I sincerely request the concerned authorities to kindly consider providing an alternative date for the KVS/NVS Tier-2 exam to ensure a fair opportunity for all aspirants. 🙏
@cbseindia29@EduMinOfIndia@dpradhanbjp
@cbseindia29 KVS/NVS Tier-2 exam is scheduled on 29 March 2026, the same day as the UPPSC Mains examination conducted by Uttar Pradesh Public Service Commission. This date clash is creating serious difficulty for candidates who have qualified for both exams.
@EduMinOfIndia
> Teacher was so GOAT that people are still watching his 7-year-old Geography lectures.
> Even though he’s no more, his content is still relevant
>A teaching style no one has been able to match
>Humble, grounded, and truly learned
A real GOAT in the world of UPSC teaching. 🙏
- 4th innings of a Test.
- Survived 2 new balls.
- Batted for 163 overs.
- 72/4 once.
- No.6 scored 200.
- Hope scored 💯.
- No.8 Roach at 37 age batted for 233 balls.
- 7th wicket stand faced 409 balls.
THIS EFFORT OF WEST INDIES SHOULD BE WRITTEN IN GOLDEN LETTERS…!!!
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As a gratitude, we are doing this give away of books worth ₹4,500.
Giving away 10 sets of UPSC PYQ booklets to 10 students for free.
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For #UPSC and State PCS aspirants😍😍
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Result: Next Sunday 28th September
शुक्रिया टीम इंडिया!
किसी रिश्ते में अगर आप अपना सब कुछ दें और फिर भी सामने वाला छोड़कर चला जाए, तो आप बिखर जाते हैं। यह क्रिकेट सीरीज़ भारतीय टीम के लिए वैसी हो सकती थी। टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा शतक हमने लगाए, एक सीरीज़ में सबसे ज़्यादा रन का रिकॉर्ड बनाया। यह पहली सीरीज़ थी जिसमें ��मने 7 बार साढ़े तीन सौ का स्कोर बनाया। टॉप 5 रन स्कोरर में से चार भारतीय थे। सबसे ज़्यादा विकेट भी भारतीय गेंदबाज़ ने लिए।
इसके बावजूद अगर भारत ओवल टेस्ट हारकर सीरीज़ 1-3 से हार जाता, तो इस दर्द को भारतीय फैन बर्दाश्त नहीं कर पाते। खिलाड़ियों के मारे शतक और बनाए गए रिकॉर्ड के कोई मायने नहीं रह जाते। और अगर गलती से इस सीरीज़ का कोई मैच सामने आ भी जाता, तो सिर्फ़ दर्द ही होता। लेकिन सिर्फ़ इस एक जीत ���े पूरे मुल्क को जीवनभर के सदमे से बचा लिया। फिर चाहे पाँच सेशन खेलकर चौथा टेस्ट बचाना हो या फिर आखिरी टेस्ट में 50 रन के अंदर छह विकेट लेकर हार के जबड़े से जीत निकाल लाना—ये ऐसे लम्हे हैं जिन्हें हर भारतीय ताउम्र याद रखेगा।
आप चाहें इंजीनियर हों, डॉक्टर हों, लेखक हों या साइंटिस्ट—हर इंसान के अंदर एक खेल प्रेमी भी होता है। जब उसकी टीम जीतती है, तो उसके साथ वह भी जीतता है। वो जीत सिर्फ़ टीम की नहीं होती, वो उस खेल प्रेमी की भी निजी उपलब्धि होती है। ऐसी निजी उपलब्धि, जिस पर न उसे कोई मेडल मिलेगा, न पैसा, मगर वो जीत उसे उतना ही fulfilled महसूस कराएगी, जैसे ऑफिस में मिली प्रमोशन या उसके काम की तारीफ़।
खेल प्रेमी होना एकतरफा प्यार में पड़ने जैसा है—जहाँ आप अपना सब कुछ देत�� हैं, लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि आपकी loyalty को क्या रिवॉर्ड मिलेगा। मगर जब वो रिवॉर्ड ओवल जैसी जीत के रूप में मिलता है, तो लगता है, इश्क़ सफल हो गया। शुक्रिया भारतीय टीम, हमारे प्यार की लाज रखने के लिए।
#INDvsENGTest
अमेरिकी धौंस और सीज़फायर के सबक!
मुझे लगता है भा��त को लेकर दुनिया की समझ अभी भी बहुत कम है। वो अभी भी भारत को एक ग़रीब, chaotic और अराजक देश मानते हैं। एक ऐसा देश जहां का पढ़ा-लिखा आदमी वहां रुकना नहीं चाहता। ये बात काफ़ी हद तक ठीक भी है। लेकिन इसी भारत के अंदर एक ऐसा भारत भी है जिसे जब मौक़ा मिलता है तो वो पूरी दुनिया को चौंका देता है।
तभी तो जब भारत का मंगल मिशन कामयाब होता है तो वो न्यूयॉर्क टाइम्स जैसा अख़बार हाथ में गाय लिए आदमी को एलीट क्लब में दाख़िल होता दिखाता है। हाथ में गाय लिया आदमी उनकी नज़र में भारत की हक़ीक़त थी लेकिन उस आदमी का मंगल मिशन पूरा कर लेना, एक ऐसी हक़ीक़त थी जो भारत को लेकर उनकी सोच से मैच नहीं खाती थी�� इसलिए न्यूयॉर्क टाइम्स उसे भारत का Slumdog Moment मानकर एक तरह से उसका मज़ाक उड़ाता है।
ये कहने में मुझे कोई हर्ज़ नहीं है कि ऑपरेशन सिंदूर के ज़रिए भारत ने पिछले एक हफ़्ते में जो किया है, उससे बाक़ी दुनिया के ईगो को ऐसी ही चोट लगी है। 60 के दशक तक अमेरिका से अनाज तक उधार माँगने वाला मुल्क, 90-दो हज़ार के दशक में हर आतंकी हमले के बाद शिकायती बच्चे की तरह अमेरिका के पास रोने वाला भारत आज अमेरिका और इज़राइली आर्मी की सटीकता और साहस के साथ दुश्मन को उसके घर में घुसकर मार रहा है, ये उसे बर्दाश्त नहीं हो रहा। न उससे भारत का ये आत्मसम्मान बर्दाश्त हो रहा है और न ही भारत की ये सैन्य क़ाबिलियत।
तभी आप देखेंगे कि ज़्यादातर अमेरिकी और वेस्टर्न मीडिया भारत के ऑपरेशन सिंदूर में भारत की सैन्य ताक़त को acknowledge करने में बहुत हिचकिचा रहा है। भारत-पाक के सीज़फायर पर ट्रंप जैसा शख़्स बहुत बदतमीज़ीपूर्�� ट्वीट करता है। वो भारत और पाकिस्तान को समझाइश देते हुए उस टोन में बोलता है जैसे दोनों देशों की हैसियत एक जैसी हो।
अमेरिका भी जानता है ऐसा नहीं है। लेकिन ऐसा करके वो भारत को उसकी जगह दिखाना चाहता है। उसे ये बर्दाश्त नहीं कि रूस-यूक्रेन युद्ध में वो भारत को सस्ता रूसी तेल ख़रीदने से रोक नहीं पाया, उसे बर्दाश्त नहीं कि भारत ने राफेल के बजाय उसके एफ-35 विमान क्यों नहीं ख़रीदे, उसे ये बर्दाश्त नहीं कि भारत पाकिस्तान की तरह कभी उसका ��िछलग्गू नहीं बना।
इसलिए भारत-पाकिस्तान युद्ध में जब ऐसी स्थिति आई कि पाकिस्तान बर्बादी की कगार के बहुत नज़दीक था, तो उसने बीच-बचाव करके पाक को बचा लिया। वैसे भी पाकिस्तान उसकी नज़र में वो बेग़ैरत गुंडा है जिसे थोड़े-बहुत पैसे देकर वो चालीस सालों से अपने फायदे के लिए गुंडई करवाता रहा है, तो उसको तो वो वैसे भी बचाएगा ही। इसलिए कोई कितना भी इंकार करे लेकिन ये सच है कि अमेरिका की जो हैसियत है वो भारत पर युद्ध रोकने का दबाव बना सकता है। ये हुआ भी है और ये हर भारतीय की पीड़ा भी है।
दोस्तों, एक बात आम तौर पर कही जाती है कि आज़ादी का मतलब होता है आर्थिक आज़ादी। क्योंकि जब तक आपके पास पैसा नहीं है तब तक आपकी उस आज़ादी के भी कोई मायने नहीं हैं। ठीक यही बात मुल्कों पर भी लागू होती है। आपकी हर तरह की हैसियत, ताक़त, आपकी राष्ट्रीय सुरक्षा इस चीज़ से तय होती है कि आप कितनी बड़ी आर्थिक ताक़त हैं। और ज�� मैं आर्थिक ताकत की बात करता हूं तो किसी मुल्क की Purchasing Economy की बात नहीं कर रहा। उसके बड़े बाज़ार की ताकत नहीं, उसके बेचने की ताकत।
और आप जब उतनी बड़ी ताक़त हो जाते हैं तो दुनिया इस बात की परवाह नहीं करती कि हांगकांग में लोकतंत्र के लिए किस तरह के आंदोलन हो रहे हैं, ताइवान के लोग क्या चाहते हैं, सऊदी में औरतों को कैसे अधिकार हासिल हैं या इज़राइल अपने बदले की कार्रवाई में ग़ाज़ा में कहाँ तक चला गया है।
और जब आप नहीं होते हैं तो एक ताक़तवर मुल्क का राष्ट्रपति आपसे पहले दुनिया को ये बता देता है कि उसने आपकी war रुकवा दी है। वो एक सांस में आपके देश की तुलना एक आतंकी देश से कर देता है। इस सबसे सबक यही है कि हमें अपनी आर्थिक हैसियत बढ़ानी होगी। वो हैसियत बिना विज्ञान और तकनीक में निवेश किए नहीं बन सकती। वो हैसियत मुफ़्तख़ोरी की राजनीति रोके बिना नहीं बन सकती। वो हैसियत असल मुद्दों पर राजनीति किए बिना नहीं बन सकती। और सबसे बड़ी बात वो हैसियत बिना लोग��ं की quality of life पर ध्यान दिए नहीं बन सकती।
वरना एक वक़्त के बाद न आपका मध्यवर्�� यहाँ रुकेगा और न ही बाक़ी दुनिया के लोग यहाँ बसने या रहने आएँगे। और जब तक दुनिया के लोग बड़ी तादाद में आपके यहां घूमने, रहने, काम करने नहीं आएँगे तब तक वो दूर-दूर से आपको लेकर एक हवाई छवि ही बनाते रहेंगे। और जब तक वो दूर दूर से आपके बारे में छवि बनाएंगे तब तक मंगल मिशन पर गाय और एलिट क्लब जैसे भद्दे कार्टून बनते रहेंगे।
इसलिए देश पर ध्यान दीजिए, उसकी तरक़्क़ी और तेज़ करने पर ध्यान दीजिए, क्वालिट��� ऑफ लाइफ पर ध्यान दीजिए, innovation पर ध्यान दीजिए। इन सब चीज़ों पर ध्यान दिया भी जा रहा है लेकिन अपने विकास को उस हद तक ले जाने की ज़रूरत है जहां हमारी संप्रभुता और लड़ाइयां किसी और की रज़ामंदी की मोहताज न हो।
-Neeraj Badhwar
सीज़फायर: गलतियों से कब सबक लेंगे हम?
पाकिस्तान ने इसलिए सीज़फायर नहीं किया क्योंकि वो शांति चाहता है। वो इसलिए माना क्योंकि उसे पता था कि वो एक भी दिन और लड़ नहीं सकता था। उसने सीज़फायर करके आपके खिलाफ दोबारा लड़ने के लिए मोहलत ले ली है। जिस तरह 71 में माफ कर देने के बाद वो 98 में न्यूक्लियर बम की ब्लैकमेलिंग ले आया था। फिर अगले 20 सालों तक हमने इस ब्लैकमेलिंग में आकर अपने सैकड़ों ह��़ारों लोगों की जान गंवाई। उसी तरह वो आपको सताने के लिए फिर कोई नया हथियार बनाएगा। आप फिर उसके उस हथियार के सामने खुद को मजबूर पाएंगे और अपने हज़ारों लोगों को मरता देखते रहेंगे।
कश्मीरी एक्टिविस्ट सुशील पंडित जी ने धारा 370 हटने के बाद भी कश्मीर में पंडितों के कश्मीर न लौटने पर कहा था, सरकारों की दिलचस्पी दरअसल समस्याओं को resolve करने में नहीं, उन्हें manage करने में होती है।
उन्होंने विस्तार से बताया था कि किस तरह पंडितों को कश्मीर में बसाने के लिए अगर दस चीज़ें ज़रूरी हैं तो उसमें धारा 370 का हटना एक चीज़ है। लेकिन बाकी 9 का क्या हुआ। वो वहां बसे या नहीं... नहीं बसे ��ो क्यों नहीं। इसकी किसी को परवाह नहीं।
मेरा भी मानना है कि कश्मीर में टूरिस्टों की संख्या दिखाकर कश्मीर में जिन सामान्य हालात का दावा किया जाता है वो भी एक managed शांति है। आप एक बार पंडितों को बसाने की कोशिश कीजिए उस शांति की पोल आधे दिन में खुल जाएगी। और उन्हें बसाने की कोशिश कर सरकार शांति के उस भ्रम को तोड़ना नहीं चाहती। मतलब आप समस्या की आंख में आंख डालकर उसे address नहीं कर रहे। उसे सुलझाने की इ���्छाशक्ति नहीं दिखा रहे। बस उस हद तक जा रहे हैं जहां लगे कि समस्या manage हो गई है।
हम POK ले लेंगे, हम पाकिस्तान को सबक सिखाएंगे... सुनने में अच्छा लगता है। आपके वोटर्स में जोश भी भरता है। पहले के लोग तो आतंकी हमलों के बाद कुछ भी नहीं करते थे, हमने देखो कितना कर दिया ये भी अच्छा लगता है। पहले वालों की अकर्मण्यता ने आपको खुद को बेहतर बताने का मौका दे दिया, ये भी आपके लिए अच्छा है।
मगर एक हज़ार साल के इतिह���स से सबक न लेकर अगर आप भी वो गलती करें जो आज तक बाकी करते आए हैं, तो कहानी बदलने वाली नहीं है। आप भी समस्या को manage कर रहे हैं, उसे resolve नहीं कर रहे। पहलगाम के बाद भारत-पाकिस्तान में शुरू हुआ तनाव अगर इसी सीज़फायर पर ख़त्म हो जाता है, तो ये भारत की ऐतिहासिक चूक होगी। ऐसी चूक जिसका पछतावा शायद सदियों तक बना रहेगा।
-Neeraj badhwar
ये युद्ध क्यों ज़रूरी है
मुझे लगता है कि जो भी लोग इस वक्त De escalate करने की बात कर रहे हैं वो न तो भारत पाकिस्तान की समस्या को समझते हैं, न ही राष्ट्रीय सुरक्षा को और न ही ये जानते हैं कि राष्ट्र बनते कैसे हैं। पहलगाम के बाद अगर भारत ने पाकिस्तान पर स्ट्राइक इसलिए की थी कि उसे इससे सबक मिल जाएगा, तो यक़ीन मानिए उसे ये सबक मिला नहीं है। बल्कि तीन दिन में उसकी जो फजीहत हुई है उससे पाक फौज, इस्लामिक आतंकी और भारत में बैठे इनके स्लीपर सेल्�� और ज़्यादा फ्रस्ट्रेट हो गए हैं।
अगर भारत ने इस लड़ाई को यहीं पर रोक दिया तो यक़ीन मानिए कश्मीर से लेकर पूरे भारत में हालात और ख़राब हो जाएंगे। पाकिस्तान इस दिन में हुई फजीहत से सबक लेते हुए खुद को और मज़बूत करेगा। और साल-छह महीने में भारत को फिर लगेगा कि उसे फिर कुछ बड़ा करना है। लेकिन छह महीने या साल बाद इस बात को रियलाइज़ करने का नुकसान ये है कि इस बीच आप फिर से अपने दर्जनों लोगों की जान गंव�� चुके होंगे। पाकिस्तान इस फजीहत से संभलकर अगली बार ज़्यादा तैयार होगा।
इसलिए ज़रूरी है कि अभी ऑपरेशन सिंदूर को कुछ दिन और चलाया जाए। नुकसान इतना किया जाए कि फिर पाकिस्तानी सेना और वहां की सियासत के पास उससे इंकार करने की गुंजाइश न हो। वो नुकसान इनको तोड़कर रख दे। वो नुकसान पाकिस्तानी सेना की पोल खोलकर रख दे। वो नुकसान पाकिस्तान से लेकर भारत में बैठे उसके हमदर्द का हौसला तोड़कर रख दे। अगर भारत इस पॉइंट पर रुक गया, तो मैं लिखकर देता हूं कि हम बहुत पछताएंगे।
दूसरी बात ये कि अगर किसी भी वजह से पाकिस्तान के साथ युद्ध के ये हालात पैदा हुए हैं तो भारतीय सेना भी अपनी ताकत ��रखने दीजिए। हम तीन तरफ से दुश्मनों से घिरे हुए हैं। आज पाकिस्तान से लड़ रहे हैं, कल को चीन भी उलझ सकता है, बांग्लादेश भी नॉर्थ ईस्ट को अलग करने की धमकी देता है। ऐसे में सेना के पास अपनी ताकत परखने का मौका आया है तो उसे परखने दीजिए। अगर ये लड़ाई कुछ दिन भी चलती है तो उससे आपको ये समझ आएगा कि आपकी कमज़ोरी क्या है, दुनिया को ये समझ आएगा कि आपकी ताकत क्या है।
चीन जैसे देश जब ये समझ जाएंगे कि उसके दिए हथियारों से पाकिस्तान भारत को नहीं रोक पाएगा, तो उसकी धौंस भी कम होगी। पाकिस्तान को अच्छे से सबक सिखाया तो बांग्लादेश तो वैसे ही सहम जाएगा। आपको भारत में तैयार किए हथियारों की ताकत समझ आएगी। लेकिन ये सब भी तभी होगा न जब आप पाकिस्तान की तरफ से थोपे गए इस युद्ध को कुछ दिन और लड़ेंगे।
अब फरीद ज़कारिया जैसे लोग ये तर्क दे रहे हैं कि भारत तो उभरती अर्थव्यवस्था है, पाकिस्तान के पास तो गंवाने को कुछ नह���ं है... भारत ने युद्ध लड़ा तो उसकी तरक्की पर ब्रेक लग जाएगा। अब इस बात में भी कोई दम नहीं है। क्योंकि जो भी देश तरक्की का रास्ता जान लेते हैं कुछ वक्त के युद्ध ��ी उनका रास्ता नहीं रोक सकते। ठीक वैसे ही जैसे अमीर आदमी किसी हादसे में अगर अपनी सारी दौलत गंवा भी बैठें ,तब भी वो बहुत जल्द फिर से अमीर बन जाते हैं। क्योंकि अमीर बनते कैसे हैं उन्हें उसका तरीका मालूम होता है।
जापान से लेकर यूरोप तक इसके उदाहरण हैं। दूसरे विश्वयुद्ध में बर्बाद होने के बाद भी वो कितनी जल्दी इससे उभर गए। इसलिए एक निरंकुश देश से ये सोचकर लड़ाई टालते रहने का कोई मतलब नहीं कि इससे ���में पैसों को नुकसान होगा।
वैसे भी ऐसी उभरती अर्थव्यवस्था का, दुनिया की चौथी आर्मी ताकत का, पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था होने का मतलब क्या है जब आप अपने से चौथाई ताकत वाले एक बदमाश देश को ज़िंदगी भर का सबक न सिखा सकें।
एक आखिरी बात, जिस तरह मुश्किल वक्त किसी भी इंसान का चरित्र बनाता है, उसी तरह अपनी संप्रभुता के लिए लड़े गए युद्ध राष्ट्रों के चरित्र बनाते हैं। उन्हें आत्मसम्मान से भरते हैं। जब लड़ना ज़रूरी हो तब संयम की बात करना आपको महान नहीं बुज़दिल बनाता है। फिर चाहे आप कितने भी महान क्यों �� हो, दुनिया आपको बुज़दिल मान लेती है। यही गलती भारत को लेकर भी बहुत सारे देश करते हैं, वक्त आ गया है उनकी सोच बदलने का, वक्त आ गया है अपने सब्र के बांध में खतरे की सीमा को बहुत नीचे लाने का। ज़ीरो टॉलरेंस का।
थोके गए युद्ध को अंजाम तक पहुंचाने का। चाणक्य ने कहा था कि किसी भी राज्य के सभी गुण तभी फलते-फूलते हैं जब पहले राजा अपने राज्य की रक्षा करता है। आर्थिक विकास और अंतरराष्ट्रीय छवि अपनी जगह, ल���किन पहले हमें अपने राज्य की रक्षा करनी होगी ताकि दोबारा किसी बच्चे के सामने कोई उसके पिता का धर्म पूछकर उसे गोली न मार सके।
-Neeraj badhwar
जिन लोगों को व्यापारियों, धन्नाढ़्य चौधरियों, कंपनियों की करोड़ों रुपये की फ़र्ज़ी लिस्ट चलाकर ख़ामख़ा की हवाबाज़ी करने में ख़ुशी मिल रही थी, वे स��जय चौकीदार के विनेश को दिये गये 100 रुपए के मान सम्मान का मतलब नहीं समझ सकते. वे कुंवर साहिब द्वारा विनेश को भेंट की गई तलवार का मतलब नहीं समझ सकते. वे गाँव के मज़दूरों द्वारा दिये गये पैसों और आशीर्वाद का मतलब नहीं समझ सकते.
विनेश कोई ट्रॉफ़ी नहीं है जिससे फ़र्ज़ी का पीआर किया जाए, फ़र्ज़ी हवाबाज़ी की जाए या जातीय घमंड किया जाए. मैं विनेश की उस यात्रा को अपने कई समझदार पत्रकार दोस्तों के साथ कव��� कर रहा था और सोशल मीडिया पर जो चल रहा था उसको भी देख रहा था. ग्राउंड पर विनेश के लिए हर जाति हर धर्म के लोग लुगाई आशीर्वाद दे रहे थे. लड़की को बहुत प्यार मिला है.
हमारे साथी नितिन शर्मा की इस रिपोर्ट को पढ़िए और लोगों की भावना समझिए. विनेश जिस मुल्क की बेटी है उसकी आबादी के 91 प्रतिशत लोग आज भी 25 हज़ार रुपए प्रति महीने से कम आजीविका कमाते हैं, इसलिए विनेश को करोड़ों रुपए देने की वह फ़र्ज़ी लिस्ट मु��े तो कम से कम परेशान कर रही थी. क्योंकि विनेश आम लोगों की बेटी है, पर यहाँ के धनाढ्य चौधरी और उनके तनखाई गुर्गे विनेश को एक ट्रॉफ़ी बनाने पर तुले हुए हैं.
जैसे हुड़दंगियों की एक भीड़ बहुसंख्यक (ज़्यादा गिनती के लोग) धर्म का नारा अल्पसंख्यक समुदाय को परेशान करने के लिए लगाती है ठीक वैसे ही दो तीन बड़ी जातियों (इस केस में जाट राजपूत बामन) के अतिउत्साहित और संकीर्ण मानसिकता के नौजवान सोशल मीडिया ��र आपस में खिजाने में लगे हुए हैं. यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि लड़ाई जुल्म के ख़िलाफ़ नहीं है बल्कि आपस में दो समुदायों के बीच में है.
दिनबंधु चौधरी छोटूराम ने कहा था कि इस धरती पर दो ही जातियाँ हैं, एक कमेरे और दूसरे लुटेरे.
जो मेहनत से कमाकर खाए वह कमेरे
जो कमेरे लोगों की मेहनत को लूटकर खाए वह लुटेरे
विनेश कमेरों की बेटी है, परंतु लुटेरों के नाम लिख करोड़ों की फ़र्ज़ी लिस्ट इसलिए वायरल ��रवाई गई ताकि वे फर्जी प���आर किया जा सके. सर्वश्रेष्ठ जाति का ख़िताब पाने के लिए बेताब लोग उसको ले उड़े और फिर कमेरों की एकता को धनाढ्यों के सस्ते पीआर ट्रिक पर क़ुर्बान कर दिया.
जात बड़ी नहीं होती है, ज़मात बड़ी होती है. यह गाँठ बाँध लीजिए. आपकी जाति के अमीर लोग ही आपके सबसे बड़े दुश्मन हैं. धनाढ्य चौधरी हों या महल मुनारों वाले राजपूत वे सभी अपने वर्ग हित (लूट जारी रखने) के लिए एक हैं. आम राजपूत और आम जाट का शोषण ही करेंग��. जाति को सर्वश्रेष्ठ घोषित करवाने के लिए जाति के नाम पर बनी सभाओं के नेता दलालों से ज़्यादा कुछ नहीं होते.
और जो ये राजा रुज़ा रहे हैं न चाहे कोई जाट राजा हो या राजपूत बामन या किस और जात का - सब फर्जी रहे हैं और किसी के भी सामने हग देते थे. इस देश की असली लड़ाइयाँ आम लोगों ने लड़ी हैं. आज़ादी की लड़ाई को याद करिए. आम घरों के लड़के (भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, बिसमिल, अश्फ़ाक) ही लड़े थे. सब राजे रजवाड़�� ��ो अंग्रेजों के लिये चाय बनाते थे.
इसलिए कमेरों को एकता रखनी चाहिए ताकि आपकी मेहनत की लूट न हो सके. किसानी, मज़दूरी, बेरोज़गारी, ग्रामीण संकट, महिला सुरक्षा, शिक्षा ये ऐसे मुद्दे हैं जिनके लिए कमेरों को लड़ना चाहिए. न की फर्जी जातीय गौरव के लिये एक दूसरे को खिजाना चाहिए. बल्कि ऐसे मौक़े तलाशने चाहिए जिससे भाईचारा बन सके.
आख़िरी में लिख रहा हूँ लड़ाई जुल्म के ख़िलाफ़ है, कमेरों की मेहनत की लूट के ख़िलाफ़ है. लड़ाई दो समुदायों के बीच नहीं है.
लुटेरे कोशिश करेंगे कि लोग आपस ही में लड़ते रहें और हमें बहाने और मौक़े ढूँढने हैं कमेरों की एकता बनाने की.
मत करो गरीबी का महिमामंडन!
पिछले दिनों पाकिस्तान के एथलीट अरशद नदीम ने जेवलिन थ्रो में गो��्ड मेडल जीता तो चारों तरफ उनकी खूब तारीफ हुई। एक इंडियन न्यूज़ चैनल में एंकर नदीम की तारीफ करते हुए कह रहे थे कि कैसे इतनी गरीबी और अभावों में रहे अरशद की कहानी हर किसी के लिए मिसाल है। हम उनसे सीख सकते हैं कि कैसे बिना अपने हालात का रोना रोए इंसान आगे बढ़ सकता है। अरशद ही नहीं, जब भी कोई इंसान गरीबी से उठकर कुछ बड़ा करता है तो हम उसे मिसाल बनाकर पेश करते हैं। मगर सच कहूं तो मेरी इस सोच से सख्त आपत्ति है। क्योंकि कोई भी इंसान कुछ करना चाहता है और उसे अपने सपने पूरे करने के लिए बुनियादी सुविधाएं तक न मिले तो ये कोई अच्छी बात नहीं है। इन अभावों के बावजूद कामयाब होने वाले आदमी की तारीफ करके आप उस इंसान को तो महान बनाकर उसका महिमामंडन कर सकते हैं मगर आप इस सच से मुंह नहीं मोड़ सकते कि अगर उसे बुनियादी सुविधाओं तक के लिए इतना संघर्ष करना पड़ा तो ये सिस्टम की नाकामी है।
अरशद नदीम से लेकर 12th fail के मनोज शर्मा के संघर्षों की कहानी बताते हुए हम अक्सर एक बात भूल जाते हैं कि किसी भी समाज में बदलाव अपवादों से नहीं आता बल्कि सिस्टम से आता है। दूसरा जब हम गरीब आदमी को मिसाल बनाकर बाकी गरीबों से ये कहते हैं कि बहाने मत बनाओ, तुम भी इससे सीखो तो ऐसा कह��े हम अभावों का ही सामान्यीकरण कर रहे होते हैं। सिस्टम को ही उसकी ज़िम्मेदारी से बचा रहे होते हैं और गरीब आदमी को इस अपराधबोध में डाल रहे होते हैं कि अगर वो सुविधाएं न मिलने की शिकायत करता है तो वो ही शिकायतीट्टू है वरना तो अरशद जैसे लोग भी तो कामयाब हो रहे हैं।
भाई, ओलिंपिक में मेडल जीतना ही अपने आप में बहुत बड़ी बात है। वो अपने आप में ही बहुत बड़ा संघर्ष है मगर उस मेडल जीतने की प्रोसेस में किसी इंसान के पास ओलिंपिक से तीन महीने पहले तक ढंग की जेवलिन भी न हो इसे कैसे जस्टिफाई किया जा सकता है। यूपीएससी क्लियर करना ही बहुत बड़ी बात है मगर इस क्रम में उसे अपनी फीस भरने के लिए एक आटा चक्की में काम करना पड़े, इसे कैसे ग्लोरिफाई किया जा सकता है। दिक्कत ये है कि जिस हम एक व्यक्ति का निजी संघर्ष बताकर उसे ग्लोरिफाई करते हैं वो एक व्यवस्था और समाज की सामूहिक शर्म होती है।
आज अगर 50 लाख की आबादी व��ला न्यूज़ीलैंड ओलिंपिक में 10 गोल्ड समेत 20 मेडल ला रहा है तो वो इसलिए नहीं क्योंकि उसके खिलाड़ी गरीबी क��� मिसालें कायम करके मैच जीत रहे हैं। अगर ढाई करोड़ वाला ऑस्ट्रेलिया ओलिंपिक में 18 गोल्ड समेत 50 मेडल जीत रहा है तो इसलिए नहीं क्योंकि अरशद की तरफ उसके खिलाड़ियों को घी के खाली डिब्बों में सीमेंट भरके उससे अपनी वेट ट्रेनिंग करनी पड़ी थी। आबादी में छोटे-छोटे देश भी ओलिंपिक में इतना कमाल इसलिए करते हैं क्योंकि खेल और खिलाड़ी उनकी प्राथमिकता में है। वो खेलों में आगे बढ़ने के लिए किसी तुक्के, किसी गरीबी की मिसाल या किसी Individual Brilliance पर निर्भर नहीं करते।
किसी भी देश में सफलताएं सिस्टम से निकलकर Individual Brilliance या किसी जीनियस के थ्रू आती हैं, वहां उस कामयाब आदमी को भगवान मान लिया जाता है। वो समाज कभी Achievement के साथ सहज ही नहीं हो पाता। क्योंकि बिना सिस्टम के उस समाज को कामयाबी देखने की आदत नहीं होती। उसे लगता है कि कामयाब हुआ ही नहीं जा सकता और जब कभी कोई अरशद नदीम सफल हो जाता है तो उसे लगता है कि ये तो खुदा है या भगवान है। तभी तो एक पेट कमिंस 50 ओवर का वर्ल्ड कप जीतने के बाद ऑस्ट्रेलिया पहुंचता है तो उस मुल्क ��ें कोई खास उत्तेजना पैदा नहीं होती और हिंदुस्तान टी ट्वेंटी वर्ल्ड कप जीत लेता है तो हम कई दिनों तक बौराए रहते हैं। क्योंकि हम Success देखने और सफल होने के आदी नहीं हैं। थोड़ा और गहरे में जाएं तो सिस्टम आपको सफलता का पैटर्न समझा देता है कि ऐसा करेंगे, इतने वक्त तक करेंगे इस तरह करेंगे तो सफल हो जाएँगे। Individual Brilliance एक तरह की मिस्ट्री के साथ आती है जिसमें कामयाब होने वाला आदमी ही जानता है कि जो उसने किया ���ो कैसे किया। अब जिस भी चीज़ में रहस्य है वो हमें चमत्कारी लगती है और हम चमत्कार करने वाले उस आदमी को भगवान मान लेते हैं।
एक और उदाहरण देकर मैं अपनी बात ख़त्म करूंगा। 2016 में "Lion" मूवी आई थी। जो एक ऐसे भारतीय बच्चे Saroo Brierley की सच्ची कहानी थी जो 5 साल की उम्र में एक भारतीय रेलवे स्टेशन पर अपने भाई से बिछड़ जाता है। उस वक्त वो बच्चा अपने परिवार के साथ बेहद बुरी हालत में एक झुग्गी में रह रहा ह��ता है। उन लोगों के पास खाने के पैसे नहीं होते और एक रोज़ वो अपने भाई के साथ काम पर गया होता है तभी 5 साल की उम्र में रेलवे स्टेशन पर बिछड़ जाता है। वहां से बच्चा एक ट्रेन में बैठकर कोलकाता जाता है, जहां एक आदमी उसे किसी को बेच देता है। वो बच्चा वहां से भी भाग जाता है। भागकर वो एक अनाथालय पहुंचता है। वहां भी उसको नर्क जैसी ज़िंदगी गुज़ारनी पड़ती है। फिर एक दिन एक ऑस्ट्रेलियाई कपल अनाथालय आता है और उस बच्चे को Adopt कर लेता है। ऑस्ट्रेलिया जाकर सरू को एक बेहतरीन ज़िंदगी मिलती है। मगर बड़े होने तक अपने परिवार की याद उसके ज़हन से नहीं जाती। इस बीच गूगल पर गूगल अर्थ फीचर आ जाता है। और वो उस फीचर का इस्तेमला करते हुए अपने गांव की धुंधली यादों का इस्तेमाल करते हुए ये पता लगा लेता है कि भारत में उसका घर कहां था। फिर वो भारत आता है और चमत्कार हो जाता है। उसने सच में उस जगह का सही पता लगा लिया था। उसकी म��ं अब भी ज़िंदा थी। उस वक्त इस ख़बर की पूरी दुनिया में चर्चा हुई। सरू ने बाद में इस पर किताब लिखी। हॉलीवुड में इस पर फिल्म भी बनी, जिसे 6 ऑस्कर पुरस्कारों के लिए नॉमिनेट किया गया।
ये घटना अपने आप में बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। सोचिए, देश के लाखों करोड़ों गरीबों की तरह सरू बेहद तंगहाली में मध्यप्रदेश के छोटे से गांव में रह रहा था। अगर उसके साथ ये हादसा न हुआ होता, तो बहुत मुमकिन है कि अपने बाकी परिवार की तरह वो कहीं मजदूरी कर रहा होता। आज भी गांव में गरीबी में जी रहा होता। मगर उसके साथ एक हादसा होता है। अपन�� किस्मत से वो ऑस्ट्रेलिया पहुंचता है। वहां उसको अच्छी एजुकेशन मिलती है। उस बच्चे के अंदर छिपी सारी संभावनाएं बाहर आ जाती हैं। वो ऑनलाइन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके वो कमाल कर लेता है जो लगभग असंभव था। उसमें इतनी Intelligence होती है कि वो अपनी कहानी को बेहतरीन तरीके से Articulate करके उस पर किताब लिखता है। वो किताब बेस्ट सेलर बनती है। उस पर हॉलीवुड की सुपरहिट फिल्म बनती है।
वो ये सब सिर्फ इसलिए नहीं कर पाया क्योंकि उसके साथ एक एक्सीडेंट हुआ। वो इसलिए कर पाया क्योंकि उसके अंदर संभावना थी। और जैसे ही उस संभावना को ��ौका मिला वो पूरी चमक के साथ निकलकर बाहर आ गई। अब आप सोचिए इस देश में कितने सरू हैं जिनके अंदर वैसी Intelligence, वैसी संभावना है। मगर एक बच्चे को ऐसा माहौल ही नहीं मिलेगा जिसमें उसे तीन टाइम रोटी खाने की परवाह न हो, रहने के लिए एक साफ-सुथरी जगह न हो, पढ़ने के लिए अच्छा स्कूल न हो, तो अपनी Intelligence वो आज़माएगा किस पर। सरू तो 5 साल में घर से गायब हो गया था। अगर वो 10 साल तक उसी परिवार में रहता तो उस माहौल में वो सारी संभावनाएं मारी जातीं और कुछ वक्त बाद वो खुद भूल जाता कि वो क्या कर सकता था या उसके अंदर क्या छिपा है।
सरू अगर ज़िंदगी में कुछ कर पाया तो इसलिए क्योंकि उसके साथ एक एक्सीडेंट हुआ। एक एक्सीडेंट हुआ और एक गरीब बच्चे की ज़िंदगी बदल गई। मगर समाज का बदलना एक एक्सीडेंट नहीं हो सकता। समाज सिस्टम से बदलता है। अरशद नदीम की सफलता किसी भी गरीब आदमी के कामयाब होने का सुखद एक्सीडेंट है। इससे उस गरीब की ज़िंदगी तो ज़रूर बदलेगी। वो गरीब जिस समाज में रह रहा है, वो भी ये सोचकर खुश हो जाएगा कि हमारे लड़के ने ये कर दिखाया मगर इससे उस समाज की गति पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इसीलिए मैंने शुरू में कहा कि संघर्ष के ऐसे किस्सों को मिसाल बताकर गरीब आदमी पर उससे सीखने की ज़िम्मेदारी मत लादिए। The Fountainhead और Atlas Shrugged जैसी मशहूर किताबें लिखने वाली महान राइटर Ayn Rand ने सालों पहले अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि गरीबी कोई बहुत अच्छी चीज़ नहीं है। गरीब होना कोई सुखद अहसास नहीं है। हम उस गरीबी से पार पाकर सफल हुए कुछ चुनिंदा लोगों को तो जानते हैं उनका महिमामंडन भी करते हैं मगर उस गरीबी की वजह से कितन�� संभावनाओं का क्तल हो जाता है इसका कोई हिसाब नहीं रखता।
Neeraj Badhwar
As I stand between the posts for the final time, my heart swells with gratitude and pride. This journey, from a young boy with a dream to the man defending India's honour, has been nothing short of extraordinary.
Today, I play my last match for India. Every save, every dive, every roar of the crowd will forever echo in my soul. Thank you, India, for believing in me, for standing by me. This is not the end, but the beginning of cherished memories.
Forever a custodian of dreams. Jai Hind 🇮🇳