जिम्मेदारियों ने मेरी मासूमियत को धीरे-धीरे अपने बोझ तले छिपा दिया। वरना मेरे भीतर भी एक बेफ़िक्र मन रहता था, जो छोटी-छोटी बातों में खुशी ढूँढ़ लेता था। मुस्कुराना कभी मेरी फितरत थ��, पर जीवन ने समय से पहले गंभीर होना सिखा दिया। अब हँसता हूँ, मगर पहले जैसी निश्चिंतता नहीं रही।
कभी-कभी रात इतनी लंबी हो जाती है कि नींद भी साथ छोड़ देती है। मन उलझनों के अंधकार में भटकता रहता है, और भीतर एक अनाम रिक्तता घर कर लेती है। सुबह होते ही वही व्यक्ति मुस्कान ओढ़ लेता है, जिसने पूरी रात अपने ही विचारों के शोर में मौन होकर बिताई होती है।
और फिर अब तक की जीवन यात्रा में मैंने बहुत कुछ छोड़ दिया बेवजह अधिक बातें करना, हर किसी पर सहज विश्वास कर लेना, महफ़िलों में अपने हिस्से की जगह तलाशना, नए रिश्तों को तुरंत अपना मान लेना। धीरे-धीरे मैंने अपेक्षाएँ भी कम कर दीं और लोगों को उनकी वास्तविकता सहित स्वीकार करना सीख लिया। इसलिए शायद अब लोगों से सुनता हूं कि मैं पहले जैसा नहीं रहा।
ज़िंदगी का अकेलापन बहुत खामोशी से दिल में घर बना लेता है। बाहर से सब ठीक दिखता है — चेहरे पर मुस्कान, लोगों के बीच हँसी, रोज़ की भागदौड़ — लेकिन अंदर कहीं एक कोना हमेशा सूना रहता है। कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे कोई अपना था ही नहीं, या जो था वो बीच रास्ते छोड़कर चला गया। रात को जब सब सो जाते हैं, तब यादें जाग जाती हैं। पुरानी बातें, अधूरे वादे, और वो लम्हे जिन्हें हम बार-बार जीना चाहते हैं, आँखों में आकर ठहर जाते हैं। इंसान रोना भी चाहता है, पर आवाज़ ��हीं निकलती। बस तकिया गीला होता है और दिल भारी। सबसे ज़्यादा दर्द तब होता है जब समझ आता है कि जिस इंसान के लिए हम सब कुछ थे, उसके लिए हम शायद कुछ भी नहीं थे। यही अकेलापन धीरे-धीरे सिखा देता है कि उम्मीदें कम रखो, क्योंकि हर कोई साथ निभाने के लिए नहीं आता — कुछ लोग सिर्फ सबक बनकर आते हैं।