महाराणा प्रताप ने प्रभु श्री राम के आदर्शों को अपनाते हुए महल छोड़ वनवास को चुना और समाज को एकजुट कर मेवाड़ की अस्मिता के लिए संग्राम चुना।#HaldighatiVijay450
महाराणा प्रताप केवल इतिहास के पात्र नहीं, बल्कि भारतीय पीढीयों के लिए एक आदर्श है, जो उन्हे आपने पूर्वजो एवं इतिहास के प्रति आत्मबोध की अनुभूति करवाते है।#HaldighatiVijay450
उस समय जमीनों के पट्टे जारी करने का अधिकार सिर्फ राजा का ही होता था। प्रताप के शासनाधिकार से यह प्रमाणित होता है कि प्रताप #हल्दीघाटी_युद्ध में हारे नहीं थे बल्कि विजय रहे थे। #HaldighatiVijay450
धरती पर बैठकर सैनिकों के साथ भोजन करना उन्होंने यह जीवन पर्यंत अपनाया। प्रताप ने भील जाति के लोगों को भी साथ में लिया और उनका विश्वास जीता। भीलों ने भी अपने प्रताप को कीका कहकर संबोधित करना प्रारंभ किया। प्रताप ने वीर योद्धाओं को अपनी सेना में सम्मिलित करदिया #HaldighatiVijay450
इतिहासकारो की खोज के अनुसार #हल्दीघाटी_युद्ध के बाद अगले 1 साल तक महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के आसपास के गांव की जमीनों के पट्टों के रूप में ताम्रपत्र जारी किए थे जिन पर एकलिंग नाथ दीवान महाराणा प्रताप द्वारा प्रमाणित हस्ताक्षर भी थे। #HaldighatiVijay450
रावत कृष्ण दास चुंडावत और जयमल राठौड़ ने प्रताप को शस्त्र विद्या सिखाई। मेवाड़ मुगल संघर्ष में महाराणा प्रताप के साथ साथ जनजाति समाज भी बलिदान देने में कहीं पीछे नहीं रहा।
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राणा प्रताप को समर्पित गाडिया-लूहारों ने प्रतिज्ञा ली कि जब तक चित्तौड़ स्वतंत्र नहीं होगा, वे स्थायी घर नहीं बनाएँगे। यह प्रतिज्ञा 400 वर्षो तक निभाते रहे।#HaldighatiVijay450
राणा प्रताप को समर्पित गाडिया-लूहारों ने प्रतिज्ञा ली कि जब तक चित्तौड़ स्वतंत्र नहीं होगा, वे स्थायी घर नहीं बनाएँगे। यह प्रतिज्ञा 400 वर्षो तक निभाते रहे।#HaldighatiVijay450
आशाशाह देवपुरा ने बालक उदयसिंह को प्रश्रय देकर अपना राणा माना। महाराणा उदय सिंह का विवाह कुंभलगढ़ में ही अखेराज सोनीगरा की लड़की जयवनता बाई से हुई। जयवंता बाई की कोख से यह पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसका नाम प्रताप रखा गया।
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भारत के इतिहास की हर कहानी में राणा प्रताप को एक वीरोचित स्थान प्राप्त है। न केवल भारत में, अपितु विश्व के वीरों की श्रृंखला में वह प्रखर स्वतंत्रता सेनानी सदा याद रहेंगे।
राणा प्रताप कहते ही हल्दीघाटी की ऐतिहासिक लड़ाई स्मरण में आ जाती है।
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महाराणा प्रताप के संघर्ष में भील समाज ने केवल सहयोग ही नहीं, बल्कि अपना सर्वस्व अर्पित किया। वीर बालक दुधा भील महाराणा को भोजन सामग्री उपलब्ध करवाते हुए बलिदान हो गया।#HaldighatiVijay450
वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की हल्दीघाटी विजय के 450 वर्ष पूर्ण होने पर समारोह
तिथि - 17 जून 2026, समय - प्रातः 9.30 बजे
स्थान - महाराणा भूपाल स्टेडियम, उदयपुर
वक्ता - डॉ. मोहन भागवत जी, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
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