माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी की अध्यक्षता में बिहार कैबिनेट की बैठक में कुल 36 एजेंडों पर लगी मुहर।
बैठक के बाद मीडियाकर्मियों को विस्तृत जानकारी देते डॉ. एस. सिद्धार्थ, अपर मुख्य सचिव, मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग, बिहार।
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मिथिला में एक त्योहार मनाया जाता है चौरचन, क्यों मनाया जाता है? इसके पीछे दो वजहें हैं. लेकिन महत्वपूर्ण तथ्य पहले, क्योंकि यह ऐतिहासिक हैः
1568 में मिथिला की गद्दी पर खरोड़े वंश के एक महात्मा राजा बैठे. नाम था हेमांगद ठाकुर. वहीं हेमांगद ठाकुर, जिन्होंने 16वीं शताब्दी में महज बांस की खपच्चियों, पुआलों के तिनकों और जमीन पर कुछ गणनाएं करके अगले 500 वर्षों तक होनेवाले सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण की तिथियां बता डालीं और इसके आगे के लिए गणना की सरल विधि भी निकाल ली.
उन्होंने ये सारा विवरण ग्रहण माला नामक पुस्तक में संकलित किया है, जिसे उन्होंने कैद में रहते हुए रचा था. बताया जाता है कि हेमांगद राजा तो बन गए, लेकिन जनता से कर लेना, प्रताड़ित करना ये सब उनके बस की बात नहीं थी.
दिल्ली के मुगल बादशाह को तो लगान समय पर चाहिए था, लिहाजा उसने हेमांगद ठाकुर को तलब किया. उनसे पूछताछ हुई तो बोले, पूजा-पाठ में कर का ध्यान न रहा. बादशाह इस बात को नहीं माना. उसने कर चोरी का आरोप लगाया और कैद में डाल दिया. हेमांगद ठाकुर कैद में यही खगोल गणना में जुट गए. एक दिन पहरी ने देखा तो ये सब बादशाह को बताया. बोला कि मिथिला का राजा पागल हो गया है.
बादशाह खुद हेमांगद को देखने कारावास पहुंचे. जमीन पर अंकों और ग्रहों के चित्र देख पूछा कि आप पूरे दिन यह क्या लिखते रहते हैं.
हेमांगद ने कहा कि यहां दूसरा कोई काम था नहीं सो ग्रहों की चाल गिन रहा हूं. करीब 500 साल तक लगनेवाले ग्रहणों की गणना पूरी हो चुकी है. बादशाह ने तत्काल हेमांगद को ताम्रपत्र और कलम उपलब्ध कराने का आदेश दिया और कहा कि अगर आपकी भविष्यवाणी सही निकली, तो आपकी सजा माफ़ कर दी जाएगी.
हेमांगद ने बादशाह को माह, तारीख और समय बताया. उन्होंने चंद्रग्रहण की भविष्यवाणी की थी. उनके गणना के अनुसार चंद्रग्रहण लगा और बादशाह ने न केवल उनकी सजा माफ़ कर दी, बल्कि आगे से उन्हें किसी प्रकार का कर(टैक्स) देने से भी मुक्त कर दिया.
अकर(टैक्स फ्री) राज लेकर हेमांगद ठाकुर जब मिथिला आये तो रानी हेमलता ने कहा कि मिथिला का चांद आज कलंकमुक्त हो गये हैं, हम उनका दर्शन और पूजन करेंगे.
बात जन जन तक पहुंची. लोगों ने भी चंद्र पूजा की इच्छा व्यक्त की. जैसे 20वीं सदी में बालगंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में गणेश की सार्वजनिक पूजा की शुरूआत की, उसी प्रकार 16वीं सदी में मिथिला की महारानी हेमलता ने चांद पूजने की इस परंपरा को सार्वजनिक पूजा के रूप में शुरुआत की.
महारानी हेमलता ने हर घर में पकवान उपलब्ध कराने का आदेश दिया. एक परिवार दूसरे परिवार के यहां पकवान भेजने लगे. भादो की चौथी तिथि को चांद पूजने की ऐसी परंपरा शुरू हुई, जो देखते ही देखते लोकपर्व का रूप ले लिया.
मिथिला के पंडितों से राय विचार के उपरांत राजा हेमांगद ठाकुर ने इसे लोकपर्व का दर्जा दे दिया. इस प्रकार मिथिला के लोगों ने कलंकमुक्ति की कामना को लेकर चतुर्थी चन्द्र की पूजा प्रारम्भ की.
दूसरी कथा पौराणिक है जिसमें गणेश जी और चांद के बीच का एक विवाद केंद्र में है. पर वह आख्यान आरोपित प्रतीत होता है क्योंकि चौरचन त्योहार मिथिला के अलावा कहीं और मनाया नहीं जाता.
इस पूरी सनचा के स्रोत @AshishDarbhanga हैं. उनका धन्यवाद.
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फोटो ग्रोक रचित है.
@ManishKasyapsob@nsitharaman बिहार में NDA की सरकार है। पिछले दस साल से केंद्र और राज्य में लगभग nda की सरकार है! कितने उद्योग लगे हैं या प्रयास हुवे हैं बिकाऊ कश्यप??
@Profdilipmandal आपको किसके बारे में बात करना है, आप तय करते हैं। फिर दूसरों को किसके बारे में बात करना है वो आप क्यों तय करेंगे? आप एक अलग से वीडियो बनाइए और उसमें बहन जी की चर्चा करिए।