एक बालक खेल-खेल में बालुका से शिवलिंग बनाकर अपनी बुद्धि से पूजन करता है। उसे जो मन में आया वैसी स्तुति की, अद्भुद भावभंगिमा से तांडव करने की चेष्टा करता है। सब कुछ उसके लिए खेल है। किन्तु भोलेनाथ इसी पूजन से प्रसन्न हो उसे अगले जन्म में पुनः ब्राह्मण कुल में जन्म और शिवभक्ति +
भगवान का सर्वोत्तम ज्ञान होना, भगवान में निरंतर मन को स्थित करना, भगवान में सबसे अधिक प्रेम करना, समस्त कर्मों का भगवान में समर्पण करना, मन वाणी और शरीर से किये जाने वाले कर्मों को भगवान की आराधना रुप से नित्य निरतंर करते रहना, यही गीता का मूल ज्ञान है।
वेदादि शास्त्रसम्मत चिरपरीक्षित और प्रयुक्त राजनीति की सार्वभौम और स्वस्थ परिभाषा को भारत में प्रचलित लोकतान्त्रिक विधा से क्रियान्वित करना सर्वथा असम्भव है । अत एव सनातन विधा से शासनतन्त्र को शोधित और क्रियान्वित करने की आवश्यकता है । ++++
जयति पराशरसूनु: सत्यवतीहृदयनन्दनो व्यास:। (वायुपुराण)
सत्यवती के हृदयनन्दन पराशर के पुत्र श्री व्यास जी की जय हो, जिनके मुख-कमल से निकले वाङ्मय अमृत का पान सारा संसार करता है।
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अच्युतं केशवं विष्णुं हरिं सत्यं जनार्दनम्।
हंसं नारायणं चैव ह्येतन्नामाष्टकं शुभम्।।
इन आठ शुभ नामों का दस बार जप करने से पाप नष्ट हो जाते हैं तथा दुःस्वप्न भी शुभकारक हो जाते हैं।
ब्रह्मवैवर्तपुराण
कहाँ भारतीय दर्शन में शक्तिवाद को देखना, समझना चाहिए तो लोग वेदों और इतिहास में नारीवाद को ढूँढ रहे हैं।
नारीवाद, पुरुषवाद यह सब मनगढंत सिद्धांत हैं, जितनी जल्दी समझ आए उतना अच्छा।
जैसे स्त्रियों के लिए पति का त्याग अनुचित है, उसी प्रकार पुरुषों के लिए स्त्री (जो व्यभिचारिणी न हुई हो) का त्याग भी उचित नहीं है।
-श्रीमार्कण्डेयपुराण