Apple Just SCREWED India!
Yes, while the iPhone 18 Pro series and iPhone Duo launched at "reasonable" prices in the US, the Indian pricing just doesn't make sense at all.
It costs way more in India, and they have even increased older phones just like that. Even if that's fine, what do Apple accessories do?
The Type-C cable, Ear Cushions, Ear Tips, Cases and even the Air battery pack have gotten price hikes in India, while it didn't change at all for the US.
We have talked about everything in our latest video: https://t.co/aePB7Xk69n
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Banning Rapido, Uber and other cab aggregators from plying in Chandigarh city is ill-considered response that inconvenience citizens who depend on affordable, convenient transport and, more seriously, take away the livelihood of thousands of self-employed drivers..... 1/2
रिटायरमेंट के अगले दिन अडानी बोर्ड में बैठ जाना – ये संयोग नहीं, भ्रष्टाचार की संस्थागत डिजाइन है। पावर, पोर्ट, होम, फाइनेंस और SEBI जैसी संवेदनशील कुर्सियाँ संभालने वाले नौकरशाह आज "इंडिपेंडेंट डायरेक्टर" बन मोटी फीस बटोर रहे हैं। क्या सरकारी कुर्सी पर बैठकर अडानी को दी गईं लैंड-क्लियरेंस, पॉलिसी-सौगातें, भविष्य के पैकेज की अग्रिम किश्त नहीं थीं? कूलिंग-ऑफ पीरियड सिर्फ कागजों में है। VRS इनके लिए एंट्री-टिकट है। जहाँ आम आदमी 60 पर ठिठुर जाता है, वहीं ये रिटायर होकर करोड़ों कमा रहे हैं।
ये कोई एक-दो नाम नहीं, स्क्रीनशॉट में दो पेज की लंबी फेहरिस्त है। जब सिस्टम के संरक्षक ही सिस्टम लूटें, तो आम आदमी की सुनवाई कौन करेगा? "इंडिपेंडेंट" का टैग लगाकर अपने पुराने सिस्टम के सबसे बड़े लाभार्थी का हित करना निष्पक्षता नहीं, नौकरशाही का नैतिक दिवालियापन है। सवाल – क्या ये नौकरशाह सेवाकाल में निष्पक्ष थे, या रिटायरमेंट की सुनहरी जॉब के लिए पहले से पुल बना रहे थे? ये गठजोड़ देश की संस्थाओं की गरिमा को खोखला कर रहा है। ये रिवॉल्विंग डोर नहीं, लूट का खुला दरवाजा है।
हम ओर हमारी धर्म करने की परम्परायें कैसे प्रकृति को असंतुलित करती है।
चींटियों को आटा ओर शक्कर डालना,कबूतरों को चुग्गा डालना,कुत्ते को रोटी देना ओर बंदरों को केला खिलाना
हम कभी नहीं सुधरेंगे क्योंकि हमारे मस्तिष्क में यहीं सब भरा गया है
“गऊ हमारी माता है” नारे के परिणाम असली तबाही मचायेंगे
दिल्ली में अभी बच्चों की लाशें निकाली जा रही हैं और ये महामानव गुजरात में खिलखिलाता हुआ मस्त रील बनवा रहा है.
क्योंकि ये 'नाराज़ फूफा' नहीं है...ये 'मस्त मामा' है...जो हमेशा अपनी मस्ती में रहेगा, चाहे 7 बच्चे मर जाएँ, चाहे 700 किसान मर जाएँ.
दिल्ली के हादसे पर इस महामानव ने एक ट्वीट तक नहीं किया है. लेकिन अगर दिल्ली के इन्हीं बच्चों के किसी कॉलेज में भाषण देना हो या फीता काटना हो तो दौड़कर चला आएगा...
मस्तराम मस्ती में...
याद रखा जाएगा ना???...
सत्य निकेतन त्रासदी के बाद भी विश्वविद्यालय प्रशासन की संवेदनहीनता जारी है।
NSUI ने आज वाइस चांसलर के खिलाफ प्रदर्शन कर जवाबदेही तय करने की मांग उठाई। तीन दिन पहले छात्रों की मौत हुई है, लेकिन वाइस चांसलर पीड़ितों और छात्रों के सवालों का जवाब देने के बजाय कार्यक्रमों में व्यस्त हैं।
इससे बड़ी बेशर्मी और संवेदनहीनता क्या हो सकती है?
छात्रों की मौत पर जवाबदेही तय करनी पड़ेगी और जवाबदेही तय होकर रहेगी। NSUI छात्रों के न्याय की लड़ाई से पीछे नहीं हटेगी।
> Be a BJP Minister
> Wake up
> Send your kids abroad to study
> Share Modi’s Aurafarm edits
> Retweet Modi’s tweet
> Say nothing about current issues
> Compare India with Pak & Bangladesh
> Sleep
So basically, Youth cleans the drains voluntarily, and we pay life time salaries to municipalities and money assigned for this work is eaten by the counsellor..... Doesn't seem an ideal solution?
संसद की इमारत 1927 में बनी थी। उसकी हालत के कारण नई इमारत बनाने पड़ी। 2019 में नई संसद के निर्माण का काम शुरू हो गया।
नॉर्थ एवेन्यू स्थित सांसदों के घर तो आजादी के बाद बने थे। उनको भी तोड़ कर नया बना दिया गया है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी का पहला हॉस्टल" ग्वायर हॉल" साल 1937 में बना था। उसके बारे में कोई जिक्र ही नहीं कर रहा।
क्या इस हॉस्टल की मेंटेनेंस संसद भवन से भी ज्यादा अच्छी है?
BJP ने पीएम मोदी का सपना कुछ इस तरह पूरा किया।
बीजेपी के 290 बन चुके दफ्तर
105 निर्माणाधीन दफ्तर
123 के लिए जमीन खरीदी जा चुकी
काश पीएम मोदी ने छात्रों के लिए हॉस्टल बनवाने का सपना देखा होता!
12 साल में अगर एक दो हॉस्टल भी बनवा देते तो सत्य निकेतन हादसे में जान गवाने वाले बच्चों की जान बच जाती।