आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। नया साल आपके जीवन में ढेर सारी खुशियां, अच्छा स्वास्थ्य और सफलताएं लेकर आए।
Wishing everyone a very Happy New Year 2026!
जामिया में पढ़ाई करता हूं। पिछले 6 महीने से बाकी तमाम कार्यकर्ताओं की तरह सबकुछ छोड़कर बिहार में था, ज़मीन पर था। अपने नेता के साथ वोटर अधिकार यात्रा और बिहार अधिकार यात्रा में शामिल रहा। गाड़ियों के आगे दौड़ते-भागते। पूरे बिहार की यात्रा की।
यात्रा के 16 दिन ऐसे रहे जब आप पूरा दिन ट्रैवल करते और किसी नए शहर पहुंचते तो पता चलता कि फलाना राष्ट्रीय पार्टी ने सारे कमरे बुक कर लिए हैं। कहीं होटल नहीं, कमरा नहीं। फिर भी हम आगे बढ़ते रहे। सुकून की नींद नहीं मिली, लेकिन ताकत और तसल्ली थी कि नेता के साथ चल रहें हैं।
जब नेता ने इंटरव्यू देने की शुरुआत की, तब ये सुनिश्चित किया कि साथ चल रहे सभी छोटे यूट्यूबर्स को इंटरव्यू मिले। नेशनल मीडिया के रिपोर्टर दिनभर मीडिया वैन में घूमते रहे, छोटे पत्रकारों को बगल में बिठाकर तेजस्वी यादव ने इंटरव्यू दिया।
चुनाव की बारी आई तो अपने ढाका विधानसभा में था। अपने गांव में, अपने शहर में, अपने बूथ पर। पर्चा बांटा, पोस्टर चिपकाया। इस चुनाव को मैंने भी उतना ही जिया, जितना राजद के किसी अन्य निष्ठावान कार्यकर्ता ने जिया है। हम ढाका विधानसभा जीत गए, लेकिन बिहार हार गए।
जैसे दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजे आए। बिहार में भी वही पैटर्न नज़र आया। जनता के उत्साह और समर्थन के आगे ये परिणाम हार है और हम इसे मंजूर कर रहें हैं।
इस हार के कई कारण होंगे। उसकी समीक्षा होगी, सुधार होगा। लेकिन किसी कीमत पर हम खुद को कमज़ोर नहीं होने देंगे। ये लड़ाई जारी रहेगी।
हम तेजस्वी के साथ थे, हैं, रहेंगे।
उसी ऊर्जा के साथ...🙏🏻
शीत-युद्ध की बात और थी। तब पाकिस्तान ने अमरीका-गुट स्पष्ट रूप से चुना था। अब तो वैश्वीकरण का दौर है, जिसमें भारत कहीं आगे है। कूटनीतिक पलड़ा भारत के पक्ष में होना चाहिए, ख़ास कर अगर प्रमाण उपलब्ध हों।
पाकिस्तान जैसा टिंगू देश जिसके पास भारत के मुकाबले ख़ास संसाधन भी नहीं, न वहाँ व्यवसायिक लाभ की बहुत अधिक संभावना है, और न ही लोकतंत्र मजबूत है, उसका आज के दौर में बैक-फुट पर होते हुए भी ठीक-ठाक अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करना चौंकाता है।
ख़ान सर से बड़ा फ्रॉड कौन है?
ये आदमी कल तक नॉर्मलाइज़ेशन के पक्ष में था। नीतीश कुमार, अशोक चौधरी और मनीष वर्मा के साथ मीटिंग कर रहा था।
जब छात्रों ने इसका सामूहिक विरोध किया तो ये आंदोलन में हीरो बनने आ गया।
लाठी खाए छात्र! सड़क पर संघर्ष करे छात्र!
नेता बनेंगे ख़ान सर।
ई सब नहीं चलेगा!
क्या ख़ान सर को लाठी से पीटा गया?
क्या ख़ान सर पहले दिन से छात्रों के साथ थे?
क्या ख़ान सर नॉर्मलाइज़ेशन के विरोध में थे?
नहीं! ख़ान सर BPSC में Normalisation के फ़ायदे गिनवा रहे थे। जदयू के स्वघोषित प्रवक्ता बन के घूम रहे थे। आज आंदोलन और भीड़ देखकर क्रेडिट लेने आ गए हैं।
पहचानिए, यह आदमी सरकार का सबसे बड़ा सेटर है।
छात्रों का आंदोलन सत्ता पोषित दलाल बिचौलियों द्वारा हाईजैक नहीं होना चाहिए।
#No_Normalisation_in_BPSC
महाराष्ट्र में विधानसभा के साथ साथ नांदेड़ लोकसभा का भी उपचुनाव था। इस लोकसभा हलके में छ: विधानसभा की सीट आती हैं।
कांग्रेस सभी छ: विधानसभा सीट हार गई है, लेकिन लोकसभा का चुनाव जीत गई है।
ऐसा इसलिए हुआ है कि लोकसभा सीट पर कांग्रेस को 1,59,323 वोट ज़्यादा मिले हैं! छ: विधानसभा सीटों पर कुल मिला कर कांग्रेस को 4.27 लाख वोट मिले हैं, जबकि लोकसभा सीट पर 5.87 लाख वोट मिले हैं; हालाँकि दोनों की पोलिंग एक साथ हुई है।
इसका मतलब क्या हुआ?
यही कि जिन वोटरों ने लोकसभा सीट पर कांग्रेस को वोट दिया, उन्हीं वोटरों में से औसतन 26,500 वोटर उन हर विधानसभा सीट पर कांग्रेस के ख़िलाफ़ हो गए!
लेकिन कांग्रेस का हर चौथा वोटर ठीक उसी वक्त विधानसभा में पार्टी के ख़िलाफ़ क्यों हो गया था? अब ये तो बीजेपी के नेता भी नहीं मानेंगे ये एक-चौथाई वोटर शिंदे-फड़नवीस-अजीत की तिकड़ी को प्रधानमंत्री मोदी से भी ज़्यादा पसंद करते हैं, इसीलिए विधानसभा में उस तिकड़ी के साथ चले गए!
ये छ: विधानसभा सीट कॉंग्रेस कुल जमा 1,84,597 वोटों से हारी है, और 1.59,323 वोट लोकसभा की बनिस्बत कम हुए हैं!
इस अद्भुत संयोग का और अपने एक-चौथाई वोटरों के इस अभूतपूर्व वोटिंग पैटर्न की हम जाँच कर रहे हैं।