ये कहानी कभी सुनी न गई।
की तिरा होके मैं तिरा न रहा।।
बूद को मैं समझ गया शायद।
कोई शिकवा कोई गिला न रहा।।
*बूद - अस्तित्व
किस क़दर गैर हो गए हम तुम
दूर का भी तो वास्ता न रहा।।
मुझको तो चाहिए खयाल तिरा
तू मिरी जां रहा, रहा न रहा ।।
#जौन_एलिया
पढ़ रहा हूँ मैं इस तरह तुमको
जैसे ख़ुद पर लिखी हुई हो तुम।।
अब नहीं मैं किसी अंधेरे में
अब मुझे क्यूं टटोलती हो तुम।।
जाने एहसास है तुम्हें कि नहीं
तुम ज़रा भी नहीं रही हो तुम।।
हे युधिष्ठर, कार्तिक महीने के शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि में यमुनाने अपने घर पर यम को पहले भोजन कराया था। इस लिए यह यमद्वितीया (भाई दूज) तीनों लोकों में सुनी जाती है।
सर्वं बलवतां पथ्यं सर्वं बलवतां शुचि ।
सर्वं बलवतां धर्मः सर्वं बलवतां स्वकम् ॥
बलवानोंको सब कुछ लाभदायक है । बलवानोंका सारा कार्य पवित्र है । बलवानोंका सब कुछ धर्म है और बलवानोंके लिये सारी वस्तुएँ अपनी हैं ।
कुरुक्षेत्रे कोटिगुणो गङ्गायामपि तत्समः।
ततोधिकः पुष्करे स्याद् द्वारवत्यां च भार्गव।।
पद्मपुराणम्
हे भार्गव, आश्विन मास की समाप्ति से लेकर कार्तिक पूर्णिमा पर्यन्त कुरुक्षेत्र में एवं गङ्गा में स्नान का फल उत्तम है और पुष्कर और द्वारका मे उससे भी अधिक पुण्य प्राप्त होता है।
आश्वयुक्कृष्णपक्षस्य चतुर्दश्यां विधूदये।
तिलतैलेन कर्तव्यं स्नानं नरकभिरुणा ।।
आश्विन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के चन्द्रोदय में नरक से डरनेवाले तिल के तेल से स्नान करें।
यथा मृत्पिण्डतः कर्ता कुरुते यद् यदिच्छति।
एवमात्मकृतं कर्म मानवः प्रतिपद्यते ।।
जैसे कुम्हार मिट्टीके लोंदेसे जो-जो बर्तन चाहता
है वही बना लेता है। उसी प्रकार मनुष्य अपने किये हुए कर्मके अनुसार ही सब कुछ पाता है ॥
अपूर्वा शक्तिरत्रैव दृश्यते प्रेमपूजने ।
प्रणयी याति देवत्वं देवता क्रियते प्रिया ।।
प्रेम में एक अपूर्व शक्ति है, जिसमें प्रणयी देवत्व के और प्रिया देवता के तुल्य हो जाती है।