बाहरी रौशनियाँ सांकेतिक है। मन के जो दिये बुझते जारहे हैं उन्हें इस दिवाली से फिर जलाना शुरू करें। तभी बाहरी जगमगाहट सार्थक होगी।
बाकी....
सबको दीपावली की ढेर सारी शुभकामनाएँ ✨
कुछ ऐसा fashion सा बन गया है की हम अपनी ही चीज़ों को, अपने इतिहास, परम्परा, अपने समाज का मज़ाक़ उड़ाएँ तो liberal और progressive माने जाते हैं। हम ख़ामियाँ ढूँढने में इतने मशगूल हो गए हैं की अपने देश की महानता भी अब नहीं देख पाते हैं।
यह एक बीमारी है और इस से बचना आवश्यक है।
कोई तो उठा दो, गिर गया हूँ मैं बीच रास्ते मे । कोई तो सम्भाल लो, फँस गया हूँ मैं बीच मझधार में
ये कोई न कोई नही होते, ये बस कोई ही होते हैं गिरे हम हैं तो उठना भी स्वयं होगा, डूबे हम हैं तो तैर कर वापस हमे ही आना होगा । लोग केवल प्रवचनिक मदद कर सकते हैं, वास्तव में नही..!