सरकारी बैंक कर्मचारी सुस्त हैं , और प्राइवेट बैंक कर्मचारी एक्टिव >> ये तुलना पूरी सच्चाई नहीं है।
पहले ये समझिए कि प्राइवेट बैंकों में ग्राहक कौन होते हैं.?
ज्यादातर पढ़े-लिखे , तकनीक से परिचित और समय की कीमत समझने वाले लोग।
ये ग्राहक फॉर्म खुद भरते हैं , लाइन में कम लगते हैं , और ���हुत-सी चीजें मोबाइल ऐप या नेट बैंकिंग से खुद ही कर लेते हैं।
यानी , बैंक कर्मी का काम पहले से आधा हल्का हो जाता है।
वहीं दूसरी तरफ , सरकारी बैंकों में हर तबके का ग्राहक आता है >>
किसान , मजदूर , बुज़ुर्ग , अनपढ़ , विधवा, पेंशनर , छात्र, विकलांग – कोई भी सोचिए, वो वहीं ��िलेंगे।
कई बार तो ग्राहक को अपनी समस्या भी ठीक से समझ नहीं होती , उसे समझाना , दस्तावेज़ जुटवाना , और फिर सिस्टम में उसका काम करना , बैंक कर्मचारी का ही जिम्मा बन जाता है।
इसके बाद भी लोग कहते हैं कि सरकारी बैंक वाले कामचोर हैं।
सरकारी बैंक कर्मचारी ना सिर्फ बैंकिंग कर रहे होते हैं , बल्कि एक सामाजिक ज़िम्मेदारी भी निभा रहे होते हैं।
हर तरह के सरकारी स्कीम पेंशन , जनधन, किसान सम्मान निधि , छात���रवृत्ति, मनरेगा भुगतान – सबका लोड इन बैंकों पर ही आता है।
भीड़ , सिस्टम की धीमी रफ्तार , सरकारी नीतियों की जटिलता और ऊपर से ग्राहक की कम जानकारी – इन सबके बीच भी वो काम कर रहे होते हैं।
तो अगली बार जब आप कहें कि सरकारी बैंक वाले सुस्त हैं , तो एक बार जाकर उनकी कुर्सी पर बैठकर देखिए...
काम समझ में आ जाएगा , और सम्मान भी।
ये कौन देशद्रोही है ,
जो ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी की बात खुलेआम करके लोगों को भड़का रहा है ? क्या इसे चीन से फंड मिल रहा है ? क्या ये देश में सिविल वार करवाना चाहता है ?
इटावा के अहेरीपुर में यादव समाज के कथावाचक से लोग अपनी कथा करवा रहे थे, फिर उसी गांव के ब्राह्मणों को पता चला कि कथावाचक “यादव” है।
उसके बाद ब्राह्मणों द्वारा कथावाचक का सिर मुंडवाकर उसको अपमानित किया गया।
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‘जैसे डॉक्टर हमारी जान की परवाह करते हैं वैसे हमें भी करनी होगी…’
मुंबई में रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन के प्रमुख अक्षय यादव ने कोलकाता अस्पताल में तोड़फोड़ पर प्रतिक्रिया दी. सु��िएगा-