*आपके जीवन का केन्द्र बनने के योग्य कोई भी नहीं है।*🪞
न आपका साथी।
न आपके माता-पिता।
न आपके बच्चे।
न आपका गुरु।
यहाँ तक कि वह व्यक्ति भी नहीं, जिसके बिना जी न सकने की आपको धारणा हो।
क्या आप उस व्यक्ति से वैसे ही जुड़ रहे हैं जैसे वह है, या आप उसका उपयोग अपने भीतर की किसी कमी को भरने के लिए कर रहे हैं?
क्या आप उन्हें प्रेम करते हैं, या आपको उनकी ज़रूरत है ताकि आप अपने‑आप को योग्य, सुरक्षित, महत्वपूर्ण या पूर्ण महसूस कर सकें?
जिस क्षण कोई आपके जीवन का केन्द्र बन जाता है, उसी क्षण आप यह जोखिम उठा लेते हैं कि वह आपके डर, आपकी अपेक्षाओं, आपकी असुरक्षाओं और आपके दुखों का भी केन्द्र बन जाएगा।
उनकी स्वीकृति ही आपकी ख़ुशी बन जाती है।
उनकी अस्वीकृति ही आपकी पहचान बन जाती है।
उनकी अनुपस्थिति ही आपकी खालीपन बन जाती है।
और इस पूरे प्रक्रिया में, आप अपने‑आप को देखना छोड़ देते हैं।
*समस्या तब शुरू होती है जब आप अपने जीवन के अर्थ देने की ज़िम्मेदारी किसी और पर डाल देते हैं।*
~ 🙏
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यज्ञ समझकर खेलो || आचार्य प्रशांत
गीता में कृष्ण कहते हैं कि ऐसे लोग चोर ही होते हैं। मुझे कुछ नहीं बचाना है। मैं कौन हूँ? वो हूँ जो यहाँ पर आया हूँ खुद को लुटाने के लिए, मिटाने के लिए, पूरी आहुति दे देने के लिए।
इसके बाद आमतौर पर देखा यह गया है कि ऐसे लोग जीवन के हर क्षेत्र में बहुत ऊपर जाते हैं।
खेलों में भी बहुत ऊपर जाते हैं। लेकिन ऊपर जाएँगे कि नहीं जाएँगे, परिणाम हमारी उम्मीदों के मुताबिक आएगा कि नहीं आएगा, हम उसकी बहुत फ़िक्र करते नहीं हैं।
इतना पक्का है, हारेंगे भी तो ऐसा हारेंगे कि जीतने वाले को भी हम पर नाज़ होगा। वो भी हमसे कहेगा, भाई!
Their Own Lives Are Quite Miserable
Millions live miserable lives, providing comforts and conveniences to the moneyed people while struggling to meet their own basic needs.
इस नवरात्रि यह याद रखें।
अगर माता रानी को, बड़ी माँ को समझना है, तो उनके केंद्रीय और प्रमुख ग्रंथ में ही जाना पड़ेगा न! यह ग्रंथ बहुत संक्षिप्त नहीं है, लेकिन बहुत विस्तृत भी नहीं है।
इस नवरात्रि दुर्गासप्तशती को पूरे हृदय से, पूरी निष्ठा से समझा जाए। नौ दिन बिल्कुल ठीक हैं, न कम, न ज़्यादा। पाठ करने के लिए।
और पाठ माने यह नहीं कि बस संस्कृत बोल दी या सुन ली। उसे पूरे हृदय से समझना है, पूरे हृदय से। यही व्रत है।
कभी आस टूटने लगे
भरोसा मिटने लगे
लगे कि घुटने टेक ही दें
बाकी सब उपाय
काम न आ रहें हों
तो एक उपाय
और कर लीजिएगा
याद कर लीजिएगा
कि एक व्यक्ति है
आपकी दुनिया में
जो घुटने नहीं टेक रहा है!
*~ आचार्य जी* 🙏🏻
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🙏_*आचार्य जी_,* एक और बार💪.....मैंने कुडो *खेलना छह महीने पहले शुरू किया था। इन छह महीनों में मैंने दो प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। पहली* ज़िला स्तर पर थी, जिसमें मुझे *गोल्ड* मेडल मिला था और दूसरी राज्य स्तर पर हुई, जिसमें मुझे दो माह पूर्व* *ब्रॉन्ज *मेडल मिला।_
सबसे बड़ी बात यह थी कि _राज्य स्तर की प्रतियोगिता के लिए मेरी तैयारी ज़्यादा नहीं थी। मैंने सिर्फ़ दो-तीन महीने ही अभ्यास किया था। मेरी उम्र _24 साल _है और मुझे लगता था कि मैंने खेलना शुरू करने में काफ़ी देर कर दी है। कहीं न कहीं ऐसा भी लगता था कि मैं उतना अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाऊँगी, क्योंकि मेरी प्रैक्टिस अभी ज़्यादा नहीं हुई थी।
लेकिन मुझे बस इतना पता था कि मैंने अब तक जो भी सीखा है, मुझे उसी के दम पर अपना बेस्ट देना है जो है अभी यही है।
मेरी कैटेगरी में कुल छह खिलाड़ी थे और उनमें से मुझे तीसरा स्थान मिला। मुझे _सीनियर कैटेगरी* में *ब्रॉन्ज मेडल_ मिला। मेरे साथ जो खिलाड़ी थे, उनमें कई ऐसे थे जो आठ-आठ साल से कुडो खेल रहे थे। कुछ तो इतने अनुभवी थे कि मुझे उन्हें देखकर लगता था कि मैं इनके साथ कैसे फाइट कर पाऊँगी चूंकि वे कूडो के कोच भी थे? मेरा तो अभी चार-पाँच महीने का ही अनुभव है।
लेकिन फिर मैंने सोचा कि मेरे पास जितना समय है और मैंने जितना सीखा है, मैं उसी के आधार पर फाइट कर सकती हूँ। परिणाम चाहे जो भी हो, मुझे अपना बेस्ट देना है। और आज उसका परिणाम आपके सामने है , यात्रा बस शुरु ही हुई है और निरंतर ही है कोई सेटलमेंट नहीं... आपसे ही समझ रही हूँ।
*आचार्य जी, यह सब आपकी बदौलत है।*
अब मैंने सोच लिया है कि मुझे नेशनल तक तो जाना ही है, चाहे कुछ भी हो जाए। इसके लिए मैं अभी जिम और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग पर भी बहुत ध्यान दे रही हूँ। पहले लगता था कि जिम तो ऐसे ही कर लेते हैं, लेकिन अब समझ में आ रहा है कि सही मार्गदर्शन और एक अच्छे टीचर की कितनी बड़ी भूमिका होती है। इसलिए मैंने जिम में पर्सनल ट्रेनिंग लेना भी शुरू कर दिया है, ताकि मैं और मज़बूत बन सकूँ और अपने खेल में बेहतर प्रदर्शन कर सकूँ।
🫠कभी-कभी अपनी पूरी जर्नी को देखती हूँ, तो समझ नहीं आता कि मेरी ज़िंदगी में इतना सब कैसे हुआ।
_मेरा बचपन बहुत अजीब रहा है। बचपन में मुझे बहुत बुली किया गया। मेरे साथ ऐसी घटनाएँ भी हुईं, जिन्हें आज मैं यौन हिंसा के प्रयास के रूप में समझ पाती हूँ। बात उस हद तक नहीं पहुँची कि मेरे शरीर को पूरी तरह नुकसान पहुँचा हो, लेकिन कई लोगों ने कई बार मेरे साथ बहुत ग़लत किया।_
मैं ऐसे माहौल से आती हूँ, जहाँ बच्चों की देखभाल पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था। माँ-बाप अपने संघर्षों में व्यस्त रहते थे और हम बच्चों की ज़िंदगी अपने आप चल रही होती थी।
_और आज जब मैं खुद को देखती हूँ, तो समझ नहीं आता कि इन सबके बाद भी मैं यहाँ तक कैसे पहुँच पाई। आज मैं खेल रही हूँ, जो बस सपना सा लगता है,खुद को मज़बूत बना रही हूँ।_
🤌_मुझे नहीं पता कि यह सब कैसे हो रहा है। बस इतना लगता है कि यह बहुत कृपा की बात है।_
🥺*धन्यवाद, आचार्य जी*
😌_पी.एस. : चूँकि सर्टिफिकेट मिलने में देरी हुई, इसलिए अब साझा कर रही हूँ!_
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आचार्य प्रशांत और Asian Games Medalist सुचिका तरियाल के साथ श्रीमद्भगवद्गीता सत्र की झलकियाँ ✨
2 अक्टूबर को Weekend With Master कैंप के दौरान Asian Games Medalist सुचिका तरियाल ने आचार्य प्रशांत के साथ सत्र में हिस्सा लिया। हाल ही में Asian Games में bronze medal जीतकर लौटीं सुचिका ने अपने खेल सफर, संघर्षों और आगे बढ़ने की यात्रा साझा की।
श्रीमद्भगवद्गीता के सत्र में आचार्य प्रशांत ने समझाया कि जीवन में आने वाली कठिन परिस्थितियों को केवल बाहरी समस्या मानकर उनसे लड़ना पर्याप्त नहीं है। ज़रूरी है कि हम खुद को देखें और समझें कि हमारे भीतर ऐसी कौन-सी कमजोरी है जिसे दूर करने की ज़रूरत है। उन्होंने यह भी कहा कि मेहनत किसी निश्चित परिणाम को खरीदने की कीमत नहीं है। सही दिशा में लगातार बेहतर होते जाना ही महत्वपूर्ण है, परिणाम अपने आप आ सकते हैं।
संवाद में खेल, संघर्ष और उत्कृष्टता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी चर्चा हुई। सुचिका ने आगे भी खेल और युवा खिलाड़ियों, विशेषकर लड़कियों, के साथ काम करते रहने की बात साझा की।
अक्टूबर में Weekend With Master के ऐसे ही संवाद हर वीकेंड आयोजित हो रहे हैं, जहाँ जीवन और स्वयं को देखने के लिए ऐसे सत्रों का अवसर मिलता है।
Neither Rules Nor Agitations Will Save Democracy. Self-Knowledge Might || Acharya Prashant (2026)
Democracy depends not just on laws, elections, or people's rights, but also on the people who use them.
In this conversation with Trilochan Shastry, Acharya Prashant explores why real change requires us to question our own desires, biases, and the forces that shape our choices.
- Can rules alone protect democracy?
- Who is really driving our choices?
- Can democracy work without self-knowledge?
- What kind of education does democracy need?
🎥 Watch the Full Video: https://t.co/xzwtdx104W
Recently, Acharya Ji spoke about the importance of physical fitness and how a healthy body is essential for doing our work sincerely and effectively.
In yesterday’s session, He also spoke about what brings you joy—what is that one thing where you truly feel joy.
For me, going to the gym has become one such thing. When I am there, I forget everything else and simply focus on myself. I return completely exhausted, but the joy and fulfilment I experience in that tiredness is difficult to put into words.
🙏
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What makes a terrorist believe that killing innocent people is the right thing to do?
Hatred, indoctrination, and unquestioned beliefs can turn violence into a mission.