1. दिल्ली के जंतर मंतर पर संविधान में एस.सी., एस.टी. व ओ.बी.सी. समाज को दिये गये आरक्षण के विरुद्ध अभी हाल ही में जमा हुये कुछ लोगों द्वारा आर्थिक आधार पर आरक्षण को लागू करने की उठाई गई यह नई माँग कतई भी उचित व देशहित में नहीं है। उन्हें आरक्षण के सम्बंध में ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिये जिससे समतामूलक समाज, विकसित व सम्मानित देश बनाने के संवैधानिक कार्यों को आघात पहुँचे।
2. वैसे भी देश में सदियों से जातिवाद की अमानवीयता का शिकार रहे एस.सी., एस.टी. व ओबीसी समाज के लोगों हेतु संविधान में की गई आरक्षण की व्यवस्था के बारे में परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर का यह कहना था कि ’जातिवाद का परित्याग ही सबसे बड़ी देशभक्ति है’। अतः लोग सही देशभक्ति का परिचय ज्यादा दें तो यही उचित होगा।
3. जहाँ तक आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की बात है, तो केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा भी ग़रीबी उन्मूलन के एक नहीं बल्कि अनेकों कार्यक्रमों पर काफी सरकारी धन हर वर्ष ख़र्च किया जाता है, किन्तु उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार आदि के कारण इसका सही लाभ अगर देश के लोगों को नहीं मिलता है तो यह तो सरकारी व्यवस्था का सीधा-सीधा दोष है।
4. इसके अलावा, आर्थिक आधार पर आरक्षण की नई व्यवस्था भी देश में लागू है, जिसका भी सही लाभ अपरकास्ट समाज के ग़रीब परिवारों को नहीं मिल पा रहा है बल्कि इसमें छलावा अधिक है।
5. वास्तव में ख़ासकर यही वह भ्रष्ट व जातिवादी सरकारी व्यवस्था है जिसने आरक्षण के संवैधानिक रचनात्मक प्रावधान को कभी सही से ज़मीन पर लागू ही नहीं होने दिया है, जिस कारण एससी, एसटी व ओबीसी समाज के लोग, आज़ादी के इतने लम्बे अरसे के बाद आज तक भी, ग़रीबी, जातिवादी द्वेष, शोषण, अत्याचार व जातिवाद के ज़हर का दंश हर दिन हर स्तर पर लगातार झेलते रहते हैं।
6. अतः सभी सरकारें भी आरक्षण विरोधी तत्वों को शरण व संरक्षण बिल्कुल भी ना दें तो यह व्यापक देश व जनहित में होगा। लोगों से भी अपील है कि वे आरक्षण जैसे अहम् एवं संवेदनशील मुद्दे पर सस्ती राजनीति ना करें और ना ही होने दें।
7. हालाँकि उसी ही दिन पार्लियामेन्ट थाना के बाहर एक पीड़ित व्यक्ति के मामले में एफआईआर दर्ज कराने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री राहुल गाँधी कई घन्टों तक धरने पर बैठे रहे, जिसका पार्टी को कोई ऐतराज़ नहीं है।
ऽ लेकिन उसके बग़ल में जंतर-मंतर पर दलित व शोषितों के जातीय आधार पर दिये जाने वाले आरक्षण को ख़त्म करवाने के लिए धरना-प्रदर्शन भी चल रहा था, वहाँ पर वे व उनका कोई भी कांग्रेसी साथी उन्हें समझाने तक के लिये भी नहीं गये, जिससे इन वर्गों के प्रति इनकी आरक्षण विरोधी मानसिकता अभी भी साफ झलकती है।
पटना में छात्रों द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर किए जा रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पुलिस द्वारा किया गया लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोले छोड़े जाना अत्यंत निंदनीय, अलोकतांत्रिक और अस्वीकार्य है।
20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर पेपर लीक और शिक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर अपनी आवाज़ उठा रहे मासूम बच्चों और बच्चियों के साथ जिस प्रकार का बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया, उसके घाव अभी भरे भी नहीं थे कि अब पटना में छात्रों पर फिर से लाठियाँ बरसाई गईं और आँसू गैस के गोले छोड़े गए।
सरकार छात्रों की बात सुनने के बजाय उनकी आवाज़ को बल प्रयोग से दबाने की नीति पर चल रही है।
#संसद_मार्च #जंतर_मंत्र
ज़ुल्म जब भी हद से आगे बढ़ने लगता है,
वहीं से बदलाव का सूरज निकलने लगता है।
आज जंतर-मंतर पर बच्चों और बच्चियों के साथ जिस प्रकार का बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया, उसने मन को गहराई तक झकझोर दिया। मैंने जलियांवाला बाग का वह दौर नहीं देखा, लेकिन आज जो दृश्य सामने आए, उन्होंने इतिहास के उस काले अध्याय की याद अवश्य दिला दी।
लोकतंत्र में अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। यदि उस अधिकार का उत्तर बल प्रयोग से दिया जाए, तो यह केवल कुछ लोगों पर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी आघात है।
इसी पीड़ा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के संकल्प के साथ, आज से मैं संसद भवन परिसर में परम पूज्य बाबा साहेब की प्रतिमा के नीचे धरने पर बैठ रहा हूँ। जब तक न्याय सुनिश्चित नहीं होता और इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध उचित कार्रवाई नहीं होती, मेरा यह शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रहेगा।
जहाँ संविधान की शपथ ली, आज वहीं संविधान का सम्मान बचाने बैठा हूँ।
मासूमों पर हुए अत्याचार के विरुद्ध अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ।
जय भीम, जय भारत।
#संसद_मार्च#जंतर_मंत्र
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
#संसद_मार्च#जंतर_मंत्र
दिल्ली पुलिस का आदर्श वाक्य ‘शांति, सेवा, न्याय’ है, लेकिन कल जंतर-मंतर पर वर्दीधारी द्वारा मासूम बेटियों की अस्मिता पर किया गया हमला इस आदर्श वाक्य को विडंबना बना देता है।
CJP Protest में छात्रों पर हुए दमनकारी लाठीचार्ज के ख़िलाफ़ संसद भवन परिसर में ही धरने पर बैठे नगीना सांसद चंद्रशेखर.
बारिश के बीच, वे बाबा साहब की मूर्ति के ठीक नीचे धरने पर बैठे हैं.
CJP Protest | Chandrashekhar | Students
निराशा में आँख का पानी
जब समुंदर बन जाता है
‘इंक़लाब’ तब आता है!!!
कोई अपनी ताक़त पर
जब सर उठा इठलाता है
‘इंक़लाब’ तब आता है!
हुक़ूमतों का घमंड-गुरूर
जब पर्वत सा बन जाता है
‘इंक़लाब’ तब आता है!!!
दौर जब नाइंसाफ़ी का
हद ही पार कर जाता है
‘इंक़लाब’ तब आता है!
जब-जब देश का भविष्य
पूरा दांव पर लग जाता है
‘इंक़लाब’ तब आता है!!!
केन–बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित आदिवासी समुदाय पिछले कई वर्षों से उचित मुआवज़े, सम्मानजनक पुनर्वास तथा अपने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की मांग को लेकर संघर्ष कर रहा है। इसी वर्ष अप्रैल में भी प्रभावित परिवारों ने आंदोलन किया था। उस समय प्रशासन ने उनकी मांगों पर विचार और समाधान का आश्वासन देकर आंदोलन समाप्त करा दिया था, लेकिन वादे पूरे नहीं किए गए।
इसी कारण प्रभावित परिवार इस बार अंतिम दम तक लड़ने के संकल्प के साथ आंदोलनरत हैं। आंदोलन के 17वें दिन भी वे चिता सत्याग्रह, जल सत्याग्रह, मिट्टी सत्याग्रह तथा प्रतीकात्मक फांसी सत्याग्रह जैसे शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक माध्यमों से अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। उनकी न्यायोचित मांगों पर संवेदनशीलता से विचार करने के बजाय प्रशासन द्वारा आंदोलन को बलपूर्वक समाप्त करने का प्रयास भाजपा सरकार की बहुजन और आदिवासी समाज के अधिकारों के प्रति असंवेदनशील सोच को दर्शाता है।
शांतिपूर्ण जनआंदोलन को पुलिस बल के सहारे दबाने का प्रयास लोकतंत्र पर सीधा प्रहार है।
एक तड़ीपार दंगाई गृहमंत्री से तुम क्या उम्मीद लगाए बैठे थे
पैदा होते ही उसने गुंडई सीखी है, उससे उसी तरह निपटो सफल होना है तो
अब ट्रक आ ही गया है तो प्रदर्शन में शामिल छात्र ध्यान दें कि कोई भी व्यक्ति एक पत्थर उस ट्रक से ना उठा पाए,टूटी गाड़ी भी पार्क है
लोकतंत्र एक बार फिर शर्मसार!
दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले 21 दिनों से शांतिपूर्ण अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक जी को सादा कपड़ों में पहुँचे पुलिसकर्मियों द्वारा जबरन अस्पताल ले जाना तथा उनके साथियों के साथ मारपीट कर उन्हें हिरासत में लेना अत्यंत निंदनीय और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार है।
इससे पहले वन रैंक वन पेंशन की मांग को लेकर महीनों तक धरने पर बैठे पूर्व सैनिकों के साथ भी यही हुआ। देश का गौरव बढ़ाने वाली महिला पहलवानों के शांतिपूर्ण आंदोलन को भी इसी तरह बलपूर्वक हटाया गया। अब सोनम वांगचुक जी के सत्याग्रह के साथ भी वही व्यवहार किया जा रहा है।क्या शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार केवल सत्ता की सुविधा तक ही सीमित रह गया?
हम प्रकृति से प्रार्थना करते हैं कि सोनम वांगचुक जी को उत्तम स्वास्थ्य, शक्ति और दीर्घायु प्रदान करे।
#SonamWangchuk
केन–बेतवा लिंक परियोजना से प्रभावित आदिवासी पिछले कई वर्षों से उचित मुआवज़े, सम्मानजनक पुनर्वास और अपने संवैधानिक एवं कानूनी अधिकारों की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। इस वर्ष अप्रैल में भी प्रभावित परिवारों ने आंदोलन किया था। तब प्रशासन द्वारा समझा-बुझाकर आंदोलन समाप्त करा दिया गया था, लेकिन मांगें पूरी न होने के कारण अबकी बार वे आखिरी तक लड़ने के जज़्बे के साथ आंदोलन के 14वें दिन भी चिता सत्याग्रह, जल सत्याग्रह, मिट्टी सत्याग्रह तथा प्रतीकात्मक फांसी सत्याग्रह के माध्यम से अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि अपनी लोकतांत्रिक आवाज़ उठाने पर उन्हें शासन-प्रशासन द्वारा तरह-तरह से परेशान किया जा रहा है।
आंदोलनकारी आदिवासियों का आरोप है कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 तथा भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन एवं पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के प्रावधानों का समुचित पालन नहीं किया गया। उनका कहना है कि कई प्रभावित परिवारों के घरों को बिना पर्याप्त पूर्व सूचना ध्वस्त कर दिया गया। इसके साथ ही मुआवज़े के निर्धारण और वितरण में अनियमितताओं एवं भ्रष्टाचार के आरोप भी सामने आए हैं।
उनका यह भी कहना है कि उन्हें दिया जा रहा मुआवज़ा वास्तविक नुकसान की तुलना में बेहद अपर्याप्त है। इस राशि से न कहीं और सम्मानजनक ढंग से बसना संभव है, न रहने के लिए घर की समुचित व्यवस्था हो सकती है, न आजीविका का स्थायी साधन जुटाया जा सकता है और न ही बच्चों की शिक्षा एवं परिवार के भविष्य को सुरक्षित किया जा सकता है। उनका यह भी कहना है कि जिन स्थानों पर उनका पुनर्वास किया गया है, वहाँ बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। ऐसे में प्रभावित परिवारों के सामने अपने अस्तित्व और भविष्य का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
यदि विकास के नाम पर लोगों को उनकी पुश्तैनी जमीन, घर, आजीविका और सामाजिक जीवन से विस्थापित किया जाता है, तो यह सरकार की जिम्मेदारी है कि प्रत्येक प्रभावित परिवार को न्यायपूर्ण एवं पर्याप्त मुआवज़ा, सम्मानजनक पुनर्वास, मूलभूत सुविधाओं से युक्त पुनर्वास स्थल, वैकल्पिक आजीविका तथा कानून के अनुरूप सभी अधिकार सुनिश्चित किए जाएँ।
मैं शीघ्र ही अपने इन परिवारों से मिलने उनके बीच जाऊँगा। मेरा वादा है कि उनकी आवाज़ बनकर इस पूरे मामले को लोकसभा में पूरी मजबूती के साथ उठाऊँगा।
@MP_MyGov को आंदोलनरत आदिवासी परिवारों के साथ संवेदनशीलता और गंभीरता से संवाद कर उनकी जायज़ मांगों का शीघ्र समाधान करना चाहिए। विकास तभी सार्थक है, जब वह न्यायपूर्ण, पारदर्शी, सहभागी और मानवीय हो; न कि आदिवासियों के अधिकारों, सम्मान और भविष्य की कीमत पर।
लखनऊ के अलीगंज में एक कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग में 13 छात्रों की दर्दनाक मृत्यु का समाचार अत्यंत दुःखद, हृदयविदारक और झकझोर देने वाला है।
शिक्षा और बेहतर भविष्य के सपने लेकर आए इन छात्रों का इस तरह असमय दुनिया से चले जाना पूरे समाज के लिए अपूरणीय क्षति है। इस हादसे में जान गंवाने वाले सभी छात्रों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं तथा उनके शोकाकुल परिजनों के प्रति गहरी संवेदनाएँ व्यक्त करते हैं। प्रकृति उन्हें इस असीम दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे तथा घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हैं।
साथ ही, इस घटना की निष्पक्ष एवं उच्च स्तरीय जाँच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए तथा सभी शिक्षण संस्थानों में अग्नि सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन कराया जाना चाहिए।
@UPGovt को मृतक छात्रों के परिजनों को पर्याप्त मुआवजा एवं आर्थिक सहायता प्रदान करनी चाहिए तथा घायलों के समुचित और निःशुल्क उपचार की व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही, पीड़ित परिवारों को हर संभव सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि इस कठिन समय में उन्हें राहत मिल सके।
भीम आर्मी-आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के लखनऊ के कार्यकर्ता पीड़ित परिवारों एवं घायलों की हर सम्भव सहायता करें।
जनपद गौतम बुद्ध नगर के GIMS अस्पताल में कार्यरत लगभग 450 आउटसोर्स कर्मचारी, जिनमें डॉक्टर, नर्स, नर्सिंग स्टाफ, वार्ड बॉय, सफाई कर्मी एवं अन्य स्वास्थ्यकर्मी शामिल हैं, पिछले दस दिनों से अपने रोजगार की सुरक्षा, सेवाओं के सम्मानजनक समायोजन और दीर्घकालीन अनुभव को उचित मान्यता दिए जाने की मांग को लेकर धरने पर बैठे हैं। इनमें से अनेक कर्मचारी पिछले 10 से 13 वर्षों से संस्थान की सेवा कर रहे हैं तथा कोविड महामारी के दौरान अपनी जान जोखिम में डालकर मरीजों की सेवा और स्वास्थ्य व्यवस्था को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। ऐसे कर्मचारियों को धमकाए जाने की खबरें बेहद चिंताजनक हैं।
मुख्यमंत्री @myogiadityanath जी, क्या यही उन स्वास्थ्यकर्मियों का सम्मान है जिन्होंने कोविड महामारी के दौरान अपनी जान जोखिम में डालकर प्रदेशवासियों की सेवा की थी? जिन कर्मचारियों ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष संस्थान को दिए, उनमें से कई आज आयु सीमा पार कर चुके हैं और अपने भविष्य को लेकर असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। क्या उनकी सेवाओं, अनुभव और योगदान को इस तरह नजरअंदाज किया जाना न्यायसंगत है?
हम @UPGovt से मांग करते हैं कि कर्मचारियों के साथ किसी भी प्रकार की धमकी, उत्पीड़न या दमनात्मक कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाई जाए तथा उनकी सेवाओं, अनुभव और रोजगार सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए न्यायसंगत एवं मानवीय समाधान निकाला जाए।
हरियाणा में डॉ. बी.आर. अंबेडकर लाइब्रेरी का नाम परिवर्तित किए जाने के निर्णय को निरस्त कर मूल नाम बहाल किए जाने हेतु महामहिम राष्ट्रपति महोदया श्रद्धेया द्रौपदी मुर्मू जी को पत्र लिखकर अनुरोध किया।
@mygovindia@rashtrapatibhvn