National Player Of Artistic Yoga (Gold Medalist In Yoga) Online Yoga DM
(Yoga /Marma Therapy Expert)
(Former Yoga Teacher KVS)
अध्यक्ष - आरोग्यम् मिशन ट्रस्ट
India can return to 8–9% real GDP growth.
For that, structural reforms that lower the cost of doing business and the cost of financing are necessary. Specifically, judicial, bureaucratic and reforms to reform all the factors of production (land, labour, capital, energy) are key.
My interview with @PTI_News@ETBFSI@EconomicTimes@Business_Line_@Bijaysinghacj@narendramodi@PMOIndia
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#IndiaGrowth #EconomicReforms #ViksitBharat
4 महीने से लापता व्यक्ति का पता लगाने में स्थानीय पुलिस हुई नाकाम परिवार वालों का रो रो कर बुरा हाल थाना चिलकाना क्षेत्र के ग्राम पटनी का पूरा मामला #saharanpur@Uppolice@dgpup@saharanpurpol
आज #MahaKumbh पर उत्कृष्ट स्नान हुआ। @myogiadityanath जी के प्रशासन द्वारा की गई व्यवस्थाएँ वास्तव में उत्कृष्ट हैं। 👌👏
इस दुर्लभ आध्यात्मिक आयोजन में भाग लेने वाली मानवता के समुद्र का प्रबंधन करना एक उत्तम और सराहनीय कार्य है। 👏@myogiadityanath@CMOfficeUP@TOIIndiaNews की रिपोर्टों के विपरीत, पानी साफ है - हमने न केवल डुबकी लगाई बल्कि अर्घ्य भी दिया। तो, इसे व्यक्तिगत अनुभव से कहें।
हर हर गंगे, जय माँ गंगे!🙏🏼
#KumbhMela2025 #MahaKumbh2025
Middle Income Trap क्या है?
Judicial Reforms का Economy से क्या लेना-देना?
उद्योगपति कोई दुश्मन नहीं. देश के 17वें मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे @SubramanianKri ने @Rupa_Books
से प्रकाशित अपनी पुस्तक 'India @100 : Envisioning Tomorrow’s Economic Powerhouse' के बहाने शब्द-रथी में वरिष्ठ पत्रकार @jai_shiven से क्या कुछ कहा.
सुनें पूरा वीडियो: https://t.co/4CZWu1UHLI
Bureaucratic Reforms के बारे में क्या समझा रहे हैं, देश के 17वें मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे @SubramanianKri. @Rupa_Books से प्रकाशित अपनी पुस्तक 'India @100 : Envisioning Tomorrow’s Economic Powerhouse' के बहाने K Subramanian ने शब्द-रथी में वरिष्ठ पत्रकार @jai_shiven से क्या कुछ कहा. सुनें आज शाम 4 बजे.
कुछ दिन पहले, मेरा संपादकीय @JagranNews में:
सभी भारतीयों के लाभ के लिए, हमें धन सृजन करने वालों का सम्मान करना होगा। मैं यह बात किसी उद्योगपति की वकालत करने के लिए नहीं कह रहा हूं क्योंकि मैंने किसी भी उद्योगपति से एक पैसा भी नहीं लिया है। मैं यह आवश्यक बात भारत के आर्थिक लाभ के लिए कह रहा हूं। ऐसा कहना जरूरी है क्योंकि हमारी राजनीति का एक वर्ग धन सृजन करने वालों के साथ उपेक्षा का व्यवहार करता है।
हमें जानना चाहिए कि समाजवाद और साम्यवाद यूरोपीय आयात हैं, भारतीय विचार नहीं, और धन सृजन के बिना जनता के लिए कोई रोजगार सृजन या समृद्धि नहीं हो सकती है।
ऐसे यूरोपीय विचारों के विपरीत, भारतीय लोकाचार ने हमेशा धन और धन सृजन का सम्मान किया है।
इसे जानने से ही हम उन संकीर्ण सोच वाले राजनेताओं के एजेंडे को समझ पाएंगे जो धन सृजनकर्ताओं की उपेक्षा करके हमारी आंखों पर पट्टी बांध रहे हैं।
https://t.co/NL7AzahP9c
@BJP4India@INCIndia@AamAadmiParty@narendramodi@RahulGandhi@ArvindKejriwal
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पूरा लेख👇
हमारे राजनीतिक वर्ग से जुड़े कुछ लोग संपत्ति का सृजन करने वाले उद्यमियों को खलनायक की तरह दिखाने में लगे हुए हैं। ऐसा रवैया भारत की प्रगति में बाधक है। अपना अनुभव साझा करूं तो बचपन में हमारे घर में एक सहायिका काम के लिए आती थीं। वह हमारे और नौ अन्य परिवारों के यहां बर्तन साफ करती थीं।
इस तरह एक वेतनभोगी निम्न मध्यमवर्गीय परिवार एक महिला के रोजगार का दसवां हिस्सा बन गया। इसके विपरीत दुर्ग शहर के सबसे अमीर आदमी एक जौहरी ने अपने उद्यम और घर में करीब 100 लोगों को रोजगार दिया हुआ था। उनके कर्मचारियों ने कारीगरी और बिक्री जैसे खास हुनर सीखे, जिससे वे एक घरेलू सहायिका की तुलना में 10 गुना ज्यादा कमा सकें।
यह व्यवसायी न सिर्फ कई गुना ज्यादा नौकरियां देता था, बल्कि हर नौकरी का वेतन भी 10 गुना ज्यादा था। जबकि एक वेतनभोगी परिवार संपत्ति सृजन के बजाय केवल उसका उपभोग कर रहा था। मेरे जीवन का यह किस्सा रोजगार उत्पन्न करने में संपत्ति सृजन की केंद्रीय भूमिका को दर्शाता है।
जरा सोचिए कि वह नौकरी जिससे आपकी रसोई चलती है या आपके बच्चे की स्कूल फीस भरने में मदद मिलती है, उसके लिए आप किसके ऋणी हैं? अगर आप सतही तौर पर सोचेंगे तो कहेंगे कि यह नौकरी आपकी काबिलियत की वजह से है, लेकिन आपकी सारी काबिलियत के बावजूद अगर संपत्ति का सृजन करने वाले न होते तो आपकी नौकरी भी न होती।
अगर सरकार ने भारतीय रेलवे में धन का निवेश नहीं किया होता तो मेरे पिता को नौकरी नहीं मिलती और मुझे वह शिक्षा नहीं मिलती, जिसने मुझे एक अच्छा जीवन दिया। वस्तुत:, नौकरी एक उद्योगपति द्वारा अपने व्यवसाय के लिए पूंजी लगाने से पैदा होती है। यही नौकरियां लाखों लोगों को सपने देखने और बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने का अवसर देती हैं।
हम वेतनभोगियों को हर महीने जो वेतन मिलता है, उसे लेकर क्या हम कभी यह सोचते हैं कि जिनकी वजह से यह वेतन संभव हो पाता है, वे किन जोखिमों का सामना करते हैं? उद्यमी अपने उद्यम में करोड़ों रुपये लगाता है। उसे असफलता, प्रतिस्पर्धा, सरकारी अड़चनों और बाजार की अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ता है।
वेतनभोगी कर्मचारियों के सुनिश्चित वेतन के विपरीत, किसी उद्यमी को केवल तभी धन की प्राप्ति होती है, जब उसका व्यवसाय सफल होता है और वह भी कई सालों की मेहनत एवं तनाव के बाद। संभव है कि दूसरी या तीसरी पीढ़ी के उद्योगपति को उतना जोखिम न उठाना पड़े या उतना संघर्ष न करना पड़े, लेकिन उनके पूर्वजों ने जरूर जोखिम उठाकर संघर्ष किया होगा।
हममें से अधिकांश लोग इतना जोखिम लेने की हिम्मत नहीं रखते। ऐसे जोखिम लेने वाले साहसी लोगों को खलनायक ठहराना भारत के आर्थिक भविष्य के लिए नितांत अदूरदर्शी है। उनके बिना न तो आर्थिक विकास होगा और न ही रोजगार उत्पन्न होंगे।
संपत्ति का सृजन करने वालों को संदेह की दृष्टि से देखने वाले दुराग्रह की जड़ें असल में नेहरूवादी समाजवाद से जुड़ी हैं। समाजवाद और साम्यवाद जैसी अवधारणाएं तो विदेशी हैं। भारत का प्राचीन आर्थिक दर्शन तो संपत्ति सृजन को समाज के लिए अत्यंत लाभकारी मानता है। भारतीय परंपरा तो ‘शुभ-लाभ’ में विश्वास रखने वाली रही है।
यह सोच भारतीय संस्कृति के उस गहरे चिंतन को दर्शाता है कि नैतिक तरीके से संपत्ति बनाना सभी के लिए लाभदायक है। भारतीय दर्शन में धर्म, काम और मोक्ष के अतिरिक्त अर्थ को चार पुरुषार्थों में से एक माना गया है। दुनिया के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में श्री सूक्तं नामक स्तोत्र है, जो धन की देवी लक्ष्मी को समर्पित है।
यह स्तोत्र संपत्ति को एक आशीर्वाद मानता है जो परिवारों, समुदायों और राष्ट्रों का पोषण करती है। नैतिक रूप से संपत्ति का सृजन भारतीय परंपरा की जड़ में है और यह सामूहिक भलाई का जरिया है। अर्थशास्त्र में चाणक्य ने बाजार और व्यापार की भूमिका पर जोर दिया, जो समृद्धि लाने में मददगार होते हैं। प्राचीन शहर अपने समृद्ध बाजारों के कारण फलते-फूलते थे, जहां प्रबुद्ध शासक यह समझते थे कि संपत्ति का सृजन सभी के लिए फायदेमंद है।
संपत्ति सृजन के इतने भारी महत्व के बावजूद देश के कुछ नेता उसकी राह में कांटे बिछाने पर तुले हैं। उनका कहना है कि कंपनियों पर व्यक्तियों की तुलना में अधिक टैक्स लगना चाहिए, लेकिन क्या हम समझते हैं कि कंपनियों द्वारा बनाई गई संपत्ति आखिर में कहां जाती है? इससे शेयर होल्डर्स को लाभांश, कर्जदाताओं को ब्याज, आपूर्तिकर्ताओं को सेवाएं और कर्मचारियों को वेतन एवं सरकार को टैक्स मिलता है।
यहां तक कि प्रमोटर भी अपने लाभांश और पूंजी लाभ से उत्पाद और सेवाएं खरीदते हैं, जिससे रोजगार पैदा होने के साथ ही आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं। कुल मिलाकर, कंपनियों द्वारा बनाई गई संपत्ति शेयर होल्डर्स, कर्जदाताओं, कर्मचारियों और नागरिकों के माध्यम से समाज एवं वित्तीय तंत्र में ही वापस आ जाती है।
हमें यह भी समझना होगा कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में अगर हम कंपनियों पर ज्यादा टैक्स लगाएंगे तो वे उन देशों में चली जाएंगी, जहां टैक्स कम है। इससे भारत को रोजगार और संपत्ति सृजन से मिलने वाले फायदे नहीं मिल पाएंगे। इसलिए कंपनियों पर भारी टैक्स लगाने की मांग आर्थिक समृद्धि के स्रोत को न समझ पाने का नतीजा है। एक स्वस्थ व्यावसायिक माहौल भारी कारपोरेट टैक्स की तुलना में समाज को रोजगार एवं आयकर के रूप में कहीं अधिक योगदान देता है।
आईए, भारत की प्रगति में संपत्ति का सृजन करने वालों के अहम योगदान को पहचानें और उनका सम्मान करें। साम्यवाद और समाजवाद जैसी बाहरी विचारधाराओं को ठुकराकर भारतीय सांस्कृतिक सोच को अपनाएं। हम सभी के लिए एक उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है। आज के भारत में संपत्ति का सृजन करने वाले सिर्फ व्यवसाय नहीं कर रहे हैं, अपितु वे एक विकसित भारत की नींव रख रहे हैं।
(लेखक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में कार्यकारी निदेशक और भारत के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं)
कुछ दिन पहले, मेरा संपादकीय @JagranNews में:
सभी भारतीयों के लाभ के लिए, हमें धन सृजन करने वालों का सम्मान करना होगा। मैं यह बात किसी उद्योगपति की वकालत करने के लिए नहीं कह रहा हूं क्योंकि मैंने किसी भी उद्योगपति से एक पैसा भी नहीं लिया है। मैं यह आवश्यक बात भारत के आर्थिक लाभ के लिए कह रहा हूं। ऐसा कहना जरूरी है क्योंकि हमारी राजनीति का एक वर्ग धन सृजन करने वालों के साथ उपेक्षा का व्यवहार करता है।
हमें जानना चाहिए कि समाजवाद और साम्यवाद यूरोपीय आयात हैं, भारतीय विचार नहीं, और धन सृजन के बिना जनता के लिए कोई रोजगार सृजन या समृद्धि नहीं हो सकती है।
ऐसे यूरोपीय विचारों के विपरीत, भारतीय लोकाचार ने हमेशा धन और धन सृजन का सम्मान किया है।
इसे जानने से ही हम उन संकीर्ण सोच वाले राजनेताओं के एजेंडे को समझ पाएंगे जो धन सृजनकर्ताओं की उपेक्षा करके हमारी आंखों पर पट्टी बांध रहे हैं।
https://t.co/NL7AzahP9c
@BJP4India@INCIndia@AamAadmiParty@narendramodi@RahulGandhi@ArvindKejriwal
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पूरा लेख👇
हमारे राजनीतिक वर्ग से जुड़े कुछ लोग संपत्ति का सृजन करने वाले उद्यमियों को खलनायक की तरह दिखाने में लगे हुए हैं। ऐसा रवैया भारत की प्रगति में बाधक है। अपना अनुभव साझा करूं तो बचपन में हमारे घर में एक सहायिका काम के लिए आती थीं। वह हमारे और नौ अन्य परिवारों के यहां बर्तन साफ करती थीं।
इस तरह एक वेतनभोगी निम्न मध्यमवर्गीय परिवार एक महिला के रोजगार का दसवां हिस्सा बन गया। इसके विपरीत दुर्ग शहर के सबसे अमीर आदमी एक जौहरी ने अपने उद्यम और घर में करीब 100 लोगों को रोजगार दिया हुआ था। उनके कर्मचारियों ने कारीगरी और बिक्री जैसे खास हुनर सीखे, जिससे वे एक घरेलू सहायिका की तुलना में 10 गुना ज्यादा कमा सकें।
यह व्यवसायी न सिर्फ कई गुना ज्यादा नौकरियां देता था, बल्कि हर नौकरी का वेतन भी 10 गुना ज्यादा था। जबकि एक वेतनभोगी परिवार संपत्ति सृजन के बजाय केवल उसका उपभोग कर रहा था। मेरे जीवन का यह किस्सा रोजगार उत्पन्न करने में संपत्ति सृजन की केंद्रीय भूमिका को दर्शाता है।
जरा सोचिए कि वह नौकरी जिससे आपकी रसोई चलती है या आपके बच्चे की स्कूल फीस भरने में मदद मिलती है, उसके लिए आप किसके ऋणी हैं? अगर आप सतही तौर पर सोचेंगे तो कहेंगे कि यह नौकरी आपकी काबिलियत की वजह से है, लेकिन आपकी सारी काबिलियत के बावजूद अगर संपत्ति का सृजन करने वाले न होते तो आपकी नौकरी भी न होती।
अगर सरकार ने भारतीय रेलवे में धन का निवेश नहीं किया होता तो मेरे पिता को नौकरी नहीं मिलती और मुझे वह शिक्षा नहीं मिलती, जिसने मुझे एक अच्छा जीवन दिया। वस्तुत:, नौकरी एक उद्योगपति द्वारा अपने व्यवसाय के लिए पूंजी लगाने से पैदा होती है। यही नौकरियां लाखों लोगों को सपने देखने और बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने का अवसर देती हैं।
हम वेतनभोगियों को हर महीने जो वेतन मिलता है, उसे लेकर क्या हम कभी यह सोचते हैं कि जिनकी वजह से यह वेतन संभव हो पाता है, वे किन जोखिमों का सामना करते हैं? उद्यमी अपने उद्यम में करोड़ों रुपये लगाता है। उसे असफलता, प्रतिस्पर्धा, सरकारी अड़चनों और बाजार की अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ता है।
वेतनभोगी कर्मचारियों के सुनिश्चित वेतन के विपरीत, किसी उद्यमी को केवल तभी धन की प्राप्ति होती है, जब उसका व्यवसाय सफल होता है और वह भी कई सालों की मेहनत एवं तनाव के बाद। संभव है कि दूसरी या तीसरी पीढ़ी के उद्योगपति को उतना जोखिम न उठाना पड़े या उतना संघर्ष न करना पड़े, लेकिन उनके पूर्वजों ने जरूर जोखिम उठाकर संघर्ष किया होगा।
हममें से अधिकांश लोग इतना जोखिम लेने की हिम्मत नहीं रखते। ऐसे जोखिम लेने वाले साहसी लोगों को खलनायक ठहराना भारत के आर्थिक भविष्य के लिए नितांत अदूरदर्शी है। उनके बिना न तो आर्थिक विकास होगा और न ही रोजगार उत्पन्न होंगे।
संपत्ति का सृजन करने वालों को संदेह की दृष्टि से देखने वाले दुराग्रह की जड़ें असल में नेहरूवादी समाजवाद से जुड़ी हैं। समाजवाद और साम्यवाद जैसी अवधारणाएं तो विदेशी हैं। भारत का प्राचीन आर्थिक दर्शन तो संपत्ति सृजन को समाज के लिए अत्यंत लाभकारी मानता है। भारतीय परंपरा तो ‘शुभ-लाभ’ में विश्वास रखने वाली रही है।
यह सोच भारतीय संस्कृति के उस गहरे चिंतन को दर्शाता है कि नैतिक तरीके से संपत्ति बनाना सभी के लिए लाभदायक है। भारतीय दर्शन में धर्म, काम और मोक्ष के अतिरिक्त अर्थ को चार पुरुषार्थों में से एक माना गया है। दुनिया के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में श्री सूक्तं नामक स्तोत्र है, जो धन की देवी लक्ष्मी को समर्पित है।
यह स्तोत्र संपत्ति को एक आशीर्वाद मानता है जो परिवारों, समुदायों और राष्ट्रों का पोषण करती है। नैतिक रूप से संपत्ति का सृजन भारतीय परंपरा की जड़ में है और यह सामूहिक भलाई का जरिया है। अर्थशास्त्र में चाणक्य ने बाजार और व्यापार की भूमिका पर जोर दिया, जो समृद्धि लाने में मददगार होते हैं। प्राचीन शहर अपने समृद्ध बाजारों के कारण फलते-फूलते थे, जहां प्रबुद्ध शासक यह समझते थे कि संपत्ति का सृजन सभी के लिए फायदेमंद है।
संपत्ति सृजन के इतने भारी महत्व के बावजूद देश के कुछ नेता उसकी राह में कांटे बिछाने पर तुले हैं। उनका कहना है कि कंपनियों पर व्यक्तियों की तुलना में अधिक टैक्स लगना चाहिए, लेकिन क्या हम समझते हैं कि कंपनियों द्वारा बनाई गई संपत्ति आखिर में कहां जाती है? इससे शेयर होल्डर्स को लाभांश, कर्जदाताओं को ब्याज, आपूर्तिकर्ताओं को सेवाएं और कर्मचारियों को वेतन एवं सरकार को टैक्स मिलता है।
यहां तक कि प्रमोटर भी अपने लाभांश और पूंजी लाभ से उत्पाद और सेवाएं खरीदते हैं, जिससे रोजगार पैदा होने के साथ ही आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं। कुल मिलाकर, कंपनियों द्वारा बनाई गई संपत्ति शेयर होल्डर्स, कर्जदाताओं, कर्मचारियों और नागरिकों के माध्यम से समाज एवं वित्तीय तंत्र में ही वापस आ जाती है।
हमें यह भी समझना होगा कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में अगर हम कंपनियों पर ज्यादा टैक्स लगाएंगे तो वे उन देशों में चली जाएंगी, जहां टैक्स कम है। इससे भारत को रोजगार और संपत्ति सृजन से मिलने वाले फायदे नहीं मिल पाएंगे। इसलिए कंपनियों पर भारी टैक्स लगाने की मांग आर्थिक समृद्धि के स्रोत को न समझ पाने का नतीजा है। एक स्वस्थ व्यावसायिक माहौल भारी कारपोरेट टैक्स की तुलना में समाज को रोजगार एवं आयकर के रूप में कहीं अधिक योगदान देता है।
आईए, भारत की प्रगति में संपत्ति का सृजन करने वालों के अहम योगदान को पहचानें और उनका सम्मान करें। साम्यवाद और समाजवाद जैसी बाहरी विचारधाराओं को ठुकराकर भारतीय सांस्कृतिक सोच को अपनाएं। हम सभी के लिए एक उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है। आज के भारत में संपत्ति का सृजन करने वाले सिर्फ व्यवसाय नहीं कर रहे हैं, अपितु वे एक विकसित भारत की नींव रख रहे हैं।
(लेखक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में कार्यकारी निदेशक और भारत के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं)
It was a privilege to meet with Hon'ble EAM Sir @DrSJaishankar again on his recent visit to Washington D.C.
Grateful for the opportunity to exchange ideas.🙏
EP-19 | How India Can Become A $55 Trillion Dollar Economy By 2047
@majorgauravarya@SubramanianKri
Catch Prof. Krishnamurthy Subramanian With Major Gaurav Arya (Retd.) In Episode 19 of #TheGauravAryaPodcast
Watch Podcast Here➡️https://t.co/QPW9on3zak
#TheGauravAryaPodcast #MajorGauravArya #KrishnamurthySubramanian #IMF #IndiaEconomy
सनातन के शंकराचार्य आपसी लड़ाई में व्यस्त हैं ! एक दूसरे को फर्जी बता रहें हैं ! यति नरसिंघानंद जी गिरफ़्तार हुए किसी धर्मगुरु का मुँह नहीं खुला किसी के चाँदी के सिंहासन नहीं हिले ! लोग गीता को सरेआम जला देते हैं राम को गाली देते हैं महर्षि मनु का पुतला फूंकते हैं तब तो एक भी हिंदू पत्थरबाज़ी नहीं करता तब ईश निंदा नहीं होती क्या ? आज यह प्रश्न उठना चाहिए !