#DeshdrohiBCCI का PR तंत्र यह ज्ञान दे रहा है कि फिर तो हम ऑलम्पिक में भी भाग न लें। जिन चिरकुटों को लगता है कि ऑलम्पिक और एशिया कप एक हैं, वो वस्तुतः पैसा पकड़ने वाले दलाल हैं।
ऑलम्पिक का समानांतर वर्ल्ड कप है, और दूसरी बात कि ऑलम्पिक की गवर्निंग बॉडी में भारत का वर्चस्व शून्य है। वहीं, ICC को यदि भारत कहेगा कि पाकिस्तान को हटा दो, बैन कर दो, तो व्यापार के कारण उसे वह भी करना पड़ेगा।
ऑलम्पिक कमिटी में जिसका वर्चस्व है, वो दूसरे देशों को प्रतिबंधित करवा देता है। रूस एवम् बेलारूस को 2024 ऑलम्पिक में यूक्रेन युद्ध के कारण प्रतिबंधित किया गया था। ऐसे कई उदाहरण हैं। अपार्थीड के समय अफ्रीका प्रतिबंधित नहीं था क्या?
भारत से वह भी नहीं हो पा रहा कि ICC से निंदा प्रस्ताव निकलवा दें कि जो सक्रिय खिलाड़ी हैं, वो पहलगाम के बाद सोशल मीडिया पर नरसंहार को सेलिब्रेट कर रहे हैं। तो यह न केवल ICC की असफलता है, बल्कि हमारी सरकार की भी है।
वापस, एशिया कप पर आते हैं। यह टुच्चा टूर्नामेंट है। इसमें पहले भी भारत और पाकिस्तान, ऐसे ही समय में बैक-आउट कर चुके हैं। पाकिस्तान ने तो पहले किया था, तो आपके पास पहले के उदाहरण हैं। हाँ, पैसे के लिए वेश्या बनना है @BCCI को, तो वो @jatinsapru जैसों को फ्रंट बना कर ज्ञान दे रहे हैं।
और हाँ, ऑलम्पिक का मेडल भी शत्रु राष्ट्र द्वारा किए गए नरसंहार के सामने कुछ भी नहीं। आत्मसम्मान मेडल से बड़ी विषयवस्तु है। यदि आपका राजनीतिक नेतृत्व हर दूसरे दिन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर बोल रहा हो, और आप यहाँ मैच खेलने को जस्टिफाय कर रहे हैं, तब तो ये दोगलापन है।
अतः, इन कमेंटेटर्स, प्रेजेंटर्स को पहचानिए और हर प्लेटफॉर्म पर उनसे पूछिए कि उनकी घर के किसी व्यक्ति की हत्या कर दी जाए, तो क्या वो मुहल्ले के कैरम टूर्नामेंट में हत्यारे के साथ बैठ कर खेलना पसंद करेंगे?
पाकिस्तान को हर प्लेटफॉर्म पर अकेला कीजिए। जीत जाए वो एशिया कप, हमें अंतर नहीं पड़ता। ये ICC इवेंट नहीं है, और यदि वह भी होता तब भी हमें बहिष्कार ही करना चाहिए। विशेष कर तब, जब आपके पीएम ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को अभी भी बंद हुआ नहीं मानते।
खेल, राष्ट्रीय आत्मसम्मान से बड़ा नहीं हो सकता क्योंकि खेल जीतना स्वयं राष्ट्रीय सम्मान बढ़ाने का ही पर्याय है। आशा तो यह थी कि खिलाड़ी स्वयं इसका विरोध कर, खेलने से मना करते, परंतु BCCI उनका करियर बर्बाद कर देगा। अतः, हमारे कोप का भाजन ये देशद्रोही बोर्ड, सरकार और ये खेल बने।
#BoycottAsiaCup
आजकल बैंक का नाम सुनते ही लोग अक्सर स्टाफ पर गुस्सा निकालते हैं , उन्हें कामचोर समझते हैं , जबकि हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। एक समय था जब बैंक की नौकरी अपेक्षाकृत आसान थी , लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।
डिजिटल इंडिया के इस दौर में बैंक देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं। रोजाना करोड़ों का लेन-देन , खातों का प्रबंधन , लोन प्रोसेसिंग , सरकारी योजनाओं का वितरण , केवाईसी अपडेट, डिजिटल फ्रॉड से निपटना और लगातार बदलते नियमों का पालन ये सब एक साथ बैंक कर्मियों पर भारी दबाव डाल रहे हैं।
स्टाफ की संख्या लगातार घट रही है , लेकिन वर्कलोड लगातार बढ़ रहा है। कई बार छुट्टियों और संडे को भी कर्मचारियों को ड्यूटी पर बुलाया जाता है। टारगेट का दबाव , तकनीकी समस्याएं , और ग्राहक सेवा की जिम्मेदारी यह सब मिलकर बैंक कर्मचारियों को मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से थका देता है।
फिर भी, इन्हीं कर्मचारियों की मेहनत से ग्रामीण क्षेत्रों तक वित्तीय सेवाएं पहुंच रही हैं , सरकारी योजनाओं का लाभ सही हाथों तक पहुंच रहा है , और देश का वित्तीय तंत्र 24x7 चलता है।
अगर बैंकिंग सेक्टर में समय रहते सुधार नहीं किए गए जैसे स्टाफ बढ़ाना, कार्य समय का संतुलन , डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को और मज़बूत करना तो इसका असर सीधे ग्राहकों की सेवा गुणवत्ता पर पड़ेगा और सिस्टम पर भरोसा भी कमजोर हो सकता है।
सरकारी बैंक कर्मचारी सुस्त हैं , और प्राइवेट बैंक कर्मचारी एक्टिव >> ये तुलना पूरी सच्चाई नहीं है।
पहले ये समझिए कि प्राइवेट बैंकों में ग्राहक कौन होते हैं.?
ज्यादातर पढ़े-लिखे , तकनीक से परिचित और समय की कीमत समझने वाले लोग।
ये ग्राहक फॉर्म खुद भरते हैं , लाइन में कम लगते हैं , और बहुत-सी चीजें मोबाइल ऐप या नेट बैंकिंग से खुद ही कर लेते हैं।
यानी , बैंक कर्मी का काम पहले से आधा हल्का हो जाता है।
वहीं दूसरी तरफ , सरकारी बैंकों में हर तबके का ग्राहक आता है >>
किसान , मजदूर , बुज़ुर्ग , अनपढ़ , विधवा, पेंशनर , छात्र, विकलांग – कोई भी सोचिए, वो वहीं मिलेंगे।
कई बार तो ग्राहक को अपनी समस्या भी ठीक से समझ नहीं होती , उसे समझाना , दस्तावेज़ जुटवाना , और फिर सिस्टम में उसका काम करना , बैंक कर्मचारी का ही जिम्मा बन जाता है।
इसके बाद भी लोग कहते हैं कि सरकारी बैंक वाले कामचोर हैं।
सरकारी बैंक कर्मचारी ना सिर्फ बैंकिंग कर रहे होते हैं , बल्कि एक सामाजिक ज़िम्मेदारी भी निभा रहे होते हैं।
हर तरह के सरकारी स्कीम पेंशन , जनधन, किसान सम्मान निधि , छात्रवृत्ति, मनरेगा भुगतान – सबका लोड इन बैंकों पर ही आता है।
भीड़ , सिस्टम की धीमी रफ्तार , सरकारी नीतियों की जटिलता और ऊपर से ग्राहक की कम जानकारी – इन सबके बीच भी वो काम कर रहे होते हैं।
तो अगली बार जब आप कहें कि सरकारी बैंक वाले सुस्त हैं , तो एक बार जाकर उनकी कुर्सी पर बैठकर देखिए...
काम समझ में आ जाएगा , और सम्मान भी।
@mufaddal_vohra Champions- Australia
Runner Ups- West Indies
Highest Run Scorer - Travis Head
Highest wicket Taker - Mitchell Starc
Player Of the Tournament- Andre Russell
This vulgarly exploitative politics around reservations is damaging our society and the quality of education, and it will eventually destroy India.
Today, they are provoked to fight with Unreserved category, soon communities will be provoked to fight within the reserved category. The worst losers will be overall reserved-class people.
Do you really believe that any political leader is genuinely interested in you or your caste?
*UR = Unreserved.
बिहार सरकार के स्टेट हेल्थ सोसायटी की तरफ ‘कम्यूनिटी हेल्थ ऑफिसर’ के पद हेतु 4500 रिक्तियाँ निकाली गईं। अनारक्षित वर्ग के लिए शून्य रिक्तियाँ थीं। हालाँकि, यह लिखा हुआ है कि इनमें पहले की छूटी हुई रिक्तियाँ भी सम्मिलित हैं।
परंतु, प्रश्न यह है कि जब अनारक्षित के लिए पद है ही नहीं तो योग्यता क्यों वर्णित है? यह स्पष्ट क्यों नहीं लिखा गया है कि 25% सामान्य वर्ग के लिए यह भर्ती नहीं है, बल्कि पहले की जो SC/ST/OBC/EWS के पद नहीं भरे गए थे, उन्हीं के लिए है?
अब @BJP4Bihar, उपमुख्यमंत्री @samrat4bjp, जो स्वास्थ्य मंत्री भी हैं, यह उत्तर दें कि सामान्य वर्ग के 1125 पद कहाँ हैं? यदि, वह हैं ही नहीं तो स्पष्टीकरण क्यों नहीं आ रहा?
मुख्यमंत्री @NitishKumar यह उत्तर दें कि कब तक आप बिहार को श्रमिक राजधानी बना कर रखोगे? सामान्य वर्ग के लोगों का कोई अधिकार बचा है या नहीं?
@narendramodi जी, मैं विश्वास और अनुभव के बल पर यह कह रहा हूँ कि आपको बिहार से केवल 40 लोकसभा सीटें चाहिए होती हैं जो बिहार आपको देता है। इसके उपरांत भी आपने बिहार को, वहाँ की सत्ता में होने के बाद भी, ऐसा क्या दिया कि हम आपसे यह न पूछें कि हमने आपका क्या बिगाड़ा है?
मैंने यह जानने की चेष्टा की कि इस 4500 रिक्तियों के विषय पर सरकार का कोई स्पष्टीकरण मीडिया में आया होगा, पर मुझे नहीं मिला। सामान्य वर्ग को @BJP4India यह बता दे कि उन्हें पाकिस्तान चला जाना चाहिए, या गंगा जी में कूद कर सामूहिक आत्महत्या कर लेनी चाहिए।
50% की सीमा तोड़ी गई, और अब बिहार में वह 65% है। राजनीतिक कारणों से अब वह सीधा न्यायालय में ही जा कर पलटेगा क्योंकि अब भाजपा स्वयं पलट कर सत्ता की गिरी मलाई जमीन पर से जीभ लगा कर चाट रही है।
मुझे टैग कर के बिहारी भाई मेरे बिहारी और सवर्ण होने पर आक्षेप कर रहे हैं कि मैंने इस पर बोला क्यों नहीं! उत्तर यह है कि आपको ऐसा भ्रम होगा कि लोग मेरी बात पढ़ते हैं और उस पर कार्य होता है, जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है।
मेरी बात भी ट्विटर पर वैसे ही घूमती है, जैसे आपकी। मैंने आरक्षण का विरोध सदैव ही किया है, चाहे पार्टी कोई भी सत्ता में हो। इसलिए, मुझे अपराध बोध की यात्रा पर आप भेज नहीं सकते। मैं कई बातों पर इसलिए नहीं लिखता क्योंकि मैं जानता हूँ मेरे लिखने से कुछ नहीं होता।
यह निर्णय नहीं पलटा जाएगा। यही सम्राट चौधरी पहले इस बात की उपेक्षा करेगा, फिर भी यदि स्थानीय मीडिया माइक ले कर इससे कुछ उगलवाने में सफल रही तो ये कुछ गोल-मोल बोल कर निकल लेगा।
सत्य यह है कि बिहार भाजपा नकारे लोगों का ऐसा समूह है जो मोदी का फोटो मुँह पर बाँध कर नाचने का कार्य करते हुए, इस अवसर की प्रतीक्षा में रहता है कि नीतीश कब पलटे और उनके भाग्य खुले। ये पूरे राष्ट्र के सबसे कामचोर, निकृष्ट और उच्च कोटि के निकम्मे लोग हैं जिनके पास न अच्छी सोच है, न दृष्टि।
बिहार के भाइयो! मेरे ट्वीट से कुछ नहीं होगा। न आपके यह लिखने से कि ‘मैं भाजपा के विरोध में नहीं लिख सकता’। यह झुनझुना आप स्वयं सुनिए। इस चिरकुटई भरे वाक्य से मुझे घंटा अंतर नहीं पड़ता।
'No five-judge bench can be voice of 140 cr Indians...': MP Sasmit Patra on judiciary vs legislature
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Chandrayaan-3 Mission:
'India🇮🇳,
I reached my destination
and you too!'
: Chandrayaan-3
Chandrayaan-3 has successfully
soft-landed on the moon 🌖!.
Congratulations, India🇮🇳!
#Chandrayaan_3#Ch3