“मोदी सरकार को मालूम था कि एक दिन चुनाव आयोग के भीतर का खेल बाहर आएगा और जनता चुनाव आयुक्त को गिरफ्तार करने की मांग करेगी। इसीलिए दिसंबर 2023 में मोदी सरकार ने कानून बनाया कि चुनाव आयुक्तों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह कानून तब बना जब दोनों सदनों के 141 सांसदों को सस्पेंड कर दिया गया था। सदन में कोई विपक्ष ही नहीं था। अब समझ में आ रहा है कि वह कानून किसलिए बनाया गया था।"
आज पूना पैक्ट दिवस, जिसे हमारे रहबर मान्यवर कांशीराम साहब ने ‘धिक्कार’ कहा, के अवसर पर 24 सूत्रीय मांगों को लेकर देशभर के जिला मुख्यालयों पर ‘सम्पूर्ण भागीदारी महाआन्दोलन’ कर महामहिम राष्ट्रपति महोदया जी के नाम ज्ञापन दिया गया।
इसी क्रम में, मैं स्वयं लखनऊ के ईको गार्डन में शामिल हुआ।
#सम्पूर्ण_भागीदारी_आंदोलन
#ASP_K_Support_UGC_Act
#ASP_K_Support_UGC_Act
@rashtrapatibhvn@mygovindia
मैं तीन साल से वोट चोरी का पर्दाफ़ाश करता आ रहा हूँ। अब चुनाव आयुक्त खुद इसे स्वीकार कर सच्चाई उजागर कर रहे हैं।
ज्ञानेश कुमार ने देशद्रोह किया है। वो अभी इस्तीफ़ा दें और approver बन जाएं।
वोट चोरी की साज़िश में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की पूरी जांच होगी।
लीगल नोटिस 🚨🚨 जिस भी व्यक्ति ने साहिल वाकोडे की मौत के बाद चीटिंग से जोड़कर उसका चरित्र हनन किया है, उसपर SC ST एक्ट के तहत मुकदमा पंजीकृत होगा,
अगले 24 घंटे का समय है अपने ट्वीट डिलीट करके सार्वजनिक माफ़ी मांगे,
SC ST एक्ट में सख्त प्रावधान है किसी जीवित या मृत SC ST व्यक्ति को अपमानित करना या उसका चरित्र हनन करना जुर्म है,
[ नोट - में साहिल वाकोडे के पिता से संपर्क में हूं, जल्द ही मनुवादियों की रेल बनाई जाएगी ]
आईआईटी मुंबई में एक दलित छात्र - साहिल आत्महत्या कर लेता है। प्रशासन तुरंत स्पष्टीकरण जारी करता है—जातीय भेदभाव नहीं हुआ, छात्र नकल करते पकड़ा गया था। मौत के तुरंत बाद यह सफाई आती है, जांच से पहले।
जाति एक ऐसी मानसिक संरचना है जो सामाजिक परिवेश से दिमाग में घुसती है और स्थायी हो जाती है। इसका सबसे साफ रूप शादी-विवाह में दिखता है। अपवाद छोड़कर लोग अपनी जाति के अंदर ही विवाह करते हैं। इसके बावजूद लगभग हर कोई जाति से इनकार करता दिखाई देता है। व्यवहार एक है, भाषा दूसरी।
प्रो. सूर्यनारायण डूला विदेश पढ़े हैं, काबिल हैं। यह बात अपने आप यह साबित नहीं करती कि उनके दिमाग में जाति का कीड़ा नहीं है। अनपढ़ भेदभाव खुलकर और क्रूरता से करता है। पढ़ा-लिखा उसे सूक्ष्म तरीके से करता है—टिप्पणी, धमकी, मूल्यांकन, नेटवर्क। जान जा सकती है, जाति नहीं जाती।
भारत के सामाजिक पिछड़ेपन और बार-बार की गुलामी की एक बड़ी जड़ जाति रही है। जब तक शादी, सम्मान और रोजमर्रा का व्यवहार जाति के घेरे में रहेगा, यह जड़ बनी रहेगी।
बाबासाहेब के अपमान और संविधान की अवमानना के लिए भाजपा और उनके संगी-साथी समय-समय पर तरह-तरह के कुतर्क देते रहते हैं। इसी कड़ी में संविधान को बदलने या पूरी तरह से ख़त्म करने की साज़िश करनेवाले अपंजीकृत व भूमिगत रहनेवाले इनके विचारवंशी कह रहे हैं कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी ने संविधान लिखा ही नहीं। इनका बस चले तो यह ये भी कह सकते हैं कि संविधान है ही नहीं। दरअसल ऐसे संकीर्ण मानसिकता के लोगों ने संविधान को हमेशा ही नकारा है। यही वो लोग हैं जो बाबासाहेब की मूर्तियों को तोड़ते हैं, ख़ासतौर से बाबासाहेब की मूर्तियों के हाथों को क्योंकि उन हाथों में संविधान की किताब होती है।
सच तो ये है कि एकरंगी-सुरंगजीवी नकारात्मक सोच के लोगों ने संविधान को कभी माना ही नहीं क्योंकि ये संविधान ही ग़ैरबराबरी को दूर करने के लिए समता-समानता की बात करता है। यही संविधान इन प्रभुत्ववादियों के उस वर्चस्व को चुनौती देता है, जिस वर्चस्व की वजह से इन्होंने पाँच हज़ार सालों से शोषित, वंचित, ग़रीब ‘पीडीए समाज’ का लगातार दमन किया है।
आज संविधान ‘पीडीए समाज’ की ढाल भी है और रक्षा कवच भी। संविधान से मिला हुआ ‘आरक्षण’ आज इन परंपरागत शक्तिशाली लोगों को फूटी आँख नहीं सुहाता है। ये वो पुरातनपंथी-रूढ़िवादी-दक़ियानूसी लोग हैं जो परिवर्तन चाहते ही नहीं है, जबकि संविधान सकारात्मक परिवर्तन का एक बेहद ताक़तवर दस्तावेज़ है।
हमने पहले भी कहा है, आज फिर दोहरा रहे हैं : शोषणकारियों के ख़िलाफ़, बाबासाहेब हमें संविधान के रूप में काग़ज़ का एक ऐसा ताक़तवर दस्तावेज़ देकर गये हैं, जो लोहे की तलवार से भी ज़्यादा मजबूत है।
संविधान ही पीडीए के भविष्य का विधान है।
संविधान ही संजीवनी है। इसमें संजीवनी की तरह को देश को अच्छा करने की और अच्छा बनाए रखने की अद्भुत शक्ति है। इसीलिए देश का नया नारा ‘जय जवान! जय किसान!! जय संविधान!!! होना चाहिए।
संविधान को चुनौती देनेवाले पाँचों इंद्रियों को सक्रिय करके सुन लें कि ‘देश संविधान से चलेगा, किसी संघ-विधान या मन-विधान से नहीं।’
संविधान था, संविधान है, संविधान रहेगा!
देश पर एक system का कब्ज़ा है - परत दर परत।
कौन है ये सिस्टम?
RSS और "हम दो, हमारे दो" की अगुवाई में गिनती के लोगों ने मिल कर भारत की हर संस्था पर अपना नियंत्रण कर लिया है।
सरकार हो, व्यापार हो, शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, खेल हो, मीडिया हो, न्यायपालिका हो, चुनाव आयोग हो या bureaucracy - इस सिस्टम में हुनर नहीं, पैसा और पहुंच मायने रखता है।
इस क़ब्ज़े के खिलाफ, भ्रष्टाचार के खिलाफ, अन्याय के खिलाफ छात्रों की आवाज़ ही सिस्टम के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
इसीलिए system को students से खतरा है - क्योंकि वो सवाल पूछते हैं, जवाबदेही मांगते हैं।
इसी डर से सिस्टम छात्र नहीं, अंधभक्त चाहता है - छात्रों को प्रताड़ित करता है, अंधभक्त को बढ़ावा देता है, ताकि कोई सवाल न उठे और मनमानी चलती रहे।
#ChhatronKiGoonj
पहले शिवसेना, फिर NCP और अब तृणमूल कांग्रेस।
हर बार एक ही पैटर्न - BJP और चुनाव आयोग मिलकर एक पार्टी को तोड़ते हैं। फिर उसका चुनाव चिन्ह छीन लिया जाता है।
जब पूरी की पूरी पार्टी चोरी हो सकती है, तो करोड़ों भारतीयों के वोट चोरी होना भी हैरानी की बात नहीं।
वोट चोरी। सरकार चोरी। अब पार्टी चोरी - ये हमारे लोकतांत्रिक पतन के प्रतीक बन गए हैं।
ECI की संवैधानिक ज़िम्मेदारी जनादेश की रक्षा करना है - मगर उल्टा वो उन ताकतों की मदद कर रहा है, जो जनता के फैसले को ही पलट देते हैं।
यह लड़ाई सिर्फ़ ममता बनर्जी जी की नहीं है। यह हर राजनीतिक दल, हर मतदाता की लड़ाई है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव चाहता है।