिता पर शोध शुरू किया...
गायत्री मंत्र पिछले दो वर्षों से रेडियो पारामारिबो, सूरीनाम, दक्षिण अमेरिका में और पिछले छह महीनों से एम्स्टर्डम, हॉलैंड में प्रतिदिन शाम 7 बजे से 15 मिनट के लिए प्रसारित किया जाता है।
गायत्री मंत्र के प्रत्येक शब्द की व्याख्या ( Hindi) –
ॐ = प्रणव
भूर = मनुष्य को प्राण प्रदाण करने वाला
भुवः = दुख़ों का नाश करने वाला
स्वः = सुख़ प्रदाण करने वाला
तत = वह
सवितुर = सूर्य की भांति उज्जवल
वरेणयं = सबसे उत्तम
भर्गो- = कर्मों का उद्धार करने वाला
देवस्य- = प्रभु
धीमहि- = आत्म चिंतन के योग्य (ध्यान)
धियो = बुद्धि
यो = जो
नः = हमारी
प्रचो- दयात् = हमें शक्ति दें (प्रार्थना)
देवाधिदेव भगवान शिव रहस्यम
𝐵𝗵𝗶𝗻𝗱𝘂 𝘀𝗵𝗼𝘂𝗹𝗱 𝗸𝗻𝗼𝘄 𝘁𝗵𝗶𝘀 𝗯𝗮𝘀𝗶𝗰 𝗶𝗻𝗳𝗼𝗿𝗺𝗮𝘁𝗶𝗼𝗻 .....
#𝘁𝗵𝗿𝗲𝗮𝗱
भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है।
*🔱1. आदिनाथ शिव : -सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें 'आदिदेव' भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम 'आदिश' भी है।
*🔱2. शिव के अस्त्र-शस्त्र : - शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।
*🔱3. भगवान शिव का नाग : -शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।
*🔱4. शिव की अर्द्धांगिनी : -शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।
*🔱5. शिव के पुत्र : -शिव के प्रमुख पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, अयप्पा सभी के जन्म की कथा रोचक है।
*🔱6. शिव के शिष्य : -शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।
*🔱7. शिव के गण : -शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है।
*🔱8. शिव पंचायत : -भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।
*🔱9. शिव के द्वारपाल : -नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।
*🔱10. शिव पार्षद : - जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।
*🔱11. सभी धर्मों का केंद्र शिव : -शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिव के शिष्यों से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में विभक्त हो गई।
*🔱12. बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय : -* ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।
*🔱13. देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव : -भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को
बिना डॉक्टर के पर्चे द्वारा मिलने वाली आयुर्वेदिक दवा है, जो मुख्यतः हृदय रोग के इलाज के लिए उपयोग किया जाता है। इसके अलावा Arjunarishta का उपयोग कुछ दूसरी समस्याओं के लिए भी किया जा सकता है।