लंबे समय से जातीय वैमनस्य का एक कथानक बुना गया। कहा गया कि इससे देश में विषमता की समाप्ति होगी। इसी लक्ष्य के लिए यूजीसी ने समता विनियम बनाये। परंतु वस्तुस्थिति क्या है? क्या इन प्रयासों से विषमता घट रही है। इन्हीं बिंदुओं पर तीन आलेख लिखे हैं।
#UGC#DelhiUniversity
भाषा के नाम पर लड़ाई जारी है। लड़ाइयां तो जाति, मजहब और लिंग के नाम पर भी जारी हैं। जबकि घोषणा इन्हें समाप्त करने की हुई थी। परिणाम उल्टा हुआ है। लड़ाइयां बढ़ी ही हैं। स्पष्ट है कि नीतियां ही गलत हैं। डिस्क्रिमीनेशन कभी पॉजिटिव नहीं होता। शासन को यह समझना होगा।
#LanguageRow
संयुक्त राष्ट्र परिवार दिवस भी मनाता है, जोकि 15 मई को था। इस वर्ष के परिवार दिवस का विषय था परिवारकेंद्रित नीतियों का निर्माण। अभी तो विश्व और भारत में बनने वाली नीतियों में परिवार कहीं दिखता नहीं है। व्यक्ति और समुदाय के बीच परिवार को इकाई के रूप में स्वीकार ही नहीं किया जाता।
ज्योति मल्होत्रा पर हमारे गुप्तचर संस्थाओं की नजर आज से पहले क्यों नहीं पड़ी? यह एक बड़ी चूक है। ऐसी ही चूक पाकिस्तान में निकाह करने वाली औरतों के भारतीय पासपोर्ट को जारी रखने में हुई है। सरकार को इन मुद्दों पर देश को उत्तर देना चाहिए।
#PakistanIndianWar
ऑपरेशन सिंदूर एक असभ्य समुदाय को भारत का एक उत्तर है। पाकिस्तान एक देश नहीं एक विचार है, उस विचार को नष्ट करना आवश्यक है। वह विचार भारत के अंदर भी पलता है। एक ऑपरेशन वहां भी आवश्यक है।
प्रधानमंत्री मोदी जी ने देश सर गर्व से ऊंचा किया है। राजा का कर्तव्य होता है सीमाओं की रक्षा और उनका विस्तार। पाकिस्तान जैसे शत्रु विचार का समूल नाश होने पर ही लाहौर और कराची जैसे प्रदेशों का पुनः भारतीयकरण हो सकेगा।
#OperationSindoor#ऑपरेशन_सिंदूर
सभ्यता अध्ययन केंद्र (Center for Civilisational Studies) द्वारा भारतीय संविधान दिवस (Indian Constitution Day) के अवसर पर एक विशेष पेशकश
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सभ्यता अध्ययन केंद्र द्वारा आयोजित अखिल भारतीय शोध आलेख प्रतियोगिता वैध गुरुदत्त : साहित्य और राष्ट्रबोध का आयोजन किया गया है। शोध पत्र जमा करने की अंतिम तिथि 20 नवम्बर 2024 है।
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@prathakbatohi इन्हें पत्रकार कहना पत्रकार शब्द का अपमान है। मुझे याद है ऐसे ही द हिंदू की पत्रकार नीना उमा भारती की पत्रकार वार्ता में उनसे बहस कर रही थीं और उमा जी के अपनी बात रखने पर वार्ता छोड़ कर भुनभुनाती हुई निकल गई थीं। ये लोग पार्टी वर्कर की तरह काम करते हैं, पत्रकार की तरह नहीं।
जापान के हिंदीप्रेमी और हिंदी साहित्यकार मिजोकामी जी के साथ परिचर्चा में सहभागी हुआ। अशोक चक्रधर, सुरेश ऋतुपर्ण, अलका सिन्हा, अनिल जोशी जैसे हिंदी के प्रेमी और कार्यकर्ता साहित्यकारों का सान्निध्य भी मिला।
भोपाल गैस त्रासदी भी बाद के सालों में खबरों और विचारों से गायब हो गई... 2 दिसंबर, 1984 से लेकर आज तक हमारे देश ने तरक्की और मजबूती की बड़ी यात्रा तय की है, पर भोपाल जैसे हादसे बताते हैं कि हमें हर देशवासी की जान को मुल्क की अमानत मानना अभी सीखना शेष है @shashidigital