हमारा #Zenz को लव sex और धोखा में ही मस्त व्यस्त है..
उत्तर प्रदेश के वाराणसी निवासी 19 वर्षीय द्वितीय वर्ष की नर्सिंग छात्रा का उसी नर्सिंग कॉलेज के तृतीय वर्ष के नर्सिग छात्र मोहम्मद समीर से पिछले 2 साल से प्रेम संबंध था ..
मोहम्मद समीर जौनपुर का निवासी बताया गया है ..
इस दौरान दोनों के बीच जिस्मानी संबंध भी बनते थे,
7 महीने पहले भी उस छात्रा का अबॉर्शन हुआ था ..
बॉयज हॉस्टल के गार्ड ने पुलिस को बताया कि छात्रा पिछले दो दिनों से लगातार हॉस्टल आ रही थी .. मंगलवार को भी वह काफी देर तक कैंपस में अकेले घूमती देखी गई थी .. बुधवार सुबह करीब 9:20 बजे वह अकेले हॉस्टल की सीढ़ियों से ऊपर गई थी जिसके कुछ समय बाद वह खून से लथपथ हालत में मिली .. जब हॉस्पिटल ले जाते तब तक मर गई ..
दरअसल छात्रा दुबारा प्रैग्नेंट हो गईं थी, उसने अपने प्रेमी
मोहम्मद समीर से से ये बात बताई तो जांच करवाई गई
जांच में निकल कर आया कि 3 महीने की प्रेग्नेंसी है ..
दोनों हॉस्पिटल हॉस्पिटल घुमे अबॉर्शन के लिए,
मगर हर जगह परिजनों को बुलाने के लिए कहा गया ..
क्योंकि कोई हॉस्पिटल अवैध काम नही करना चाहता था
पकड़े जाते तो डॉ साहब जेल में और हॉस्पिटल सील हो जाता ..
इसके बाद दोनों ने खुद ही गर्भपात करने की योजना बनाई .. समीर ने बताया कि मेडिकल की पढ़ाई से जुड़े होने के कारण पहले उन्होंने किताबों में जानकारी खोजी लेकिन स्पष्ट जानकारी नहीं मिलने पर यूट्यूब वीडियो देखे ..
इसके बाद एक ब्रांड की अबॉर्शन पिल खरीदी गई .. बुधवार सुबह छात्रा हॉस्टल खाना लेकर पहुँची दवा खाने को लेकर डरी हुई थी!
समीर ने बताया, जब दवा खाने को कहा गया तो उसने मना कर दिया .. उस पर दबाव बनाया तो उसने कहा- हम निकाह कर लेते हैं लेकिन मैंने उसकी बात नहीं मानी .. उसकी मर्जी के खिलाफ जबरन दवा खिला दी .. कुछ देर बाद छात्रा की तबीयत बिगड़ने लगी .. आरोपित के मुताबिक, दवा की खुराक अधिक थी जिसके चलते तेज दर्द, उल्टी और भारी ब्लीडिंग शुरू हो गई .. छात्रा ने अस्पताल ले जाने की बात कही, लेकिन वह कमरे से बाहर निकलकर सीढ़ियों की ओर भागी और वहीं गिरकर बेहोश हो गई .. आरोपित ने पुलिस को बताया कि खून देखकर वह घबरा गया, और अपने कमरे में ताला लगाकर बस से जौनपुर भाग गया .. छात्रा की तड़प तड़प कर मौत हुई.. 🥲
सुबह हो चली है
मैं उठ रही हूं
और मेरे साथ तुम्हारा सात सुरों का महाकाव्य भी जाग रहा है
मैं नाचते बलखाते अपनी टूटी घुंघरू, अपनी केशों की लटों को बार बार संवार रही हूं
और मेरे सामने तुम
मुझमें नृत्यशैली की भांति समाहित हुए जा रहे हो..!
हे नारायण सदा आत्म अनुरागी
जय जय श्री हरि नारायण ✨✨✨
बीज पत्थर जैसा कठोर है। वह बंद है, संकुचित है और स्वयं में ही कैद है। बीज उस अवस्था जैसा है जहाँ गति रुक गई है। अहंकार का अर्थ भी यही है। स्वयं को एक सीमा में बांध लेना। जब तक ऊर्जा बीज के भीतर बंद है, वह "जड़" है। बहुत से लोग बीज की तरह ही जीकर मर जाते हैं; उनके भीतर की महान संभावनाएं कभी अंकुरित नहीं हो पातीं। यह चेतना की सुषुप्ति है।
जैसे ही बीज टूटता है, संघर्ष शुरू होता है। मिट्टी को चीरकर अंकुर बाहर आता है और वृक्ष का रूप लेता है। जहाँ गति है, फैलाव है और द्वंद्व है। वृक्ष को धूप भी चाहिए और छाँव भी, उसे पतझड़ भी सहना है और वसंत भी। मनुष्य की अधिकांश चेतना इसी "वृक्ष" की अवस्था में है। यहाँ संसार है, संबंध हैं, इच्छाएं हैं और कर्म का कोलाहल है। यहाँ हम दिखाई पड़ते हैं, हमारी पहचान है, हमारा नाम है।
लेकिन वृक्ष का अंतिम लक्ष्य वृक्ष बने रहना नहीं, बल्कि "फूल" बनकर खिल जाना है। और फूल का भी अंतिम गंतव्य "सुगंध" होकर हवाओं में बिखर जाना है। सुगंध वह अवस्था है जो अदृश्य है, ऊर्ध्वगामी है। सुगंध का कोई शरीर नहीं होता, उसका कोई घर नहीं होता, वह मुक्त है।
जब मनुष्य की ऊर्जा प्रेम और ध्यान की अग्नि में तपती है, तब वह सुगंध (शुद्ध चेतना) बन जाती है। सुगंध को आप पकड़ नहीं सकते, लेकिन उसकी उपस्थिति से इनकार भी नहीं कर सकते।
हम अक्सर "वृक्ष" की पूजा करता हैं क्योंकि वृक्ष लकड़ियाँ देता है, छाया देता है। वह उपयोगी है।
साधारण बुद्धि केवल उसे ही सत्य मानती है जिसे छुआ जा सके, लेकिन श्रेष्ठ बुद्धि उसे जानती है जो केवल अनुभव की जा सके।
जीवन का पूरा विज्ञान बस इतना ही है। अपनी ऊर्जा को बीज की जड़ता से मुक्त करना, वृक्ष के संघर्षों से गुज़ारना और अंततः सुगंध की शून्यता में विलीन हो जाना। जो कल तक पत्थर था, वही आज प्रार्थना बन सकता है; बस जरूरत है अपने भीतर की Intensity को सौ डिग्री तक ले जाने की।
#अन्नुश्री
आज सुबह एक फेसबुक मित्र माया ने भोलेनाथ की सवारी दिखाने के लिए एक लाइव वीडियो बनाया, वीडियो बेहद सामान्य था जिसमे न कोई रिवीलिंग कपड़े थे न ही ऐसा कोई कामुक अंदाज़ जिसे देखकर किसी आदमी की सेक्सुअल डिजायर या काम कुंठा जागृत हो जाए।
वीडियो के कमेंट सेक्शन में एक आदमी आकर कमेंट करता है "सुबह से कितनी बार ठुकवा चुकी हो"
अभी उसपर माया ने बेहतरीन तरीके से जवाब दिया बजाय के कमेंट डिलीट करने के...
कई बार किसी पोस्ट पर कोई महिला आदमियों के कमेंट पर थोड़ी भी सख्त लहजे में रिप्लाय कर दे तो ये मेरी पोस्ट पर आई महिलाओं के साथ भी होता है मैं उनकी गरिमा को ध्यान रखते हुए डिलीट कर के ऎसे मनोरोगियों को ब्लॉक कर देती हूँ।
इन्हें देखकर मुझे हमेशा वेबसीरीज़ 'she' की कॉन्स्टेबल भूमि के पति का क़िरदार याद आ जाता है।
इस सीरीज में वो आदमी नपुंसकता से ग्रसित होता है और अपनी कमी छुपाने के लिए भूमि को हर समय बदसूरत, ठंडी, बेकार और छक्का जैसे शब्द बोलकर अपमानित करता है, भूमि को खुद शक होने लगता है कि वो स्त्री ही नहीं है क्योंकि पति को खुश नहीं रख पा रही, तलाक का केस चलता है और इसी दौरान भूमि एक अंडर कवर एजेंट बनकर प्रॉस्टिट्यूट की तरह कुख्यात अपराधी को पकड़ने के लिए भेजी जाती है।
जहाँ हर कोई भूमि को देखकर आकर्षित होने लगता है। खुद वो अपराधी इसके जाल में फस जाता है। फिर एक दिन बाकी वेश्याओं से इसे पता चलता है कि इसका पति अक्सर उधर आता है, घण्टे पर महिलाओं को ले जाकर बेल्ट से पीटना, काटना और अपमानित करना जैसे काम करता है क्योंकि वो उनके साथ कुछ कर नहीं पाता...
अगली बार जब वो भूमि को फिर अपमानित करने की कोशिश करता है तो भूमि के अंदर का सारा गुबार उसके बेल्ट में उतर आया और वो इस लम्पट को मार मार के अधमरा कर देती है।
असल मे सोशल मीडिया प्लेटफार्म की वरचुल दुनिया मे महिलाओं पर यौन टिप्पणी वही आदमी करते हैं जो नपुंसकता से ग्रसित होते हैं और हर पल सबको बस ये बताने की कोशिशों में लगे रहते हैं कि वो कितने बड़े मर्द हैं, क्योंकि असली मर्द महिला की गरिमा, इच्छाओं और पर्सनल स्पेस का सम्मान करना जानते हैं, वो कभी किसी महिला पर यौनिक टिप्पणी नहीं करते।
यदि आपको किसी के विचार, लेख, वीडियो, शक्ल पसन्द नहीं तो ब्लॉक कर दीजिए पर घटिया कुंठित टिप्पणी करने का अधिकार किसी को नहीं।
न पुरुष को न ही महिला को।
शुक्रिया मेरी मित्र सूची के सभी सम्मानित पुरुषों का, जो हमेशा सम्मान से बात करते हैं न सिर्फ मुझसे बल्कि हर एक महिला से भी।
#अन्नुश्री #INDvsPAK
उदासी का सबब वो पूछता है
मिरे होने का ढब वो पूछता है
मुझे मुझ-सा नहीं कोई मिला है
जो मिलता है उसी को पूछता है
कहो सब ख़ैरियत ?उस वक़्त देखूँ
खु़तूत- ए- दस्त, जब वो पूछता है
-Princy
🚨पुरुषत्व का अहंकार और सदियों की खामोश चीखें
आज के समय में समाज के गलियारों में एक अजीब सी बेचैनी है। चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया के कमेंट सेक्शन तक, 'पुरुष समाज' डरा हुआ है। खबर आई है कि कुछ पत्नियों ने अपने पतियों की हत्या कर दी– कहीं हनीमून पर, तो कहीं घर की चारदीवारी के भीतर। अचानक शोर मच गया कि "शादी अब सुरक्षित नहीं रही," पुरुषों के अधिकार खतरे में हैं, और लड़कों को शादी के नाम से डर लगने लगा है।
लेकिन इस शोर के बीच एक सवाल जो चीख-चीख कर खुद को दोहरा रहा है, वो यह है कि— यह डर उस आधी आबादी के हिस्से में हजारों सालों से क्यों नहीं आया, जिसे हर दिन, हर पल मारा जा रहा है?
हैरानी की बात यह नहीं है कि हत्याएं हुई हैं; हत्या किसी की भी हो, वह जघन्य है। हैरानी इस बात पर है कि हमें 'अचंभा' कब होता है। हमें अचंभा तब होता है जब शिकारी खुद शिकार बन जाता है। हज़ारों सालों से स्त्रियों को दहेज की वेदी पर जलाया गया, कोख में ही उनकी सांसें घोंट दी गईं, संतान न होने पर उन्हें जलील किया गया और 'कुल की मर्यादा' के नाम पर उनका कत्ल किया गया।
पर तब समाज को डर नहीं लगा। तब किसी पुरुष ने नहीं कहा कि "मुझे शादी करने से डर लगता है क्योंकि मेरे समाज के पुरुष अपनी पत्नियों को जला रहे हैं।" क्यों? क्योंकि समाज को इसकी आदत पड़ चुकी है। एक स्त्री का मारा जाना हमारे लिए खबर नहीं, बल्कि एक 'दुर्भाग्यपूर्ण घटना' मात्र बनकर रह गई है जिसे हम सुबह अखबार के साथ पढ़ते हैं और शाम तक भूल जाते हैं।
आज जो पुरुष समाज "डर" की दुहाई दे रहा है, वह दरअसल अपनी सत्ता के हिलने से डरा हुआ है। सदियों से पुरुष ने खुद को रक्षक के रूप में स्थापित किया, लेकिन उसी रक्षक की ओट में सबसे ज्यादा भक्षक पैदा हुए। जब एक स्त्री की हत्या उसका पति करता है, तो उसे 'निजी मामला' कहकर ढक दिया जाता है। लेकिन जब स्थिति उलटती है, तो वह पूरे पुरुष समाज के अस्तित्व पर हमला लगने लगता है।
यह धिक्कारने योग्य है कि हमने हिंसा को 'लिंग' के चश्मे से देखना शुरू कर दिया है। एक लड़की जब शादी करके किसी नए घर में जाती है, तो वह अपनी जान हथेली पर रखकर जाती है। उसे नहीं पता कि जिस बिस्तर पर वह सोएगी, वही उसकी कब्र बनेगा या नहीं। लेकिन उसके इस डर को हमने 'संस्कार' और 'त्याग' का नाम देकर महिमामंडित कर दिया।
दहेज के नाम पर जब किसी बहु को केरोसिन डालकर जलाया जाता है, तो पूरा मोहल्ला खामोश रहता है। जब एक पति अपनी पत्नी को हर रात पीटता है, तो पड़ोसी कहते हैं "मियां-बीवी का मामला है।" यह चुप्पी ही पुरुष समाज का सबसे बड़ा अपराध है। आज अगर कुछ छिटपुट घटनाओं ने पुरुषों के मन में डर पैदा किया है, तो यह डर उस खौफ का एक अंश भी नहीं है जिसे एक स्त्री सदियों से अपनी रगों में लेकर जी रही है।
हम किस बात पर गर्व करते हैं? उस वर्तमान पर जहाँ आज भी 'दहेज' के नाम पर बेटियों को मारा जाता है? या उस मानसिकता पर जो आज एक पति की मौत पर तो विलाप कर रही है, लेकिन उन लाखों स्त्रियों को भूल गई जो हर साल घरेलू हिंसा की भेंट चढ़ जाती हैं?
समाज की यह 'आदत' ही सबसे खतरनाक है। हमने अन्याय को सहना नहीं, बल्कि अन्याय को 'अनदेखा' करना सीख लिया है। पतियों की हत्या की खबरें अगर आपको चौंका रही हैं, तो यकीन मानिए, आपको स्त्री की पीड़ा कभी समझ ही नहीं आई। आपको सिर्फ अपनी 'अजेय' होने का भ्रम के टूटने का दुख है।
धिक्कार है उस सोच पर जो बराबरी के हक की बात तो करती है, लेकिन जब दर्द का पलड़ा थोड़ा सा भी बदलता है, तो शोर मचाने लगती है।
यदि सच में समाज को बचाना है, तो उस जड़ पर प्रहार कीजिए जहाँ 'हिंसा' को पुरुष का गहना और 'सहनशीलता' को स्त्री का भाग्य बताया गया है। जिस दिन एक स्त्री का कत्ल आपको उतना ही चौंकाने लगेगा जितना एक पुरुष का कत्ल आज चौंका रहा है, उस दिन समझिएगा कि समाज में मानवता अभी जिंदा है। तब तक, आपका यह डर सिर्फ एक पाखंड है।
–राकेश कुमार
@rakesh3kr धन्यवाद आपका