शिक्षा विभाग का पतन- शिक्षा मंत्री जी में ये निश्चय कर लिया है की शिक्षा विभाग में कुछ नहीं छोड़ा जाएगा पूरी तरीके से बर्बाद करके जाएँगे
न अच्छी बिल्डिंग है न एक भी योजना
विशेष- एक ढंग की भर्ती नहीं हुई अब शुरू कर रहे है विद्या सम्बल योजना के नाम से गेस्ट फैकल्टी लगाना (पूर्व सरकार में 15 दिन मेहनत करके कैंसल करवाने का कार्य किया था क्योकि सरकार सुनने वाली वार्ता करने वाली थी ) ।
गेस्ट फैकल्टी में भी कोई पारदर्शिता नहीं सब फ़र्ज़ीवाडे से मनमर्जी से बिना मॉनिटरिंग के केवल तीन दिन में प्रक्रिया पूरी की जा रही है
ऑफलाइन मोड पर किसी को हवा तक नहीं लगेगी हुआ क्या
लेकिन शिक्षा विभाग और चिकित्सा विभाग से उम्मीद करना ही बेकार है ।
इन सब पीड़ाओं का एक ही समाधान है आने वाले लोकल चुनाव में नोटा दबा देना लेकिन कमल मत दबा देना वरना रोने के अलावा कोई ऑप्शन नहीं है
तानाशाही और घमंड चरम पर इसलिए पतन जरूरी है
वन्दे मातरम्।
इस देश के 23 करोड़ मुसलमानों के लिए अल्लाह के सिवा किसी अन्य के समक्ष सर झुकाना हराम है। और ये तो भला आंबेडकर ही लिखकर गए हैं कि एक मुसलमान के लिए हमेशा मातृभूमि से ऊपर क़ुरान रहेगा। ये अलग बात है कि पैगम्बरीकरण के चक्कर में इस्लाम को लेकर कही गई उनकी बातों को भुला दिया गया है।
ख़ैर... मुसलमान 'वन्दे मातरम्' गाएँ या न गाएँ उनपर कार्रवाई होने पर कैसा आंदोलन होता है वो हम शाहीन बाग़ में देख चुके हैं, उसके बाद हिन्दुओं का जो नरसंहार हुआ वो भी हमने देखा। मुसलमानों के आंदोलन RHA जैसे नहीं होते, तभी उन्हें कई राजनीतिक दलों का समर्थन भी मिलता है।
सुजलां तो हमारा देश रहा ही नहीं। 271 नदियाँ प्रदूषित हैं, गंगा-यमुना का जब बुरा हाल है तो बाक़ी नदियों की तो बात ही छोड़ दीजिए। जहाँ तक सुफलां की बात है, 80.56 करोड़ लोग सरकारी खाद्यान्न पर निर्भर हैं। 36 करोड़ टन रिकॉर्ड बागवानी उत्पादन के बावजूद फल अधिकतर पेट तक पहुँच ही नहीं रहा इसका मतलब। मलयजशीतलां का क्या ही कहें, गर्मी 2024 में ही सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर चुकी है। हवा ज़हरीली है। दुनिया के शीर्ष-20 सबसे प्रदूषित शहरों में अकेले भारत के 13 शहर हैं। शस्यश्यामलां तो हम आज भी हैं, 35 करोड़ टन से अधिक के वार्षिक खाद्यान्न उत्पादन के साथ। लेकिन, आज भी इस धरती को शस्यश्यामलां रखने वाले लगभग दस हजार किसान हर साल आत्महत्या कर लेते हैं।
गर्मी, कंक्रीट और कृत्रिम प्रकाश से भरपूर रातें देखकर 'शुभ्र-ज्योत्स्ना-पुलकित-यामिनीम्' गाने का मन तो नहीं ही करेगा। वायु प्रदूषण ने चाँदनी का रंग ही बदल डाला है। फुल्लकुसुमित-द्रुमदलशोभिनीम्... पूर्वोत्तर और पश्चिमी भारत के वन हमारी जैव-विविधता की जान हैं, लेकिन वनों को सबसे अधिक क्षति इन्हीं इलाक़ों में पहुँची है। पहाड़ों तक में जंगल काटकर होटल और रिजॉर्ट बन रहे हैं। विदेश वाले हमें हैप्पीनेस इंडेक्स में 116वें नंबर पर रखते हैं, मैं इन चोचलों को नहीं मानता लेकिन भारत माँ को आज सुहासिनीं भी कैसे कह दूँ जब अवसादग्रस्त जीवन में फँसे लोगों को हँसने के लिए भी फूहड़ स्टैंडअप कॉमेडियनों का सहारा लेना पड़ रहा है। मेरी मातृभूमि सुमधुरभाषिणीम् तो है, लेकिन किसी एक टीवी डिबेट्स को देख लीजिए मधुर भाषणों का अंदाज़ा लग जाएगा। गालियाँ ही कंटेंट हैं, OTT से लेकर इंस्टाग्राम तक पर। हर साल पौने 2 लाख आत्महत्याएँ हो रही हैं, सुखदां की असलियत यही है।
माता वरदां हैं, फिर भी UN हमें मानव विकास के मामले में 130वें स्थान पर रखता है। कोटीकोटीकण्ठ-कलकल-निनाद-कराले... सप्तकोटी को अब कोटीकोटी पढ़ा जाता है, क्योंकि हम अब 7 करोड़ से 150 करोड़ हो चुके हैं। दुनिया में सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश हैं हम। कोटीकंठ चीख-चीखकर आरक्षण में सुधार की माँग भी कर रहे हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं। द्विसप्तकोटीभुजैर्धृत-खर-करवाले... यहाँ भी कोटीकोटी कर दीजिए। लेकिन, 57% महिलाओं और 67% बच्चों में रक्त की कमी है, भुजाएँ हैं लेकिन उनमें शक्ति नहीं है। बहुबलधारिणीं होने के बावजूद आतंकी आज भी ख़ून बहाते रहते हैं, उनपर वार हो रहे हैं लेकिन एक तरफ़ पाकिस्तान और दूसरी तरफ़ चीन कभी पुलवामा तो कभी गलवान करते रहता है।
नमामि तारिणीं... तारने वाले जो स्थल थे, अब बाजार बन गए हैं। ऋषिकेश नशेड़ियों का अड्डा है। लेजर लाइट-साउंड शो ही अध्यात्म है अब। रिपुदलवारिणीं... जहाँ भीतर ही गद्दार बैठे हों, वहाँ रिपु को बाहर खोजने की आवश्यकता ही क्या है। तुमि विद्या... हाँ! लेकिन, सरकारी अधिकारियों-नेताओं के बच्चे नहीं पढ़ते हैं सरकारी विद्यालयों में। तुमि धर्म, लेकिन अब साथ-साथ ज्योतिबा-आंबेडकर भी धर्मशिरोमणि हैं, वो भी पूजे जाते हैं। तुमि हृदि... हृदय में मातृभूमि तो है, लेकिन 30 लाख लोग हर साल इसी हृदय रोग से परलोक सिधार रहे। तुमि मर्म, लेकिन 40% संपत्ति यहाँ केवल 1% के पास है। हमारे अस्तित्व का मर्म भारत माता ही है, लेकिन भ्रष्टाचारी नेताओं-अधिकारियों के लिए ऐसा कुछ भी नहीं।
त्वं हि प्राणाः शरीरे... 45 लाख के प्राण तो हर साल असमय ही निकल जा रहे। बाहुते तुमि मा शक्ति... जहाँ एक-तिहाई से अधिक बच्चे सरकारी आँकड़ों में ही कुपोषित हैं, वहाँ क्या ही शक्ति की बात? हृदये तुमि मा भक्ति... भक्ति ऐसी है कि रामभक्तों के सबसे बड़े ग्रन्थ रामचरितमानस को खुलेआम जला दिया जाता है और वो व्यक्ति मजे से घूमता रहता है। भक्ति अब दलों की होती है, धर्म की नहीं। तोमारइ प्रतिमा गड़ि, मन्दिरे मन्दिरे... पुजारी बेचारे ऐसे ही छोड़ दिए जाते हैं, इमाम विदेश तक से फंडिंग पाते हैं। मंदिर-मंदिर में प्रतिमा तो है, लेकिन छोटे मंदिर बेहाल हैं और उनके पुजारी निर्धन। त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी, फिर भी महिलाओं के विरुद्ध अपराध के हर साल साढ़े 4 लाख मामला पंजीकृत होते हैं। कई तो पुलिस-प्रशासन तक पहुँच ही नहीं पाते।
कमला कमल-दलविहारिणी... कमल पर बैठी माँ लक्ष्मी आज भी व्यवस्था में बैठकर मलाई चाभ रहे लोगों के घरों में रह रही हैं। वाणी विद्यादायिनी... ग्रामीण भारत में 5वीं कक्षा के 30% छात्र साधारण भाग के सवाल हल नहीं कर सके थे। विद्या की आवश्यकता तो है, लेकिन मेरिट की जगह रिजर्वेशन से पात्रता तय होती है। नमामि त्वां... नमन ही बचता है अब, नमन करते-करते कचरों के ढेर पहाड़ बन रहे हैं। नमामि कमलाम्... कमल खिलने के लिए फ़िलहाल भारत का मौसम आदर्श है, बारिश में हर सड़क दलदल ही तो है। सिटीज 'स्मार्ट' हैं, उनकी सड़कें बदमाश। अमलाम् कैसे कहें देश को, जब 1.85 करोड़ टन खतरनाक कचरा हर साल खुले में छोड़ दिया जाता है। अतुलाम् तो हैं हम, सचमुच कहीं किसी से तुलना नहीं हो सकती। यूरोप का कोई गाँव घूमकर आ जाइए, पता चल जाएगा हमने अपने गाँवों को क्या बना दिया है। सचमुच, कोई तुलना ही नहीं है।
हमारी 29.77% भूमि क्षरण से प्रभावित है, फिर भी हम श्यामलां है। हर साल बाढ़ के बाद गाँव के गाँव कटते चले जाते हैं, कोई आता है और पैसा बाँटकर चला जाता है। सरलां तो भारत माता भी है और आम लोग भी, बस जीवन सरल नहीं रहा। स्वच्छ जल से लेकर स्वच्छ हवा तक के लिए जहाँ संघर्ष करना पड़े, वहाँ कैसा सरल जीवन!
हमारा देश सुस्मितां तो है, लेकिन ये मुस्कान अरबों की इमारतों में करोड़ों के डब्बे जैसे फ्लैट्स में रह रहे लोगों के चेहरों पर भी नहीं मिलती। हमारी भूमि भूषिताम् है, इतनी सजी-सँवरी कि एक बारिश सालभर का विकास क्षणभर में बहाकर ले जाती है। ये धरणीं भी है, आज भी हमें धारण कर रही हैं - हमारे डेढ़ सौ करोड़ होने के बावजूद। भरणीं भी है, फिर भी 17 करोड़ लोग पर्याप्त पोषण से वंचित हैं।
मातरम्, वन्दे मातरम्।
@AnupamNawada देख भाई...ठीक है उन्होंने बीजेपी को ही target किया... जो कि उनकी एक गलती है...पर स्कूल की हालत क्या है... यह बात तो एकदम सही है... मैं राजस्थान से हु...मुझे मेरे गांव की हालत पता है..ये sale bhadwe सब चोर है..!
@madandilawar ठीक है... यह इतना लंबा लिख रहे हो...तो उसके पहले में आपको चुनौती देता हु...आप मेरे गांव के सरकारी स्कूल का दौरा कर लीजिए... अरे नहीं करेंगे आप लोग...आप बीजेपी, कांग्रेस वाले सब के सब chutiya है...जनता को बस chutiya बनाया है तुमने और कुछ नहीं..!
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Jinks, congratulations on a great career, buddy. You’ve done wonders for Indian cricket, and you can be very proud of your journey. The safest pair of hands in the slips and my favourite Test batting partner. Wishing you well always. God bless. 🤝🇮🇳
@ajinkyarahane88