एक बकलोली चल रही है इथेनॉल को लेकर कि हम जो अमेरिका से आयात करते हैं, उसका एक प्रतिशत भी ब्लेडिंग में प्रयोग नहीं होता।
भाई, ये दो कौड़ी का तर्क है। 2021 से 2025 तक, 720, 550, 460, 600, 1000 मिलियन लीटर इथेनॉल भारत ने इम्पोर्ट किया। तो तुम्हारा घरेलू उत्पादन ब्लेंडिंग के लिए लॉक्ड होने से, इम्पोर्ट बिल तो नहीं घट रहा?
ये केवल शब्दों का खेल है जो @nitin_gadkari@HardeepSPuri खेल रहे हैं और भारत मंडपम काजू खाऊ गिरोह उसे आँख मूँद कर प्रचारित कर रहा है। क्रूड का इम्पोर्ट बिल कम करो, पर इथेनॉल इम्पोर्ट बिल 177% बढ़ जाए, वो तो हम डॉलर में नहीं लेते!
अंततः, जब ���ुम इम्पोर्ट बिल घटाना चाह रहे हो, तो ये क्या बकलोली हुई कि ये अमेरिका वाला इथेनॉल है और ये भारत वाला? इम्पोर्ट तो हो ही रहा है न?
A minister admits his sons make about ₹100 crores a year on a policy he has driven, THIS IS CONFLICT OF INTEREST!
Also do you know our INDIA even imports ETHANOL ! What nonsense is this!
Nitin Gadkari ji BETA BADHAO YOJNA #EthanolScam
We had accepted Hon'ble Union Minister shri Nitin Gadkari ji's challenge of bringing him a single case of an individual whose vehicle has suffered due to E20 blended petrol. However shri @nitin_gadkari sir HAS NOT GRANTED: TEAM BHARAT an appointment. @DelhiPolice has said we cannot go to his residence ! Nitin Gadkari ji sir: you gave the challenge, why aren't u accepting it? Lets do this live before the citizens of India!
Team INDIA
Shame on @Swiggy for treating its delivery partners this way.
We placed an order from Baskin Robbins that should have arrived in 45 minutes. Instead, after 50 minutes, the delivery executive came to our doorstep without the order because the restaurant had been closed since the afternoon.
He had video proof, proof that he had reached the location, and messages sent to Swiggy asking for help—but Swiggy never responded. We even called the restaurant ourselves, and they confirmed they had been closed for hours. So why was Swiggy still accepting orders?
We got our refund, but that’s not the issue.
Despite repeatedly telling Swiggy that the delivery executive was not at fault and had all the evidence, they still slapped him with an ₹850 penalty.
To make matters worse, Swiggy customer care disconnected our call while we were trying to resolve the issue. They also kept insisting they were trying to contact the delivery executive, even though he was standing right in front of us and didnt receive a single call.
This is unacceptable. A company worth billions should not be forcing hardworking delivery partners to pay for its own system failures. Stop punishing the people who keep your business running and take responsibility for your own mistakes.
#Swiggy #DeliveryPartners #GigWorkers @SwiggyCares
Kyun nahi, bhai sahab. Hamare yahan rulebook sirf powerless logon ke liye hi sakhti se khulti hai, even when there is no criminal intent. In this case, she clearly acted to expose an alleged crime, not to facilitate it.
Ironically, the rich, powerful, and well-connected escape even in far more serious cases like murder, rape, corruption. But when it's someone without influence, every rule is suddenly enforced to the letter. That contrast is what makes the system seem so selective.
I'm sure police ke paas jaati to police Capgemini se matter settle kar leti. Koi rulebook nahi khulti waha.
A daycare employee at Capgemini's Bengaluru campus couldn't bear the abuse of the kids at the centre.
She reported it to supervisor, but instead of taking action, they fired her. She then became a whistleblower and leaked videos that exposed the abuse.
In the videos, toddlers were made to sit inside the drum of a front-loading washing machine, had water sprayed into their mouths using a toilet jet spray, were locked inside bathrooms, and were forced into narrow, water-filled pipes to frighten them. The videos triggered outrage, forcing authorities to act.
Today, according to media reports, the police have arrested the whistleblower only for allegedly "leaking sensitive videos." Lol! What a system! A poor woman with a clear conscience stood up to the powerful and went public, not for personal gain or with any malicious intent, but solely to protect those children. And she's the one who gets arrested.
क्या अब समय आ गया है कि आरक्षण पर खुल कर चर्चा हो??? इसके फायदे, नुकसान और समीक्षा पर बात की जाए???
धन्यवाद @ajeetbharti का इस चर्चा को मंच पर लाने के लिए!
गौतम गंभीर फुटबॉल टीम के लिए क्या अच्छा क्या बुरा, बात नहीं करते क्योंकि उनका क्षेत्र क्रिकेट है फुटबॉल नहीं।
पी वी सिंधु कबड्डी खिलाड़ियों के बारे में बात नहीं करती क्योंकि वो बैडमिंटन के क्षेत्र की हैं, कबड्डी खिलाड़ी नहीं।
रामगोपाल वर्मा फिल्म निर्माण की बात करते हैं, एयरोनॉटिक्स इंजीनियरिंग की नहीं। क्योंकि वो फिल्म बनाते हैं, हवाई जहाज नहीं।
पर नितिन गडकरी पिछले कई सालों से पेट्रोलियम और एथेनाल की बात कर रहे हैं। इंटरव्यू दे रहे।
जबकि उनका क्षेत्र पेट्रोलियम मंत्रालय नहीं, सड़क मंत्रालय है।
किसी को ये अभी तक अजीब क्यों नहीं लगा?
भारत तरक्की कर रहा है..!
आज भुसावल से गोवा ट्रेन से यात्रा करते समय एक अनुभव हुआ..!
अचानक, मेरे दोस्त के 2 साल के बेटे को बुखार आ गया। हमारे पास कोई दवा नहीं थी, और हमारी मंज़िल, मड��ांव, पहुँचने में अभी भी 7 घंटे बाकी थे। हमने सोचा कि अगले स्टेशन पर उतरकर डॉक्टर से सलाह लेंगे और फिर सड़क मार्ग से यात्रा जारी रखेंगे..!
मैंने यूँ ही ट्रेन में सामान बेचने वाले एक वेंडर से कहा..!
"हमें कुछ दवा चाहिए। क्या आप अगले स्टेशन पर इसका इंतज़ाम कर सकते हैं ? मैं आपकी मेहनत के लिए ₹500 दूँगा"
वेंडर ने जवाब दिया..!
"इसकी कोई ज़रूरत नहीं है। TTE (टिकट परीक्षक) से मिलिए; आपकी समस्या हल हो जाएगी"
हम ���ुरंत TTE से मिले..!
मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में किसी सरकारी कर्मचारी से इतनी तत्परता का अनुभव नहीं किया था..!
उन्होंने अपना काम रोका, तुरंत फ़ोन किया, हमारी सीट नंबर और बीमारी की स्थिति नोट की, और हमें अपनी सीट पर वापस जाने के लिए कहा..!*
सच कहूँ तो, हमें ज़्यादा उम्म���द नहीं थी। हमने पहले ही तय कर लिया था कि अगर ज़रूरत पड़ी तो हम अगले स्टेशन पर उतरकर बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाएँगे..!
हमने सोचा था कि शायद कोई कागज़ में लिपटी कुछ गोलियाँ ही लाएगा..!
लेकिन ठीक अगले स्टेशन पर, एक डॉक्टर अपने असिस्टेंट के साथ हमारी सीट पर आए। TTE भी वहाँ मौजूद थे। बच्चे की जाँच करने के बाद, डॉक्टर ने तुरंत अपने असिस्टेंट को हमें सिरप की कुछ बोतलें देने का निर्देश दिया। उन्होंने दवा देने का तरीका समझाया और फिर TTE से पैंट्री से थोड़ा नमक मँगवाने को कहा..!
TTE ने तुरंत एक और फ़ोन कॉल किया। डॉक्टर ने हमें बच्चे के माथे पर नमक के पानी में भीगा हुआ कपड़ा रखने की सलाह दी और चले गए..!
जब हमने आवाज़ देकर पूछा कि हमें कितने पैसे देने हैं, तो हमें बताया गया कि यह सब पूरी तरह से मुफ़्त था..!
हम अभी भी हैरान और चकित थे कि जब तक हम अपनी सीट पर वापस पहुँचे, पैंट्री का एक कर्मचारी नमक लेकर आ गया..!
म���रा देश सचमुच बेहतर के लिए बदल रहा है..!
इतनी सारी आलोचनाओं का हम क्या करें..!
क्या उन्हें पेट्रोल के साथ पी जाएँ..!
मीडिया या अख़बारों में अक्सर ऐसे सकारात्मक बदलावों को उजागर नहीं किया जाता है..!
बदलाव हो रहा है। हमें भी इन अनुभवों को अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ साझा करना चाहिए..!
इसमें समय लगेगा, लेकिन हम उस बदलाव को देख और महसूस कर रहे हैं जो हो रहा है..!
राष्ट्रहित सर्वोपरि..
🪷 🇮🇳 🙏 🇮🇳 🪷🇮🇳
जर्मनी और ब्रिटेन ने अभी एक फिल्म को प्रवासियों के खिलाफ बताते हुए प्रतिबंध लगाया है, जिसपर एलन मस्क ने पूरी फिल्म "सिटीजन विजिलेंटे" को ही एक्स पर डाल दिया
फिल्म की शुरुआत माइकल सैंडर्स से होती है, जो एक अमेरिकी सैन्य अधिकारी रह चुका है और अब व्यवसाय में लगा हुआ है, इस दौरान वो अपने शहर में घूम रहा होता है, जहां वो प्रव��सी मुस्लिमों को देखता है,
वे शहरों में गंदगी फैलाते है, स्थानीय लोगों को घूरते है खासकर महिलाओं को और कई बार बेवजह चिल्लाते है, दुकानों से बिना पैसे दिए समान ले जाते है जब पकड़े जाए तो धमकी देते है
माइकल अनुशासनप्रिय व्यक्ति था, कुछ प्रवासी बस का किराया मांगने पर धमकाने लगे, जिसपर माइकल खुद आगे आकर पैसे देता है और उन्हें समझाता है
बात हद से ज्यादा तब बढ़ गई जब एक चौदह साल की बच्ची को सीरियाई प्रवासियों के समूह ने पकड़ लिया और गैंगरेप कर अधमरी हालात में छोड़ दिया
जब ये मामला अदालत में पहुंचा तो अदालत न��� अपराधियों की कम उम्र और शरणार्थी होने की दलील देकर रिहा कर दिया
माइकल समझ जाता है कि कानून व्यवस्था इनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती तब ये पीड़ित के पास पहुंचते है और पूछते है कि "तुम्हे बदला चाहिए"? पीड़िता और उसके मां बाप हाँ कहते है
माइकल सबसे पहले उस भ्रष्ट जज की हत्या कर देता है, जिसने आरोपियों को छोड़ा था
उसने चेहरा ब्लर करके एक वीडिय��� पोस्ट किया, जिसमें उसने बताया कि कानून प्रणाली पीड़ितों को न्याय देने असक्षम हो चुकी है जिस कारण उसे ये करना पड़ रहा है
वो एक हीरो बन जाता है, पर वो गुप्त था, उसे सब विजिलेंटे कहने लगते है
फिल्म के अंत इतना विवादित है कि यूरोपीय देशों ने बैन लगा दिया
वास्तव में माइकल एक बलात्कारी गिरोह के लड़के के घर जाता है और उसे डराकर बाकी सभी उसके दोस्तों को बुलवाता है,
इस दौरान माइकल मुख्य आरोपी के पि���ा से पूछता है कि क्या आपने यहीं संस्कार दिया है? तो पिता बोलता है कि वो उसे कुरान की शिक्षा देता है और उसके मुख्यभूमि में युद्ध के कारण इसके मन पर दबाव पड़ा है, इसलिए इसे माफ कर देना चाहिए
इसके पश्चात ये आरोपी की बहन के पास जाते है, उसकी बहन उसके कपड़े को लेकर बोलती है, उसने कपड़े ही ऐसे पहने थे
इसके पश्चात वो मुख्य आरोपी से पूछता है, आरोपी बोलता है कि उसे लगा वो लड़की यहीं चाहती है
तब माइकल कहता है कि यूरोप और अमेरिका की म��िलाएं इसलिए रेप के लायक है क्योंकि वे अपनी मर्जी के कपड़े पहनती है? तो फिर तुम यहां आए ही क्यों? इसके बाद बंदूक की गड़गड़ाहट शुरू होती है, उसने सब लोगो को गोलियों से भून दिया था
अब आप सोच रहे होंगे कि ये फिल्म प्रोपेगैंडा होगी, बिल्कुल नहीं, ये रियल घटना पर बेस्ड है जो जर्मनी में हुई थी जहां अदालत ने आरोपियों को रिहा कर दिया था, बस राइटर ने फिल्म की कहानी को इसके आगे से लिखना शुरू किया, जो हर व्यक्���ि प्रतिक्रिया में करता
यूरोप के देशों ने इसे बैन करके शुतुरमुर्ग के जैसे अपना सर रेत में गाड़ दिया है, क्या ये घटना गलत है? क्या फिल्म ने जो प्रश्न उठाया वो गलत है? अगर गलत है तो फ्रांस क्यों जल रहा है? स्पेन और स्वीडन क्यों जलता रहता है?
अभी कुछ दिन पहले ही लंदन और जर्मनी में प्रवासियों द्वारा बनाए शिकार की घटना घटी है क्या वो भी गलत है?
जिसका हम दूध पीते हे वो हमारी मां हे गौमाता
और उसकी रक्षा करना हमारा धर्म
मुस्लिम जज द्वारा 14 हिंदू गौरक्षकों को उम्र कैद सजा
ऐसा लगा फ़ैसला भारत में नहीं पाकिस्तान में हो रहा
हिंदुओं आज शांत रहे तो इतिहास में कायर कहलाएंगे या अगला नंबर हमारा होगा आवाज रुकनी नहीं चाहिए
शर्म करो Story TV
तुम्हारा promotion देखकर लगता है कि अश्लीलता दिखाकर पैसे कमाना ज़्यादा आसान है…
शर्म आनी चाहिए ऐसे ऐप्स को बढ़ावा देने वालों को।
Views और downloads के लिए ऐसे इतना घटिया कंटेंट दिखाओगे अब तुम लोग? बच्चों युवाओं के दिमाग में ये सब भरना चाहते हो, ये देखकर बच्चा क्या सीखेगा इसका अंदाजा नहीं है क्या ?
@narendramodi जी आपको Creator Economy पर बात करते हुए हम हमेशा सुनते गईं लेकिन आज अनुरोध है कि ऐसे मामलों में सख्त कदम उठाए जाए।
US supported Pakistan in 1971
US sent its warships to Attack India in 1971
US along with Pakistan has been fueling KhaIistan agenda
US tried to stop our nuclear program
Many Indian scientists kiIIed !!
Never Forgive , Never forget
🙏
Guys if you are in such situation, just run away.. if you are in Gujarat, run to Hyderabad or Bangalore.. if you are in Andhra, run to Delhi..
start over.. start from zero.. no need to die.. learn something new.. live one day at a time..
no one can find you.. so many illegals finding life in this country.. you don’t have to die.. for debt..
Today, a Muslim couple came to our house to rent a room, but we refused.
They said they are not like other Muslims. The husband works in a bank, and the wife is a teacher.
We told them to look for a house across the road in the Muslim area. But they said they do not want to live there. They said that area is very dirty and noisy, which is bad for their children and can put them in bad company.
Even after hearing this, we did not want to take any risk, so we clearly refused them.
The truth is that these people first make their own area dirty and noisy. When it is no longer good to live there, they want to come to clean Hindu areas. But after coming here, they slowly start making this place dirty too. That is why we thought it was best not to take any risk.
हे माझं वैयक्तिक निरीक्षण आहे आणि त��� सगळ्यांना पटेलच आणि रिलेट होईलच असं नाही. पण मला दिवसेंदिवस असं वाटतं की २०१९ हे आपण अनुभवलेलं शेवटचं नॉर्मल वर्ष वाटतं.
मी असं म्हणत नाही की त्याआधी समस्या नव्हत्या. राजकारण होतं, आर्थिक अड��णी होत्या, सामाजिक तणाव होते. पण आयुष्याची एक लय होती. वेळ जरा संथ वाहायचा. आठवणी, घटना, वर्षं यांच्यात एक नैसर्गिक अंतर जाणवायचं.
आज मला स्वतःच्या आयुष्याकडे बघताना एक वेगळीच गोष्ट जाणवते. २०२० नंतर वेळ जणू वेगळ्याच गतीने धावू लागला आहे. एक वर्ष संपतं आणि दुसरं कधी सुरू होतं ते कळत नाही. २०२१, २०२२, २०२३, २०२४, २०२५... ही वर्षं वेगवेगळी आठवण्याऐवजी एकाच धूसर कालखंडासारखी वाटतात.
माझ्या आसपा���च्या लोकांकडे बघितलं तरी काहीसं असंच दिसतं. प्रत्येकजण व्यस्त आहे, जोडलेला आहे, माहितीने वेढलेला आहे. पण त्याच वेळी थोडासा थकलेलाही वाटतो. संभाषणांमध्ये भविष्याबद्दलची उत्सुकता कमी आणि अनिश्चितता जास्त जाणवते. करिअर, नोकरी, घर, नाती, आरोग्य, पैसे...प्रत्येक गोष्टीबाबत एक सूक्ष्म अस्वस्थता कायम असल्यासारखी वाटते.
यामागे कारणंही आहेत. कोविड हा फक्त आरोग्याचा प्रश्न नव्हता. त्याने लाखो लोकांच्या आयुष्याची सलगता मोडली. अनेकांनी नोकऱ्या गमावल्या, काहींनी जवळची माणसं गमावली, काहींची वर्षानुवर्षे आखलेली नियोजनं कोसळली. समाज म्हणून आपण त्यातून बाहेर आलो, पण त्याचे मानसिक परिणाम अजूनही दिसतात.
सोशल मीडियाचा प्रभावही प्रचंड वाढला. आपण पूर्वीपेक्षा जास्त माहिती घेतो, पण कदाचित कमी पचवतो. प्रत्येक दिवसाला काहीतरी मोठी बातमी, काहीतरी संकट, काहीतरी वाद, काहीतरी ट्रेंड असतो. परिणामी कोणत्याही घटनेला मनात स्थिर व्हायला वेळच मिळत नाही.
मला कधी कधी असंही वाटतं की आपण आता आठवणी कमी आणि अपडेट्स जास्त जमा करतो. पूर्वी एखादं वर्ष काही ठळक घटनांनी लक्षात राहायचं. आता शेकडो घटना घडतात, पण फार कमी गोष्टी मनात टिकतात.
कदाचित जग पूर्णपणे बदललं नसेल. कदाचित वय वाढल्यावर वेळ वेगाने जात असल्याची भावना स्वाभाविक असेल. कदाचित कोविडनंतर आपण सर्वजण थोडे वेगळे झालो असू. या सगळ्याचं उत्तर एकाच कारणात सापडणार नाही.
पण एक गोष्ट मला अनेकदा जाणवते, लोक पूर्वीसारखे हसतात, काम करतात, फिरतात, योजना आखतात... पण त्यांच्या मनात कु���ेतरी एक सततची घाई, एक अदृश्य चिंता आणि वेळ हातातून निसटत असल्याची भावना कायम असते.
आणि म्हणूनच कधी कधी मागे वळून बघताना वाटतं.
२०१९ हे फक्त एक वर्ष नव्हतं. ते एका वेगळ्या काळाचं शेवटचं पान होतं असं मला वाटतं. त्यानंतर जग चालू राहिलं, आपणही चालत राहिलो. पण काहीतरी सूक्ष्म आणि मूलभूत बदलून गेलं. काहीतरी हरवून गेल्यासारखं.