किसने कहा कि प्रेम के लिए संग-साथ जरूरी है?
मैंने तो अपने ही मन की निस्तब्ध झील में
प्रेम को फूल-सा खिलते देखा है
निर्भर, निस्पृह, फिर भी पूर्ण...
न उसने मुझे चाहने की शर्त रखी
न मैंने उसे अपना बनने की दरकार समझी...
ना मिलने की ललक
ना बिछड़ने का संताप
बस एक सहज-सा भाव
जो भीतर ह��� भीतर ��्रकाश बनकर ठहर गया...
सोचती हूं....
अगर हर मन यूँ ही बिना किसी मांग के
प्रेम को जी ले...
तो कितनी सरल हो जाए यह दुनिया
अकेले ही प्रेम में डूब जाना सीख जाए
हर धड़कन...
#सरलसरिता
राष्ट्रीय गणित दिवस आज
हमारे देश में हर दिन कुछ न कुछ विशेष होता है। इसी क्रम में 22 दिसंबर को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय गणित दिवस (National Mathematics Day) के रूप में सेलिब्रेट किया जाता है। इस दिन को भारत के महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।
इन समीकरण एवं सूत्रों में दिया अहम योगदान
श्रीनिवास रामानुजन ने लगभग 3900 परिणामों (Equations and Identities) का संकलन किया है। इन कार्यों के अ���ावा उन्होंने एक और महत्वपूर्ण कार्य पाई (Pi) की अनंत श्रेणी शामिल थी को भी जीवंत किया।। उन्होंने पाई के अंकों की गणना करने के लिये ऐसे बहुत से सूत्र और समीकरणों का बनाया जो परंपरागत तरीकों से अलग थे और बेहद ही सटीक थे।
कौन थे श्रीनिवास रामानुजन
श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु के इरोड में हुआ था। उन्होंने एक ब्राह्मण परिवार में ज���्म लिया। बचपन से ही वे गणित में रुचि रखते थे। जब तक वे 12 साल के हुए तब तक उन्होंने त्रिकोणमिति में महारत हासिल कर ली थी। इसी के चलते उनको कुंभकोणम के सरकारी कला महाविद्यालय में छात्रवृत्ति प्रदान की गई और उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई यहां से जारी रखी। यहां वे गैर गणितीय विषयों के चलते सफल नहीं हो सके। इसके बाद वे 1913 में ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज चले गए और वहां से बैचलर ऑफ साइंस (बीएससी) की डिग्री ���्राप्त की। ट्रिनिटी कॉलेज के फेलो बनने वाले वे पहले भारतीय बने। अपने पढ़ाई के बाद और स्वास्थ्य में गिरावट के चलते वे 1919 में भारत वापस लौट आये। इसके बाद उनके स्वास्थ्य में लगातार गिरावट होती रही और अंत में 26 अप्रैल को मात्र 32 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।
राष्ट्रीय गणित दिवस मनाने का महत्व
इस दिन को सबसे पहले तो गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को याद कर उनको श्रद्धांजलि देना है और साथ ही उनके द्वारा दिए गए योगदान को बच्चों के साथ ही देश के सभी लोगों तक पहुंचाना है। इसके साथ ही गणित के प्रति जागरूक करना, स्कूली बच्चों में गणित के प्रति जागरूकता और रूचि पैदा करना है!
एक बार देवी सत्यभामा ने देवी रुक्मणि से पूछा कि दीदी क्या आपको मालुम है कि श्री कृष्ण जी बार बार द्रोपदी से मिलने क्यो जाते है । कोई अपनी बहन के घर बार बार मिलने थोड़ी ना जाता है , मुझे तो लगता है कुछ गडबड है , ऐसा क्या है ?
जो बार बार द्रोपदी के घर जाते है । तो देवी रुक्मणि ने कहा : बेकार की बातें मत करो ये बहन भाई का पवित्र सम्बन्ध है जाओ जाकर अपना काम करो ।
ठाकुर जी सब समझ ग्ए । और कहीं जाने लगे तो देवी सत्यभामा ने पूछा कि प्रभु आप कहां जा रहे हो ठाकुर जी ने कहा कि मैं द्रोपदी के घर जा रहा हूं । अब तो सत्यभामा जी और बेचैन हो गई और तुरन्त देवी रुक्मणि से बोल��� ‘ देखो दीदी फिर वही द्रोपदी के घर जा रहे हैं ‘।
कृष्ण जी ने कहा कि क्या तुम भी हमारे साथ चलोगी तो सत्यभामा जी फौरन तैयार हो गई और देवी रुक्मणि से बोली कि दीदी आप भी मेरे साथ चलो और द्रोपदी को ऐसा मज़ा चखा के आएंगे कि वो जीवन भर याद रखेगी । देवी रुक्मणि भी तैयार हो गई ।
जब दोनों देवियां द्रोपदी के घर पहुंची तो देखा कि द्रोपदी अपने केश संवार रही थी जब द्रोपदी केश संवार रही थी तो भगवान श्री कृष्ण ने पूछा : द्रोपदी क्या कर रही हो तो द्रोपदी बोली : भैया केश संवार के अभी आई तो भगवान ���ोले तुम काहे को केश संवार रही हो , तुम्हारी तो दो दो भाभी आई है ये तुम्हारे केश संवारेगी फिर कृष्ण जी ने देवी सत्यभामा से कहा कि तुम जाओ और द्रोपदी के सिर में तेल लगाओ और देवी रूक्मिणी तुम जाकर द्रोपदी की चोटी करो ।
सत्याभाम जी ने रुक्मणि जी से कहा बड़ा अच्छा मौका मिला है ऐसा तेल लगाऊंगी कि इसकी खोपड़ी के एक -एक बाल तोड के रख दूंगी । और जैसे ही सत्यभामा जी ���े द्रोपदी के सिर में तेल लगना शुरु किया और एक बाल को तोडा तो बाल तोड़ते ही आवाज आई : “हे कृष्ण”
फिर दूसरा बाल तोडा फिर आवाज आई :
“हे कृष्ण”
फिर तीसरा बाल तोडा तो फिर आवाज आई : “हे कृष्ण”
सत्यभामा जी को समझ नहीं आया और देवी रुक्मणि से पूछा , “दीदी आखिर ऐसी क्या बात है द्रोपदी के मस्तक से जो भी बाल तोड़ती हूं तो कृष्ण का नाम क्यों निकल कर आता है ,”
रुक्मणि जी बोली ,” मैं तो नहीं जानती “,
पीछे से भगवान बोले : ” देवी सत्यभामा तुम देवी रुक्मणि से पूछ रही थी कि मैं दौड़ – दौड़ कर इस द्रोपदी के घर क्यो जाता हूं “, क्योंकि पूरे भूमण्डल पर , पूरी पृथ्वी पर कोई सन्त , कोई साधु , कोई संन्यासी , कोई तपस्वी , कोई साधक , कोई उपासक ऐसा नहीं हुआ जिसने एक दिन में साढ़े तीन करोड़ बार मेरा नाम लिया हो और द्रोपदी केवल ऐसी है जो एक दिन में साढ़े तीन करोड़ बार मेरा नाम लेती है , प्रति दिन स्नान करती है इसलिए उसके हर रोम में कृष्ण नजर आता है और इसलिए मैं रोज इसके पास आता हूं ।”
इसे कहते हैं ‘ स्नान ‘ जो देवी द्रोपदी ���्रतिदिन किया करती थी ।
हम जो हर रोज साबुन , शैम्पू और तेल लगा कर अपने तन को स्वच्छ कर लिया , इसको केवल ‘ नहाना ‘ कहा गया है ।
स्नान का मतलब है : हमारे शरीर में साढ़े तीन करोड़ रोम छिद्र है
जब नारायण से पूछा गया : ये साढ़े तीन करोड़ रोम छिद्र कर्मों दिए गए हैं तो नारायण ने कहा : जब मनुष्य साढ़े तीन करोड़ बार भगवान का नाम ले लेता है तब जीवन में एक बार उसका स्नान हो पाता है “।
“इसको कहते हैं स्नान”
उसकी ख़ुशबू मेरी
ग़ज़लों में,
सिमट आई है
नाम- का नाम है रुसवाई की
रुसवाई है
दिल है एक,
और दो आलम का तमन्नाई है
दोस्त का दोस्त है हरजाई
का हरजाई है
हिज़्र की रात है और उनके तसव्वुर
का चिराग,
बज़्म की बज़्म है तन्हाई
की तन्हाई है
कौन से नाम से
ताबीर,
करूँ इस रुत को
फूल मुरझाए
हैं ज़ख्मों, पे बहार आई है
कैसे तरक़ीब से गिरे
हैं काग़ज़ पे
आँसू,
एक भूली- बिसरी हुई तस्वीर उभर
आई है
#सरलसरिता
पता है ....
स्त्री कभी समझा ���ी नहीं पाई
सटीकता से अपने प्रेम को
उसने एहसासों को सर्वोच्चता दी
उसे लगा कि जैसे मैने महसूस किया है
सारे एहसासों सारे प्रयासों को
जैसे मै आंखों से ही समझ जाती हूं कि
मन प्रेम से कितना परिपूर्ण है
ठीक वैसे ही तुम भी समझ जाओगे
कि उसके मन में क्या है..
उसे प्रेम का प्रदर्शन करने की
या फिर कुछ कहकर जताने की आवश्यकता ही नहीं है
वो सबकुछ समेटे रहती हैं मन मे
बस जताती नहीं कि
उसे कमजोर न समझा जाए
कहीं उनके प्रेम का मखौल न बन जाए
वो मौन ही रह गई
कभी शर्माकर कभी हिचकिचाकर..😊
#सरलसरिता