''राजभाषा परिवार'' संपूर्ण विश्व में हिंदी-प्रेमियों के लिए समर्पित एक वैश्विक समूह है। यह परिवार विश्व के सभी हिंदी-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता है।
कभी सोचा है हमारे चिंतन में सीखते समय विनम्रता पर इतना बल क्यों दिया जाता है? क्योंकि ज्ञान को पचाना सबसे कठिन काम है। ज़रा सा मिलते ही ऐसा चढ़ता है कि ��ीखने वाला अंधा होकर किसी काम का नहीं रहता! अधपका ज्ञान, अज्ञान से अधिक ख़तरनाक होता है। पत्रकारों से बेहतर यह बात कौन जानता है!
राजभाषा परिवार हाजिर है "संगीतमय काव्य संध्याा" के साथ इस शनिवार शाम सात बजे सुनिये प्रख्यात विचारक, गायक, लेखक और हिन्दी शिक्षण योजना नई दिल्ली के निदेशक डॉ. बरुण कुमार का मधुर गायन
लिंक वहीं पुराना
: https://t.co/KH7g5p3SBu
शनिवार 26 जून 2021
गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, सिक्किम, त्रिपुरा के प्रख्यात लोककलाकारों को सुनने का अवसर , जरूर शामिल होइये
वही लिंकः https://t.co/HIqLoRsMAl
इस वेब लोकस��ध्या में आप सभी सादर आमंत्रित हैं।
@drhiteshbajpai @MisraGirishwar @bbharti20
@vipranagarkar @shivkant
शाम सात बजे दो घंटे का समय हम सबकी लोक संस्कृति के लिए निकालिए पहचानिये कैसे भारत की लोक भाषायें एक दूसरे से वैविध्य के धरातल में भी एकत्व रखती है और भारतीयता के छत्र में एकाकार हो जाती हैं
तो शनिवार शाम 7 बजे वही पुराना लिंकः https://t.co/HIqLoRsMAl
@MisraGirishwar@shivkant
राजभाषा परिवार अगले अंक में अपनी लोक भाषा में आलेख आमंत्रित करता है वो आपके द्वारा बोली जाने वाली लोक भाषा की कहानी कविता, संस्मरण, नाटक या किसी भी अन्य विधा में हो। लिपि देवनागरी होगी पर भाषा आपकी अपनी बोली की होनी चाहिए।
लेख भेजने की अंतिम तिथि 30 अप्रैल है।
@MisraGirishwar
दरवाजा खुला रहता था
राही भी आ बैठता था…
कौवे भी कांवते थे
मेहमान आते जाते थे…
इक साइकिल ही पास थी
फिर भी मेल जोल की आस थी …
रिश्ते निभाते थे
रूठते मनाते थे…
पैसा चाहे कम था
माथे पे ना गम था…
मकान चाहे कच्चे थे
रिश्ते सारे सच्चे थे…
आज कई बार
बिना मुस्कुराये ही शाम हो जाती है!!
कितने दूर निकल गए,
रिश्तो को निभाते निभाते...
खुद को खो दि���ा हमने,
अपनों को पाते पाते...
मकान चाहे कच्चे थे...
रिश्ते सारे सच्चे थे…
अब शायद कुछ पा लिया ��ै
पर लगता है कि बहुत कुछ गंवा दिया है
जीवन की भाग-दौड़ में
क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है?
हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी आम हो जाती है।
एक सवेरा था जब हँस कर उठते थे हम
*"मकान सारे कच्चे थे" हरिवं�� राय बच्चन*
मकान चाहे कच्चे थे
लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे…
चारपाई पर बैठते थे
पास पास रहते थे…
सोफे और डबल बेड आ गए
दूरियां हमारी बढा गए….
छतों पर अब न सोते हैं
कहानी किस्से अब न होते हैं..
आंगन में वृक्ष थे
सांझा करते सुख दुख थे…
गीताप्रेस, गोरखपुर के अध्यक्ष और प्रसिद्ध पत्रिका कल्याण के संपादक राधेश्याम खेमका जी का निधन हो गया है। सनातन संस्कृति के लिए आपके द्वारा किए गए कार्य को हिंदू समाज सदैव ऋणी रहेगा। ओ���् शांति 🙏🏻
@GitaPress