You took a nation with zero major titles and turned it into a team everyone feared at every FIFA World Cup. Gave everything — every match, every minute, every tear.
The end of an era, but the legend is forever. Thank you, CR7. 🐐🇵🇹❤️
#CR7#Ronaldo#FIFAWorldCup
एक संप्रभु राष्ट्र की असली पहचान उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि अपने नागरिकों के लिए खड़े होने की उसकी क्षमता और इच्छा से तय होती है। जब हमारे भारतीय नाविक अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में, जहाँ किसी एक देश का एकाधिकार नहीं है, अपनी जान गँवा देते हैं, तो यह सवाल केवल सुरक्षा का नहीं, बल्कि राष्ट्र की संप्रभुता, गरिमा और नैतिक अधिकार का हो जाता है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांत में राज्य का प्रथम कर्तव्य अपने नागरिकों की रक्षा करना है, चाहे वे समुद्र के बीच हों या विदेश की भूमि पर। अगर कोई सरकार इस मौलिक जिम्मेदारी से पीछे हटती है, तो वह न केवल अपने लोगों के साथ अन्याय करती है, बल्कि विश्व समुदाय में अपनी वैधता भी खोने लगती है। क्योंकि कोई भी राष्ट्र तब तक “महान” या “शक्तिशाली” नहीं माना जाता, जब तक वह अपने सबसे साधारण नागरिक की जान की रक्षा के लिए खड़ा न हो।
ओमान की खाड़ी और होर्मुज के अंतरराष्ट्रीय जल में हाल की घटनाएँ ��स सिद्धांत को सीधे चुनौती दे रही हैं। वाणिज्यिक जहाजों पर हमले, भारतीय नाविकों की जान का खतरा और इन सबके बीच हमारी सरकार की चुप्पी या बेहद कमजोर प्रतिक्रिया गहरी चिंता पैदा करती है। क्या हमारे नागरिकों की जान इतनी सस्ती हो गई है कि एक शक्तिशाली देश के सामने हम अपनी आवाज़ भी नहीं उठा पा रहे? क्या संप्रभुता का अर्थ अब केवल सीमा की रक्षा करना रह गया है, या इसमें अपने लोगों के जीवन और अधिकारों की रक्षा भी शामिल है?
एक सच्ची, गरिमापूर्ण और शक्तिशाली सरकार वही होती है जो अपने नागरिकों के लिए बिना किसी समझौते के आवाज़ उठाए, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली देश क्यों न हो। जो सरकार विदेशी दबाव या रणनीतिक संबंधों के नाम पर अपने लोगों के खून पर चुप्पी साध ले, वह न केवल कमजोर है, बल्कि समझौतावादी भी साबित होती है। ऐसी सरकार न देश के भविष्य के लिए उपयुक्त है, न ही उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि के लिए।
हर मनुष्य को जीवन का अधिकार है। अंतरराष्ट्रीय जल में यह अधिकार और भी पवित���र हो जाता है, क्योंकि वहाँ कोई एक देश का कानून नहीं चलता। जब यह अधिकार छीना जाता है, तो यह न केवल मानवाधिकार का उल्लंघन है, बल्कि पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चेतावनी भी है।
हम एक ऐसे भारत की कल्पना करते हैं जो अपने नागरिकों के लिए खड़ा हो, गरिमा के साथ, शक्ति के साथ और सिद्धांतों के साथ। क्योंकि जब देश अपने लोगों के साथ नहीं खड़ा होता, तो वह दुनिया में अपनी जगह खो देता है। हमारे नाविकों की ज��न सस्ती नहीं है। जवाबदेही तय होनी चाहिए।
हमारे देश के प्रधानमंत्री को इस पर बोलना चाहिए, अपने नागरिकों के लिए।
इतिहास कोई मृत पांडुलिपि नहीं, बल्कि जीवंत चेतना है जो समय के आवर्तन में स्वयं को बार-बार प्रक��� करती है। वह मिटता नहीं, क्योंकि वह मानव स्वभाव का सबसे गहरा दर्पण है।
बंगाल की मिट्टी पर #मीर_जाफर की कथा इसी सत्य की प्रथम झलक थी। जब #सिराजुद्दौला के सबसे विश्वसनीय सेनापति ने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए विदेशी ताकतों से हाथ मिलाया, तो न केवल एक नवाब का राज्य ढहा, बल्कि यह भी सिद्ध हो गया कि सत्ता की भूख में निष्ठा कितनी क्षणभंगुर होती है।
आज उसी बंगाल की राजनीति उसी पुरानी लिपि को दोहरा रही है। #वामपंथी मोर्चे के दी��्घकालिक शासन के विघटन के बाद #TMC के उदय पर वाम के अनेक चेहरे उसी सुविधा की गोद में चले गए। फिर जब हवाएँ पलटीं और #BJP का प्रभाव बढ़ा, तो #टीएमसी के ही अनेक स्थापित नेता उसी वेग से दूसरी ओर दौड़ पड़े। यह महज राजनीतिक गतिशीलता नहीं, बल्कि इतिहास का अनवरत चक्र है।
दर्शन हमें सिखाता है कि इतिहास दोहराता नहीं, मानवता उसे दोहराती है। क्योंकि लालच, भय, महत्वाकांक्षा और अवसरवादिता के बीज मानव हृदय में शाश्वत रूप से विद्यमान रहते हैं। जो लोग अतीत को केवल भूलने की कोशिश करते हैं, उन्हें वह बार-बार जीने को मजबूर करता है।
सच्ची बुद्धिमत्ता इतिहास को मिटाने में नहीं, उसे समझने और उसके चक्र को तोड़ने के साहस में है। बंगाल की यह यात्रा हमें एक गंभीर प्रश्न पूछती है,
क्या हम केवल सत्त�� के रंग बदलते रहेंगे, या कभी ऐसा समाज रच पाएंगे जहाँ निष्ठा सिद्धांतों से जुड़ी रहे, न कि सुविधा से?
इतिहास हमें यूं ही नहीं दोहराता। वह हमें बार-बार चेतावनी देता है कि जो अपने अतीत से सीखने से इनकार करता है, वह भविष्य में वही गलतियाँ दोहराने को अभिशप्त होता है।
#BengalPoliticas #Bengal_Politics
जब ज्ञान और सादगी एक साथ मिलते हैं... 🙏✨
कुछ लोग जिंदगी में दोस्त बनकर आते हैं, लेकिन वो आपके बड़े भाई और मेंटॉर (Mentor) बन जाते हैं। डॉ. प्रशांत कुमार (Dr. Prashant Kumar) मेरे लिए बिल्कुल वैसे ही हैं। एक ऐसे इंसान जिनके पास ज्ञान का भंडार है, लेकिन स्वभाव में इतनी विनम्रता है कि कोई भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। उनसे मैंने जिंदगी (Life) और ज्ञान (Knowledge) , दोनों के बारे में बहुत कुछ सीखा है।
आज मेरे लिए बेहद गर्व का पल है! भैया की नई किताब "Understanding 'What There Is'" पब्लिश हो चुकी है।
यह सिर्फ एक किताब नहीं है, बल्कि आज के डिजिटल और AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के दौर में "अस्तित्व" (Existence) और "वास्तविकता" को समझने का एक नया दार्शनिक नज़रिया है। जो लोग विज्ञान, तकनीक और फिलॉसफी में थोड़ी भी रुचि रखते हैं, उनके लिए यह किताब एक आंखें खोलने वाला अनुभव साबित होगी। यह वाकई दिमाग को झकझोरने वाली एक कमाल की फिलॉसॉफिकल किताब है। अगर आप दुनिया को एक नए नज़रिए से देखना चाहते हैं, तो यह किताब आपकी रीडिंग लिस्ट में ज़रूर होनी चाहिए।
जितने वो ज्ञानी और बुद्धिमान हैं, उतने ही वो जमीन से ज���ड़े और विनम्र (Humble) इंसान भी हैं। उनसे सीखी बातें मेरे जीवन का एक अहम हिस्सा हैं।
प्रशांत भैया, इस अद्भुत उपलब्धि के लिए आपको दिल से बधाई! मुझे पूरा यकीन है कि आपकी यह बौद्धिक यात्रा (Intellectual Journey) दुनिया भर के विचारकों को प्रेरित करेगी।
📖 आप सभी इस किताब को ज़रूर पढ़ें!
#Philosophy #Ontology #PrashantKumar #ProudMoment #ArtificialIntelligence
ये सिर्फ़ एक पेपर लीक नहीं है… ये हमारे राष्ट्र की रूह पर गहरा ज़ख़्म है।
एक किसान का बेटा, एक मज़दूर की बेटी, एक साधारण घर का नौजवान, जो अपनी नींद, अपनी जवानी, अपनी हँसी-खुशी सब कुछ एक बेहतर ज़िन्���गी के लिए कुर्बान कर देता है, जब उसे ये पता चलता है कि उसकी मेहनत का इम्तहान पहले ही बिक चुका था, पेपर पहले ही चोरी हो चुका था, नतीजा पहले ही तय था…
तब केवल एक एग्जाम नहीं टूटता…
उसके अंदर राष्ट्र के प्रति यक़ीन टूटता है।
और जिस दिन किसी मुल्क के नौजवानों का यक़ीन टूटने लगे, समझ लो कि उस मुल्क की रूह घायल हो चुकी है।
आज सवाल सिर्फ़ “पेपर लीक” का नहीं है। सवाल ये है कि क्या हम वो मुल्क बनते जा रहे हैं जहाँ मेहनत हार जाए और भ्रष्टाचार जीत जाए? जहाँ इल्म हार जाए और जुगाड़ जीत जाए? जहाँ किरदार हार जाए और चोरी इज़्ज़त बन जाए?
हमारे मुल्क की राजनीतिक संस्थाएँ पहले ही जनता के विश्वास को खो चुकी है, और आने वाले समय में प्रशासनिक संस्थाएँ भी भ्रष्ट हाथों में चली जाएँ, तो यह केवल शासन का संकट नहीं रहेगा, यह राष्ट्र की बौद्धिक मृत्यु का आरम्भ होगा।
राजस्थान पुलिस की SOG ने जो “गेस पेपर” पकड़ा है, जिसमें 100 से 140 सवाल असली NEET 2026 से मिलते-जुलते पाए गए, वो सिर्फ़ एक कागज़ का टुकड़ा नहीं। वो इशारा है उस गहरे संस्थागत पतन का, जहाँ कोचिंग माफिया, व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी और भ्रष्ट हाथ मिलकर लाखों नौजवानों के ख़्वाबों को लूट रहे हैं।
@NTA_Exams कह रही है “जांच चल रही है”… लेकिन, जांच तो हर बार होती है। गिरफ्तारियाँ भी होती हैं। फिर क्यों हर साल यही ज़ुल्म दोहराया जाता है?
ये कोई साधारण ग़लती नहीं। ये व्यवस्था की बेग़ैरती है।
हमारे सबसे ईमानदार नौजवान आज सबसे ज़्यादा बेइज़्ज़त महसूस कर रहे हैं। वो लाइब्रेरी में रात भर जागते हैं, लेकिन सिस्टम उनके सपनों की हिफ़ाज़त नहीं कर पा रहा। वो संविधान पर यक़ीन करना चाहते हैं, लेकिन भ्रष्ट��चार उनकी उम्मीदों का गला घोंट रहा है।
और सबसे ख़तरनाक बात यह है कि हम धीरे-धीरे इस ज़ुल्म के आदी होते जा रहे हैं। हर नया घोटाला अब हमें गुस्सा नहीं, सिर्फ़ थकान देता है।
यह किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे खतरनाक अवस्था होती है,
जब जनता अन्याय देखकर क्रोधित होना छोड़ दे।
री-एग्ज़ाम सिर्फ़ दोबारा परीक्षा नहीं है, ये हमारी प्रशासनिक नाकामी का सार्वजनिक सबूत है। इसमें सिर्फ़ पैसे नहीं जलते, नौजवान���ं का समय जलता है, परिवारों की आरज़ू जलती है, और मुल्क का यक़ीन जलता है।
अगर आज हम ख़ामोश रहे, तो कल वही लोग हमारा मुल्क चलाएँगे जिनके पास न किरदार होगा, न संवेदना, न दूरदृष्टि और न ही विचार।
और जब किसी राष्ट्र का प्रशासन विचारहीन हाथों में चला जाए, तब वह राष्ट्र केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि बौद्धिक और नैतिक रूप से भी पंगु होने लगता है।
तो फ़ैसला हमें करना है -
क्या हम वो मुल्क चाहते हैं जहाँ चोर इज़्ज़तदार हों और मेहनतकश बेइज़्ज़त? क्या हम वो समाज चाहते हैं जहाँ ईमानदारी को मूर्खता कहा जाए? क्या हम वो भविष्य चाहते हैं जहाँ ताक़त हार जाए और सिफ़ारिश जीत जाए?
नहीं ना!
तो अब आवाज़ उठानी होगी। सवाल पूछने होंगे। जवाब माँगने होंगे। क्योंकि राष्ट्र सिर्फ़ सीमाओं से नहीं, अपने नौजवानों के यक़ीन से बचता है।
जिस दिन ये नौजवान पूरी तरह निराश हो गया, उस दिन हार सिर्फ़ एक छात्र की नहीं होगी, उस दिन हार पूरे हिंद��स्तान की होगी।
#NEET2026 #PaperLeak #इंसाफ_चाहिए #नौजवान_की_आवाज़ #मेहनत_की_इज़्ज़त
पश्चिम बंगाल में TMC की हार-जीत पर बहस करने के लिए तो बहुत कुछ है, लेकिन मैं उस बात पर नहीं जाऊँगा। क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि बंगाल के लिए कौन सही था। असली सवाल यह है, कि BJP ने बंगाल को किस तरीके से जीता? चुनाव आयोग (ECI) की क्या भूमिका रही? और सबसे बड़ी बात कि क्या यह ��ुनाव वाकई मुक्त और निष्पक्ष (Free and fair) थे?
लोकतंत्र मतलब वोट का अधिकार है। और यह अधिकार किसी योजना के नाम पर, कुछ महीने पहले ही, SIR जैसी विशेष तीव्र संशोधन (Special Intensive Revision) योजना चला कर छीन लिया जाए, तो यह किसी भी प्रगतिशील, चिंतनशील राष्ट्र के लिए खतरे की घंटी है। एक राज्य में करोड़ों नाम मतदाता सूची से गायब हो गए। लाखों भारतीय मतदाताओं, महिलाओं, गरीबों, किसानों और जिनका ख़ून हमारी मातृभूमि से लिपटा हो, ज���नका वोट का अधिकार संवैधानिक था, अचानक 'अनुपयुक्त' घोषित कर दिया जाए। क्या यह लोकतंत्र है? या लोकतंत्र का सौंदर्य चुराने का सुनियोजित खेल?
हम एक ऐसे दौर में खड़े हैं जहां बहुमत के नाम पर संस्थाओं से भरोसा उठ रहा है। ECI से, जिसे हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का रक्षक मानते थे। अगर आम जनता और विपक्षी दलों का भरोसा चला गया है, तो आने वाले समय में चुनाव ��िर्फ़ औपचारिकता बनकर रह जाएंगे। जीत-हार पहले ही तय हो चुकी होगी।
यह सवाल सिर्फ़ बंगाल का नहीं, पूरे भारत का है।
लोकतंत्र तब तक जीवित रहता है, जब तक उसकी प्रक्रिया पर विश्वास बना रहता है। जब वह विश्वास टूटता है, तो राष्ट्र की सरकारें सिर्फ कागजों, पोस्टरों और डिजिटल स्क्रीनों तक ही सीमित हो जाती हैं।
हम सब, चाहे छात्र हों, चाहे BJP समर्थक हो या फिर चाहे आम नागरिक, अगर देश से थोड़ी भी मोहब्बत रखते हैं, तो इस पर गंभीरता से सोचें।
पार्टियों की छोटी-छोटी राजनीति से ऊपर उठकर
लोकतंत्र की रक्षा की बड़ी लड़ाई लड़ें।क्योंकि आज बंगाल में जो हो रहा है, वह कल कहीं और हो सकता है।
और अंत में सिर्फ़ एक ही हार होगी और वो होगी भारत की।
जय हिंद। जय लोकतंत्र।
#SaveIndianDemocracy #ECI_Question #LoktantraKiRaksha
मंत्री जी ने बड़ी ही दार्शनिक बात कही है।
तो अब फैसला हो जाना चाहिए।
सबसे पहले तो BJP मुख्यालय से AC हटा दी जाए, फिर सभी मंत्रालयों, सरकारी दफ्तरों, विधानस��ाओं, राजभवनों और पार्टी कार्यालयों से भी।
आखिर हमारे सब नेता तो जनता की सेवा में लगे हैं, उन्हें AC की क्या जरूरत?
और फिर प्याज खरीदो किसानों से, अच्छे दाम पर और हर मंत्री, हर अधिकारी, हर सांसद, हर कार्यकर्ता और हर नागरिक को एक-एक किलो प्याज फ्री में सरकार को बांट देना चाहिए, फिर चाहे तो जेब में रखो, काटकर सूंघो, और 52 डिग्री में “प्रकृति से जुड़ो”।
और हाँ AC हटाने से कार्बन उत्सर्जन घटेगा, पर्यावरण ब��ेगा, स्वास्थ्य सुधरेगा, फ़ायदे ही फ़ायदे हम तो दुनिया के सबसे शिक्षित और समृद्ध देश हैं न?
हम जलवायु परिवर्तन पर ग्लोबल समिट नहीं करते, हम प्याज से समाधान निकालते हैं।
क्योंकि असली बुद्धिमत्ता तो यही है, समस्या को हल करने की बजाय, समस्या को “पारंपरिक ज्ञान” से मैनेज करना।
प्याज लगाओ, AC हटाओ, गर्मी भगाओ।
आत्मा तो पुरानी है ही, शरीर भी पुराना हो जाएगा तो क्या फर्क पड़ता है?
क्यों मंत्री जी? @JM_Scindia
#प्याज_से_समाधान #चंबल_की_खाल #गर्मी_का_उपाय
India Post, your inefficiency has crossed all limits of tolerance.
Tracking ID: PP874021804IN
•Status: “Out for delivery” by Jagdish Chandra (BEAT_01)
•Then: “Delivery attempt successful” on 13-03-2026 at 17:13:17
Yet the item is NOT delivered.
This is not a minor glitch. This is deliberate deception and systemic failure. You publicly declare “successful delivery” while the parcel sits undelivered, forcing citizens to chase ghosts in your broken system.
Jagdish Chandra and India Post — do you even understand the meaning of the word “successful”? Or has accountability been completely erased from your vocabulary?
This is not just one parcel. This reflects the deep rot in a once-revered institution that now treats public trust as optional. You hold a monopoly on postal services, yet you deliver incompetence with clinical precision.
I demand:
1. Immediate delivery of PP874021804IN with proof of handover.
2. Strict action against the concerned official for filing a false “successful delivery” report.
3. Public explanation from India Post on how many such fake “successful deliveries” are recorded daily.
@IndiaPostOffice
Enough is enough. Taxpayers are not your experimental subjects for testing how long we can tolerate mediocrity.
Fix this. Now.
#IndiaPostFail #PP874021804IN #PostalScam
#लोकसभा का डिप्टी स्पीकर पद 7 साल से खाली क्यों? ये लोकतंत्र का सबसे बड़ा सवाल है।
अनुच्छेद 93 कहता है , “जल्द से जल्द” स्पीकर और डिप्टी स्पीकर चुनो। लेकिन 2019 से आज तक खाली है! पहली बार दो पूरी लोकसभा बिना डिप्टी स्प��कर चलीं।
पहले परंपरा थी, कि स्पीकर सत्ता से, और डिप्टी स्पीकर विपक्ष से हो। 1990-2014 तक यही चला। लेकिन अब?
सत्ता पक्ष को विपक्ष को “समय” देना पसंद नहीं है। एक स्पीकर को आसानी से संभाल जा सकता है। लेकिन दो कुर्सियाँ हो गईं तो विपक्ष की आवाज़ दबाना सत्ता पक्ष के लिए मुश्किल हो जाएगा!
ये सिर्फ एक पद खाली रखना नहीं है, बल्कि संसदीय संतुलन को मारना है। डिप्टी स्पीकर सदन की निष्पक्षता, बहस का समय और विपक���ष का सम्मान सुनिश्चित करता है। जब वो गायब है, तो लोकतंत्र अधूरा है।
@kharge जी ने ठीक कहा, ये संवैधानिक भावना के खिलाफ है। लोकतंत्र बहुमत का खेल नहीं, संतुलन का नाम है।
अगर परंपराएँ टूटती रहीं, तो संस्थाएँ कमजोर होंगी। #DeputySpeakerVacant #SaveDemocracy #Article93 #LokSabha
महिलाओं का आरक्षण: लोकतंत्र का स्वप्न या राजनीति का चालाकी भरा आधा वादा?
भारत का लोकतंत्र आज भी एक गहरे सवाल से जूझ रहा है, जब आधा आ��ाश महिलाओं का है, तो संसद के 543 आसनों पर उनका पूरा, सच्चा प्रतिनिधित्व क्यों नहीं?
महिलाएँ इस देश की आधी आबादी हैं, फिर भी उनकी आवाज़ को “एक-तिहाई” तक सीमित रखने का क्या तर्क है?
सरकार ने 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास किया, यह सच है। लेकिन अब 2026 में नया खेल शुरू हो गया है। सरकार की नई शर्त है: पहले लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर लगभग 850 कर लो (परिसीमन के नाम पर), तब जाकर महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण दो।
��ोचिए, अगर सरकार सचमुच महिलाओं को समान शक्तिशाली नेता मानती, तो मौजूदा 543 सीटों पर ही आरक्षण क्यों नहीं लागू कर दिया?
क्यों इंतज़ार?
क्यों यह शर्त?
क्योंकि 543 सीटें “सुरक्षित” हैं, पुरुष-प्रधान सत्ता के लिए। नई सीटें बनाकर ही महिलाओं को जगह दी जाएगी, ताकि किसी पुराने सांसद की कुर्सी न छिन जाए। क्या यह महिलाओं के प्रति विश्वास है?
या फिर यह संदेश है कि “तुम्हें जगह चाहिए तो हम पाई बढ़ा देंगे, लेकिन अपना हिस्सा नहीं छोड़ेंगे”?
मैं आरक्षण का पूर्ण समर्थक हूँ, बिना किसी शर्त के। क्योंकि लोकतंत्र तभी सच्चा है जब हर वर्ग की भाग��दारी हर जगह पर दिखे, न कि केवल भाषणों में। महिलाएँ कोई “विशेष वर्ग” नहीं, वे इस देश की बेटियाँ, माताएँ, बहनें और सक्षम नेता हैं।
पर जब सरकार आरक्षण का बिल लाकर फिर उसे “सीटें बढ़ाओ, तब लागू करो” की शर्त से बाँध देती है, तो सवाल उठता है, क्या यह सच्ची नारी शक्ति है, या वोट-बैंक की चालाक सजावट?
साथियों, आरक्षण कोई दान नहीं, बल्कि सबका अधिकार है। और अधिकार को “पहले सीटें बढ़ाओ” कहकर टालना, लोकतंत्र के साथ अन्याय है।
मैं महिलाओं के प��र्ण, और बिना शर्त प्रतिनिधित्व की माँग करता हूँ, न केवल लोकसभा की सीटों में, बल्कि हर मंच पर जहाँ फैसले होते हैं।
क्योंकि जब तक आधा देश प्रतिनिधित्व में बराबर नहीं होगा, तब तक भारत सच्चे अर्थों में समृद्ध और समान नहीं कहलाएगा।
नारी शक्ति का सम्मान करो, न केवल शब्दों में, बल्कि इरादों और व्यवहार में भी।
#WomenReservation #NariShaktiVandan #LoksabhaExpansion #SacchiSamanta #LoktantraKiAwaaz
मैं अभी लोकसभा की बहस देख रहा था।
बीजेपी की ओर से राज्य कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल @arjunrammeghwal बोल रहे थे। उन्होंने पूरी तरह से लिखे हुए कागज को शब्द दर शब्द पढ़ा। हर लाइन, हर शब्द पहले से तय था। कोई अपनी सोच, अपनी समझ या अपनी बात नहीं। सिर्फ़ एक पार्टी का दिया हुआ स्क्रिप्ट।
फिर कांग्रेस के गौरव गोगोई @GauravGogoiAsm बोलने लगे। उन्होंने कोई कागज नहीं निकाला, कोई नोट्स नहीं देखे। बस सीधे अपने शब्दों में, अपनी भाषा में, अपनी समझ और अपने विचारों से बात कर रहें हैं। बिना किसी स्क्रिप्ट के,दिल से और अपने दिमाग से।
दोनों सांसद हैं। दोनों जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं।
सवाल यह है
हमारा संसद क्या है?
क्या यह एक जगह है जहाँ लोग पार्टी के दिए गए कागज पढ़कर “प्रदर्शन” करते हैं? या यह वह मंच है जहाँ चुने हुए नेता देश और जनता के लिए अपनी सोच, अपनी चिंता और अपने विचार खुलकर रखते हैं?
जिस नेता को अपनी ब��त कहने के लिए कागज की जरूरत पड़ती है, वह खुद की सोच रखता है या सिर्फ़ पार्टी की? और जो नेता बिना कागज के, अपनी ज़ुबान और अपने दिमाग से बोल��ा है, वह कम से कम अपनी जिम्मेदारी तो समझता है।
सांसद का काम सिर्फ़ वोट बैंक या पार्टी लाइन पढ़ना नहीं है। सांसद का काम है, देश की सेवा करना , जनता की आवाज़ बनना और अपनी अंतरात्मा की बात संसद में रखना।
जो बिना कागज के बोलता है, वह कम से कम “अपना” तो बोल रहा है। जो कागज पढ़ता है, वह अक्सर “पराया” ही बोलता है।
संसद जनता के लिए है। जनता के चुने हुए लोग अपनी सोच से बोलें, यही लोकतंत्र की सुंदरता है।
क्���ा आप भी यही सोचते हैं?
#LokSabha #Parliament #Democracy #IndianPolitics
One of the BJP's dangerous plans is to “gerrymander” all Lok Sabha seats to its advantage for the 2029 elections
The proposed Bills remove all Constitutional safeguards on delimitation, giving full power to the Delimitation Commission which the govt itself will appoint and direct.
We have seen how BJP does this - it hijacked delimitation in Assam and Jammu and Kashmir, where it split up anti-BJP regions and communities for electoral advantage. As a result,
- some seats have 25 lakh voters, while some have only 8 lakh
- some seats have 12 Vidhan Sabha segments, while some have only 6
- some seats are broken into pieces without connection, sometimes divided by rivers or mountains
Having captured the Election Commission, PM Modi is confident that he can capture the Delimitation Commission too. The Congress will not allow this to happen.
Delimitation should be based on a transparent policy framework, developed after wide consultations with a consensus. Indians of all communities and States should feel confident that they will be represented and their voices will be heard.
This is the only way forward to protect and strengthen our democracy.
बाबा साहेब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर की 135वीं जयंती।
जिन्होंने “अछूत” कहलाने वाले समाज से उठकर, दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज़ से डॉक्टरेट हासिल किया, और फिर पूरे राष्ट्र को एक ऐसा संविधान दिया जिसकी नींव पर आज हमारा लोकतंत्र खड़ा है।
बाबा साहेब के विचारों की जड़ें गहरी थीं, शिक्षा को उन्होंने सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि मानव मुक्ति का सबसे शक्तिशाली हथियार माना। उन्होंने कहा था — “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।” क्योंकि शिक्षा ही वह आग है जो अंधकार को जलाती है, जाति की जंजीरों को तोड़ती है और मनुष्य को उसकी असली गरिमा लौटाती है।
उनका बौद्धिक योगदान सिर्फ कानून या राजनीति तक सीमित नहीं था। उन्होंने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को केवल शब्द नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता बना दिया। उन्होंने सिखाया कि सच्चा लोकतंत्र तब तक अधूरा है, जब तक सामाजिक और आर्थिक समानता न हो। उन्होंने जाति को सिर्फ सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रगति का सबसे बड़ा शत्रु बताया।
आज जब हम देखते हैं कि शिक्षा के द्वार खुल रहे हैं, पिछड़े वर्गों के युवा आगे बढ़ रहे हैं, महिलाओं को अधिकार मिल रहे हैं और संविधान की भावना जीवित है, तो यह सब बाबा साहेब के दूरदर्शी विचारों का फल है।
वे हमें याद दिलाते हैं: “मुझे वह धर्म पसंद है जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सिखाता है।” “भाग्य में विश्वास मत रखो, अपनी शक्ति और कर्म में विश्वास रखो।”
बाबा साहेब, आपका जीवन संघर्ष, ज��ञान और करुणा की मिसाल है। आपके विचार आज भी हर युवा को प्रेरित करते हैं कि हम न सिर्फ पढ़ें, बल्कि सोचें, सवाल करें और एक बेहतर, न्यायपूर्ण भारत का निर्माण करें।
शत-शत नमन आपको, भारत रत्न बाबा साहेब। जय भीम! जय भारत! 🙏🇮🇳
#AmbedkarJayanti #BabaSahebAmbedkar #DrBRAmbedkar #JaiBhim #Samaanta #EducationForAll #ConstitutionDay #BharatRatna
क्या किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र का चुनाव आयोग कभी भी किसी एक पार्टी को “दो टूक” कहकर इस तरह की धमकी भरी, एकपक्षीय भाषा का इस्तेमाल करता है?
सच्चे लोकतंत्र में चुनाव आयोग निष्पक्षता का दार्शनिक embodiment होता है — जॉन रॉल्स की ‘justice as fairness’ या डॉ. आंबेडकर की ‘संवैधानिक नैतिकता’ की तरह।
जब ECI खुद TMC को निशाना बनाकर “straight talk” करता है, तो हम किस मुंह से कहें कि हमारा चुनाव आयोग निष्पक्ष है?
(नोट:- मैं यहां सिर्फ लोकतांत्रिक राष्ट्रों की ही बात कर रहा हूँ।)
#ECI #Loktantra #WestBengalElections
नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के 56वें स्थापना दिवस की हार्दिक बधाई!
आज ही के दिन 9 अप्रैल 1971 को इंदिरा गांधी जी के दूरदर्शी सपने से जन्मा NSUI, मात्र एक छात्र संगठन नहीं… बल्कि लोकतंत्र की जीवंत आत्मा है।
छात्र जीवन सिर्फ़ एक जीवन नहीं बल्कि संघर्षों का प्रतीक है! पढ़ाई की किताबों के साथ-साथ, नफरत की राजनीति, शिक्षा के बाजारीकरण, और लोकतांत्रिक मूल्यों पर लगातार हमलो�� की आग छात्र में खड़ा होना पड़ता है।
इसी अन्याय के ख़िलाफ़ NSUI हमेशा से खड़ा रहा हैं।
यह संगठन हमें याद दिलाता है कि छात्र शक्ति सिर्फ युवा ऊर्जा नहीं… बल्कि समाज को नया आकार देने वाली क्रांतिकारी ताकत/सोच है।
ये मूल लोकतांत्रिक मूल्य स्वतंत्रता, समानता, न्याय, भाईचारा और धर्मनिरपेक्षता — ठीक वैसे हैं जैसे परमाणु कण। इन छोटे-छोटे कणों के बिना न तो राष्ट्र बनता है, न समाज टिकता है, न भविष्य ��ंभव है। NSUI इन्हीं मूल्यों की रक्षा के लिए हर विश्वविद्यालय, हर कॉलेज में लड़ रहा है — चुपके से नहीं, बल्कि खुले मंच पर, साहस और ध���र्य के साथ।
आज सवाल हम सबसे है: क्या हम सिर्फ छात्र हैं… या लोकतंत्र के वास्तविक रक्षक? आइए, इस NSUI के स्थापना दिवस पर संकल्प लें — छात्र संघर्ष जारी रहेगा, लोकतंत्र अटूट रहेगा, और नफरत की दीवारें हमेशा गिरेंगी।
जय हिंद! जय NSUI! जय छात्र शक्ति!! ✊❤️
#NSUIFoundationDay #NSUI56 #StudentStruggle #LoktantraKiRaksha #DemocraticValues #YouthForDemocracy
हमारे देश में एक नेता है सरेंडर जी (नोट: मैं सही नाम नहीं लिख सकता क्योंकि मेरा अकाउंट भी सस्पेंड हो सकता है।) वो हमारे देश में झूठ बोलने की ट्रेनिंग दे सकते हैं या फिर नईं संस्था खोल सकते हैं।
या उनके द्वार बनाए गए विश्वविद्यालयों में जा कर बच्चों को लेक्चर ( Advanced Lying, Narrative Building & Blind Bhakti ) दे सकते है, इससे हो सकता है की हमारे देश में कम से कम अंधभक्तों के लिए नए रोजगार के अवसर खुल जाए।
खैर मेरे अनुसार सरेंडर जी को ये करना चाहिए, ताकि बेरोजगारों को रोज़गार मिल सके!
क्या कहते हो?
The difference between India and Spain is glaring and unforgivable.
When a leader has spine, the entire nation stands tall and unstoppable.
When a leader is a spineless surrenderer, the whole country is forced to kneel and suffer.
We don’t want Narendra Modi and his endless capitulation.
We want our rights, our dignity, and our pride back.
Enough of this weak leadership that sells our future for photo-ops.
India deserves strength, not surrender.
#RejectWeakness #WeWantOurRights
Note:- In this screenshot you can compare the gas price of March 15th with today's gas price in Spain.
चित्रा त्रिपाठी जी,
पत्रकारिता कोई चाटुकारिता का आवरण नहीं है कि जब मन चाहे, सत्ता की प्रशंसा कर लो और जब मन भर जाए, तो किसी सत्ता पर कीचड़ उछाल दो।
आपका यह हमला सिर्फ एक महिला पर नहीं, बल्कि सच्चाई पर है। एक पत्रकार का सबसे बड़ा धर्म है, सत्य को बिना रंग-रूप बदले सामने रखना।
लेकिन जब आपकी क��म सत्ता की लय पर नाचती है, तो वह कलम पत्रकारिता की नहीं, बल्कि ग़ुलामी की मोहताज़ बन जाती है।
आपको पत्रकारिता के योग्य नहीं माना जा सकता जब तक आप खुलकर यह ना कह दें, मैं मोदी जी की या भाजपा की प्रवक्ता हूँ। कम से कम तब लोग तो आपको चापलूस नहीं कहेंगे, बल्कि ईमानदार कहेंगे।
अपनी जुबान का सम्मान करिए। वह आपकी अपनी है, किसी पार्टी की ग़ुलाम नहीं।
और हाँ आप से निवेदन है कि, पत्रकारिता को पत्रकारिता र��ने दीजिए। अगर सत्ता की सेवा ही आपका स्वभाव है, तो खुलकर मोदी जी की प्रवक्ता बन जाइए। वही आपके लिए सबसे सच्ची, सबसे सुरक्षित और सबसे उपयुक्त जगह है।
शर्म करिए।
कुछ तो अपनी आत्मा का भी ऋण चुकाइए। #JournalismNotPropaganda
जब उपराष्ट्रपति का पद भी जांच एजेंसियों की छाया में असुरक्षित हो जाए, तो लोकतंत्र का दावा कितना खोखला रह जाता है?
भारत का संविधान महज एक कागजी दस्तावेज नहीं—यह जीवंत मूल्यों, सिद्धांतों और संस्थागत स्वतंत्रता का प्रतीक है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ठीक कहा था: “संविधान कितना भी ��च्छा हो, अगर उसे लागू करने वाले लोग बुरे निकले, तो यह सबसे बुरा साबित होगा।” आज वही आशंका साकार होती दिख रही है।
जब संविधान के अनुच्छेद 63 के तहत निर्वाचित उपराष्ट्रपति, जो राज्यसभा के सभापति भी होते हैं, को अपनी स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनाए रखने के कारण जांच एजेंसियों (जैसे ED) की फाइलें दिखाकर इस्तीफे के ��िए मजबूर किया जाता है, तो हम लोकतंत्र की बात कैसे कर सकते हैं?
अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और केशवानंद भारती मामले (1973) में स्थापित मूल ढांचा सिद्धांत चीख-चीखकर कह रहे हैं, संस्थाएं सत्ता के अधीन नहीं, बल्कि संविधान के प्रति जवाबदेह होंगी।
क्या यह वाकई “कानूनी प्रक्रिया” है, या राजनीतिक असहमति को कुचलने का नया तरीका?
जब विपक्षी नेता, पूर्व चुनाव आयुक्त, संवैधानिक पदाधिकारी या यहां तक कि उपराष्ट्रपति जैसी ऊंची कुर्सी पर बैठे व्यक्ति भी ED-CBI जैसी एजेंसियों के दबाव में दिखते हैं, तो संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं। हम कैसे दावा करें कि हमारा लोकतंत्र निडर और मजबूत है?
लोकतंत्र की जान है— बहुलता, असहमति की जगह और शक्तियों का संतुलन। जब सत्ताधारी दल जांच एजेंसियों को हथियार बनाकर असहमति को दबा���े लगे, तो यह तानाशाही की ��र पहला कदम होता है। अंबेडकर की चेतावनी याद कीजिए: राजनीतिक लोकतंत्र बिना, सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र कभी फल-फूल नहीं सकता। आज राजनीतिक लोकतंत्र ही खतरे में नजर आ रहा है।
संविधान शक्ति के पृथक्करण (Separation of Powers) पर टिका है— कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका अलग-अलग, स्वतंत्र। लेकिन जब ED जैसी एजेंसियां संवैधानिक पदों पर दबाव बनाने लगें, तो यह पृथक्करण का खुला उल्लंघन है। यह सिर्फ किसी व्यक्त��� (जैसे जगदीप धनखड़) का नहीं, बल्कि पूरे संवैधानिक ढांचे का अपमान है।
आज सवाल यह है—
विपक्षी दल, नेता और संस्थाएं कितनी सुरक्षित हैं?
क्या सरकार संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ जांच एजेंसियों को “राजनीतिक हथियार” के रूप में इस्तेमाल नहीं कर रही?
जब तक ED-CBI जैसी संस्थाएं सत्ता के इशारों पर काम करती रहेंगी, तब तक हम “निष्पक्ष और स्वतंत्र प्रणाली” का दावा नहीं कर सकते।
जनता को जागना होगा। संवैधान��क नैतिकता और संस्थाओं की स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी। क्योंकि अगर आज उपराष्ट्रपति का पद सुरक्षित नहीं, तो कल राष्ट्रपति, न्यायाधी�� या कोई भी आम नागरिक सुरक्षित नहीं रहेगा।
“लोकतंत्र तब तक जीवित रहता है, जब तक असहमति व्यक्त करने का अधिकार जीवित है।” — जस्टिस हंसराज खन्ना
जय हिंद। जय संविधान।