'सुपर इंडिया- द नेक्स्ट मिलिट्री पॉवर'
इस कवर स्ट���री के साथ 3 अप्रैल, 1989 को टाइम मैगजीन ने वैश्विक मंच पर भारत के आगमन की दुदुम्भी बजा दी थी।
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इस वक्त दक्षिण एशिया में भारतीय सेना की तूती बोल रही थी। एक के बाद एक, सैनिक और राजनीतिक सफलताओं ने भारत को क्षेत्रीय ��हाशक्ति के रूप में उभार दिया था।
यह राजीव का वह स्वर्णिम दौर था। जो शुरू हुआ ऑपरेशन मेघदूत से..
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1984 में भारत ने सियाचिन पर कब्जा कर लिया था। लेकिन कुछ हिस्से छूट गए थे, जहां पाक ने "कायेद" चौकी बना ली थी।
1987 में एक रात, भारतीय फौज ने ऑपरेशन कर, पाकिस्तान को पूरी तरह खदेड़ दिया। उस कार्रवाई में बाना सिंह ने जो बहादुरी दिखाई, उसके लिए उन्हें परमवीर चक्र मिला।
कायेद चौकी का नाम बदल दिया गया
नया नाम- बाना सिंह चौकी।
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अब चीन की बारी। जो 1986-87 में चीन ठीक वही नाटक कर रहा था, जो आज डोकलाम और गलवान में करता है।
तब यह ड्रामा तवांग और सामदोरांगचु की घाटी में चल रहा था। भारत ने 10 डिविजन फौज ��ैनात की, एयरफोर्स लगाई और सेना को आगे बढ़ने की छूट दी।
फ़ौज ने वे इलाके उठाये जहाँ वह 1962 के बाद पेट्रोलिंग के लिए नहीं जाती थी। सारे हाई ग्राउंड कवर किये और चीन की आवक रोक दी।
इसे 'ऑपरेशन चेकरबोर्ड' कहते हैं।
गूगल कर लें।।
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यह अंधेरे में छुपकर की गई स्ट्राइक नहीं थी। दिन-दहाड़े धमाका था। चीन ने आंखे दिखाई, दबाव डाला। राजीव हिले नही।
उस क्षेत्र को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया।
अरुणाचल प्र���ेश इस तरह बना।
चीन आज तक नाराज फूफा बनकर अरुणाचल वालों को आज तक 'स्टेपल वीजा' देता है।
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बीजिंग ने शांति वार्ता के लिए बुलाया। राजीव गए, तय हुआ कि अब हम लोग प्यार से रहेंगे।सैन्य कार्रवाई नहीं होगी। जो जहां खड़ा है, उसे नक्शे पर मार्क करेंगे।
अब वही LAC रहेगी।
ठीक!! समझौता ड्राफ्ट होने लगा
दो दिन बाद साइन होता।
इधर ईस्टर्न कमांड GOC को ताकीद मिली कि 2 दिन जितना आगे बढ़ सकते हो, बढ़ो। अगले 2 दिन तक फ़ौज सर पे पांव रखकर भागती रही।
अरुणाचल में जितना भी कब्जा कर सकती थी, कब्जाया। फिर उस सीमा को कंट्रोल लाइन बना लिया गया।
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श्रीलंका में अशान्ति थी। शांति कौन लाएगा? यूनाइटेड नेशंस? अरे नहीं!
साउथ एशिया की पॉवर हम थे।
'ऑपरेशन पवन' भारत ने शांति सेना भेजी।
अब श्रीलंका भारतीय सेना के बूटों तले था। इसका मतलब समझते हैं आप? ऐसा इसके पहले 1971 में हुआ था, 1965 में हुआ था।
उसके बाद कभी नही हुआ।
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मालदीव सरकार के तख्तापलट की कोशिश हुई। हथियारबंद विद्रोहियों ने माले पर कब्जा कर लिया। राष्ट्रपति गयूम ने गुहार लगाई; अमेरिका को?
जी नहीं, इंडिया को!
तत्काल 'ऑपरेशन कैक्टस' लॉन्च हुआ।
6 घण्टे में भारतीय नौसेना माले उतरी, माले हवाई पट्टी पर कब्जा किया। एयरफोर्स उतरने लगी। भारतीय फौज का नाम सुनते ही विद्रोही द्वीप छोड़कर भागे। अहसानमंद गयूम ने रात डेढ़ बजे फोन कर, राजीव को धन्यवाद दिया।।
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इस दौर में आंतरिक अशांति से भी फ़ौज निपटी।पंजाब मे ऑपरेशन ब्लैक थंडर, मेरठ दंगे, नार्थ ईस्ट के विद्रोही गुट।
उस विस्फोटक दौर में राजीव ��ांधी ने सेना और राजनीतिक पहल, दोनों का इस्तेमाल किया।
इस बिंदु पर आप सहमत हों या असहमत;
मगर भारत की टूट का एक बड़ा खतरा, भारतीय सेना ने टाल दिया, इस पर असहमत नहीं हो सकते।
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इसी दौर में सेना को मिले नए जमाने के हथियार, साजो-सामान, संचार उपकरण, नाइट विजन दूरबीनें, परमाणु पनडुब्बी, फ्रिगेट व अन्य बहुत कुछ।
और हां, तोपें मिलीं। वही होवित्जर बोफोर्स, जिसने 1999 में कारगिल बचाया। मगर जिसे अटल द्वारा थककर जांच बन्द करने के 20 साल बाद भी आप 'घोटाले' के नाम से याद रखे हैं।
INS विराट आया। आप इसे आइटी सेल फारवर्ड में, राजीव गांधी के एक रात गुजारने के लिए पिकनिक स्पॉट के रूप में याद करते हैं।
घटिया फॉर्वर्ड से ऊपर उठकर देखेंगे तो जानेंगे कि इस दौर में भारत एशिया का अकेला देश था, जिसके पास दो-दो विमानवाहक पोत थे।
टाइम ��े इस कवर पर, राजीव गांधी नही, INS विराट ने ही जगह बनाई है। आप नौसैनिकों का आत्मविश्वास औऱ खुशी जूम करके देखिए।
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जब यह कवर छपा, राजीव का आखरी वर्ष था। भारत दुनिया के पॉवर स्ट्रक्चर में दरवाजे खटखटा रहा था।
आज चीन छाती पर खड़ा है।वह पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, मालदीव, म्यंमार को अपनी गोद में बिठाकर हमें घेर चुका है।
न रूस साथ है, न अमेरिका,
न क्वाड न ब्रिक्स।
बस मेलोडी काल चल रहा है।
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टाइम पत्रिका अब भी भारत को तवज्जो देती है।
पर वह अपने मुखपृष्ठ पर डिवाइडर इन चीफ की तस्वीर छापती है। और राजीव का वो सुपर इंडिया, 40 साल बाद,
किसी पुराने मैगजीन के पन्ने की तरह ..
पीला और भंगुर दिखाई देता है।
Remembering #RajivGandhi today, a leader and former Prime Minister whose vision helped usher India into the modern technological age and whose faith in India’s youth and democratic institutions left a lasting imprint on the Republic.
Reacting in shock to his assassination in 1991, I had written in the @nytimes about his belief that the strength of India’s democracy lay in the bond between its leaders and its people. His commitment to a progressive and future-ready India continues to resonate across generations.
MEMORY: 21st May 1991, a day I will never forget. I was covering the general elections in steaming Vidarbha for @timesofindia and had reported on a Rajiv Gandhi rally where the mood suggested both he and the Congress were on the comeback trail.
Back in Mumbai after an exhausting train journey from Nagpur, I put the phone off the hook (this was pre-mobile India!) and went to sleep. Next morning, the screaming headline stunned me: Rajiv Gandhi assassinated in Sriperumbudur.
I still remember my editor Darryl D’Monte yelling at me: “How could you switch off the phone? We wanted to send you to the spot to report !” Since that day, I’ve never switched my phone off.
I met Rajiv ji only once: he was in the opposition at the time. What stayed with me was his warmth towards a young reporter: no airs, no hostility, just an easy smile and gentle manner. And yes, a willingness to answer all our questions! It was an informal press gathering at the CCI organised by the late Murli Deora. There was an innate DECENCY about him that was striking.
History remembers leaders in many ways. But sometimes, nearly 35 years later, I still wonder how differently India may have evolved had that one tragic night never happened. 🙏
मैं राजीव से बात करना चाहता हूँ..
रात के 3 बजे, मालदीव के राष्ट्रपति ने इसरार की। थके हुए, मगर बेहद कृतज्ञ गयूम का सम्पर्क, सेटेलाइट फोन से राजीव से कराया गया।
राजीव उस रात सोए नही थे। उन्हें इस कॉल का इंतजार था।
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दिल्ली में राजीव से गयू�� की मुलाकात तय थी, मगर अपरिहार्य कारणों से उनका दौरा स्थगित हो गया था। इसकी खबर विरोधियों को नही थी।
श्रीलंका में बैठे गयूम के विरोधी अरबपति ने सरकार पलटने की योजना बना रखी थी। लंकाई चीतों से डील सेट थी। गयूम दिल्ली में होते, माले में हमला होता।
भाड़े के लड़ाके, हाईजैक किये शिप से माले उतरे। बहुत से इसके पहले ही, आम वेशभूषा में माले पहुँच गए थे। 4 नवंबर 1988 की रात हमला हुआ।
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छोटा सा शहर- आप एयरपोर्ट, टेलीफोन एक्सचेंज, सेक्रेट्रीटीएट जैसी आधा दर्जन बिल्डिंग कब्जा कर लें, तो सत्ता आपकी हुई। भाड़े के विद्रोही कब्जा कर चुके थे।
लेकिन राष्ट्रपति को भी तो हिरासत में लेना होगा��� वे अपने पैलेस में नही थे। हमले की खबर से वे कहीं छिप गए।
और वहीं से अमेरिका से मदद मांगी। मगर डिएगो गार्सिया से मदद आने में कुछ दिन लगते। श्रीलंका और पाकिस्तान से मदद मांगी।
पाकिस्तान ने क्षमता न होने का बहाना किया, श्रीलंका चीतों से उलझना नही चाहता था। तो ब्रिटेन से मदद मांगी। थैचर ने सलाह दी- भारत से मदद मांगो।
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राजीव कलकत्ता में थे, जब खबर आई। रक्ष�� और विदेश मंत्रालय की संयुक्त बैठक रखी गयी।राजीव सीधे एयरपोर्ट से वहीं पहुचें।
आर्मी, नेवी, एयरफोर्स का एक संयुक्त ऑपरेशन तय किया गया। नाम - ऑपरेशन कैक्टस
कई योजना बनी, बिगड़ी। पैराट्रूपर्स उतारने की बात सोची गयी, मगर माले इतना छोटा की ज्यादातर सैनिक, समुद्र में गिर जाते।
फिर एक डेयरिंग योजना बनी।
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शाम होते होते आगरा से हैवी एयरक्राफ्ट, फौजी, साजोसामान, जीपें लेकर प्लेन माले चला। और सीधे हुलहले एयरपोर्ट पर उतर गया। घुप्प अंधेरे में ये लैंडिंग जानलेवा हो जलती थी।
तुरन्त ही फौजी और जीपें बिखर गए। एयरपोर्ट थोड़ी बहुत सँघर्ष के बाद कब्जे में आ गया। इतने में और विमान उतर गए।
कुछ ही घण्टो में माले में विद्रोहियों की लाशें बिखरी पड़ी थी। खेल खत्म हो गया था।
सेफ हाउस में छिपे गयूम से माले के भारतीय राजदूत मिले। बताया कि विद्रोह कुचल दिया गया है। वे सेफ हैं।
��ाजीव को मदद की गुहार लगाए महज सोलह घण्टे हुए थे। त्वरित मदद से अभिभूत, थके हुए, मगर बेहद कृतज्ञ गयूम ने राजदूत से कहा - मैं प्रधानमंत्री राजीव से बात करना चाहता हूँ..
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इसके बाद, मालदीव एक स्ट्रेटजिक एसेट के रूप में भारत का ठिकाना बना। हिन्द महासागर में भारत को एक मजबूत ताकत बनाने में, वहां क्रिएट किया गया फौजी ठिकाना, हमे थाह देता रहा। तीन दशक तक ..
जब तक कि घर मे घुसकर मारने की बकैती नेशनल टीव�� पर करने वाले,
औरो के बाथरूम में ताक झांक करने वाले..
दूसरो के स्वतंत्रता संग्राम में खुद को सेनानी बताने के शौकीन,
पड़ोसियों नाकाबंदी कर क्षुद्र ब्लैकमेलिंग करने वाले मूर्ख को, हमने राजीव के जूतों में फिट न कर दिया।
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दस साल पहले जिस व्यक्ति के राज्याभिषेक में समारोह में सभी सार्क देशों के नेता, लाइन लगाकर हाथ मिलाने आये थे..
तब मेरे,आपके, हिंदुस्तान की जनता के निर्णय से एक नई आशा भारत में ही नही, पूरे उपमहाद्वीप में फैली थी।
सबको लगा, कुछ बड़ा होने वाला है..
दस बरस बाद, सिर्फ निराशा है। उम्मीदों का बादशाह, बौना जोकर साबित हुआ है।
पदानुकूल बड़प्पन त्यागकर, क्षुद्र हरकतों से, छिछोरे समर्थकों की तालियां हासिल तो हुई। मगर पद , देश का वकार, इसके स्ट्रेटेजिक इंटरेस्ट, इसकी गरिमा का जनाजा निकल गया है।
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हाल यह है कि पाकिस्तान ही नही नेपाल, श्रीलंक���, भूटान भी चीन को गोद मे जा बैठे है। ताजा ताजा मालदीव उसमे मिल चुका है। माले से भारतीय बेस खाली करवाया जा चुका है।
और हमारा छबीला राजा, लक्षद्वीप में बैठकर मालदीव को चिढा रहा है। उसके छल्ले लक्षद्वीप को मालदीव से बेहतर टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनाने की देशभक्ति बेच रहे हैं।
हद्द है..
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इस दौर में राजीव की रह रह कर याद आती है। वो गरिमा, वो गम्भीरता ��ाद आती है।
काश यह शख्स अगर 10 साल जिया होता। तब दुनिया की हर बड़ी ताकत दिल्ली में फोन लगाकर कहती..
- मैं राजीव से बात करना चाहता हूँ..
❤️
India actually voted out this Prime Minister ( in the video he was then FM) and opted instead for a populist demagogue, opted to endure repeated & crippling blows to lives and livelihoods, opted for massive religious conflict, opted for total politicisation of the state and opted for daily incursions by the State into personal liberty. All this was known from the so-called “Gujarat model” yet the Indian public made the most irrational choice in the history of independent India. #Manmohansingh
The real #KeralaStory is how… “In its mouth-watering culinary journey, Kerala’s yummy Syrian Christian beef fry and the coconut beef have added legacy, history and culture to the recipe.” Please try n relish 😜😜😜😜 #justasking
In 2017, Hardeep Puri ji was the President and Chairman of the Governing Council of the Research and Information System for Developing Countries (RIS), a Delhi-based think tank funded by the Government of India.
❓Why was a representative of the Government of India emailing Epstein in 2017?
❓Why was he communicating with Epstein - a convicted sex offender and criminal?
❓Even earlier, between 2014 and 2016, under whose authority and instructions was Hardeep Puri interacting with Epstein?
Hardeep Puri was a retired diplomat; nothing more. India had three ambassadors to the United States during this period: S. Jaishankar, Arun Singh, and Navtej Sarna. Were they so useless that the Prime Minister required Hardeep Puri to engage with Epstein?
Even more disturbing, Hardeep Puri spoke about Digital India seven months before the programme was officially announced in India. Why was Digital India being discussed with Epstein at all? On whose behalf?
हरदीप सिंह पुरी ने हाल ही में कहा कि 'अरे यार, कुछ हुआ होता तो बताता, मैं तो बस मिलकर ही रह गया'...
ये बात हरदीप पुरी की मानसिकता दिखाती है। पुरी अफ़सोस जता रहे हैं कि वे सेक्स क्राइम्स का हिस्सा बनते-बनते रह गए।
सवाल है:
• क्या इस सबके बाद हरदीप पुरी को मंत्री बने रहने का हक है?
• जून, 2015 में Epstein हरदीप पुरी के जरिए मिडिल ईस्ट की नीति पर नाराजगी जता रहा था, क्योंकि मई 2015 में फिलिस्तीन के राष्ट्राध्यक्ष महमूद अब्बास भारत आए थे?
• क्या Epstein की नाराजगी के चलते और अपनी गलती सुधारने के लिए नरेंद्र मोदी फिलिस्तीन न जाकर इजराइल गए थे?
• आखिर भारत की विदेश नीति कौन तय कर रहा था?
ये दिखाता है कि भारत की विदेश नीति Epstein, नरेंद्र मोदी और हरदीप पुरी मिलकर चला रहे थे।
: AICC मीडिया और पब्लिसिटी विभाग के चेयरमैन @Pawankhera जी
Exclusive: The Indian government allegedly directed $3.9 billion from the state-owned Life Insurance Corporation to India’s second richest man Gautam Adani’s businesses amid the mogul’s legal and financial challenges, a Post investigation reveals. https://t.co/jm9guPzG30
A sobering message from a history teacher:
I’ve spent years teaching American and international government — from strong democracies like the UK to authoritarian regimes like russia and China.
But lately, the most alarming lesson comes from home.
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Arban Gawswami : Grok, it is not true that Modi is great and Vishwaguru
Grok : Yes it's true just like people got ₹15 lakh, 2 crore jobs and Demonetization was masterstroke 😂😂
This AI video is going viral 🔥🔥
French MEP Raphaël Glucksmann responds to the White House press secretary’s attack after he suggested France should reclaim the Statue of Liberty:
“Dear Americans, since the White House press secretary is attacking me today, I wanted to tell you this:”
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