#cjp@CJP_for_India NTA भंग कर यूपीएससी की तरह एक पारदर्शी संवैधानिक संस्था बनाई जाय. विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों की नियुक्तियों से लेकर उच्च शिक्षा के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं तक उसी से आयोजित हों. न्यायिक सेवा में भी इसी तरह नियुक्तियां हों.
#cjp_पार्टी हिम्मत है तो पूरे अकादमिक सिस्टम को बदलने का आंदोलन करो. चेले, चेली और अटैची गुरुओं की जमात से परीक्षाओं में पारदर्शिता और ऑक्सफोर्ड कैंब्रिज की होड़ की उम्मीद मूर्खता है. सारे भ्रष्टाचार की जड़ विश्वविद्यालय और उनकी भ्रष्ट संस्कृति है.
दुर्भाग्य यह है कि विपक्ष के पास कोई वैचारिक आधार नहीं. वह ज़मूरो की दिशा हीन भीड़ भीड़ के भरोसे है. भीड़ की तरह ही उससे होने वाले बदलाव भी दिशा हीन होते हैं. कॉकरोच सिर्फ 'नकार' से पैदा हुए हैं. राजनीतिक दलों और अमेरिका चीन का जूठा खाकर जी तो सकते हैं, लेकिन फैलाएंगे बीमारी ही.
जंतर-मंतर पर खलिहरो की भीड़ है. विदेशी चंदे और विपक्षी नेताओं के सपोर्ट से चल रहा अराजक भीड़ का एकत्रीकरण. न, विजन न दिशा न बोध. फिर भी सरकार ने हथियार डाल दिए. मोदी जी भूसे का पुतला बन गए हैं.
प्रधान नहीं उनके पीछे का रैकेट जिम्मेदार है. उसके सामने प्रधान जैसे दर्जनों की औकात नहीं. उसने विश्वविद्यालय से देवालय तक हर जगह ब्रांच खोल रखी हैं. समय दबी जुबान कहने का नहीं खुल कर बोलने का है. प्रधान नहीं वह रैकेट दोषी है प्रधान जिसके चेहरे थे .
अटैची और नोटों के सहारे पद पाने वाले पेपर लीक नहीं करेंगे तो खर्चा कैसे निकालेगा ? एक परीक्षा नहीं नहीं तमाम अटैची गुरुओं की जाँच होनी चाहिए. विभिन्न संस्थानों के प्रमुख और कुलपति से लेकर विश्वविद्यालयों और चयन आयोग से नियुक्त उच्च शिक्षा के जगमगाते चेहरों की.
अराजकता को नई दिशा मिल रही है. बांग्लादेश, नेपाल और अब भारत. दक्षिण एशियाई देशों में जेनेरेशन जेड के नाम पर होने वाले आंदोलनों के पैटर्न एक हैं. बदलाव और जिम्मेदारी जरूरी है, लेकिन भीड़ के पीछे कौन है यह समझना भी जरूरी है. प्रधान ने शिक्षा को नाक तक भ्रष्टाचार में डुबा दिय
जिसमें राम को लाने का दंभ हो उसके लिए राम भगवान नहीं ख़ज़ाना ही होंगे . भक्ति और भक्त में अहंकार नहीं होता. जो राम का ही मालिक बन गया वह खजाने का मालिक तो खुद ब खुद बन जाएगा फिर भ्रष्टाचार हुआ कहाँ ? हाय तोबा किस बात का ?
शिक्षा में राजनीति का प्रवेश बहुत गहरा होता जा रहा है शिक्षकों की सोशल मीडिया वाल राजनेताओं से भी आगे निकल गई है . शिक्षक का काम राजनीतिक प्रवक्ता बनना नहीं . तर्क और और विवेक की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है वे राजनीतिक पक्षपात की लाठी पीट रहे हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है.
समाज की नैतिकता का दबाव और सोशल मीडिया इन्टरनेट का निर्बाध खुलापन नई पीढ़ी में कुंठा बढ़ा रही है . दोनों के बीच फांक इतनी चौडी है कि उनमें पति पत्नी या मंगेतर का धकेला जाना आश्चर्य नहीं .
हमने एक ऐसा तथाकथित खुला आसमान रच लिया है, जो नीला दिखने से खुलेपन का भ्रम रचता है लेकिन वह कुंठा की स्याह गहराइयों की अभेद्य परत है. उसमें सिर्फ फरेब है . पति, मंगेतर के लिए पहाड़ खाई और नीले ड्रम और पत्नियों के लिए फ्रिज सूटकेस उसी की देन है .
थक गया हूँ वक़्त! कदमों की नहीं आहट कहीं,
उम्र गुज़री राह में, मंज़िल की अब चाहत नहीं।
जीस्त के इस ढाल पर अब आशियाना क्या करूँ,
हो मयस्सर छाँव भी, फिर भी कहीं राहत नहीं।
त्रिभाषा सूत्र वर्षों से चल रहा है लेकिन भाषा की हालत स्कूल शिक्षा में सबसे खराब है. उत्तर भारत ने दक्षिण की किसी भाषा को स्कूल में नहीं आने दिया. दिल्ली के स्कूल में अतिरिक्त विदेशी भाषा स्पेनिश, फ्रैंच और जर्मन शामिल है. अँग्रेजी के साथ मिला कर 4 भाषाएँ चीनी भाषा क्यों नहीं?