@rashtrapatibhvn माननीय महोदया मेरी भांजी भूमि दुबे जो मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के कस्बा आष्टा में रहती है तथा 12 वी में अध्ययनरत है, ने आपका पोर्ट्रेट बनाया है, आशा है मेरी भांजी का यह प्रयास आपको पसंद आएगा
प्रेम में डूबी हर स्त्री अमृता होती है या फिर होना चाहती है पर सबके हिस्से कोई इमरोज नहीं होता, शायद इसलिए भी कि इमरोज होना आसान नहीं।खासकर हमारी सामाजिक संरचना में एक पुरुष के लिए यह अच्छा खासा मुश्किल काम है कि किसी ऐसी स्त्री से से प्रेम करना और उस प्रेम में बंधकर जिन्दगी गुजार देना, जिसके लिए यह पता हो कि वह आपकी नहीं है।
एक बार अमृता ने इमरोज़ से कहा था -
" तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले,
मिलना था तो दोपहर में मिलते "
जब इमरोज और अमृता ने साथ साथ रहने का निर्णय लिया तो उन्होंने इमरोज से कहा था,
‘ एक बार तुम पूरी दुनिया घूम आओ
फिर भी तुम मुझे अगर चुनोगे
तो मुझे कोई उज्र नहीं
मैं तुम्हें यहीं इंतजार करती मिलूंगी ’
इसके जवाब में इमरोज़ ने उस कमरे के सात चक्कर लगाए और कहा, ‘हो गया अब तो...’ इमरोज के लिए अमृता का आसपास ही पूरी दुनिया थी।
उनके प्यार की समझदारी देखिये कि सालो तक एक ही घर में साथ रहने के बाद भी दोनों अलग अलग कमरों में रहते थे , इमरोज़ बताते है कि अमृता को रात में लिखने कि आदत थी क्योंकि उस वक़्त ना कोई आवाज़ होती थी ना फोन बजता और ना ही कोई आता जाता।
हालांकि लिखते समय उनको चाय चाहिए होती थी।अब लिखने में मशरूफ अमृता खुद तो उठकर चाय बना नहीं सकती थी तो इमरोज़ ने रात में 1 बजे उठना शुरू कर दिया।इमरोज़ चाय बनाते और चुपचाप उनके बगल में रख आते वो लिख़ने में इतनी खोई हुई रहती कि इमरोज़ की तरफ देखती भी नहीं थी ।और ये सिलसिला इसी तरह बदस्तूर चालीस- पचास सालों तक चलता रहा।
एक किस्सा बताते हुए इमरोज़ कहते है
एक बार जब वो अमृता को अपने स्कूटर पर बैठा कर कही जा रहे थे, तो पूरे रास्ते अमृता कि उंगलियां उनके पीठ पर कुछ लिख रही थी। इमरोज़ जानते थे वो शब्द साहिर का नाम था। वो कहते इस बात से उनको कोई नराज़गी नहीं थी ,वो बोले - मैं भी अमृता का, मेरी पीठ भी अमृता की।
इमरोज़ होना आसान नहीं, और मैने प्रेम में इमरोज़ होना चुना।
इसीलिए अमृता जी की अंतिम नज्म ‘मैं तुम्हें फिर मिलूंगी’ इमरोज़ के नाम थी, केवल इमरोज़ के लिए।
" मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं
शायद तेरे कल्पनाओं की प्रेरणा बन
तेरे केनवास पर उतरुँगी
या तेरे केनवास पर
एक रहस्यमयी लकीर बन
ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी
मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं। "
अमृता-इमरोज़
@UtkarshSingh_@vivekagnihotri@AnupamPKher ये कौन हजरत है, जिसके कहे को पूरे विश्व की राय मान ली जावे। जो खुद अपने देश के लिए गलत विचार रखता हो उससे और क्या उम्मीद रख सकते है।
@ReallySwara , @AnupamPKher , @vivekagnihotri , @ashokepandit एक निवेदन और है, कि यदि कश्मीर फाइल्स अश्लील है, तो फिर आपकी तथाकथित वेब सीरीज क्या आध्यात्मिकता का प्रदर्शन कर रही है, या किसी वैश्विक समस्या को विश्व पटल पर रख रही है, कृपया मार्गदर्शन करे।
@AnupamPKher@vivekagnihotri@ReallySwara आपकी बौद्धिक क्षमता पर तरस आता है और आपका मानसिक विकास नही होने के कारण आपसे सहानुभूति भी है,क्या एक व्यक्ति की अज्ञात कारणों से निर्मित राय को विश्व की राय माना जा सकता है?नही माना जा सकता है,सुविधा का संतुलन सदैव अपने पक्ष में न रखे ।
@ReallySwara@AnupamPKher एक निवेदन और है, कि यदि कश्मीर फाइल्स अश्लील है, तो फिर आपकी तथाकथित वेब सीरीज क्या आध्यात्मिकता का प्रदर्शन कर रही है, या किसी वैश्विक समस्या को विश्व पटल पर रख रही है, कृपया मार्गदर्शन करे।