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आज प्रधानमंत्री बंगाल में है। राजधानी कोलकाता के प्रसिद्ध ब्रिगेड मैदान (जिसको भरना राजनीतिक पार्टियों का शक्ति प्रदर्शन जैसा होता है) में सभा कर रहे हैं। रोचक यह है कि सभा का मंच पर बंगाल की जन आस्था के सबसे बड़े मंदिर दक्षिणेश्वर काली मंदिर की थीम पर तैयार हुआ है।
नरेंद्र मोदी के भीतर कोई इंदिरा गाँधी उठ खड़ी हो!
हिन्द महासागर में आईआरएस-डेना के डूबने की घटना को “युद्ध की कार्रवाई” कहकर टाल देना भारत के लिए रणनीतिक भूल होगी। यह वह क्षण है जब ��मुद्र के खुले विस्तार में, जहाँ जहाज झंडों की तरह नहीं, संदेशों की तरह चलते हैं, एक टॉरपीडो ने एक ईरानी युद्धपोत को नहीं, भारत की समुद्री-कूटनीतिक प्रतिष्ठा को छू लिया है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने दावा किया कि अमेरिकी पनडुब्बी ��े श्रीलंका के दक्षिणी तट के पास अंतरराष्ट्रीय जल में इसे टॉरपीडो से निशाना बनाया, जिससे जहाज डूब गया।
यह जहाज भारत के विशाखापट्टनम में 2026 इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में भाग लेकर लौट रहा था। यानी उसकी यात्रा-रेखा पर “भारत का मंच” और “भारत की मेज़बानी” की छाया स्वाभाविक थी। जहाज पर लगभग 180 नौसैनिक थे; 87 के मारे जाने और 32 के बचाए जाने की सूचना है, जबकि बाक़ी लापता हैं।
मूल प्रश्न यह नहीं कि युद्ध मे��� जहाज क्यों डूबा; युद्ध में तो पुल, स्टेशन, रनवे और जहाज डूबते ही हैं। मूल प्रश्न है, कौन-सा जहाज, किस भूगोल में और किस प्रतीकात्मक संदर्भ के साथ डुबोया गया? आईआरएस-डेना कोई “गुमनाम” जहाज नहीं था; उसकी हालिया सार्वजनिक पहचान भारत-आयोजित नौसैनिक कार्यक्रम से जुड़ी थी। इसलिए इस कार्रवाई का प्रभाव-क्षेत्र केवल ईरान तक सीमित नहीं रहता। वह भारत के लिए भी एक रणनीतिक असुविधा पैदा करता है। दुनिया इसे ऐसे पढ़ सकती है कि हिन्द महासागर में भारत के निकट एक बड़ी शक्ति ने अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर दिया और वह प्रदर्शन भारत की मेज़बानी के “संदर्भ” को धता बताकर किया गया।
क्या अमेरिका का उद्देश्य भारत को “अपमानित” करना था? इसे निर्विवाद तथ्य की तरह कहना अभी प्रमाण-सिद्ध नहीं; लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में “इंटेंट” अक्सर पब्लिक डोमेन में घोषित नहीं होता; वह टाइम-प्लेस-टारगेट के पैटर्न से पढ़ा जाता है। और यहाँ यह पैटर्न भारत के लिए असहज है। एक तो घटना श्रीलंका के निकट हिंद महासागर में हुई यानी भारत के रणनीतिक पड़ोस में। लक्ष्य वही जहाज था, जो भारत के बहुपक्षीय आयोजन से लौट रहा था। रक्षा मंत्री का सार्वजनिक “कन्फर्मेशन” भी रहा है। लिहाजा, इरादा जो भी रहा हो, परि��ाम यह है कि भारत के समुद्री-मंच की प्र��िष्ठा के आसपास एक विस्फोटक युद्ध कथा बन गई है। “भारत की मेज़बानी से लौटता जहाज हिंद महासागर में डुबो दिया गया।” यह वही जगह है, जहाँ भारत को स्पष्टता, संयम और कठोरता; तीनों चाहिए।
इसमें एक क़ानूनी फ्रेम भी है। भारत को भावुक नहीं, नियम-आधारित भाषा में अपनी बात रखनी चाहिए। समुद्र में बल-प्रयोग का प्रश्न यूएन चार्टर और युद्ध की स्थिति में लॉ ऑफ़ नवल वारफ़ेयर की कसौटी पर रखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का मूल सिद्धांत बल-प्रयोग पर रोक है; अपवादों में आत्मरक्षा जैसी दलीलें आती हैं (आर्टिकल 51), पर वह भी “आर्म्ड अटैक” और “आवश्यकता-अनुपातिकता” के तर्कों से बंधी होती है। नौसैनिक युद्ध-कानून का व्यावहारिक संदर्भ-ग्रंथों में सैन रेमो मैनुअल को प्रमुख माना जाता है। हालाँकि वह गैर-बाध्यकारी है, फिर भी व्यापक संदर्भ-दस्तावेज़ है और आईसीआरसी का केसबुक भी युद्ध-समुद्र में नियमों के ढाँचे की व्याख्या करता है।
हिन्द महासागर में तीसरे देशों के निकट इस प्रकार की कार्रवाइयाँ क्षेत्रीय स्थिरता और समुद्री व्यापार-मार्गों को जोखिम में डालती हैं और इसलिए भारत इसे स्वीकार नहीं कर सकता। भारत लंबे समय से हिन्द महासागर में “नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर” की भूमिका की बात करता रहा है। ऐसे में अगर कोई महाशक्ति भारत के निकट समुद्री क्षेत्र में, एक भारत-संदर्भित जहाज पर, हाई-प्रोफाइल कार्रवाई करे तो वह भारत की पर्सीव्ड इन्फ़्लुएंस पर भी प्रश्नचिह्न बन सकता है। हम किसी पक्ष के युद्ध के हिस्सेदार नहीं, लेकिन हिन्द महासागर में ऐसी कार्रवाइयाँ क्षेत्रीय स्थिरता के खिलाफ हैं।
लब्बेलुबाब ये कि आईआरएस-डेना प्रकरण भारत को एक कठोर याद दिलाता है। आज के युद्ध सिर्फ़ सीमाओं पर नहीं लड़े जाते; वे समुद्रों पर सिग्नलिंग के रूप में भी लड़े जाते हैं और कभी-कभी किसी तीसरे देश की प्रतिष्ठा के आसपास “घटना” रचकर उसे असहज किया जाता है। भारत को इस असहजता को कूटनीतिक आत्मविश्वास, कानूनी शब्दावली और समुद्री-क्षमता से जवाब देना चाहिए ताकि हिन्द महासागर “किसी और का शतरंज-बोर्ड” न बन जाए। हिन्द महासागर मतलब भारत के गर्व का महासागर; लेकिन आज जो स्थिति है, उसे देख लगता है : “बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी!” आज जैसे मन मुट्ठियाँ तानकर कहने को बेताब है कि नरेंद्र मोदी के भीतर कोई इंदिरा गाँधी उठ खड़ी हो!
अलविदा, कॉमरेड हेतराम बेनीवाल;
पसीने की मादकता में भीगी एक नैतिक उपस्थिति!
सोमवार की रात लगभग ग्यारह बजे जब शहरों की रोशनियाँ अपने-अपने कृत्रिम चाँद गिन रही थीं, तब कॉमरेड हेतराम बेनीवाल की सांसों ने गंगानगर की हवा से एक अंतिम संवाद किया। नब्बे के पार की उम्र; समय के विशाल रेगिस्तान में एक लंबी, तपती हुई पदयात्रा। वे 1990 और 1993 में ��िधायक रहे, पर यह सूचना उनकी जीवनी का शीर्षक नहीं, केवल फुटनोट है। उनका असली पद था : किसान और मज़दूर की आवाज़ का शिल्पकार।
सत्ता की अश्लीलता के इस दौर में, जहाँ वैभव अपने ही प्रतिबिंब से मोहित खड़ा है, वहाँ किसान के पसीने में जो गंध होती है; वह किसी डेलिशस मिलियन डॉलर फ्रैग्रेंस से कम नहीं और उसकी तपिश में जो मादकता है; वह डैलमोर 62 की दुर्लभ बोतल से अधिक तीव्र।
कॉमरेड हेतराम इसी श्रमशील मादकता में स्नान किए हुए मनुष्य थे। उनके पास न प्राइवेट जेट थे, न राजभवनों की सीढ़ियाँ; पर उनके पास खेत की मुंडेर पर खड़े उस किसान की काँपती उँगलियाँ थीं, जो अपनी फसल से अधिक अपने कर्ज़ की चिंता करता है।
वे बूढ़े थे; हाँ, बहुत बूढ़े। पर उनकी रीढ़ में जो नैतिकता थी, वह जवानों की भीड़ में दुर्लभ थी। वे न गुंडा थे, न मवाली, न अपराधी; फिर भी ऐसे लोग उनसे थर-थर काँपते थे, जिनकी राजनीति का ताप केवल वातानुकूलित कमरों में पैदा होता है। वे किसान की बात दिन में भी करते थे और रात में भी; और शायद यही उनकी सबसे बड़ी ‘अपराध-सूची’ थी।
आज के समय में आंदोलन भी अक्सर सत्ता के साथ सेल्फी खिंचवाते हैं। प्रशंसक नग्न हैं और सत्ता के प्रवेश-द्वार पर खड़े लोग भी। राजभवन अब केवल संवैधानिक शब्द नहीं रहे; वे कभी-कभी रनिवासों की तरह प्रतीत ���ोते हैं, जहाँ वैभव अपने ही झूठे दर्प का उत्सव मनाता है। इस पृष्ठभूमि में हेतराम बेनीवाल की उपस्थिति किसी पुराने, किंतु जीवित शब्द की तरह थी “मर्यादा”।
वे जानते थे कि किसान होना आजकल लगभग अपराध है। पुलिस की वर्दी कानून का गर्व पहनती है, पर प्रशासनिक शक्ति कभी-कभी उस जगह तैनात हो जाती है जहाँ पसीना गिरना अपराध और खून गिरना पद्मश्री जैसा सम्मान बन जाता है। ऐसे समय में, यदि कोई बूढ़ा आदमी खेत की मुंडेर पर खड़े होकर पानी के अभाव में मुरझाती सरसों की प्यास को नारे में बदल दे तो सत्ता की अश्लील शक्तियाँ मर्माहत हो उठती हैं। मर्म का यह जर्म अजीब है और गंगानगर की मिट्टी में बार-बार जन्म लेता रहा। वे कर्म के शिल्पी थे।
हेतराम किसी रोमानी मिथक के नायक नहीं थे। वे एक जिद थे कि लोकतंत्र घुन लगा स्वाद नहीं, आहत किसान की थाली में परोसी जाने वाली गरम रोटी है। वे उस रोटी को कला की तरह पलटते थे; तवे पर नहीं, जनसभा में। वे जानते थे कि जब नैतिकता भूमिगत हो जाती है और अनैतिकता गर्व से प्रदर्शन करने लगती है, तब समाज संकट में होता है। जब मतांधताएँ हीरे-मोती बनकर सजाई जाती हैं और समता, स्वतंत्रता, बंधुता के सरल आभूषण बिच्छुओं की तरह उतार फेंके जाते हैं, तब नग्न नृत्य आसान हो जाता है।
और शायद इसलिए, इस कालखंड में वही सबसे जवान और साहसी है, जो गेहूँ की बालियों के भीतर पकते दूधिया दानों की प्यास के लिए तड़प उठे। जिसे किसा�� के पसीने में ��िसी दुर्लभ इत्र की नहीं, धरती की ईमानदार गंध मिले।
ऐसे चुनीदा लोगों में एक नाम, निस्संदेह हेतराम बेनीवाल का रहेगा।
वे चले गए, पर खेत की मेड़ पर खड़ी वह आकृति अभी भी दिखती है। सफेद कुर्ता, धूप से तपे चेहरे पर एक शांत जिद और आँखों में यह भरोसा कि इतिहास अंततः पसीने की स्याही से ही लिखा जाएगा।
एक साहित्यकार, जो शानदार व्यंग्य लिखा करता था; सत्ता प्रतिष्ठानों को ही व्यंग्य में बदलता रहा। मुझे नहीं लगता उन जैसा कोई दूसरा किसान और श्रमिक नेता राजस्थान में हुआ है, जो जेल को ठेलकर ताल ठोकता था। उठी एड़ियों और टिके पंजों पर दाएँ हाथ को नंगी तलवार की तरह घुमाने वाली उनकी अदा आज भी मुझे उन संतुष्ट श्रमिकों किसानों की याद दिलाती है, जो उन्हें सुनकर मुट्ठियाँ भींच लेते थे!
अलविदा, कॉमरेड!
आपके जाने के बाद भी, सरसों की कच्ची गंध में आपकी आवाज़ सुनाई देगी!
@cpimspeak @CPIM_WESTBENGAL @CPIMKerala #HetramBeniwal
As India enters the New Year the most consequential contest it faces is not between parties, personalities or ideologies. It is between allure of fantasy and discipline of reality
100 साल पहले भारत में दो अलग विचारों वाले संगठन बने, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी.
सीपीआई आज कई तरह की मुश्किलों का सामना करती दिख रही है, वहीं आरएसएस इतना मज़बूत पहले कभी नहीं रहा.
सीपीआई के 100 साल के सफ़��� के कुछ अहम पड़ाव...
रिपोर्ट: नासिरुद्दीन/ @dhaiakhar
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आज़ादी के आंदोलन में चरखा केवल एक उपकरण नहीं था; वह एक ऋचा थी, एक आयत थी, एक बाणी था, एक सूत्र था, एक वर्स था, एक पसूक था...।
चरखा कोमल कपास के बेहद अशक्त धागों की धुरी पर लिखा हुआ धैर्य और प्रतिरोध था, जिसके माध्य��� से आज़ादी की अलख घर-धर पहुँची। कोई नासमझ ही चरखे को चरखा मानेगा। चरखा हिन्दू के घर भी आज़ादी की अलख लेकर गया। चरखा सिख, ईसाई और मुसलमान के घर भी आज़ादी की अग्निवीणा स���ना गया। चरखे ने ऐसे सूत्र दिए, जिनसे खादी एक विचार का रूप बनकर देश के हर नागरिक के बदन पर सुशोभित हुई। लेकिन उस समय भी देश में ऐसे लोग थे, जो खादी को पहनने से डरते थे।
चरखा आजादी के आंदोलन में एक ऐसा रूपक था, जो देखने में साधारण और भीतर से चकित कर देने वाला था। जैसे किसी तितली के पंख पर उभरी वह आकृति, जो पहली नज़र में सजावट लगती है और दूसरी नज़र में पूरा जुगराफिया बदल देती है।
चरखे की घूमती हुई गति में कोई क्रांतिकारी शोर नहीं था।
वह बंदूक की तरह नहीं गरजा, न तलवार की तरह चमका।
वह धीरे-धीरे चला—ठीक वैसे ही जैसे स्मृति चलती है: मौन, जिद्दी और अस्वीकार न की जा सकने वाली। गांंधी ने इसे हथियार नहीं, आदत बनाया।
और आदतें किसी भी विचारधारा से ज़्यादा ख़तरनाक होती हैं—वे शरीर में उतर जाती हैं, भाषा से पहले व्यवहार बन��ी हैं और जीवन को हर दिन वैसा का वैसा चलाती हैं। देश को आज़ाद कराने की ललक भी एक आदत थी और डरकर दुबक जाना भी।
चरखा एक काउंटर-नैरेटिव था।
औद्योगिक साम्राज्य की तेज़ और निर्मम मशीनों के सामने यह एक धीमा और लगभग हास्यास्पद प्रतिरोध था।
लेकिन यही हास्यास्पदता उसकी ताक़त बनी। जैसे किसी भारतीय षड्दर्शन के मासूम से दो-दो शब्द वाले वाक्य अचानक नैतिक आतंक में बदल जाता है, वैसे ही चरखा भी घरेलू दृश���य से निकलकर औपनिवेशिक सत्ता के लिए असहनीय बन गया। वह बताता था कि स्वतंत्रता को चीखकर नहीं, चरखे के ताकळे या तकुए पर से तांत निकाल कर जब हाथ को ऊपर ले जाएंगे तो वह जैसे इंक़लाब ज़िंदाबाद के लिए उठा हाथ हो जाएगा!
चरखा समय को भी चुनौती देता था। वह अतीत की स्मृति नहीं था, भविष्य की रिहर्सल था—जहाँ उत्पादन और गरिमा अलग नहीं थे। उसमें हाथ, श्रम और स्वाभिमान एक ही वृत्त में घूमते थे। यह कोई रोमांटिक वापसी नहीं थी, एक सौंदर्यपूर्ण अवज्ञा थी—जैसे कबीर की उलटबांसी, जो अर्थ को ऐसे उलट देती है कि बड़े शास्त्रज्ञ चकरा जाते हैं।
आज जब हम चरखे को केवल प्रतीक मानकर संग्रहालय में रख देते हैं, तब हम उसके सबसे ज़रूरी गुण को भूल जाते हैं—उसकी पुनरावृत्ति। चरखा हर दिन चलना चाहता था, ठीक वैसे ही जैसे स्वतंत्रता हर दिन अर्जित की जानी थी। उसमें न कोई अंत था, न कोई अंतिम विजय—सिर्फ़ घूमता हुआ धैर्य, जो कहता था: आज़ादी कोई घोषणा नहीं, एक अभ्यास है। निरंतर चरखे की तरह घूर्णन करता हुआ। खेत की कपास, किसान की आस, आंगन का आह्लाद, अहिंसा का अभ्यास और सूत के वस्त्र पहनकर देह के भीतर उंड़ेलने वाला अकूत अभय!
#चरखा #Charkha
मनरेगा वह क्रांतिकारी योजना या अधिनियम है, जिसने इस देश के मज़दूरों के लिए वह किया, जो आज तक किसी कम्युनिस्ट आंदोलन ने भारत में मज़दूरों के लिए लाख प्रयासों के बावजूद नहीं किया था।
यह ��ानून जब आया था तो उसका विरोध किसी गलियारे में फुसफुसाहट नहीं था। वह एक संगठित चीख़ थी। किसकी? यह चीख़ आई थी बड़े उद्योगपतियों की तरफ़ से, छोटे उद्योगपतियों की तरफ़ से, बड़े किसानों की तरफ़ से और कई जगह छोटे किसानों की तरफ़ से भी।
कारण कोई वैचारिक नहीं था, सीधा आर्थिक था: मज़दूर ने पहली बार मोलभाव करना सीख लिया था और उसने सत्तर रुपए में दिहाड़ी पर जाना नामंजूर कर दिया था। आज हमारे देश में मज़दू�� अगर आठ सौ से हजार रुपए लेता है तो वह उस अधिनियम का ही प्रतिफल है।
यह कानून जब बना तो मेरे पास गांवों से लगातार फोन आते थे, “सत्तर रुपये वाला मज़दूर मनरेगा में भाग गया है। सौ रुपये मांगता है। वहाँ काम भी नहीं करता। अब हमें डेढ़ सौ देने पड़ते हैं।” धीरे-धीरे वही मज़दूरी आम बाज़ार में तीन सौ हुई। फिर पाँच सौ। यह किसी रिपोर्ट का आँकड़ा नहीं है।
यह मेरे सामने घटा हुआ सामाजिक बदलाव था।
मेरे अपने गाँव से, यहाँ तक कि घर से फोन आते थे—इस योजना के ख़िलाफ़ लिखो। ये कांग्रेस ने हमें तबाह कर दिया।
मैं उनसे कहता और पूछता थ��—आपके घर कच्चे से पक्के कैसे हो गए? आप बैल और ऊँट से खेती करते थे—ट्रैक्टर कब आए? कैसे आए? आपके बच्चे आठवीं-दसवीं से आगे शहरों तक कैसे पहुँचे? अगर आपकी तरक़्क़ी स्वाभाविक है तो मज़दूर की तरक़्क़ी से इतनी बेचैनी और नाराज़गी क्यों?
सच यह है कि भारत में 1925 से चला क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन भी मज़दूरों को वह न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा नहीं दे पाया, जो मनरेगा कानून ने दी।
पहली बार श्रम दान नहीं, ��धिकारबना। पहली बार मज़दूर की मज़दूरी सरकार की गारंटी बनी। और इस बदलाव को हमारे महान् नेता महात्मा गांधी के नाम से जोड़ा गया। यह कोई प्रतीकात्मक निर्णय नहीं था, यह नैतिक राजनीति का गरिमापूर्ण जीवन जीने की आश्वस्ति का वक्तव्य था। वही गरिमापूर्ण जीवन, जिसका जिक्र हमारे संविधान के प्रिएंबल्स में है।
इस कानून के ज़रिये मैंने जो सामाजिक परिवर्तन देखा, वह भारतीय लोकतंत्र की सबसे ख़ामोश क्रां���ियों में से एक है। जैसे जनता पार्टी के नेता के तौर पर मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत ने महात्मा गांधी के नाम से जो अंत्योदय योजना शुरू की, मैं उसका भी बहुत प्रशंसक रहा हूँ।
लेकिन मैंने यूपीए सरकार के दौरान आए इस कानून के बदौलत मज़दूरों के पास आईं बाइकें देखीं। जो लोग कभी रोटी और प्याज़ या लाल मिर्च की चटनी पर ज़िंदा थे, वे दाल-सब्ज़ी खाने लगे। स्वास्थ्य बदला, देह बदली, आत्म��म्मान बदला। भुखमरी से मुक्ति मिली तो उनके बच्चे पढ़ने लगे। काम के घंटे बदले— मज़दूरों का जो दिन पहले सुबह आठ बजे से देर शाम छह या कई बार आठ बजे तक यानी दस-बारह घंटे का होता था, वह दस से पाँच हो गया। दोपहर का खाना एहसान नहीं, अधिकार बना।
राजस्थान की बदलाव वाली उन स्टोरीज़ को मैं भूल नहीं सकता। उन्हीं दिनों इस तरह की मेरी एक स्टोरी का शीर्षक दैनिक भास्कर के फ्रंट पेज पर लीड रूप में हमारे तत्कालीन ज़हीन-शहीन संपादक नवनीत गुर्जर ने दिया था : "मन रे गा!" यूपीए शासन के दौरान कुछ वर्षों में हमारे प्रदेश को लगभग दस हज़ार करोड़ रुपये मिले थे एक साल। इनमें से सात-सात, आठ-आठ हज़ार करोड़ रुपये का काम महिलाओं ने किया।
यह केवल रोज़गार नहीं था—यह ग्रामीण भारत में लैंगिक सत्ता-संतुलन का पुनर्लेखन था।
हाँ, इस कानून या योजना में भ्रष्टाचार ��ी हुआ। लेकिन यह सवाल ज़्यादा अहम है कि भ्रष्टाचार किस व्यवस्था में नहीं होता? फर्क़ यह है कि मनरेगा में नीचे तक पैसा पहुँचा। यह योजना लीक नहीं हुई—यह फैल गई।
विडंबना यह है कि कांग्रेस के ज़्यादातर स्थानीय, प्रांतीय और राष्ट्रीय नेता इस योजना की राजनीतिक ताक़त और श्रमिक वर्ग पर इसके व्यापक, हॉरिजेंटल और वर्टिकल प्रभाव को समझ ही नहीं पाए।
वे समझते कैसे? वे तो चौबीस घंटे जातियों में फंसे रह��े हैं। दूसरे वे पार्टी के अंदर एक दूसरे को निबटाने में जिस तरह ऊर्जा खर्च करते हैं, उसमें ही इस तरह की क्रांतिकारी योजनाओं का बंटाधार वे कर देते हैं।
लेकिन यह राजस्थान का सच है कि यूपीए की इस योजना को राजस्थान में जिस गंभीरता से वसुंधरा राजे ने लागू किया, वह कांग्रेस के समय नष्टप्राय हो गई। कांग्रेस के नेताओं ने इसे भ्रष्टाचार की भेंट अधिक चढ़ाया।
मुझे लगता है कि इस योजना की शिल्पकार सोनि��ा गांधी और राजस्थान में वसुंधरा राजे के बीच जो संबंध स्त्री मन का दिखता है, वह शासन और प्र��ासन की लय को एक अलग रूप देता है।
यह योजना एक दूर देश की भारत आई बेटी के हृदय से जिस तरह होकर आई थी, वैसे ही पड़ोसी राज्य के एक राजपरिवार की बेटी राजस्थान आई तो उसने भी इस प्रदेश की महिलाओं पर फोकस किया। उस समय राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष और मुख्यमंत्री भी महिला ही थीं और कांग्रेस की सुप्रीम लीडर सोनिया गांधी थीं और आसपड़ोस में भी मायावती जैसी महिलाएं थीं तो जैसे घर परिवार को संभाला जाता है उस त��ह का कुछ सोच रहा होगा उनके मनों में। तब राजनीति में आज जैसा फसादी मामला नहीं था। इस तरह के काम विकृत चित्त वाला हमारा पुरुष वर्ग ही कर सकता है।
यह योजना यूपीए की थी। लेकिन मैंने किसी चुनाव में कांग्रेस के किसी नेता को मनरेगा के मजदूर वर्ग पर पड़े पॉजिटिव और क्रांतिकारी कामों के असली प्रभाव को गिनाते समझाते बिलकुल नहीं देखा। जबकि यह आज़ादी के बाद की सबसे बड़ी वोट-निर्माता योजना थी। कांग्रेस के नेता उसी तरह वसुंधरा राजे के भ्रष्टाचार के प्रचार में फंसे रहे, जिस तरह आजकल भाजपा के नेता नेहरू गांधी परिवार के भ्रष्टाचार और व��वादों में लगे हैं।
मनरेगा केवल श्रमिक कल्याण नहीं था।
यह दलित कल्याण भी था।
यह आदिवासी कल्याण भी था।
यह महिला कल्याण भी था।
यह भूमिहीन किसान का सुरक्षा कवच भी था।
यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का स्वचालित स्टिमुलस पैकेज था।
अगर कांग्रेस के रणनीतिकारों ने इसे समझा होता; अगर इसे राजनीतिक भाषा दी गई होती; अगर इसे गर्व और गर्वीले अंदाज से जनता के सामने रखा गया होता और उद्योगपतियों से लेकर किसानों तक को यह समझाया होता कि आप तो स्वयं दया के सागर हैं, आप लोग हमारे निर्धन नागरिकों के बारे में ऐसा कैसे सोच सकते हैं तो आज कांग्रेस की यह हालत नहीं होती।
मनरेगा दरअसल एक सवाल था।
सवाल था कि क्या लोकतंत्र सिर्फ़ मतदान का अधिकार है?
या फिर गरिमा के साथ जीने की गारंटी भी?
इस सवाल से आज भी सत्ता असहज है। क्योंकि मनरेगा ने मज़दूर को पहली बार यह एहसास कराया—कि वह सिर्फ़ सस्ता श्रम नहीं, इस महान् देश का गरिमाशाली नागरिक है, जिसकी गारंटी इस देश के संविधान के पहले ही पन्ने पर दी गई है।
@priyankagandhi @_YogendraYadav @VasundharaBJP @INCIndia #manrega #MGNREGA #VB_G_RAM_G
अरावली पहाड़, जिसके किनारे सभ्यता और संस्कृति के बहुत से सोते हैं। दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक पर्वतमाला। @bhanwarmegh सर इसी पर्वतमाला को लघु भारत कहते हैं जिसमें वह अपने ���िस्से का ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ खोजते हैं।