स्वतंत्र भारद्वाज ने गलत किया तो 70 दिन बाद भी SC/ST लगा दिया जाएगा और वो जेल जाएगा लेकिन उसको पीटनेवाले वीडियो में दिख रहे हैं पर उनपर कोई कार्रवाई नहीं होगी।
अजीत भारती को गाली देनेवाले का बाल भी बांका नहीं होगा लेकिन अजीत के जवाब पर SC/ST एक्ट भी लगेगा और उसको एंटीसिपेटरी बेल भी नहीं मिलेगी।
ये सिर्फ दो उदाहरण नहीं हैं.. यही आज की डेट में हमारे समाज की सच्चाई है।
सवाल बस इतना है कि जब किसी के गलत पर होनेवाला कानूनी एक्शन उसकी जाति देखकर होता है तो वो प्रक्रिया बटेंगे तो कटेंगे की कैटेगरी में आती है या नहीं?
जब देश की व्यवस्था ही हमें एक नहीं मान रही तो काहे का एक हैं तो सेफ हैं फिर? आज कोई और है.. कल को हममें से कोई होगा। बस अपनी बारी का इंतजार कीजिए।
@VinodAgnihotri7 जी, आचार्य @AcharyaPramodk जी को अपनी बात रखने दीजिए आपको क्या दिक्कत है? वैसे तो अभिव्यक्ति के पुरोधा आप बनते हैं और आचार्य जी के हर वक्तव्य पर एक ट्रोल की तरह कमेंट करते हैं।दरअसल आपको दिक्कत ये है कि आचार्य जी आपकी सड़ी हुई गुलामी की विचारधारा छोड़ चुके हैं।
वाह आचार्य इतना भी मत बहिये ।बकौल आपके गांधी जी के असहयोग आंदोलन के बाद हुए सारे आंदोलन जिनमें अगस्त क्रांति किसानों के आंदोलन जेपी आंदोलन चिपको आंदोलन शराब बंदी आंदोलन अयोध्या आंदोलन अन्ना आंदोलन आदिवासियों के आंदोलन आदि संस्कारहीन थे।तारीफ़ कीजिए पर दूसरों को बिना छोटा किए ।
इससे साबित होता है कि आज तक ये कभी चाय की दुकान पर गया ही नहीं है।और पूरे भारत के चाय वालों पर कलंक लगाते हुए कह रहा है "यही पूरे हिंदुस्तान की रियलिटी है"।
पूरी तरह से पागल हो गया है और कुछ भी बक रहा है। देश के सभी चाय वालों को अपना सम्मान बचाने के लिए इस पर FIR करनी चाहिये।
इससे साबित होता है कि आज तक ये कभी चाय की दुकान पर गया ही नहीं है।और पूरे भारत के चाय वालों पर कलंक लगाते हुए कह रहा है "यही पूरे हिंदुस्तान की रियलिटी है"।
पूरी तरह से पागल हो गया है और कुछ भी बक रहा है। देश के सभी चाय वालों को अपना सम्मान बचाने के लिए इस पर FIR करनी चाहिये।
और तीसरी व्यवस्था होती है प्लास्टिक की थैली की .....
जाति पूछने के बाद दुकानदार आवाज लगाता है .....छोटू यह पिछड़ा वर्ग OBC वाला है इसको थैली में बांधकर दे दो 😂🤣😂
कितना बवासीर आदमी है यार 😂😂😂
देश के हर दलित व्यक्ति का जन्म से मृत्यु तक, हर जगह, हर कदम अपमान किया जाता है।
उनकी जितनी बुलंद आवाज़ होती है, उनपर उतना तेज़ हमला होता है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे जी के साथ हल्द्वानी में जो भी हुआ वो "शुद्धिकरण" का नाम दे कर उनके खिलाफ़ छुआछूत है - और छुआछूत भारत के संविधान के अनुसार दंडनीय अपराध है।
इस बात को 20 दिन हो गए - मगर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई, कोई FIR दर्ज नहीं हुई।
नरेंद्र मोदी जी, देश के हर दलित व्यक्ति को आपकी यह दलित विरोधी विचारधारा साफ़ दिखाई दे रही है।
अब गेंद BJP के पाले में है - जल्द से जल्द SC-ST क़ानून के तहत FIR दर्ज हो, कार्रवाई हो और न्याय हो - वरना कांग्रेस पार्टी न्याय हासिल करना अच्छे से जानती है।
@VinodAgnihotri7@RahulGandhi जिस जमाने में सोशलमीडिया नहीं होता था लोग केवल अखबारों व पत्रिकाओं पर निर्भर रहते थे तब विनोद अग्निहोत्री विनोद शर्मा सतीश के सिंह जैसे दरबारी पत्रकारों का लिखा हुआ नैरेटिव खूब बिकता था
इन्ही सरकारी पत्रकारों के दम पर ही कांग्रेस 60 वर्षों तक देश पर राज कर पाई
आज हरकोई समझदार है
@VinodAgnihotri7@RahulGandhi अरे महोदय अब @RahulGandhi को सामजिक चिंतक बना दिया?
किस घर में मनुस्मृति है और कितने हिंदूओं ने पढ़ी है या उस पर चल चल रहे हैं? और क्या आप और आपके तथाकथित सामाजिक चिंतक भारतीय समाज के अन्य धर्मों की किताबों के बारे में प्रश्न उठाने की हिम्मत रखते हैं? @anantvijay@ARanganathan72
अरे महोदय अब @RahulGandhi को सामजिक चिंतक बना दिया?
किस घर में मनुस्मृति है और कितने हिंदूओं ने पढ़ी है या उस पर चल चल रहे हैं? और क्या आप और आपके तथाकथित सामाजिक चिंतक भारतीय समाज के अन्य धर्मों की किताबों के बारे में प्रश्न उठाने की हिम्मत रखते हैं? @anantvijay@ARanganathan72
जिन्हें @RahulGandhi के मनुस्मृति वाले विमर्श पर एतराज है वो पहले अंबेडकर को पढ़ें जिनका पूरा दलित विमर्श मनुस्मृति के निषेध पर आधारित है।राहुल नई बात नहीं कह रहे हैं।वो वही दोहरा रहे हैं जो इसके पहले सामाजिक न्याय के हर चिंतक ने कहा है।क्या कोई दल मनुस्मृति के पक्ष में बोलेगा ?
दोनों को विदेश शिफ्ट कर दिया है अंकल ने उन्हें आरक्षण और जातिगत राजनीति से बचा लिया
अब अंकल आरक्षण को डिफेंड करके चाटुकारिता की पराकाष्ठा को दिखाते हुए अपनी राजनीति बचा रहे हैं
निर्लज्ज
अजय आलोक जितना भी चाटुकारिता कर लो इस जन्म में कभी टिकट नहीं मिल पाएग।
कभी नीतीश जी की झोला उठाते थे दल बदलकर आज कल भाजपा का झोला लेकर घूम रहे है दल बदलू आदमी को कोई वैल्यू नहीं होता।
सामान्य वर्ग समाज का ये आदमी वही जयचंद, विभीषण है
इन्होंने अपने बेटे को पहले अमेरिका की नागरिकता दिलाई
फिर NRI कोटे से बहुत कम नम्बर पाने पर भी AIIIMS में MBBS दिला दिया
एक बेटी की अमेरिका सेटल कर दिया
मतलब अपने दोनों बच्चों को विदेशी नागरिक बनाकर
उनका इंतजाम कर जनरल समाज को ज्ञान बांट रहे है
आपको सवर्णों का ठेकेदार किसने बनाया??
इतने सालों में आपने सवर्णों के हितों के लिए एक भी आवाज़ उठाई?
अगर नहीं,, तो आपको कोई हक नहीं ये बोलने का कि सवर्ण किसके लिए आवाज़ उठाएं और किसके लिए नहीं!
क्योंकि आप सवर्ण नहीं, सिर्फ एक नेता हैं!🙏
प्रिय अजय आलोक जी,
अगर हम SC/ST समाज में क्रीमी लेयर या आरक्षण की समीक्षा की बात नहीं कर सकते, तो फिर आप भी हमारी बात नहीं कर सकते। अपना पक्ष हम खुद रख लेंगे।
आपने कहा कि UGC के मामले में कोर्ट ने स्टे दे दिया। लेकिन सवाल यह है कि कोर्ट ने स्टे कब दिया? जब हम सड़कों पर उतरे, जब हमने विरोध किया, तभी न?
और अगर आप भी मानते हैं कि UGC गलत था, तो फिर बीजेपी ने इसे अपनी नाक की लड़ाई क्यों बना रखा है? UGC ROLLBACK क्यों नहीं किया गया? सवर्ण समाज को आश्वस्त करने और उनका आक्रोश शांत करने की कोशिश क्यों नहीं हुई?
और SC/ST एक्ट की बात कौन करेगा? जिसे मोदी सरकार ने और मजबूत किया, उसी कानून का इस्तेमाल आज लोगों की ज़िंदगियां तबाह करने के लिए हो रहा है। @ajeetbharti जैसे बड़े चेहरे पर इस तरह SC/ST एक्ट लगाया जा रहा है, तो सोचिए आम आदमी के साथ क्या होता होगा।
अब हम यह चूरन नहीं चाटेंगे। या तो आप हमारी बात के लिए काम करेंगे, हमारी समस्याओं के समाधान के लिए आवाज़ उठाएंगे, नहीं तो हम भी अपना राजनीतिक फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
वोट हमारी ताकत है और अब हम उसका इस्तेमाल सोच-समझकर करेंगे।
ये हैं मंडल से कमंडल पार्टी में आए भाजपा के अजय आलोक जी। कह रहे हैं कि दलितों के और ओबीसी के आरक्षण की समीक्षा सवर्ण क्यों करेंगे, यदि ईबीसी, एमबीसी या महादलित को आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा तो सवर्ण क्यों बोल रहे हैं।
वाह भाई!! क्या भारत बालकनाइज़ हो गया है, क्या सारे कास्ट ब्लॉक अपने में ही एक समाज और राष्ट्र बन गए हैं कि कोई भी एक दूसरे के विषय में नहीं बोलेगा। क्या देश के संसाधन एक ही मद में हैं या इसका भी 1947 की तरह विभाजन कर लिया गया है?
1950 में एक व्यवस्था बनी और सबों ने उसपर सहमति जताई। देश को सुचारू रूप से चलाने और सबको भागीदारी देने की नियत से उस व्यवस्था को सभी ने स्वीकार किया। फिर नेताओं के मुंह में खून लग गया। गणतंत्र की छाती पर इस व्यवस्था को अपने फायदे के लिए बढ़ाते रहे। ज़ाहिर है कुछ लोगो का भी फ़ायदा हुआ, पर जिनके लिए ये व्यवस्था बनी थी, जिनके लिए बाकियों को कुछ समय का त्याग करने को कहा गया, उनतक लाभ नहीं पहुँचा। और उन्हींके माथे पर, उन्ही के बहाने कुछ लोग जो लाभ ले रहे हैं वो चाहते हैं कि ये व्यवस्था और बढ़े, और फैले और सबको लील जाए।
जब भी इस व्यवस्था में सुधार की बात होती है, वही चंद लाभार्थी नई मांगों के साथ आ जाते हैं और इस व्यवस्था को अनंत काल तक खींच कर ले जाना चाहते हैं। जिस गणतंत्र की नींव रखने के तुरंत बाद नेहरू ने जाति जनगणना को अस्वीकार्य किया, उसे हम आज 76 सालों के बाद करने जा रहे हैं। किसके दबाव में? वही जो चंद लाभार्थी हैं उनके दबाव में। और ये आख़िरी माँग नहीं है, आगे हम सौ प्रतिशत आरक्षण की तरफ़ भी जा सकते हैं, हर संस्थान को आरक्षण की कसौटी पे खड़ा कर सकते हैं। इस स्तर पर हम बंदर बांट कर सकते हैं कि फिर हम देश ही ना रहें, पूर्वी यूरोप के बालकन की तरह हो जाएँ। क्या ऐसा न होने देना सबकी चिंता नहीं है?
और यदि ये सवर्ण की या किसी और की चिंता नहीं है तो मेरा सवाल है कि ये आपकी चिंता क्यों नहीं हैं? आप वीडियो में खुदको सवर्ण बता रहे हैं, क्या आप सवर्ण के प्रतिनिधि हैं या संविधान के नीचे भारत के एक भूखंड इकाई के प्रतिनिधि हैं जिसमे सभी वास करते हैं।
और आपकी ही पार्टी ने उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह जी के नेतृत्व में ओबीसी एससी वर्गीकरण के लिए कमीशन बनाया था। आप ही की पार्टी ने उत्तर प्रदेश में योगी जी के नेतृत्व में राघवेंद्र पैनल बनाया था ताकि ओबीसी का वर्गीकरण हो। आप ही के मोदी सरकार ने रोहिणी कमिशन बिठाया था ताकि केंद्र के स्तर पर ओबीसी का वर्गीकरण हो। आप ही के मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया कि एससी एसटी वर्गीकरण को सरकार सही मानती है।
तो इतना सब करने के बाद आप वर्गीकरण क्यों नहीं करते। क्या भारत के लोग जो इस देश की राजनीति को सुचारू रूप से अगले सौ सालों तक चलते देखना चाहते है, आपसे ये सवाल नहीं पूछ सकते?
इसलिए कहता हूँ कि ये सवाल ग़लत है कि सवर्ण क्यों बोल रहा है वर्गीकरण पर, सवाल ये है कि आप, आपकी पार्टी और आपकी सरकार क्यों चुप है वर्गीकरण पर।
गणतंत्र के कुछ लिखे और कुछ बिन-लिखे समझौते हैं। मूक समझौतों की तार बहुत पतली हो गई है। ज़रा और खींचेंगे तो टूट जाएगी।