तुम विकास पर विकास करते जा रहे हो। तुम्हारे शत्रु एक के बाद एक टूलकिट पर टूलकिट के प्रयोग करते चले जा रहे है।
अभी समय है विकाश पुरुष संभल जाओ या खुल के खेलो अपने शत्रु के साथ उसकी भाषा में करारा प्रतिउत्तर देने का साहस करो।
हमारा क्या है एक बार और अठारह सौ सत्तावन फिर सही ?