देश के शिक्षामंत्री उड़ीसा से हैं और वहाँ के बच्चों की किताब में पढ़ने के लिए बॉलीवुड का गाना ‘निम्बूड़ा-निम्बूड़ा…’ छाप दिया है।
भला हो कि निगोड़ा-निगोड़ा नहीं छापा।
इस सरकार के कारनामों ने एक फिर साबित किया है कि ना पढ़ा हूँ ना पढ़ने दूँगा।
अबकी बार मूर्खाधिराजों की सरकार।
इस ख़बर को ग़लत तरीके से दिखाया जा रहा है।इसको ऐसे लिखना था -
उज्जैन के विकास में मोहन यादव ने पेश की नज़ीर। पूरे परिवार को झोंका। पत्नी संग ख़ुद भी लगाए पैसे,बेटा भतीजा सब महाकाल के विकास में शामिल। सीएम ने किया साबित कि धर्म की सेवा में वो पीछे नहीं। उज्जैन तो अभी झाँकी है..
जादू देखिए 👇
मोहन यादव मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. इसके बाद उनके परिवार ने उज्जैन में धड़ाधड़ जमीनें खरीद लीं.
खास बात है कि ये जमीनें सरकारी प्रोजेक्ट के आस पास थीं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है- मोहन यादव की पत्नी, बहू, भाई, उनके लड़के और तमाम रिश्तेदारों ने जमीन खरीदी.
खबरदार- अगर किसी ने भ्रष्टाचार कहा, ये तो जादू है.
प्रदेशवासियों,
मैंने पहले भी सार्वजनिक रूप से कहा था! आज मैं फिर से दोहरा रहा हूं, "हमारे मुख्यमंत्री जी ने मध्यप्रदेश के "तबादला उद्योग" को "ट्रांसफर फैक्ट्री" में बदल दिया है!"
@PMOIndia - देखो-समझो!
@NarendraModi - जागो-पूछो!!
कर्नाटक के गृह मंत्री @PriyankKharge जी ने RSS से काग़ज़ क्या मांग लिया, BJP ने अपने असल रंग दिखाने शुरू कर दिए
BJP MP रमेश जिगाजिनगी ने कहा “एक दलित आदमी को RSS से क्या मतलब?”
यह है इनकी असली सोच - एक दलित का RSS से क्या लेना देना
यह है इनके मन में दलितों के किए घृणा
कोटा में छात्रों के साथ सीधा संवाद, हाल के सालों में किसी भी भारतीय राजनेता द्वारा किया गया अनोखा प्रयोग है..राजनीति से इतर, युवाओं के शिक्षा और परीक्षा के साथ रोजगार और भविष्य की चिंता को समझना, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने युवाओं के नब्ज को पकड़ लिया है..सुनिए कोटा में राहुल ने क्या कहा..👇
इस वीडियो ने मुझे झकझोर दिया।
ये उस भारत के लाचार युवा हैं - जिसकी सरकार अपने अरबपति दोस्तों पर लाखों करोड़ लुटा देती है, पर अपने ही छात्रों को एक सुरक्षित सफ़र तक नहीं दे सकती।
चुनाव के वक़्त यही सरकार पूरी-पूरी ट्रेनों का इंतज़ाम कर लेती है। और परीक्षा देने जा रहे छात्रों के हिस्से में आती है - भीड़, घुटन, और बेबसी।
इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि मोदी सरकार छात्रों की गूंज सुनना ही नहीं चाहती।
पर मैं वादा करता हूँ - हम यह आवाज़ उन बहरे कानों तक पहुँचाएँगे। हर छात्र को उसका हक़ मिलेगा, उसका न्याय मिलेगा।
17 जून, कोटा। यही गूंज, अब हुंकार बनेगी।
#ChhatronKiGoonj
आकांक्षा डॉक्टर बनकर देश और समाज की सेवा करना चाहती थी। आकांक्षा के पिता किसान हैं। बेटी के डॉक्टर बनने के सपने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड पर ₹3 लाख का कर्ज़ लिया। और नागपुर में खुद कुक की नौकरी कर ली, ताकि बेटी वहाँ coaching कर सके।
एक पिता ने जो कर सकता था, सब किया।
फिर NEET पेपर लीक हुआ। परीक्षा रद्द हुई। उस अनिश्चितता में आकांक्षा हमें छोड़ कर चली गई।
आकांक्षा की मौत आत्महत्या नहीं - मोदी जी की एक भ्रष्ट, टूटी हुई व्यवस्था की देन है।
और धर्मेंद्र प्रधान जी? आज भी कुर्सी पर हैं।
फिर वही कमेटी। वही ट्रांसफर। वही जाँच। न सुधार, न न्याय।
मोदी जी, कुर्सी स्थायी नहीं होती - आती-जाती रहती है। लेकिन आपने 12 वर्षों में शिक्षा व्यवस्था को जिस हद तक बर्बाद किया है, उसकी कीमत भारत की एक पूरी युवा पीढ़ी चुका रही है।
प्रयागराज के “विवेक Sir” रोते हुए
मोदी जी योगी जी और गोदी मीडिया क्या आप लोगों को “विवेक SIR” के आँसू नही दिखाई देते?
ऊपर वाले के पास जब हिसाब होगा तो क्या बोलोगे बच्चों की कोचिंग पर बुलडोजर चलाया, किसी का मकान उजाड़ा, किसी की दुकान उजाड़ी, करोड़ों नौजवानों की ज़िंदगी बर्बाद की।
मुद्दों से ध्यान भटकाना है, धर्मेंद्र प्रधान को बचाना है, शिक्षकों को निशाना बनाना है !
देश में बहुत भांड चाटुकार फुटी कौड़ी के पत्रकार हैं जिन्हें लगता है कि देश इनपर आंख बंद करके भरोसा करेगा सड़क पर उतरते ही इन्हें जनता द्वारा खदेड़ा जाता है।
यह BJP शिरोमणि राष्ट्रीय महासचिव @blsanthosh हैं
बता रहे हैं पंडित नेहरू ने संसद में सावरकर की मौत पर श्रद्धांजलि नहीं होने दी थी
पंडित नेहरू का देहांत 1964 में हो गया था और सावरकर की मृत्यु 1966 में हुई
क्या ज़बरदस्त पॉवर थी नेहरू की!
असली दिक्कत YouTube Teachers से नहीं, बल्कि उनकी आवाज़ से है। आज किसी भी परीक्षा में गड़बड़ी हो, पेपर लीक हो, रिज़ल्ट में अन्याय हो या छात्रों के साथ गलत हो, तो यही YouTube Teachers सबसे पहले छात्रों के हक़ की लड़ाई में कूद पड़ते हैं। लाखों छात्रों की आवाज़ बन जाते हैं। सरकार पर दबाव बनता है, सवाल पूछे जाते हैं और जवाब माँगे जाते हैं।
शायद यही कारण है कि कुछ लोगों को शिक्षक नहीं, उनकी सक्रियता खटकती है।लोगों की आँखों की किरकिरी बन जाता है।
इसलिए जो बातें सत्ता सीधे नहीं कह सकती, वही बातें कुछ चेहरे अपने मुख से कह देते हैं।
ध्यान रहे कि "सरकार कहना चाहती थी, अंजना ने कह दिया"
मैं 2017 में उस समय YouTube पर 10 लाख (1 Million- aap hi bio mai million ka aura dekha) लोगों को जोड़कर बैठा था, जब न Reels थीं, न Shorts थे और न ही Jio का आज जैसा विस्तार था।
उस समय लोगों को जोड़ने का एक ही तरीका था -विषय पर पकड़, पढ़ाने की क्षमता और छात्रों का विश्वास।
शिक्षक का मूल्यांकन पत्रकार से नहीं, लाखों छात्रों के परिणामों से होता है।
पत्रकारिता बची है नहीं, देश की जनता कर रही है इसका फैसला।
पेपर लीक, बेरोज़गारी और भर्ती घोटालों पर सवाल पूछने वाले शिक्षक आपको तमाशेबाज दिख रहे हैं।