हम दुनिया की नज़रों में गिरेंगे या खरे उतरेंगे ये पता नहीं? लेकिन इतना यक़ीन है, कि हम ख़ुद अपने आपसे नज़रें मिला के ये कह पायेंगे-
...कि हमने जो सोचा वो देश के लिए था! हमने जो किया वो देश के लिए है और हमने जो पाया वो देश के लिए होगा!!
जय हिंद! जय भारत!!!
❤️🇮🇳🙏
यह झूठा भ्रम मत फैलाएं और जो एकता देश में बनी हैं उसपर कुठाराघात न करें !
आज़ कांग्रेस सेवादल ने CJP आंदोलनकारियों के लिए नाश्ता तैयार किया हमारी मदद कर रहें हैं !
और श्री राहुल गांधी जी ने जो किया है उससे यह स्पष्ट है कि पुरा देश अब सरकार पर दबाव बना रहा है।
नेता विपक्ष अपना कर्तव्य निर्वहन कर रहे हैं।
बहुत कड़ी भाषा का प्रयोग किया है तहसीन ने मंत्री गडकरी और अधिकारियों के खिलाफ। जबकि ये लोग तो सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पास की गई एथनॉल पॉलिसी का पालन कर रहे हैं।
सोचिये तहसीन को मोदी पर कितना गुस्सा आता होगा, जिसने इस ���ॉलिसी को लोगों पर लादा है?
लेकिन मोदी का नाम पता नहीं क्यों नहीं लेते? प्यार है, डर है, लालच है, ये नहीं पता। लेकिन मोदी का जिक्र आप ना इनकी बातों में देखेंगे, ना इनके ट्वीट्स में। गडकरी गरियाने लायक है, ये बात सही है। लेकिन क्या मोदी मोहब्बत के लायक है?
बा��� रावण की नाभि में लगा
और परकटे पक्षी की तरह भूशायी हुआ।
लँका जीत ली गयी थी। सोने से मढ़ी लंका, अद्भुत प्रासाद, ऊंचे महल, समृद्ध राज्य। राम ने कहा- अब यह सब मेरा है।
लंका पर कब्जा कर लिया।
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बाली को यही तीर लगा।
वह परलोक सिधारा���
पम्पापुरी, श्रीराम के कदमो में थी। उन्होंने अपना राज्याभिषेक कराया। अपने बाहुबल से राजा बन गए।
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कैकयी ने उनके राज्याभिषेक का विरोध किया। युवा रानी ने वृद्ध राजा की अपने प्रति राजा की आसक्ति का लाभ उठाया। सौतन के पुत्र को 14 साल के वनवास, और अपने पुत्र को राजगद्दी का आदेश निकलवा दिया।
लक्ष्मण क्रोधित थे। अयोध्या की जनता क्रोधित थी। मंत्रिमंडल में असंतोष था। श्रीराम के एक इशारे की देर थे। लक्ष्मण को उन्होंने बस भौहों से इशारा किया। और फौज ने राजमहल को घेर लिया।
दशरथ और कैकयी को बंदी बनाया गया। नानी के घर गए भरत शत्रुघ्न को निर्वासन दिया गया। उन्हें मारने को जासूस भेजे गए। और अयोध्या में तख्तापलट कुछ ही घण्टो में पूर्ण हो गया।
अयोध्या में राम राज्य 14 साल बाद नही,
उसी वक्त शुर�� हो गया।
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ये तीन दृष्टांत हैं।
जो राम कर सकते थे, मगर किया नही। अगर देते तो अशोक और औरँगजेब की श्रेणी में होते। शायद बड़े दिग्विजयी राजा होते, धन सम्पदा, शक्ति भरपूर होती।
लेकिन वे हमारे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम न बनते।
श्रीराम का मतलब- त्याग है।
न्याय है। करुणा है।
नैतिकता, धर्म और मर्यादाओं का बंधन है।
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माइट इज राइट अगर फलसफा होता, ताकत और विजय अगर उनकी निगाह में सर्वोच्च प��रतिफल होते, तो लंका का राजा विभीषण नही बनता। पम्पापुरी वे सुग्रीव को नही देते। और अयोध्या में भरत का राज न आता।
पिता से हकदारी वाली भूमि, या कहें पूरा राज्य एक क्षण में त्यागने वाले उस श्रीराम को, तुमने कपट से छीनी हुई जमीन पर बिठा दिया????
देश भर मर लाखो मासूमो के लहू से रंगे पथ पर उन्हें घसीटते हुए ले गए, और गीत बजवाते रहे- जो राम को लाये हैं..
उफ्फ्फ!!
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यदि प्रभु राम की सबसे बड़ी असेवा, सबसे बड़ा द्रोह, सबसे बड़ा अपमान कोई हो सकता था, तो यही हो सकता था।
और अब तो साबित हो गया है कि बीस सालों तक यह जद्दोजहद, विनाश का खेल- श्रद्धा से वशीभूत होकर नही किया था। यह तो धन चोरी का एक ठिया बनाने का प्रक्रम था।
योजनाबद्ध कार्यक्रम था।
षड्यन्त्र था।
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राम की मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठान को, राम का आशीष मिलने का प्रश्न ही नही है। तो जो हो रहा है, औऱ जो हुआ है- बट नैचुरल था।
इसमे आगे रोक लग जायेगी, इसकी भी आशा आत्मप्रवंचना के सिवाय कुछ नही।
पर मसला भी इससे बड़ा है। राम के मंदिर में सीसीटीवी के बावजूद चोरी करने वालो के हाथ मे देश का खजाना है। वहां तो सीसीटीवी भी नही है। चौकीदार ��पना है। पुलिस अपनी, जज अपने हैं। जब वहां खुलासा होगा, तो जाने क्या क्या खुलेगा।
जो राम को लाये हैं, जाने क्या क्या लेकर जा चुके, और क्या क्या ले जायेंगे?
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प्रभु राम , कभी वे लक्ष्मण, सीता, हनुमान के साथ दिखते थे। मुस्कुराते, हाथ आशीर्वाद देते हुए। लेकिन जब से राम से छल शुरू हुआ, जहां देखो, क्रोधित दिखाई देते हैं।
कारो पर, दुकानों में, सोशल मीडिया पर, क्रोधित, कुंठित सी तस्वीरे देखता हूँ, तो सोचता हूँ- श्रीराम किस पर गुस्सा है। किसे तलाश रहे.. यह तीर किसकी नाभि की तरफ है। किसे भूशायी कर यह क्रोध शांत होगा..
यह भविष्य बतायेगा। इस दौर में हम तो आँखें बंद कर अपने भक्तवत्सल, प्रेमिल सियाराम का स्मरण कर रहे हैं। इंतजार में हैं।
हमे प्रभु के न्याय पर आस्था है।
कल तक एक थाली में चार स्व���ंसेवक खिचड़ी खाते थे, एक ही निक्कर को छह लोग बदल बदलकर पहनते थे, दस लोग एक ही खोली में चिपक चिपक कर सोते थे।
लेकिन आज 12-12 मंजिल के भव्य ��ाँच सितारा दफ्तर बन रहे हैं, महंगे लैपटॉप, कैमरा और टेलीप्रॉम्प्टर से भागवत और होसबले बयानबाजी करते हैं।
ये सब चढ़ावा कहाँ से आ रहा है? अयोध्या से जो लूटा गया है, उसका कितना हिस्सा यहाँ पहुंचा है? संघ इस सारी लूट पर पर्दा डालने की इतना बेचैन क्यों है?
बुजुर्ग और अनुभवी लोग बार बार क्यों कहते हैं कि जीवन का कोई भरोसा नहीं है।
देख लीजिये, स्कूटी सवार आराम से अपने रास्ते जा रहा था. पेड़ से टूटकर लकड़ी गिरी।
स्कूटी सवार के सिर में चोट आई और सड़क पर बेसुध पड़ गया. लोग आनन फानन में लेकर अस्पताल पहुंचे, जहां डॉक्टर ने बताया कि ये कोमा में चले गए हैं. घटना बेंगलु���ु के राजाजीनगर की है.
उत्तर प्रदेश की मेरठ पुलिस ने 6 साल पहले कथित एनकाउंटर में शेमन खान को कमर में 3 गो*लियाँ मारी, तब से वह चारपाई पर है। वह बिना सहारे चल नहीं पाता। जिंदगी कमरे में कैद होकर रह गई है।
पहले पुलिस ने कहा कि वह लूट की बाइक चला रहा था। जब शेमन ने बाइक के डॉक्यू��ेंट दिखाए तो पुलिस ने कहा कि वह लूट में शामिल था। शेमन खान को आज तक नहीं पता कि उसे गोली क्यों मारी ��ई?
Reporting with @Benarasiyaa
नोएडा में 158 करोड़ रुपए लगाकर बस टर्मिनल बना. साल 2022 में CM योगी ने इसका उद्घाटन किया.
अब ये टर्मिनल बंद पड़ा हुआ है. यहां से एक भी बस नहीं चलती.
सोचिए- जनता के 158 करोड़ रुपए लगाकर इतनी बड़ी इमारत बना द���, लेकिन उसका इस्तेमाल तक नहीं किया जाता.
📍यूपी
लोग चंपत राय और उनकी टीम से अपने दिए हुए चढ़ावे का हिसाब माँग रहे हैं, कोई पूछा रहा है हमारी चाँदी की ईंट कहां गई, कोई कह रहा है कि हमें कैश की रसीद नहीं मिली।
भैया अगर आपसे पलट कर चंपत जी ने जवाब माँग लिया कि चढ़ावे के बदले जो पुण्य कमाया है, उसका हिसाब ��ो। तो क्या आप दे पाओगे?
दान-पुण्य भावना का खेल होता है, इसमें हिसाब नहीं चलता।
इसलिए कहा गया है कि एक हाथ से दान दो तो दूसरे को पता नहीं चलना चाहिए। पेटी में डालो और आगे बढ़ो। मथुरा और काशी में अभी बहुत काम बाकी है।
जय माधव, जय महादेव 🙏🏼
इस देश मे कुछ सवाल सिर्फ राहुल गांधी के लिए रिजर्व हैं।
जिनका दायरा, मोहम्मद गोरी लेकर खलजी, बाबर, औरंगजेब, अंग्रेज, नेहरू, इन्दिरा, मनमोहन तक फैला हो सकता है।
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राहुल की क्वालिफिकेशन के बारे मे रामचन्द्र गुहा का सवाल, ऐसा ही स्पेशल सवाल है। भारत के 99% नेता, नेता बनने के पहले क्या करते थे, इसकी जानकारी न तो आम लोगो है,
न वे इसकी परवाह करते हैं।
मसलन, बिना कोई अनुभव , बिना कोई चुनाव लड़े, डायरेक्ट शपथ लेकर अनिर्वाचित मुख्यमंत्री बनने के पहले, हमारे प्रधानमंत्री क्या करते थे??
पब्लिक डोमेन में इसकी सूचना शून्य है।
अब भले वे खुद स्वीकार करें, कि वे पढ़े लिख नही पाये, स्टेशन पर चाय बेची, 35 वर्ष भिक्षाटन करते रहे - तो भी इससे किसी को फर्क नही पड़ता।
मगर राहुल के बारे मे जानना है।
गहराई से, और तथ्यपरक जानना है।
और नकारना है।
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दरअसल राहुल से उसकी योग्यता नही पूछी जाती, उन्हें प्रच्छन्न रूप से निर्योग्य घोषित किया जाता है। और निर्योग्यता का एक ही कार�� है- गांधी सरनेम के साथ पैदा होना..
और दरअसल यही गुहा जैसो का ऑब्जेक्शन है। वरना तो 5 बार का सांसद, 4 राज्य सरकारो का पॉवर सेंटर, केंद्रीय सरकार में 10 साल तक निर्णय बदलने की ताकत रखने वाला शख्स.
जिसे विभिन्न संसदीय समितियों में दो दशक का अनुभव हो,
पब्लिक पॉलिसी की पुख्ता समझ हो, कैम्ब्रिज मे पढ़ा हो और और अर्थव्यवस्था की दशा दिशा की बार बार सटीक पूर्वसूचना देता हो, अगर किसी और दल या देश में में 100 ��ांसद लेकर बैठा होता..
तो उससे यह सवाल करने की हिम्मत किसी मे न होती।
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लेकिन आप राहुल से पूछ सकते है।
क्योकि राहुल से डर नही लगता।
रामचन्द्र गुहा का वह वीडियो हमने देखा है, जिसमे सरकार के विरुद्ध तख्ती लेकर खड़े हो जाने भर से पुलिस उन्हें कुत्तो की तरह घसीटकर ले गई। इसके बाद वे दोबारा सरकार के नाम की त��्ती लेकर चौराहे पर नही गए।
राहुल के नाम की तख्ती सेफ है।
गुहा को पता है।
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और यही "सेफ" फीलिंग राहुल की उपलब्धि है। उसके 20 साल के पोलिटिकल करियर का एसेंस है।
रामचन्द्र गुहा इस देश मे भाजपा/ मोदी की हेजेमनी को राहुल पर थोपते है, तो उनके इतिहासकार होने की समझ पर शक होता है।दरअसल, जो वे स्वीकार करने से बच रहे है, वो यह कि आज देश की राजनीतिक हालात, एक आम चुनावी राजनीति नही, एक कंट्रोल्ड सामाजिक पर���वर्तन है।
यह परिवर्तन, मीडिया, ज्युडिशयरी, चुनाव आयोग, ब्यूरोक्रेसी और एजेंसियों के शीर्ष पर कठपुतलियां बिठाकर थोपा गया है। जिसके नीचे जनाक्रोश उबल रहा है।
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इस आक्रोश की प्रतिक्रिया को विस्फोटक, और विध्वंसक होने से बचाने, और गृहयुद्ध समान हालात टालने के लिए किसी भी विपक्ष को बहुत धैर्यवान, सॉफ्ट होने की जरूरत है।
वरना जिस स्ट्रीट फाइट, सँगठनीकरण और आक्रामक राजनीति की अपेक्षा, राम गुहा आज राहुल गांधी से कर रहे है- उसका नतीजा पिछले 1 माह का बंगाल, और 3 साल से मणिपुर देखकर समझ लेना चाहिए।
आप पूरे देश मे ऐसा चाहते हैं???
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गम्भीर इतिहासकार जानता है, कि ऐसी सत्ता अपनी कब्र खुद बड़ी गहरी खोदती है।
मौजूदा दौर उन भावनाओ का एक्सप्रेशन है, जिसे हमारे समाज ने 70 साल तक ऐसे छिपा रखा था रखी थी, जैसे कोई बूढा अपने किशोर उम्र के कुटैव छिपाकर रखता है। बेहयाई को मान्यता मिलते ही वह धारा खुलकर खेल रही है।
लेकिन तमाम धन, ताकत, नंगई और मैनिपुलेशन के बावजूद 37-38% जनसमर्थन उसका पीक था। अब तो आगे सिर्फ ढलान है।
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गुहा हों, या उनकी तरह डेस्परेट दूसरे लोग, जान लें कि हिंदुस्तान की आत्मा इस तरह बहुत देर कुचली नही जा सकती।
इस ��ँजवात से बाहर निकलने का रास्ता, यह देश जल्द तय करेगा। पर उस उबाल का पथ प्रदर्शक कोई ईमानदार, दूरदर्शी, और नैतिक मूल्यों पर ठहराव रखने वाला ऐसा शख्स होना चाहिए। जो शांति, साहचर्य और मेल मिलाप का चेहरा हो।
इस वक्त, बिलाशक..
वह राहुल है।
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इस दौर का बुद्ध है।
जिसे महज राजघराने की पैदाइश की वजह से खारिज कर देना, और खास तरह की प्रतिक्रियाओं की आशा रखना, बौद्धिक नही- बायस्ड होने के लक्षण हैं।
जो ��ाम गुहा कई बार प्रदर्शित कर चुके हैं। उनका फैन होने के नाते उन्हें सप्रेम सलाह है कि वे समाज मे अपनी उम्र औऱ अनुभव का आडम्बर बनाये रखें। भ्रम और खीज की शिकार जुबान को विराम दें।
और मौन की शक्ति महसूस करें।
जादू देखिए 👇
मोहन यादव मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. इसके बाद उनके परिवार ने उज्जैन में धड़ाधड़ जमीनें खरीद लीं.
खास बात है कि ये जमीनें ���रकारी प्रोजेक्ट के आस पास थीं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है- मोहन यादव की पत्नी, बहू, भाई, उनके लड़के और तमाम रिश्तेदारों ने जमीन खरीदी.
खबरदार- अगर किसी ने भ्रष्टाचार कहा, ये तो जादू है.